July 7, 2022

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भारतीय संसद की उत्पादन क्षमता

जनवरी, 2011 में ब्रिटेन के उच्च सदन हाऊस ऑफ लार्ड में संसदीय मतदान प्रणाली में सुधार और निर्वाचन क्षेत्रों के सीमांकन से संबंधित एक बिल पर लगातार 21 घंटी लंबी बहस हुई थी। 17 जनवरी को शाम 3.48 मिनट पर शुरू हुई यह बहस रातभर जारी रही और अगले दिन दोपहर एक बजे के बाद ही खत्म हो सकी। इस दौरान आलम यह था कि बहुत से सदस्य बहस के दौरान देर रात उंघते नजर आए।

 

इसके अगले दिन पूर्व लेबर मंत्री लॉर्ड नाइट ने अपने ब्लॉग में लिखा, ‘यह शर्म की बात है कि सरकार इस बिल पर समझौते को तैयार नहीं है,जिसकी वजह से गतिरोध बना हुआ है और नतीजतन लॉर्ड्स (सदस्यों) को पूरी रात जागना पड़ा। यह हममें से किसी के लिए अच्छा नहीं है और इससे सदन की प्रतिष्ठा पर भी आंच आती है।’ (http://www.dailymail.co.uk/news/article-1348216/Oh-Lord-weve-night-18-hour-debate-voting-reform-rumbles-Parliament-peers-grumpy.html)

वैसे यह ब्रिटिश संसद की सबसे लंबी बहस नहीं थी। इससे पहले 10-11 मार्च, 2005 को आतंकवाद के विरुद्ध लाए गए एक बिल पर लगातार करीब 33 घंटे लंबी बहस हो चुकी है!

अब जरा हम हाल ही में संपन्न हुए संसद के शीतकालीन सत्र पर नजर डालें, तो पता चलता है कि हमारे यहां संसद में लगातार न केवल बहस का समय घट रहा है, बल्कि उसका स्तर भी गिर रहा है। पीआरएस लेजिसलेटिव रिसर्च के मुताबिक संसद में तय कामकाज के मुताबिक राज्यसभा में जहां सिर्फ 46 फीसदी ही काम हो सका, वहीं लोकसभा में 102 फीसदी काम हुआ! लोकसभा में प्रश्नकाल के लिए तय समय में से 87 फीसदी में काम हुआ, वहीं राज्यसभा में सिर्फ 14 फीसदी। मानसून सत्र की तुलना में फिर भी यह सत्र काफी उपयोगी साबित हुआ है।

यह स्थिति क्या बताती है? इस प्रश्न का जवाब दो तरह से दिया जा सकता है। एक तो यह कि लोकसभा में सरकार का बहुमत है इसलिए वहां कामकाज हो रहा है, वहीं चूंकि राज्यसभा में विपक्ष बहुमत में है, वह सरकार को काम नहीं करने दे रहा है। दूसरा जवाब यह भी है कि चूंकि लोकसभा में सरकार का बहुमत है, इसलिए वह विपक्ष की परवाह नहीं कर रही है।

यदि भारतीय संसद के इतिहास को देखें तो पता चलता है कि पिछली यानी 15वीं लोकसभा में सबसे कम काम हुआ था। उस वक्त कांग्रेस की अगुआई वाला यूपीए सत्ता में था और भाजपा की अगुआई वाला राजग विपक्ष में।

संसद का काम कानून बनाना है, और देशहित के मुद्दों पर बहस करना है। वास्तव में संसद के भीतर होने वाले काम का संबंध चुनाव सुधार से जुड़ा हुआ है। जब तक अच्छे लोग चुनकर नहीं आएंगे, संसद के भीतर अच्छी बहस भी सुनने को नहीं मिलेगी। ऐसा नहीं है कि अबके दौर से पहले चुने जाने वाले सभी लोग पढ़े लिखे और विद्वान ही थे। पढ़ने लिखने का आशय सिर्फ डिग्रियों से नहीं है, ग्रास रूट पर काम करने से भी है। आज ऐसी कितनी पार्टियां हैं, जो जमीनी स्तर पर काम करने वाले कार्यकर्ताओं को संसद तक पहुंचा रही हैं?

सदन के भीतर बहस का स्तर गिर रहा है, तो इसकी सबसे बड़ी वजह यह है कि सदस्य अब पूरी तैयारी के साथ सदन में नहीं जा रहे हैं। संसद की अपनी समृद्ध लाइब्रेरी है, वहां अब आपको बहुत कम सांसद नजर आएंगे। राम मनोहर लोहिया कोई बहुत लंबे समय तक संसद में नहीं थे, लेकिन उनके भाषणों को आज भी याद किया जाता है। उनके अलावा मधु लिमये, मधु दंडवते, इंद्रजीत गुप्त, अटल बिहारी वाजपेयी, जॉर्ज फर्नांडीज, सोमनाथ चटर्जी जैसे नेता भी बहस के लिए पूरी तैयारी से सदन में जाते थे और पूरे रेफरेंस के साथ अपनी बात रखते थे।

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इसी वर्ष 15 अगस्त के मौके पर एक अंग्रेजी दैनिक ने स्वंतत्रता प्राप्ति के बाद की संसद में दिए गए सात श्रेष्ठ भाषणों की सूची दी थी। इसमें 14 अगस्त की मध्य रात्रि को दिया गया प्रथम प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू का मशहूर भाषण जिसे नियति से साक्षात्कार के नाम से जाना जाता है, शामिल था। इसके अलावा 25 नवंबर, 1949 को संविधान सभा में दिया गया डॉ भीमराव अंबेडकर का भाषण, जिसमें उन्होंने स्वतंत्रता आंदोलन के सत्याग्रह और नागरिक अवज्ञा जैसे आंदोलनों का जिक्र करते हुए कहा था कि जब आर्थिक और सामाजिक उद्देश्यों को प्राप्त करने का सांविधानिक रास्ता नहीं था, तब तक असांविधानिक विकल्पों को जायज ठहराया जा सकता था, लेकिन सांविधानिक विकल्पों के रहते इन्हें न्यायसंगत नहीं ठहराया जा सकता।

इन श्रेष्ठ भाषणों में स्वतंत्र पार्टी से कभी गोधरा का प्रतिनिधित्व कर चुके पीलू मोदी का एक भाषण, पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी का उनकी 13 दिन की पहली सरकार के पतन के समय 1 जून, 1996 को दिया गया भाषण, दिवंगत पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी का 1971 को बांग्लादेश युद्ध पर हुई जीत के बाद दिया गया भाषण भी है।

इसमें राम मनोहर लोहिया का 1963 में संसद में दिए गए पहले भाषण को भी रखा गया है, जिसमें उन्होंने कहा था कि देश की 27 करोड़ जनता तीन आना रोज पर जीवनयापन को मजबूर है, वहीं प्रधानमंत्री नेहरू की सुरक्षा पर 25000 रुपये रोज खर्च होते हैं। इसके जवाब में नेहरू ने कहा था कि देश के नागरिकों की औसत आय 15 आना रोज है। यह बहस तीन आना पंद्रह आना के नाम से मशहूर हुई। इस सूची में आखिरी भाषण उमर अब्दुला का था, जोकि उन्होंने 2008 में दिया था और जिसमें उन्होंने कहा था कि आई एम ए मुस्लिम ऐंड आई एम इंडियन।

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यह सूची और लंबी हो सकती है। वास्तव में संसद कोई फैक्टरी नहीं है कि उसकी उत्पादन क्षमता को घंटों से आंका जाए। लेकिन इन दिनों समाचार टीवी चैनलों में जो बहसें और रिपोर्ट दिखाई जाती हैं, उससे लगता है कि मानो संसद कोई फैक्टरी है और वहां से माल बनकर तैयार नहीं हो रहा है!

संसद को चलाने की जिम्मेदारी सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों की है। उन्हें समझने की जरूरत है कि इसी से उनकी साख भी जुड़ी हुई है। और हां, हमें ऊंघती हुई नहीं, जीवंत संसद चाहिए।

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