June 29, 2022

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भारत में मतदान प्रतिशत बढ़ाने के लिए जरूरी है कि आनलाइन वोटिंग की सुविधा उपलब्ध कराई जाए.

दुनिया में लोकतंत्र के लिए ऑनलाइन वोटिंग कोई नई बात नहीं है। दुनिया के कई देश इसको अभी आजमा रहे हैं। दरअसल वहां प्रयोग हो रहा है। मसलन ऑस्ट्रेलिया, स्वीडन और इस्टोनिया आदि देश शामिल हैं। शहर में इन दिनों वित्तीय गतिविधियां कैशलेस अर्थात ऑनलाइन पर जोर है। ऐसे में ऑन लाइन वोटिंग पर बहस भी अनिवार्य और प्रासंगिक बनती जा रही है। हालांकि अधिकतर विशेषज्ञों का कहना है कि इसकी डगर बहुत मुश्किल है।

 

लोकसभा चुनाव के छठे चरणों के चुनावों में पूरे देश में मुद्दे भले ही अलग-अलग रहे हों पर एक बात लगभग सारे देश में एक जैसी ही रही कि वोटरों ने अपने घरों से निकल कर पोलिंग बूथ तक जाने में कम रूचि दिखाई। इसकी वजह मौसम को बताया गया। नेताओं, अभिनेताओं, स्वयंसेवी संगठनों और एनजीओ की लाख कोशिशों के बावजूद वोट प्रतिशत नहीं बढ़ा।

 

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कई जगहों पर तो यह पिछले चुनाव से भी कम हो गया। फिल्मी सितारों की अपीलें और प्रियंका गांधी जैसी युवा नेता की विनती भी वोटरों को पोलिंग बूथ तक नहीं ला पाईं। शायद अब समय कुछ नया सोचन का है। इस बार की सारी कोशिशें पुराने तौर-तरीकों में नया जोश भरने भर की ही थीं। और यह भी साफ हो गया कि इस तरीके में बहुत ज्यादा कुछ हासिल करने की संभावनाएं नहीं हैं। जमाना बदल गया है, इसलिए पुराने तौर-तरीकों से आगे बढ॥कर कोई पहल करनी होगी। आज दुनिया भर के कई विकसित लोकतंत्र ई-वोटिंग के विकल्प पर विचार कर रहे हैं। कई देशों में तो ई-वोटिंग शुरू भी हो चुकी है। इंटरनेट की बढ़ती लोकप्रियता ने ई-डेमोक्रेसी के कॉन्सेप्ट को जन्म दिया है। इंग्लैंड में 2007 के निकाय चुनावों में वोट डालन के लिए परम्परागत तरीके के अलावा ई-वोटिंग का भी सहारा लिया गया। इसके लिए ब्रिटिश सरकार ने 65 अलग-अलग जगहों पर 300 लैपटॉप और कंप्यूटरों की व्यवस्था करवाई। इन लैपटॉप और कंप्यूटरों का इस्तेमाल लोगों ने साइबर कैफे की तर्ज पर किया। वहां पर पहुंचकर लोगों ने अपना वोट एक क्िलक के जरिये ज्यादा आसानी से डाला। इंग्लैंड के अलावा स्वीडन,नीदरलैंड और स्विट्जरलैंड में भी वोट डालन के लिए इंटरनेट का इस्तेमाल शुरू हो चुका है। मेरिका में पिछले दिनों हुए राष्ट्रपति चुनावों में बराक हुसैन ओबामा ‘लेट्स ब्रिंग द चेंज’ के नारे के साथ चुनावो में उतरे। कई अन्य बदलावों के अलावा उनकी टीम ने इंटरनेट तकनीक को भी तेज विकास और परिवर्तन का जरिया बनाया। युवाओं को रिझान के लिए ओबामा की टीम ने ऑनलाइन केंपेनिंग की। ओबामा एक उम्मीदवार के तौर पर फेसबुक, माई स्पेस और लिंक्ड इन जैसी साइट्स पर हमेशा मौजूद रहे। यहां तक कि उन्होंने पार्टी के लिए 600 मिलियन डॉलर चंदा भी ऑनलाइन इकट्ठा किया। ऐसा नहीं है कि इन सबसे हमारे देश के नेता अंजान है। इन आम चुनावों में लगभग हर राष्ट्रीय पार्टी ने प्रचार के लिए इंटरनेट का सहारा लिया है। भारतीय जनता पार्टी के पीएम इन वेटिंग लालकृष्ण आडवाणी से लेकर तमाम दूसर नेताओं तक ने अपनी बात जनता के सामने रखन के लिए अपनी साइट्स लांच की। उधर, कांग्रेस की शीला दीक्षित ने भी बड़े शहरों में रह रहे युवा वोटरों तक पहुंचने के लिए इंटरनेट के महत्व को समझा। यू-टय़ूब जैसी फेमस साइट्स पर पार्टियों और नेताओं के फुटेज देखे जा सकते हैं। यानि 200े आम चुनावों में एक खास वर्ग तक अपनी बात पहुंचाने के लिए इंटरनेट का इस्तेमाल किया जा रहा है,लकिन इंटरनेट के जरिये वोट डालना कब तक शुरू होगा?

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ये एक सवाल है, जिसे अपने मतदान अधिकार क्षेत्र से दूर रह रहे मतदाता जानना चाहते हैं। क्या ये अगले आम चुनावों तक संभव हो पाएगा? हालांकि इंटरनेट का विस्तार अब लगभग पूर देश में हो गया है, लेकिन इसकी अच्छी बैंडविड्थ और भरोसेमंद सेवा अभी भी हर जगह उपलब्ध नहीं है। डिािटल डिवाइड का सवाल अभी भी बना हुआ है। भले ही कई इलाकों में इंटरनेट पंहुच चुका है, लेकिन फिर भी आबादी के एक बड़े तबके के लिए अभी भी कंप्यूटर इंटरनेट एक अजूबे की तरह है। उसके बावजूद कई विशेषज्ञों की राय है कि अगर ऑन लाइन वोटिंग शुरू होती है तो उसका लाभ देश के कम स कम 20 फीसदी लोग उठा सकते हैं। जब एक-एक वोट मायने रखता है तो 20 फीसदी से तो राजनैतिक समीकरण ही बदल सकते हैं।

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यह तरीका खासकर शहरी क्षेत्रों में ज्यादा उपयोगी हो सकता हैं, जिनके लिए वोट डालने के तमाम अभियान चले और नाकाम रहे। जब वोटरों का एक खास तबका एसी की ठंडक छोड़, धूप में बाहर आकर वोट डालना नहीं चाहता तो क्यों न इंटरनेट के जरिये उनके घरों तक पहुंचकर उनका वोट ले लिया जाए। इस सुविधा के शुरू होने से एनआरआई, सैनिक और अपने होम टाउन से दूर रह रहे लोग भी मताधिकार का इस्तेमाल कर पाएंगे। वैसे यह मसला सुविधासंपन्न वर्ग को एक और सुविधा सौंपने भर का नहीं है। यह मसला लोकतंत्र की व्यवस्थाओं को आधुनिक तकनीक से जोड़ने का भी है। जो अगर चल गया तो चुनाव के खर्च और भारी ताम-झाम को कम कर सकता है।

 

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