June 29, 2022

Such Ke Sath

सच के साथ

भू-धर्म की आवश्कता क्यों ?Why the Earth Religion
सामने है क्यों उसे लोग बुरा कहते है जिसको देखा ही नहीं उसको खुदा कहते है।

1- जीवन की उत्पत्ति के बारे विज्ञान ने सिद्ध किया कि करीब 4,80,000 वर्ष पूर्व पृथ्वी ग्रह का निर्माण हुआ एवं इस प्रकार पृथ्वी के लगभग 70 प्रतिशत भाग पर जल व 30 प्रतिशत भाग पर स्थल भाग का निर्माण हुआ। पृथ्वी के उपर जल में सर्वप्रथम प्रोटीन, प्रोटीन के बाद एककोशीय,बहुकोशीय एवं क्रमशः विकास के फलस्वरुप प्रकृति में मानव जीव अस्तित्व में आया। मानव की उत्पत्ति के बाद, क्रमशः परिवार, समाज, राज्य, देश व विश्व का निर्माण हुआ। मानव के अवचेतन मन में कहीं न कहीं, उत्पत्ति सिद्धांत समाया हुया है इसलिये सभी धर्म में ऐंसा माना जाता कि ईश्वर या खुदा,भगवान एक है अर्थात सृष्टि का सृजन करता एक है। एक प्रयोग के द्वारा एक अध्ययन किया जाये कि एक बच्चा या बच्चो के समूह को जन्म से ही धर्म के बारे में बताया ही न जाये एवं आभार,पूजा या उपासना के बारे में उनसे विचार लिये जाये,तब शायद- सबसे प्रथम माता,पिता,परिवार,समाज,अन्य जीवों एवं प्रकृति को ही महत्वपूर्ण मानेंगें। अर्थात हमें जन्म से ही एक विशेष धर्म से जुडने का कारण हमें जो सिखाया जाता है उसी से बंध के ही रह जाते है एवं अवचेतन मन गांठ तैयार हो जाती है। इसके विपरीत यह भी सिखाया जाता कि स्यवं का धर्म श्रेष्ठ व दूसरे का धर्म गलत या कमजोर है एवं इससे मन व मतिष्क में स्यवं के धर्म के प्रति अंधा लगाव एवं अन्य धर्म के प्रति इर्षा,नफरत पैदा हो जाती है एवं मानव मानव का दुश्मन बन जाता है। वर्तमान समय में अलग अलग धर्मो में नफरत,घृणा होना तो दूर की बात है वरन एक ही धर्म लोग भी आपस में लडते मरते रहते है।

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2- धर्म अर्थात धारण करना अर्थात ऐंसे सिद्धांत या नियम जिससे शारीरिक , मानसिक, आध्यात्मिक, सामाजिक ,भौतिक या पराभौतिक हित जुडा हो। इस प्रकार मानव सहित सभी जीवों का जन्म पृथ्वी पर होता है व जीवन पूर्ण करने करने के लिये आवश्यक कारक अर्थात भोजन , पानी, वायु एवं जीवन के आवश्यक रोटी, कपडा, मकान, अन्य वस्तुयें ,परिस्थीतियां माँ पृथ्वी से ही पूर्ण होती है। जीवन पूर्ण होने के बाद पंच तत्व से निर्मित शरीर पृथ्वी व पृथ्वी से संबंधित कारको में समा जाता है अर्थात जीवन की शुरुआत पृथ्वी से प्रारंभ व पृथ्वी पर ही पूर्ण होती है। जन्म देने वाली को दुनिया में माँ कहा जाता है तब सभी जीवों को जन्म देने वाली एवं पालन पोषण करने वाली पृथ्वी दुनिया की माँ है, शायद इस सत्य से सभी सहमत होगें। समाज में व्यक्तिगत माँ के लिये संतान के कुछ कर्तव्य होते है तब फिर सभी के माँ पृथ्वी के लिये भी कर्तव्य होना चाहिये। समस्त विश्व के सभी विज्ञानिको ,बुद्धिजीवियों, समाज सेवियों, विचारको का ध्यान, बदलते पर्यावरण एवं भविष्य में आने वाले दुष्प्रभावों पर हैं , सभी विश्व एकमत है ,विभिन्न सम्मेलनों के द्वारा विचार कर रहे है कि यदि समस्त मानव समाज ने समय रहते ही उचित निर्णय नहीं लिया तो आने वाला प्राकृतिक अंसुलन के दुष्प्रभावों से पूरी दुनिया के भविष्य में बहुत ही भयाभय, भंयकर सृष्टि विनाशक परिणाम आने वाला है एवं जिसके लिये पूरे विश्व के मानव जिम्मेदार होंगें। शायद जब यह समय आयेगा कोई परमेश्वर,ईश्वर,खुदा,भगवान बचाने के लिये नहीं आयेगा क्योंकि सभी धर्म सिद्धांत यही कहते है कि बुरे कर्म का बुरा फल व अच्छे कर्म का अच्छा फल प्राप्त होता है। सर्वे भवन्तु सुखिनः,सर्वे सन्तु निरामयाः,सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मा कश्चित दुःभागभवेत अर्थात समस्त विश्व सुखी हो,समस्त विश्व निरोगी हो, सभी प्रेम से रहें, विश्व में किसी को भी शारीरिक ,मानसिक कष्ट न हो,इस उदेश्य से पूर्ण कुछ ऐंसे कार्य या सिद्धांत होने चाहिये एवं सिद्धातों को हम सभी धारण करें तो निश्चित ही जिस स्वर्ग की कल्पना विभिन्न धर्म ग्रथों में की है,वह स्वर्ग निश्चित ही हमारी पृथ्वी पर निर्मित होगा।

 

अयं निजपरो वेति गणना लघुचेतसाम | उदाचरितानाम तु वसुधैव कुटुम्बकम|

 

यह मेरा ,यह तुम्हारा ,इस प्रकार के तुच्छ विचार ,सामान्य अर्थात संकीर्ण विचार धाराओं वाले के होते है,लेकिन उच्च सोच व वृहत विचार धाराओं वाले के लिए लिए समस्त विश्व एक परिवार के सामान है|

प्रकृति से मानव व सभी जीव पैदा होते है ,प्रकृति ही सभी जीवों का पालन करती है एवम अंतिम समय में सभी माँ प्रकृति की गोद में समां जाते है ,जो की प्रकृति का अटल सिद्धांत है एवम सभी जीवों पर लागू होता है | लेकिन वर्तमान समय में मानव अपने अहम की संतुष्टि व स्वार्थ के कारण , धर्म के नाम पर मनुष्य को मनुष्य का शत्रु बना दिया है, जिसके परिणाम स्वरूप एक ओर प्रेम ,शांति,करूणा,एकता व आपसी सामंजस्य में कमी आ रही है एवम दूसरी ओर मनुष्यों में मनुष्यों के प्रति ही घ्रणा व नफरत में तीव्र गति से वृद्धि हो रही है |

मैने लगभग सभी धर्म ग्रंथो के अध्ययन का प्रयास किया एवम पाया की सभी धर्मो व मजहब में प्रेम, त्याग, सेवा, करुणा, सहायता, अंहिसा,एकता ,प्रकृति व प्रकृति की समस्त चीजों से प्रेम का ही महत्व बताया गया है। विश्व में एक भी धर्म या मजहब नहीं जिसमें अहं ,हिंसा ,फूट ,धोखा,छल , कपट, को महत्व दिया हो या करने की बात को महत्व दिया हो लेकिन धर्म के ठेकेदारों ने स्यवं के स्वार्थ के लिये मानव समाज को बहुत से समूह में बाटकर एक दूसरें का दुश्मन बना दिया।

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हे मानव तेरे पास ज्ञान,धन,पद,ताकत जो भी है वह सभी प्रकृति अर्थात माँ पृथ्वी की देन है,विश्व में कोई भी धर्माधीश,ज्ञानी,वैज्ञानिक ,नेता,व्यापारी अन्य व्यक्ति एक बूँद जल या एक बूँद रक्त या एक छोटा सा पेड या भोजन का एक कण पैदा नहीं कर सकता,न हीं एक सेकन्ड के लिये प्राण वायु बिना जीवित नहीं कर सकता है, तो फिर किस बात का अंह पाल रहा है। हे मानव जब तूँ कुछ पैदा नहीं कर सकता है ,तो तुझे झीनने का कोई अधिकार नहीं है। जब तु एक जीव को पुनर्जीवित नहीं कर सकता है, तो तुझे जीवों को मारने का कोई अधिकार नहीं है।

हे मानव! सर्वप्रथम स्यवं से प्रेम कर ,परिवार से प्रेम कर, पडोस से प्रेम कर,समाज से प्रेम कर, अपने ग्राम या शहर से प्रेम कर, अपने राज्य व देश से प्रेम कर ,विश्व से प्रेम कर एवं पृथ्वी की समस्त चीजो से प्रेम कर… इस प्रकार धीरे धीरे प्रेम के सागर में गोता लगाये जा, एक दिन सारी दुनिया प्रेम हो जायेगी। जिसके परिणाम स्वरुप ईश्वर, खुदा,प्रभु व परम पिता, भगवान जिसको हम विभिन्न नामो से पुकारते है उसकी कृपा सभी के उपर अवश्य बरसेगी।

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