June 29, 2022

Such Ke Sath

सच के साथ

मजबूरी और मजदूरी

प्रशासन ने मान लिया है कि मेघालय में जमीन की असीम गहराई में एक महीने से अधिक समय तक पानी में डूबी मासूमों की लाशें इस लायक भी नहीं हैं कि उनको बाहर निकालकर उनका अंतिम संस्कार किया जा सके। अब समय है कि इस पूरे कारोबार पर नजर डाली जाए। जहां मेघों का डेरा रहता है, वहां पेट पालना इतना जटिल है कि 14-15 साल के बच्चों को कोयले की ऐसी खदानों में उतार दिया जाता है। इस अवैध काम में न तो कोई सुरक्षा है और न ही जिंदगी का कोई भरोसा। चूहे के बिल के आकार की इन संकरी खदानों में बच्चों को खोदने का एक उपकरण लेकर उतार दिया जाता है। यही नहीं, इस अवैध खदान से नदी दूषित हो रही है, हवा-जमीन भी नष्ट हो रही हैं। यह ऐसी जगह है, जहां राष्ट्रीय हरित अभिकरण यानी एनजीटी की पाबंदी भी कोई मतलब नहीं रखती। पिछले दिनो मेघालय की सिविल सोसायटी द्वारा सुप्रीम कोर्ट में प्रस्तुत रिपोर्ट बताती है कि एनजीटी द्वारा पाबंदी लगाने के बाद भी 65 लाख, 81 हजार, 147 मीट्रिक टन कोयले का खनन किया गया।

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मेघालय पर्वतीय क्षेत्र है और दुनिया में सबसे ज्यादा बरसात वाला इलाका कहलाता है। यहां छोटी-छोटी नदियां और सरिताएं हैं, जो यहां के लोगों को जीविकोपार्जन के लिए फल-सब्जी व मछली के साधन देती हैं। मेघालय जमीन के भीतर छिपी प्राकृतिक संपदा के मामले में बहुत संपन्न है। यहां चूना है, कोयला है और यूरेनियम भी है। शायद यही नैसर्गिक वरदान अब इसके संकटों का कारण बन रहा है। सन 2007 में ही जब पहली बार लुका व मिंतदु नदियों का रंग नीला हुआ था, तब इसकी जांच प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने की थी। मेघालय राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने 2012 की अपनी रिपोर्ट में इलाके में जल प्रदूषण के लिए कोयला खदानों से निकलने वाले अम्लीय अपशिष्ट और अन्य रासायनिकों को जिम्मेदार ठहराया था।

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अभी हालत यह है कि राज्य में प्रत्येक एक वर्ग किलोमीटर में 52 रैट होल खदानें हैं। अकेले जयंतिया हिल्स पर इनकी संख्या 24,626 हैं। ये खदानें दो तरह की होती हैं। पहली किस्म की खदान बमुश्किल तीन से चार फीट की होती है। इनमें श्रमिक रेंगकर घुसते हैं। साइड कटिंग के जरिए मजूदर को भीतर भ्ोजा जाता है और वे तब तक भीतर जाते हैं, जब तक कि उन्हें कोयले की परत नहीं मिल जाती। वैसे मेघालय में कोयले की परत बहुत पतली है, कहीं-कहीं तो महज दो मीटर मोटी। इसमें अधिकांश बच्चे ही घुसते हैं। दूसरी तरह की खदानों में आयताकार आकार में 10 से 100 वर्गमीटर माप में जमीन को काटा जाता है और फिर उसमें 400 फीट गहराई तक मजदूर जाते हैं। यहां मिलने वाले कोयले में गंधक की मात्रा ज्यादा है और इसे दोयम दर्जे का कोयला कहा जाता है। तभी यहां कोई बड़ी कंपनियां खनन नहीं करतीं। ऐसी खदानों के मालिकों में लगभग सभी राजनीतिक दलों के लोग हैं और इनके ज्यादातर श्रमिक बांग्लादेश, नेपाल से आए अवैध घुसपैठिए होते हैं।

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एनजीटी द्वारा खनन पर रोक के बाद मेघालय की पिछली सरकार ने प्राकृतिक संसाधनों पर स्थानीय आदिवासियों के अधिकार के कानून के तहत इस तरह के खनन को वैध रूप देने का प्रयास किया था, लेकिन कोयला खदान (राष्ट्रीयकरण) अधिनियम के तहत कोयला खनन के अधिकार, स्वामित्व आदि हित केंद्र सरकार के पास सुरक्षित हैं, सो राज्य सरकार इस अवैध खनन को वैधता का जामा नहीं पहना पाई। लेकिन गैर-कानूनी खनन, संकलन और पूरे देश में इसका लदान चलता रहा। वह तो दिसंबर के दूसरे सप्ताह में शिलांग से कोई 80 किलोमीटर दूर जयंतिया हिल्स की लुमथारी गांव की अवैध खदान में 15 नाबालिग मजदूर फंस गए। उनको निकालने के लिए ओडिशा, पश्चिम बंगाल की सरकारें, आपदा प्रबंधन विभाग और नौसेना ने ऑपरेशन चलाया और उसी समय एक जनहित याचिका में मामला सुप्रीम कोर्ट में आया, वरना इसकी कभी चर्चा भी नहीं होती। ज्यादा चिंता यह है कि कोयले की कालिख राज्य की जल निधियों की दुश्मन बन गई है। मेघालय ने गत दो दशकों में कई नदियों को नीला होते,उसके जलचर मरते और आखिर में जलहीन होते देखा है।

(यह लेखक के अपने विचार हैं)

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