January 18, 2021

Such Ke Sath

सच के साथ – समाचार

मूर्ख होने और बने रहने में फर्क है। मूर्खों पर हंसना आसान है, लेकिन यह अंदाज लगाना मुश्किल है कि कई लोग मूर्ख होते नहीं, मूर्ख बने रहकर अपने लिए एक आसान जिंदगी और दुनिया भी बना लेते हैं। विवेक कुमार ले जा रहे हैं आपको बिना कजा, पूरा मजा वाली इस दुनिया में :

आठ साल तक अमेरिका के राष्ट्रपति रहे जॉर्ज बुश ने 12 जनवरी 2009 को वॉशिंगटन में एक भाषण दिया। ऊटपटांग अंग्रेजी में कही गई उनकी एक उक्ति का अगर अनुवाद करने की कोशिश करें तो कुछ ऐसा होगा : ‘मैं आपको बता रहा हूं कि एक दुश्मन है, जो अमेरिका और अमेरिकियों पर फिर से हमला करना चाहता है। बस है। यही दुनिया की सचाई है। और मैं उसे ऑल द वेरी बेस्ट विश करता हूं।’


सुनने वालों ने फौरन आइन्स्टाइन को प्रणाम किया। वह कह गए हैं कि दो ही चीजें अनंत हैं, एक यूनिवर्स और दूसरी मूर्खता। इनमें से भी पहली के बारे में पक्का नहीं पता। वैसे इतनी समझदार-सी सुनाई देने वाली बात कहने वाले इन साहब की मूर्खताओं के भी कई किस्से हैं। क्योंकि मूर्खता के बारे में समझदारी से बात हो ही नहीं सकती। मूर्खता भी तो रेलेटिव है ना। लिहाजा लिखने से पहले ही मान चुका हूं कि मैं मूर्ख हूं। आप भी पढ़ने से पहले यह मूर्खतापूर्ण सलाह मान लें, तो पढ़ने में मजा आएगा। ऐसा इसलिए क्योंकि यह कोशिश है दुनिया को मूर्खालय साबित करने की। और कहीं यह मूर्खतापूर्ण कोशिश कामयाब हो गई तो आपको बड़ा घरेलू-सा अहसास होगा।


तो साहेबान, जैसा कि चलन है, सब कुछ परिभाषित होता है, ऑक्सफर्ड की डिक्शनरी के हिसाब से। (क्या मूर्खता है!) देवी ऑक्सफर्ड कहती हैं कि स्टूपिड यानी मूर्ख वह है, जिसमें कॉमन सेंस की कमी हो। और अंग्रेजी का मुहावरा सुनते ही हैं कि कॉमन सेंस तो बहुत कम पाई जानी वाली चीज है (कॉमन सेंस इज नॉट सो कॉमन)। यानी ज्यादातर लोग उसी कैटिगरी में आते हैं, जिसमें वे अक्सर अपने अलावा अधिकतर लोगों को रखते हैं। और गलत नहीं रखते। इटली के आर्थिक इतिहासकार कार्लो मारिया सिपोला ने इसे बाकायदा सिद्ध किया है। उन्होंने बड़ा बवालिया लेख लिखा था, मूर्खता के नियम नाम से। गणितीय तर्कों के आधार पर सिपोला ने मूर्खता के पांच नियम सिद्ध किए। पहला ही नियम है कि हमेशा और हर शख्स अपने आसपास मौजूद मूर्खों की तादाद को कम करके आंकता है। जानकर खुशी हुई न? आप ठीक ही समझते हैं कि आपके पड़ोसी मूर्ख हैं। और आप यह सोचकर भी खुश हो सकते हैं कि उसे शायद सिपोला के नियमों की जानकारी न हो।

तब भी कोई बड़ी बात नहीं है। जिस वक्त में हम जी रहे हैं, वह मूर्खता को सेलिब्रेट करने का ही तो युग है। यह इंसानी बुद्धिमानी को सबसे कम करके आंकने का युग है। ज्यादातर लोग ज्यादातर लोगों को मूर्ख समझते हैं। ज्यादातर लोग ज्यादातर लोगों को मूर्ख बनाते हैं। जैसे टीवी प्रोग्राम बनाने वाले मानते हैं कि दर्शक लड़ना-झगड़ना, गाली गलौज या सेक्स देखकर खुश होते हैं, या उन्हें इतना ही समझ आता है। हॉलिवुड की पिछले एक दशक की सबसे ज्यादा कमाई करने वाली फिल्में कॉमिक्सों या बच्चों की कहानियों से प्रेरित हैं। जितनी भी साइंटिफिक खोज हो रही हैं, उनमें इंसान को मशीनों पर निर्भर करने का दर्शन काम कर रहा है, ताकि मेहनत और दिमाग कम-से-कम लगाना पड़े। बड़ों की समझ पर भरोसा ही नहीं है। और भरोसा किया जा सकता है क्या? इन बड़ों के समझदारी भरे फैसलों का नतीजा है: बम कम नहीं हो रहे, समुद्र का पानी शहर डुबोने को बेकरार है, आतंकवादी दर्जन के हिसाब से मिलने लगे हैं। लेकिन दुनिया तो चल ही रही है। जब इंसान की समझदारी नापने के लिए फ्रांस में एल्फ्रेड बिनेट ने आईक्यू टेस्ट ईजाद किया तो उसके आधार पर अमरीकियों को सबसे ज्यादा मूर्ख कहा गया। उन्हीं अमरीकियों ने पूरी सदी दुनिया पर दादागीरी चलाई है। श्रद्धेय बुश के बारे में तो बात हो ही चुकी है! मुख्तसर सी बात है। इंसान कुदरती तौर पर मूर्ख है। मूर्खता में उसे आनंद आता है। खुद को मूरख, खल, कामी कह लेने से जगदीश मिलते हैं! साइंस कहती है कि पिछले 100 बरस में इंसान सबसे ज्यादा बुद्धिमान हुआ है। और इन्हीं 100 बरसों में वह मूर्खता का सेलिब्रेशन चरम पर ले आया है। लेकिन शायद इंसान डरपोक हुआ है। जिंदगी आसान होने से रिस्क लेने की हिम्मत कम हुई है। मूर्खता में रिस्क कम है। आप खुद को मूर्ख दिखाकर जिम्मेदारी से बच सकते हैं। और दूसरों को मूर्ख समझकर मजा ले सकते हैं। बिना कजा, पूरा मजा!

मूर्खता के पांच नियम


इटली के आर्थिक इतिहासकार कार्लो मारिया सिपोला को उनकी अर्थशास्त्र संबंधी मान्यताओं से ज्यादा उनके ‘मूर्खता के नियमों’ ने मशहूर कर दिया। उन्होंने द फंडामेंटल लॉज़ ऑफ ह्यूमन स्टूपिडिटी नाम से एक लेख लिखा। इस लेख में उन्होंने लगभग सारी दुनिया को मूर्ख साबित करने की कोशिश की। बवाल भी हुआ। उनके निष्कर्ष थे :

  • हमेशा और हर कोई अपने दायरे में मौजूद मूर्खों की तादाद को कम करके आंकता है।
  • कोई शख्स मूर्ख होगा, इसका उसके और किसी गुण से कोई लेना-देना नहीं है। यानी वह कुछ और होते हुए भी मूर्ख हो सकता है।
  • मूर्ख शख्स बिना किसी फायदे के भी किसी दूसरे शख्स का या समूह को नुकसान पहुंचा सकता है। यहां तक कि वह इस दौरान खुद अपना भी नुकसान कर सकता है।
  • गैरमूर्ख लोग हमेशा मूर्खों के खतरे को कम करके आंकते हैं। वे भूल जाते हैं कि किसी समय और परिस्थिति में मूर्खों से वास्ता उन्हें भारी पड़ सकता है।
  • मूर्ख शख्स खतरनाक इंसानों में सबसे खतरनाक होता है।

मूर्ख कैसे कैसे
करारे मूर्ख

ये बड़े कमब्खत लोग हैं। यही हैं, जिनके सिर पर सींग नहीं होते। फिर भी ये सींग फंसाने को तैयार रहते हैं। जब सींग फंस जाते हैं तब भी इन्हें पता नहीं चलता। यही नहीं, जब कोई देख ले कि अब इन्हें न बचाया गया तो सींग टूट जाएंगे और मदद को आ जाए तो ये उसी पर पिल पड़ते हैं। कार्लो मारिया सिपोला ने ऐसे ही लोगों के लिए मूर्खता का तीसरा नियम बनाया है। इसके हिसाब से मूर्ख वह होता है जो अपना फायदा किए बिना दूसरों को नुकसान पहुंचा सकता है। बल्कि दूसरों को नुकसान पहुंचाने के चक्कर में वह खुद का भी नुकसान कर बैठता है।


बेचारे मूर्ख


ये होते हैं संता टाईप मूर्ख। इतने मासूम कि इन पर फिदा हुआ जा सकता है। एक बार संता सिंह की 20 लाख की लॉटरी निकली। संता सिंह लॉटरी वाले के पास गया। नंबर मिलाने के बाद लॉटरी वाले ने कहा : ठीक है सर, हम आपको अभी 1 लाख रुपये देंगे और बाकी के 19 लाख आप अगले 19 हफ्तों तक ले सकते हैं। संता : नहीं, मुझे तो पूरे पैसे अभी चाहिए नहीं तो आप मेरे 5 रुपए वापस कर दीजिए। अब इस भोलेपन पर कोई क्या कहे। गालिब ने कहा है : ऐसी मासूमियत पर कौन न मर मिटे ऐ खुदा / लड़ने आए हैं और हाथ में तलवार भी नहीं!


सच्चे मूर्ख


सही मायने में ये हैं मूर्ख। ये कालीदास हैं। जिस डाल पर बैठते हैं, उसे काट भी सकते हैं। इन्हें दीन-दुनिया का पता ही नहीं होता। ये भले लोग होते हैं। लेकिन खतरनाक। क्योंकि दूसरों का भला करने के चक्कर में ये उन्हीं का नुकसान भी कर सकते हैं। मूर्ख मित्र से समझदार दुश्मन भला वाली कहावत इन्हीं लोगों ने जुड़वाई है फेहरिस्त में। ये वैसे लोग होंगे जिन्होंने शाहरुख खान को क्रिकेट टीम खरीदने की सलाह दी होगी। ये वैसे लोग, जिन्होंने राहुल गांधी के लिए यूपी प्रचार का काम संभाला होगा!

बनते मूर्ख


बन कर रहने वाले मूर्ख उस्ताद होते हैं। वे मूर्ख बनकर तमाशा देखते हैं और आनंद से रहते हैं। मूर्खता का फायदा उठाना कोई इनसे सीखे। ये सीख लेते हैं कि कम समझदार लोगों के बीच खुद को मूर्ख बनाकर रखने से सब काबू में रहते हैं। दूध पिलाने का लालच देकर ये मलाई खाते हैं। और सबको सुहाते हैं क्योंकि कम समझदार लोगों को भी इनसे फायदा होता रहता है। यह पढ़कर मनमोहन सिंह जी बुरा तो नहीं मान जाएंगे!


तनते मूर्ख


यह मूर्खों की आधुनिक श्रेणी है। इन्होंने मूर्खता को भुनाना सीखा है। मूर्ख नहीं होते ये लोग। अपनों के फायदे के लिए मौका देखकर मूर्ख बन जाते हैं। दिखाते हैं कि इन्हें कुछ आता-जाता नहीं। पर पता सब होता है। दरअसल, इन्हें पता है कि मूर्खता बिक सकती है। इसलिए ये समझदार होने की कोई कोशिश नहीं करते। मूर्खता को अपने पक्ष में एक टूल की तरह इस्तेमाल करते हैं। जब कोई इन्हें समझाने आता है तो ये तनकर खड़े हो जाते हैं। डंके की चोट पर खुद को मूर्ख कहते हैं। मूर्खता का असल फायदा ऐसे लोग ही उठाते हैं।

क्या कहते हैं एक्सपर्ट्स

मूर्खता हमारे आईक्यू लेवल पर निर्भर करती है। एक शख्स का औसत आईक्यू लेवल 84-100 के बीच रहता है। अगर आईक्यू लेवल ही कम हो तो उसका मूर्खतापूर्ण हरकतें करना असामान्य नहीं। आदमी का आईक्यू अगर औसत से ज्यादा हो तो भी वह मूर्खतापूर्ण हरकतें कर सकता है। यह दीगर बात है कि उसकी सोचने, समझने की क्षमता बहुत अच्छी हो। लेकिन उसकी सामाजिक समझ कम होती है। अगर कोई शख्स अपनी उम्र और परिस्थितियों के मुताबिक व्यवहार न करे, तो भी उसे मूर्ख समझा जा सकता है। वही व्यवहार एक देश में आम हो सकता है, लेकिन दूसरे देश में शायद नहीं। तेज बोलने वाले शख्स को भी अक्सर लोग मूर्ख समझते हैं। लेकिन वह भी अगर किसी जमावड़े में तेज बोले तो मूर्ख नहीं कहलाएगा।

साइकॉलजिस्ट
मूर्खता की पहचान आप कई जगह कर सकते हैं। आजकल टीवी में अनेक शोज आते हैं, जो मूर्खता को बढ़ावा देते हैं। जैसे, लाफ्टर चैलेंज शो, बिग बॉस आदि। राखी सावंत जैसे कई सितारे भी हैं, जो समाज की नजर में मूर्खतापूर्ण हरकतें करते हैं, लेकिन मीडिया में उनको बढ़ावा मिलता है क्योंकि इससे उनके चैनल या अखबार की मार्केटिंग होती है। ऐसे ही सिगरेट, शराब, तंबाकू का सेवन करना भी मूर्खता है, क्योंकि उन पर लिखा होता है कि इनके सेवन से हमारे स्वास्थ्य को नुकसान है, फिर भी लोग इनका सेवन करते हैं। बचपन में माता-पिता से बच्चों को कुछ मूर्खतापूर्ण हरकतें करने पर बढ़ावा मिलता है, इसलिए वे हरकतें बच्चों की आदत बन जाती हैं। इनमें से कुछ चीजों को हमारे समाज में अगर मान्यता मिल जाती है तो फिर वे स्टूपिड नहीं रहतीं।

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