March 5, 2021

Such Ke Sath

सच के साथ – समाचार

किसानों और खेती के लिए गांधी का लगाव तब विकसित हुआ जब वह दक्षिण अफ्रीका में थें, जहां उनके आश्रम में वह खेती किया करते थे और बाद में उन्होंने अहमदाबाद और साबरमती के आश्रमों में भी इस गतिविधि को जारी रखा।

गांधी भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में उन चुनिंदा नेताओं में से एक थे जिन्होंने वैचारिक रूप से स्वतंत्रता आंदोलन को एक नया आकार दिया था। महात्मा गांधी ने अहिंसा, सत्याग्रह, सविनय अवज्ञा, निष्क्रिय प्रतिरोध के अपने अपरंपरागत माध्यमों के ज़रिए से शक्तिशाली ब्रिटिश साम्राज्य के 200 साल के शासन से भारत को मुक्त करने के लिए मजबूर कर दिया था।

 

दो अक्टूबर, 1944 को महात्मा गांधी के 75वें जन्मदिवस पर नोबल पुरस्कार से सम्मानित प्रख्यात वैज्ञानिक अल्बर्ट आइंस्टीन ने अपने संदेश में लिखा था, “आने वाली नस्लें शायद मुश्किल से ही विश्वास करेंगी कि हाड़-मांस से बना हुआ कोई ऐसा व्यक्ति भी धरती पर चलता-फिरता था।”

 

गांधीवादी सिद्धांत ने न केवल स्वतंत्रता सेनानियों को प्रेरित किया बल्कि व्यापक रूप से गांधीवाद एक जीवन शैली बन गया। आज़ादी के मुख्य लक्ष्य को ध्यान में रखते हुए गांधी ने अपने जीवन में और भी कई मुद्दों पर अपना ध्यान केंद्रित किया। गांधीजी ने अस्पृश्यता के उन्मूलन, हिंदू-मुस्लिमों के बीच एकता, स्वतंत्रता आंदोलन में महिलाओं की भागीदारी को प्रोत्साहित करके अधिक समावेशी बनाने की कोशिश की और इसके पीछे मुख्य कारण उन्होंने यह बताया की प्रत्येक संप्रदाय, समुदाय, लिंग और वर्ग की भागीदारी के बिना हम आज़ादी हासिल नहीं कर सकते।

 

एक और क्षेत्र जहां गांधी ने अपना ध्यान केंद्रित किया वह है कृषि क्षेत्र। किसानों और खेती के लिए गांधी का लगाव तब विकसित हुआ जब वह दक्षिण अफ्रीका में थें, जहां उनके आश्रम में वह खेती किया करते थे और बाद में उन्होंने अहमदाबाद और साबरमती के आश्रमों में भी इस गतिविधि को जारी रखा। 1917 के चम्पारण सत्याग्रह से लेकर 1942 के भारत छोड़ो आन्दोलन तक देखा जाए तो किसान हमेशा गांधी के सत्याग्रह का अनभिज्ञ अंग थे। गांधी ने एक बार कहा था, “अपनी मिट्टी और पृथ्वी को खोदने के तरीके को भूलना, खुद के अस्तित्व को भूलना है।”

 

गांधी के अनुसार आर्थिक या राजनीतिक शक्ति की एकाग्रता लोकतंत्र के मूल सिद्धांतों का उल्लंघन करेगी। हिन्द स्वराज में राजनीतिक और आर्थिक शक्ति के केंद्रीकरण की जांच के लिए गांधी ने समांतर राजनीति के संस्थानों और आर्थिक स्वायत्तता की इकाइयों के रूप में पंचायती राज का सुझाव दिया था। गांधी कहते हैं की गांव एक विकेन्द्रीकृत प्रणाली की सबसे छोटी और अहम इकाई है। गांधीवादी विकेन्द्रीकरण का अर्थ समानांतर राजनीति का निर्माण, ग्राम संचालित अर्थव्यवस्था और न्याय प्रणाली में लोगों का सीधा भागीदार होना है। गांधी के आदर्श पंचायत के आर्थिक विकास में किसानों की सहभागिता को सबसे अहम माना गया है। कृषि के साथ साथ पशु-पालन और लघु-कुटीर उद्द्योगों को किसानो के विकास का संचालक माना गया है। गांधीवादी अर्थव्यवस्था का लक्ष्य किसानों और गाँवों को आत्म निर्भर बनाना था।

 

आज़ादी के बाद का किसान और बदलता भारत

आजादी के उपरांत नीति नियंताओ द्वारा भारी उद्योगों को अर्थव्यवस्था के चालक के रूप में स्वीकृत किया गया। यह एक लम्बे समय से बहस का मुद्दा बना हुआ है कि, क्या भारत द्वारा कृषि क्षेत्र पर आधारित अर्थव्यवस्था का चुनाव किया जाना चाहिए था जिसमें कृषि विकास तथा अर्थव्यवस्था की प्रेरक शक्ति का कार्य करे? अगर हम आज़ादी के दौर का मूल्यांकन करें तो यह स्पष्ट हो जाता है कि बिजली, यातायात, और संचार का मूलभूत ढांचा भी कमज़ोर था, साथ ही भारी उद्योगों हेतु आवश्यक तकनीकी शोध व दक्ष संसाधन की भी कमी थी। इसकी तुलना में भारत के पास उर्वर भूमि के रूप में कृषि हेतु आवश्यक संसाधन प्रचुर मात्रा में था, साथ ही मानव संसाधनों को भी किसी प्रकार के उच्च प्रशिक्षण की दरकार नहीं थी ऐसे में कृषि एक स्पष्ट चुनाव होना चाहिए था।

 

सही समय पर कुछ सीधे और सरल कदम जैसे कि जमीन का स्वामित्व, सिंचाई व उचित पारिश्रमिक आदि उठाने मात्र से ही विकास और भारत की बहुसंख्य आबादी की बेहतरी के रास्ते खोले जा सकते थे। विश्व उद्योगों की शक्ति का अंदाजा द्वितीय विश्वयुद्ध और उसके बाद की परिस्थितियों से लगा चुका था तथा विश्वपटल की तबकी प्रचलित मान्यताओं के अनुरूप ही अन्तर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष, विश्व बैंक और अन्य आर्थिक संस्थाओं का झुकाव भी औद्योगीकरण की तरफ था जिसने तबकी भारत सरकार की नीतियों को प्रभावित किया।

 

आजादी के आरंभिक तीन दशकों में सरकारों के सामने मुख्य लक्ष्य खाद्यान्नों की खपत के अनुरूप उपज बढ़ाना था जिसकी परिणीति हरित क्रान्ति के रूप में हुई। चौथी पंचवर्षीय योजना के दौरान उद्योगों के क्षेत्र में भी सरकारों द्वारा रासायनिक खाद और कृषि यंत्रों से सम्बंधित उद्योगों पर ज़ोर दिया गया और उच्च उत्पादकता वाली किस्म के बीजों की सहायता से उपज बढ़ने पर ज़ोर दिया गया।

 

हालंकि हरित क्रांति से मिलने वाली ख़ुशी भी क्षणिक ही रही क्योंकि जल्दी ही यह सिद्ध हो गया कि बढ़ा हुआ फसल उत्पादन भी भारत की बढ़ती जनसँख्या की मांगो को पूरा करने में असफल था। स्वयं को खाद्यान्नों के मामले में आत्मनिर्भर कहने का तमगा मिल जाने के पश्चात भी आम जनता तक उनकी उपलब्धता सुनिश्चित करना व किसानों की आय बढ़ाना एक चुनौती ही रहा। वर्ष 2000 तक ऐसी विरोधाभासी स्थितियां बन चुकी थी जब भारत में अतिरिक्त उपज के बावजूद भुखमरी जैसी समस्या चरम पर थी और देश भर के किसान बदहाल थे।

2000 के दशक में उच्चतम न्यायालय के हस्तक्षेप के उपरान्त नेशनल फ़ूड फॉर वर्क प्रोग्राम का आरम्भ हुआ और खाद्य सुरक्षा कानून, खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करने की तरफ एक बड़ा कदम रहा। वर्तमान सरकार द्वारा 2022 तक किसानो की आय को लक्ष्य रखा गया है परन्तु सम्यक दृष्टि से सरकारों की कृषि नीति और पूर्ववर्ती पंचवर्षीय योजनाओ को देखने पर हम पाएंगे कि खाद्य सुरक्षा और किसानो के लिए खेती को लाभ का क्षेत्र बनाने के द्विस्तरीय लक्ष्य को पाना अभी तक की सभी सरकारों के लिए टेढ़ी खीर रहा है। सरकार और नीतिनिर्माताओं का यह समझना ज़रूरी है कि सिर्फ बेहतर पैदावार न तो खाद्य सुरक्षा की गारंटी है न ही किसानो की बेहतर आय की। न्यूनतम समर्थन मूल्य किसानों को फौरी सहायता और असुरक्षा से बचाने में अहम् है परन्तु स्थायी और दीर्घकालीन लाभ के लिए ढांचागत सुधारों की आवश्यकता है!

 

आधुनिक खेती में गांधीवादी सिद्धांतों की प्रासंगिकता

सिंचाई, उन्नत बीज की उपलब्धता आदि सुनिश्चित करते हुए खरीद के उपरान्त होने वाले फसलों के नुकसान से बचाने हेतु ग्राम पंचायतों के स्तर पर कोल्ड स्टोरेज और गोदाम बनवाये जाए। कृषि उत्पादों के मूल्य संवर्धन के लिए खाद्य प्रसंस्करण इकाइयों की उपस्थिति यदि पंचायत और मंडल स्तर पर सुनिश्चित की जा सके तो किसानो की बेहतर आय की संभावनाएं बढ़ जाएंगी।

2017 के मॉडल एग्रीकल्चर प्रोड्यूस मार्केटिंग समिति एक्ट (एपीएमसी ऐक्ट) ने यह सुविधा दी है कि किसी एक बाजार क्षेत्र के अंतर्गत एक से अधिक बाजार क्षेत्र भी स्थापित किये जा सकते हैं।

 

ऐसे में राज्य सरकारों का यह प्रयास होना चाहिए कि बाजार या मंडी को किसानो के पास लाया जा सके, जिससे उत्पाद की सकल लागत में कमी आये और किसानो पर से उत्पाद को मंडी तक लाने का अतिरिक्त बोझ हटाया जा सके। कृषि उत्पादों के सरल विनिमय और व्यापार के लिए एक सक्षम और क्रियाशील राष्ट्रीय कृषि बाजार (NAM) जिससे उपभोक्ताओं को उत्पादकों से सीधे जोड़ा जा सके, वर्तमान किसानो की समस्या के समाधान के लिए संभावित परन्तु महत्वाकांक्षी उपाय है।

 

इसके सफल क्रियान्वयन में उत्पादों के गुणवत्ता आधारित श्रेणीकरण के लिए वैज्ञानिक कृषिशालाओं की उपलब्धता, इंटरनेट कनेक्टिविटी इत्यादि अन्य व्यावहारिक अड़चने हैं। किसानों, व्यापारियों आदि सभी हितधारकों को ऑनलाइन माध्यमों के लिए तैयार करना और इसके प्रति विश्वास जगाना अपने आप में एक चुनौती है।

 

सरकार को तीन स्तरों पर काम करने की आवश्यकता है जिसमें समर्थन मूल्य पर सरकार द्वारा ही सीधी खरीद, वास्तविक बाजार मूल्य और समर्थन मूल्य के अंतर का किसानो को भुगतान तथा निजी भण्डारण की व्यवस्था और निजी कंपनियों को किसानो से सीधी खरीद के लिए प्रोत्साहित करने की योजना शामिल हो। कृषि क्षेत्र में कॉर्पोरेट निवेश बढाने की ज़रूरत है जिसके लिए एक प्रभावी और पारदर्शी भूमि अधिग्रहण क़ानून और जटिल श्रम कानूनों में सुधार की आवश्यकता है परन्तु इन सबके मध्य इस बात पर ध्यान देने की आवश्यकता है कि किसानों के हितों को सर्वोपरि रखा जाय।

 

गांधीवादी दर्शन के मूल में यह विचार स्थापित है कि खेती और ग्राम्य जीवन एक दूसरे से जुड़े हुए हैं और गाँवों का जीवन स्तर सुधारने के लिए खेती की बेहतरी ज़रूरी है। एक राजनैतिक और आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर गाँव की संकल्पना बिना किसानों को आत्मनिर्भर बनाये साकार होनी संभव नहीं है। गांधी दर्शन के आत्मनिर्भरता के विचार में अपनी जड़ें ढूंढ़ते हुए आधुनिक परिवेश के लिए आवश्यक कदम उठाये जाएँ।

 

निजी क्षेत्र में भी एमएसपी को वैधानिक रूप से बाध्यकारी बनाएं’

तमाम दावों के बावजूद किसानों की आशंकाओं को दूर करने में सरकार अब तक असफल रही है। किसानों का कहना है कि वर्तमान मंडी और एमएसपी पर फसलों की सरकारी क्रय की व्यवस्था इन सुधारों के कारण किसी भी तरह से कमज़ोर ना पड़े। अभी मंडियों में फसलों की खरीद पर 8.5 प्रतिशत तक टैक्स लगाया जा रहा है परन्तु नई व्यवस्था में मंडियों के बाहर कोई टैक्स नहीं लगेगा।

 

कृषि क्षेत्र में लाए गए तीन सुधारवादी कानूनों के विरोध में किसान 26 नवंबर से दिल्ली घेरे हुए हैं। कई दौर की वार्ता के बाद भी अभी तक सहमति नहीं बन पाई है। 8 दिसंबर को सैंकड़ों किसान संगठनों ने भारत बंद भी कराया। 9 दिसंबर को आंदोलनकारियों और सरकार के बीच निर्णायक चरण की बातचीत भी प्रस्तावित है। मोदी सरकार के लिए किसान आंदोलन अब तक की सबसे बड़ी चुनौती बन गया है। पूरा विपक्ष भी किसानों के पक्ष में कूद पड़ा है। किसान इन मुद्दों पर आर-पार की लड़ाई के मूड में हैं। किसानों की समस्याओं का जल्द कुछ हल नहीं निकाला गया तो यह आंदोलन सरकार के गले की फांस बन सकता है।

 

किसानों की मूल आशंका यह है कि इन सुधारों के बहाने सरकार एमएसपी (न्यूनतम समर्थन मूल्य) पर फसलों की सरकारी खरीद और वर्तमान मंडी व्यवस्था से पल्ला झाड़कर कृषि बाजार का निजीकरण करना चाहती है। नए कानूनों के फलस्वरूप कृषि क्षेत्र पूंजीपतियों के हवाले हो जाएगा जो किसानों का जम कर शोषण करेंगे। सरकार का तर्क है कि इन कानूनों से कृषि उपज की बिक्री हेतु एक नई वैकल्पिक व्यवस्था तैयार होगी जो वर्तमान मंडी व एमएसपी व्यवस्था के साथ-साथ चलती रहेगी। इससे फसलों के भंडारण, विपणन, प्रसंस्करण, निर्यात आदि क्षेत्रों में निवेश बढ़ेगा और साथ ही किसानों की आमदनी भी बढ़ेगी।

 

पहले कानून में किसानों को अधिसूचित मंडियों के अलावा भी अपनी उपज को कहीं भी बेचने की छूट प्रदान की गई है। सरकार का दावा है कि इससे किसान मंडियों में होने वाले शोषण से बचेंगे, किसान की फसल के ज्यादा खरीददार होंगे और किसानों को फसलों की अच्छी कीमत मिलेगी। दूसरा कानून ‘अनुबंध कृषि’ से संबंधित है जो बुवाई से पहले ही किसान को अपनी फसल तय मानकों और कीमत के अनुसार बेचने का अनुबंध करने की सुविधा देता है। तीसरा कानून ‘आवश्यक वस्तु अधिनियम’ में संशोधन से संबंधित है जिससे अनाज, खाद्य तेल, तिलहन, दलहन, आलू और प्याज़ सहित सभी कृषि खाद्य पदार्थ अब नियंत्रण से मुक्त होंगे। इन वस्तुओं पर कुुुछ विशेष परिस्थितियों के अलावा स्टॉक की सीमा भी अब नहीं लगेगी।

तमाम दावों के बावजूद किसानों की आशंकाओं को दूर करने में सरकार अब तक असफल रही है। किसानों का कहना है कि वर्तमान मंडी और एमएसपी पर फसलों की सरकारी क्रय की व्यवस्था इन सुधारों के कारण किसी भी तरह से कमज़ोर ना पड़े। अभी मंडियों में फसलों की खरीद पर 8.5 प्रतिशत तक टैक्स लगाया जा रहा है परन्तु नई व्यवस्था में मंडियों के बाहर कोई टैक्स नहीं लगेगा। इससे मंडियों से व्यापार बाहर जाने और कालांतर में मंडियां बंद होने की आशंका निराधार नहीं है।

 

अतः निजी क्षेत्र द्वारा फसलों की खरीद हो या सरकारी मंडी के माध्यम से, दोनों ही व्यवस्थाओं में टैक्स के प्रावधानों में भी समानता होनी चाहिए। किसान निजी क्षेत्र द्वारा भी कम से कम एमएसपी पर फसलों की खरीद की वैधानिक गारंटी चाहते हैं। किसानों से एमएसपी से नीचे फसलों की खरीद कानूनी रूप से वर्जित हो। किसानों की मांग है कि विवाद निस्तारण में न्यायालय जाने की भी छूट मिले। सभी कृषि जिंसों के व्यापारियों का पंजीकरण अनिवार्य रूप से किया जाए। छोटे और सीमांत किसानों के अधिकारों और जमीन के मालिकाना हक का पुख्ता संरक्षण किया जाए। प्रदूषण कानून और बिजली संशोधन बिल में भी उचित प्रावधान जोड़कर किसानों के अधिकार सुरक्षित किए जाएं।

 

एमएसपी पर सरकारी खरीद की व्यवस्था किसानों के लिए बहुत महत्वपूर्ण प्रश्न है। हमारे देश में 23 फसलों की एमएसपी घोषित होती है। इसमें मुख्य रूप से खाद्यान्न- गेहूं, धान, मोटे अनाज, दालें, तिलहन, गन्ना व कपास जैसी कुछ नकदी फसलें शामिल हैं। दूध, फल, सब्ज़ियों, मांस, अंडे आदि की एमएसपी घोषित नहीं होती। 2019-20 में एमएसपी पर खरीदी जाने वाली फसलों में से गेहूं और चावल (धान के रूप में) दोनों को जोड़कर लगभग 2.15 लाख करोड़ रुपये मूल्य की सरकारी खरीद एमएसपी पर की गई। चावल के कुल 11.84 करोड़ टन उत्पादन में से 5.14 करोड़ टन यानी 43 प्रतिशत एमएसपी पर सरकारी खरीद हुई।

 

इसी प्रकार गेहूं के 10.76 करोड़ टन उत्पादन में से 3.90 करोड़ टन यानी 36 प्रतिशत सरकारी खरीद हुई। गन्ने की फसल की भी लगभग 80 प्रतिशत खरीद सरकारी रेट पर हुई जिसका मूल्य लगभग 75,000 करोड़ रुपये था। इसी प्रकार कपास के कुल उत्पादन 3.55 करोड़ गांठों में से 1.05 करोड़ गांठों यानी लगभग 30 प्रतिशत की एमएसपी पर सरकारी खरीद हुई। दलहन और तिलहन की फसलों की भी एमएसपी पर कुछ मात्रा में सरकारी खरीद होती है।

 

अपनेे कुल उत्पादन विशेषकर खाद्यान्नों का किसान स्वयं भी बहुत बड़ी मात्रा में उपभोग कर लेते हैं जिससे सारा उत्पाद कभी भी बाजार में नहीं आता। अतः यदि किसान द्वारा बाजार में बेची गई मात्रा के सापेक्ष सरकारी खरीद का आंकलन करें तो उपरोक्त सरकारी खरीद का प्रतिशत और अधिक बढ़ जाता है। इस प्रकार फसलों की सरकारी खरीद से करोड़ों किसान परिवार लाभान्वित होते हैं। जिन फसलों की एमएसपी पर बड़े पैमाने पर सरकारी खरीद होती है उन फसलों के दाम बाजार में भी संभले रहते हैं और निजी क्षेत्र के व्यापारी भी एमएसपी के आसपास ही दाम देने को मजबूर होते हैं। इस प्रकार एमएसपी पर सरकारी क्रय की व्यवस्था किसानों की जीवनरेखा है।

 

जिन लोगों का यह कहना है कि एमएसपी निजी क्षेत्र पर बाध्यकारी नहीं हो सकता उन्हें गन्ने की अर्थव्यवस्था को समझना चाहिए। गन्ने का रेट सरकार घोषित करती है और उसी रेट पर निजी चीनी मिलें किसानों से गन्ना खरीदती हैं। इसी प्रकार मज़दूरों का शोषण रोकने के लिए सरकार न्यूनतम मजदूरी दर घोषित करती है। सरकार अपने राजस्व की सुरक्षा हेतु जमीनों का न्यूनतम बिक्री मूल्य व सेक्टर रेट घोषित करती है। ऐसे तमाम उदाहरण हैं जहां जनहित या वर्गहित में सरकार सेवाओं या वस्तुओं का मूल्य निर्धारित या नियंत्रित करती है तो किसानों की आर्थिक सुरक्षा हेतु फसलों का न्यूनतम मूल्य निर्धारित क्यों नहीं किया जा सकता।

 

हमारे देश में लगभग 30 करोड़ टन खाद्यान्न का वार्षिक उत्पादन हो रहा है जिसमें 75% केवल गेहूं और चावल ही हैं। एमएसपी पर सरकारी खरीद भी मुख्यतः इन दो फसलों की ही होती है। किसान अपने परिवार के लिए खाद्यान्न रखने के बाद बाकी लगभग 20 करोड़ टन बाजार में बेच देता है। इसमें से लगभग 10 करोड़ टन सरकार खरीद लेती है, बाकी 10 करोड़ टन ही निजी व्यापारी खरीदते हैं। अब यदि यह मान लिया जाए कि निजी व्यापारी औसतन 5000 रुपये प्रति टन एमएसपी से नीचे मूल्य पर फसल खरीदते हैं तो एमएसपी बाध्यकारी होने पर उन्हें 50,000 करोड़ रुपए अतिरिक्त चुकाने होंगे।

 

इसी प्रकार एमएसपी वाली गैर-खाद्यान्न फसलों को भी जोड़ दें तो भी यह राशि किसी भी सूरत में एक लाख करोड़ रुपये से ज्यादा नहीं बैठती। यह राशि हमारी जीडीपी का केवल आधा प्रतिशत है। 30 लाख करोड़ रुपये की कृषि जीडीपी के सापेक्ष यह मात्र 3.33 प्रतिशत है।

 

पिछले साल कंपनियों की आयकर दर घटाने के एक निर्णय से ही सरकार को लगभग डेढ़ लाख करोड़ रुपये का घाटा और कंपनियों को यह लाभ हुआ है। इस तथ्य के प्रकाश में सरकार के लिए एमएसपी बाध्यकारी बनाने का निर्णय शायद कुछ आसान हो। इससे सरकार को कोई घाटा नहीं होगा क्योंकि यह अतिरिक्त राशि सरकार को नहीं चुकानी है। कृषि जिंसों के व्यापार में लगे लाखों व्यापारियों और निजी क्षेत्र की कंपनियों के लिए भी यह बहुत बड़ी रकम नहीं है। वास्तव में यह राशि किसानों का हक है जिसे अब तक निजी व्यापारी हजम करते रहे हैं। सरकार को चाहिए कि वह एमएसपी को निजी क्षेत्र में भी बाध्यकारी बनाने की किसानों की इस मुख्य मांग को तत्काल मान ले जिससे आंदोलनकारी किसान अपने घर लौट जाएं।

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