October 27, 2021

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महाभारत काल: गांधारी के शाप के कारण हुआ है अफगानिस्‍तान का यह हाल, इतिहास देता है गवाही

शाप’ शब्द संस्कृत भाषा के ‘श्राप’ का अपभ्रंश है। ‘शाप’ को उर्दू में ‘बददुआ देना’ कहते हैं तो अंग्रेजी में ‘कर्स’ (curse) कह सकते हैं। कई जगह शाप को शार्प यानी तीखे रूप में भी प्रयोग किया गया है, जैसे अंग्रेजी के नियर को हिन्दी के निकट और नियरे शब्द से लिया गया माना जाता है। 

 

 

अफगानिस्तान का भारत से 5000 साल पुराना नाता

अफगानिस्‍तान में तालिबान शासन ने देश को पूरी तरह से अपने कब्‍जे में ले लिया है। लोकतांत्रिक व्‍यवस्‍था को पूरी तरह से ध्‍वस्‍त करते हुए सभी सरकारी संस्‍थाओं पर अब तालिबान आतंकियों का कब्‍जा हो चुका है। वर्तमान में मुस्लिम आबादी वाला यह देश एक समय में हिंदू संस्‍कृति और रीतियों को मानता था। आइए आपको ले चलते है इतिहास के पन्‍नों में और बताते हैं अफगानिस्‍तान का इंडिया कनेक्‍शन। ऐसा माना जाता है कि अफगानिस्‍तान से भारत का संबंध एक दशक या सैकड़ा पुराना नहीं बल्कि हजारों साल पुराना है। जी हां अफगानिस्‍तान का भारत से 5 हजार साल पुराना नाता है। और तो और इतिहास के सबसे बड़े युद्ध माने जाने वाले महाभारत के षड्यंत्र का आरंभ भी यहीं से हुआ था। आइए आपको बताते हैं अफगानिस्‍तान का संबंध महाभारत काल से है और देते हैं रोचक जानकारियां…

महाभारत का षड्यंत्र यहीं से आरंभ हुआ

 

कांधार का नाम पहले गांधार था। कालांतर में यह गांधार से कैसे कांधार बन गया। इस बारे में काफी कुछ वेद व्‍यासजी के महाकाव्‍य महाभारत में बताया गया है। करीब 5500 साल पहले राजा सुबल गांधार पर राज करते थे। उनकी पुत्री का नाम था गांधारी। गांधारी का विवाह हस्तिनापुर के राजकुमार धृतराष्‍ट्र के साथ हुआ था। गांधारी के एक शकुनि नामक एक भाई था। पिता की मृत्‍यु के बाद गांधार का सारा राजपाट शकुनि के हाथ में आ गया। भीष्‍म ने राजा सुबल के पूरे परिवार हो नष्‍ट कर दिया था तो उसका बदला लेने के लिए शकुनि ने कौरव और पांडवों को आपस में लड़वाकर पूरे हस्तिनापुर का नाश करने की साजिश रची थी। अपने 100 पुत्रों को खोने के बाद गांधारी ने क्रोध की अग्नि में जलते हुए शकुनि को यह शाप दिया था, ‘मेरे 100 पुत्रों को मरवाने वाले गांधार नरेश तुम्‍हारे राज्‍य में कभी शांति नहीं रहेगी।’ अब जब तालिबान ने फिर से अफगानिस्‍तान को अपने कब्‍जे में ले लिया है गांधारी के उस शाप को लेकर एक बार फिर चर्चा आरंभ हो गई है। ऐसा माना जा रहा है कि गांधारी के शाप के दंश से गांधार आज तक उबर नहीं पाया है।

कौरवों के वशंज भी आकर बसे थे यहां

ऐसा माना जाता है कि पांडवों के हाथों पराजय के बाद कौरवों के सैकड़ों वंशज अफगानिस्‍तान में आकर बस गए थे। यहां उन्‍होंने अपने शकुनि मामा के प्रांत गांधार में शरण ली थी फिर यहां से वह धीरे-धीरे ईराक और सऊदी अरब में जाकर बस गए थे।

गांधार कैसे बन गया कंधार

महाभारत काल की समाप्ति के बाद यहां धीरे-धीरे बौद्ध धर्म का प्रचार-प्रसार होने लगा। यहां तक कि एशिया के कुछ भाग में बौद्ध धर्म तेजी से फैलने लगा। भगवान शिव की पूजा यहां से धीरे-धीरे समाप्‍त होने लगी और इसके बाद बौद्ध धर्म के अनुयायी अपने धर्म को बढ़ावा देने लगे। मुस्लिम शासकों के यहां कब्‍जा करने से पहले कई मौर्य शासकों ने यहां पर राज किया। उसके बाद 11वीं शताब्‍दी में यहां महमूद गजनवी ने यहां अपनी सत्ता स्थापित कर ली औऱ इस तरह गांधार बन गया कांधार। जो कि अब यहां कंधार नामक एक शहर के रूप में जाना जाता है। ऐतिहासिक साक्ष्य बताते हैं उस वक्‍त गांधार राज्‍य में वर्तमान के उत्तरी पाकिस्‍तान का भी कुछ हिस्‍सा शामिल था।

भगवान शिव से भी है संबंध

गांधार शब्‍द का उल्‍लेख ऋग्‍वेद के अलावा उत्‍तर रामायण और महाभारत में मिलता है। गांधार शब्‍द का अर्थ है गंध और गांधार का मतलब सुगंधित जमीन। इस नाम के पीछे वजह यह है कि यहां केसर की खेती की जाती है। पौराणिक मान्‍यताओं के अनुसार, भगवान शिव का एक नाम गांधार है। शिव सहस्‍त्रनाम में इस बात का उल्‍लेख किया गया है। ऐसा माना जाता है कि यहां सबसे पहले भगवान शिव के भक्‍तों का वास हुआ करता था। प्राचीनकाल में उत्तर-पश्चिमी पंजाब का कुछ हिस्‍सा भी गांधार में मिला हुआ था।

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