December 7, 2021

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महाराजा रणजीत सिंह: ‘शेर-ए-पंजाब’ से कभी टकराने की हिम्मत न कर सके अंग्रेज, जानिए क्यों

महाराजा रणजीत सिंह: ‘शेर-ए-पंजाब’ से कभी टकराने की हिम्मत न कर सके अंग्रेज, जानिए क्यों

महाराजा रणजीत सिंह को एक महायोद्धा के रूप में जाना जाता है। लेकिन, एक बार उन्हें अपने प्यार की खातिर, कोड़े भी खाने पड़े थे। पढ़ें पूरी कहानी।

 

 

महाराजा रणजीत सिंह (Maharaja Ranjit Singh) को सिखों के सबसे दृढ़ और शक्तिशाली राजा के रूप में जाना जाता है। इतिहास में उन्हें शेर-ए-पंजाब के नाम से जाना जाता है। रणजीत सिंह का जन्म 13 नवंबर, 1780 को गुजरांवाला में हुआ था, जो अब पाकिस्तान में है। उनके पिता का नाम महा सिंह और माँ का नाम राज कौर था। जब रणजीत सिंह महज 12 साल के थे, तो उनके पिता ने इस दुनिया को अलविदा कह दिया, जिसके बाद उन्हें 1792 में सिख समूह ‘शुक्रचकियों’ का सरदार बना दिया गया।

उस दौर में पंजाब के शासक टुकड़ों-टुकड़ों में बंटे हुए थे और उनमें कोई एकता नहीं थी। इन समूहों को ‘मिस्ल’ कहा जाता था। इन समूहों का निर्माण 18वीं सदी के आखिरी दशकों में, पंजाब में मुगलों के पतन के बाद हुआ।

 

 

महाराजा रणजीत सिंह (Maharaja Ranjit Singh) की इच्छा, इन मिस्लों को एक सूत्र में पिरोने की थी। इसलिए उन्होंने कई सरदारों को जीत कर, अपने सैन्य अभियान की शुरुआत की। जिसके बाद उन्होंने 1797-98 के दौरान, लगातार दो बार शाह जमान को परास्त किया और 1799 में कन्हैया मिस्ल की मदद से उन्होंने भंगी शासकों को लाहौर में मात दे दी। फिर, आने वाले वर्षों के दौरान, उनका सतलुज से लेकर झेलम तक के क्षेत्र पर प्रभुत्व हो गया और इस तरह उन्होंने एक विशाल सिख साम्राज्य की नींव रखी।

बुद्ध सिंह से बदलकर क्यों रखा गया रणजीत सिंह नाम

बताया जाता है कि महाराजा रणजीत सिंह (Maharaja Ranjit Singh) के बचपन का नाम बुद्ध सिंह था। बचपन में ही चेचक के कारण उन्होंने अपनी बाईं आँख गंवा दी। इस वजह से वह ज्यादा पढ़-लिख नहीं सकते थे। उनका कद ज्यादा बड़ा नहीं था, लेकिन उन्होंने घुड़सवारी और युद्ध की बारीकियों को खूब सीखा और महज 10 साल की उम्र में वह पहली बार अपने पिता के साथ जंग के मैदान में उतरे। इस युद्ध में फतह हासिल करने के बाद, उनके पिता ने उन्हें रणजीत सिंह नाम दिया।

 

 

रणजीत सिंह जुलाई 1799 में, जब चेत सिंह की सेना को मात देकर लाहौर किले के मुख्य द्वार पर पहुंचे, तो उन्हें सैनिकों द्वारा शाही सलामी दी गई। यहां पहुंचते ही उन्होंने सबसे पहले औरंगजेब द्वारा बनवाई गई बादशाही मस्जिद में अपना माथा टेका। इसके बाद वह शहर के ही एक अन्य लोकप्रिय मस्जिद वजीर खाँ भी गए।

माना जाता है कि चेत सिंह एक अय्याश शासक था और प्रजा उनसे तंग आ चुकी थी। इसलिए लोगों ने रणजीत सिंह को संदेश भेजकर, मदद की अपील की। रणजीत सिंह ने लोगों की मदद करने का फैसला किया और अपने 25 हजार सैनिकों के साथ लाहौर पर अधिकार कर लिया। उन्हें पता था कि लाहौर एक मुसलमान बहुल्य क्षेत्र है। इसलिए उन्होंने ऐसा एक भी कदम नहीं उठाया, जिससे वे अलग-थलग महसूस करें। उन्होंने तमाम बड़े मस्जिदों को सहायता देना जारी रखा। साथ ही, उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि उन्हें मुसलमानों के इस्लामी कानून मानने से कोई ऐतराज नहीं है।

1837 में लड़ी अपनी आखिरी लड़ाई

12 अप्रैल 1801 को रणजीत सिंह पंजाब के महाराजा बने। जिस दिन उन्हें यह ताज दिया गया, वह बैसाखी का दिन था। तब उनकी उम्र महज 21 साल थी। उनका तिलक, साहिब सिंह बेदी ने किया। महाराजा बनने के बाद, रणजीत सिंह ने अपने दायरे को और व्यापक बनाने का विचार किया और 1802 में उन्होंने अमृतसर पर और 1807 में अफगानी शासक को मात देते हुए कसूर पर अधिकार जमा लिया।

इसके बाद सिखों और अफगानों के बीच, कई बार युद्ध हुए। इस बीच रणजीत सिंह ने 1819 तक मुल्तान और कश्मीर जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्रों को जीत लिया था। 1837 में, जमरूद का युद्ध उनकी आखिरी लड़ाई थी। इस युद्ध में उनके सामने फिर से अफगान ही थे। लड़ाई में उनके सेनाध्यक्ष हरि सिंह नलवा मारे गए और कुछ सामरिक वजहों से अफगानों ने जीत हासिल करते हुए वापस काबुल पर कब्जा कर लिया।

 

 

 

जैसा कि महाराजा रणजीत सिंह (Maharaja Ranjit Singh) सभी धर्मों को साथ लेकर चलना चाहते थे, इसलिए उन्होंने कई मुस्लिम सैनिकों को ऊंचे औहदे पर नियुक्त किया। यहां तक कि लोगों में एकता को बढ़ावा देने के लिए सिक्के पर उनका नाम लिखने के बजाय नानकशाही सिक्के को पेश किया गया था। उस सिक्के पर फारसी में एक वाक्य लिखा रहता था, जिसका अर्थ होता था, “अपने साम्राज्य, अपना विजय और अपनी लोकप्रियता के लिए मैं गुरु नानक और गुरु गोविंद सिंह का ऋणी हूं।”

सेना को किया सशक्त

रणजीत सिंह पढ़े-लिखे न होने के बावजूद, एक शानदार शासक और सामरिक रणनीतिकार थे। वह अपनी सेना को सर्वश्रेष्ठ बनाना चाहते थे, इसलिए उन्हें पश्चिमी तौर-तरीकों से भी कोई दिक्कत नहीं थी। उन्होंने अपनी “खालसा सेना” गठित की, जिसमें कई पश्चिमी अधिकारियों को भी नियुक्त किया गया।

उनकी सेना में भारतीयों के साथ-साथ फ्रांसिसी, इतालवी और यहां तक कि अमेरिकी सैन्य अधिकारी भी थे। अंग्रेज, रणजीत सिंह की सेना को भारत की सर्वश्रेष्ठ सेना मानते थे। बताया जाता है कि सेना में विदेशियों के लिए उन्होंने कुछ जरूरी शर्तें लगाईं कि वे न तो सिगरेट पिएंगे, न ही दाढ़ी कटाएंगे। उन्हें स्थानीय महिलाओं से शादी करने और पंजाब छोड़ने से पहले अनुमति लेने का आदेश दिया गया।

 

फ्रेंच यात्री विक्टर जाकमाँ ने अपनी क़िताब ‘अ जर्नी टू इंडिया’ में लिखा है, “रणजीत सिंह की तुलना में हमारे अच्छे से अच्छे कूटनीतिज्ञ नौसीखिया हैं। मैंने अपने जीवन में इतने सवाल करने वाला भारतीय नहीं देखा। उन्होंने मुझसे भारत, ब्रिटेन, यूरोप और नेपोलियन के बारे में क़रीब एक लाख सवाल पूछ डाले। यही नहीं उनकी दिलचस्पी स्वर्ग-नर्क, ईश्वर-शैतान और न जानें कितनी चीज़ों में थी।”

कभी किसी की हत्या नहीं की

जीवन के आखिरी दिनों में रणजीत सिंह के बोलने की शक्ति चली गई थी। लेकिन, वह अपने पूरे होशो हवास में थे और हाथों के इशारों से अपने सहयोगियों को राज्य की खबरें बताने के लिए कहते थे। उन्होंने अपनी नीतियों से कभी अंग्रेजों को अपने पास नहीं फटकने दिया। उनकी एक और खासियत थी कि उन्होंने युद्ध के अलावा कभी किसी की जान नहीं ली। वह अपने दुश्मनों को जीतने के बाद, हमेशा मानवीय तरीके से पेश आए।

महाराजा रणजीत सिंह (Maharaja Ranjit Singh) ने अपने जीवन में कुल मिलाकर 20 शादियां कीं, जिसमें से 10 शादियां परंपरागत थीं और 10 शादियां चादर रस्म के जरिए। उन्होंने अपनी पहली शादी कन्हैया मिस्ल के संस्थापक जय सिंह कन्हैया की पोती मेहताब कौर से की। तब उनकी उम्र सिर्फ पंद्रह या 16 साल रही होगी।

 

 

मेहताब उनसे 2 साल छोटी थीं। रणजीत सिंह की यह शादी नहीं चली, क्योंकि उनके पिता ने मेहताब के पिता गुरबख्श सिंह की जान ली थी और वह इस बात को भूल नहीं पाईं। वह अधिकांश समय अपने मायके में ही रहीं। लाहौर जीतने के बाद, उन्होंने 13 साल एक मुस्लिम नर्तकी मोहरान से शादी करने का फैसला किया।

जब होने वाले ससुर ने रणजीत सिंह से जलवाया था चुल्हा

उस दौर में एक प्रथा थी कि लड़की का परिवार अपने होने वाले दामाद को तभी स्वीकार करेगा, जब वह अपने ससुराल में चूल्हा जलाए। बताया जाता है कि मोहरान के पिता अपनी बेटी की शादी रणजीत सिंह से नहीं करना चाहते थे। इसलिए उन्होंने जानबूझ कर रणजीत सिंह के सामने यह शर्त रख दी। उन्हें लग रहा था कि वह इस शर्त को कभी पूरा नहीं करेंगे, लेकिन उन्होंने इस शर्त को तुरंत पूरा कर दिया। यह बात कई सिख रूढ़िवादियों को हजम नहीं हुई।

 

नतीजन, उन्हें अकाल तख्त के समक्ष पेश होने का आदेश दिया गया और उन्होंने अपने गलती स्वीकार कर ली। फिर भी, उन्हें इमली के पेड़ से बांधकर, सौ कोड़े मारने के आदेश दिए गए, लेकिन रणजीत सिंह की विनम्रता से जत्थेदार फूला सिंह का दिल पसीज गया और उन्होंने कहा कि रणजीत सिंह ने अपनी गलती को स्वीकार किया है और अकाल तख्त के फैसले को मानने के लिए तैयार हैं। इसलिए एक राजा होने के कारण उन्हें सम्मान दिया जाना चाहिए। इस तरह उन्हें सौ कोड़ों के बजाय सिर्फ एक कोड़े मारे गए।

 

बाद में उन्होंने मोहरान के सम्मान में सिक्के भी जारी किए और उनके नाम से एक मस्जिद भी बनवाई , जिसे आज मस्जिद-ए-मोहरान के नाम से जाना जाता है।

हरमंदिर साहिब को सोने से ढककर दिया स्वर्ण मंदिर नाम

महाराजा रणजीत सिंह (Maharaja Ranjit Singh) को अप्रैल 1835 में लकवा मार गया था, जिसके बाद उनके शरीर के दाएं हिस्से ने काम करना बंद कर दिया। फिर, 1837 में उन्हें दूसरी बार लकवा मारा और इसके बाद वह कभी संभल नहीं पाए। 27 जून 1839 को उन्होंने इस दुनिया को अलविदा कह दिया।

सिख धर्म में सती प्रथा की मान्यता न होने के बावजूद, उनकी चार रानियों और सात गुलाम लड़कियों ने सती बनने का फैसला किया, ताकि वे अगले जन्म में फिर से साथ हो सकें। तब तक भारत में सती प्रथा पर प्रतिबंध लगे एक दशक बीत चुके थे। चिता को आग उनके बेटे खड़ग सिंह ने दी।

रणजीत सिंह की मौत के 6 वर्षों के बाद आंतरिक संघर्ष के कारण उनके राज्य का पतन हो गया। उन्हें सदैव न्यायपूर्ण और बिना धार्मिक भेदभाव के शासन करने के लिए जाना जाता है। उन्होंने अमृतसर में हरमंदिर साहिब को सोने से ढककर, स्वर्ण मंदिर नाम दिया था।

कभी सिंहासन पर नहीं बैठे

साल 2016 में, फ्रांस ने महाराजा रणजीत सिंह के सम्मान में उनकी एक कांस्य प्रतिमा का अनावरण किया। इसके अलावा, उनके तख्त को लंदन स्थित विक्टोरिया एंड अल्बर्ट म्यूजियम में खास तरीके से रखा गया है।

रणजीत सिंह को खुद के महाराजा होने का थोड़ा-सा भी गुमान नहीं था। कहा जाता है कि वह अपने सिंहासन पर कभी नहीं बैठते थे, बल्कि किसी कुर्सी पर पालथी मार कर शासन चलाते थे। उनका पहनावा भी बेहद साधारण था।

उनका कहना था, “मैं एक किसान और सिपाही हूं, मुझे दिखावे की कोई जरूरत नहीं है। मेरी तलवार ही वो फर्क पैदा करती है, जिसकी मुझे जरूरत है।”

 

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