September 27, 2022

Such Ke Sath

सच के साथ

माँ की शिक्षाएँ अमर कर देती हैं:

माँ केवल कर्तव्य करती है, आसक्ति नहीं रखती। उसका कर्म इतना सुन्दर कि उसे नमन करने को दिल करता है। माताओं ने अपने बच्चों को महान संस्कार दिये हैं। इतिहास में ऐसी आदर्श और पूजनीय माताओं की लम्बी शृंखला है। विश्व के महापुरुषों की क़तार में इन माताओं का नाम भी आता है। इतिहास बताता है कि सुनीति, सुमित्रा और मदालसा, ये तीन मातायें भारतीय इतिहास की अनोखी मातायें हैं। उन्होंने अपनी सन्तान का ऐसा पालन-पोषण किया और ऐसी ऊँची शिक्षाएँ दीं कि उनके बच्चे इतिहास में अमर हो गये, उधर उन माताओं के नाम भी स्वर्णाक्षरों में लिखे गए।

समझदार माताएँ इतिहास की इन देवियों से आज भी प्रेरणा लेती हैं। अगर मदालसा की तरह अपने बच्चे को पालना हो तो भाव रखना कि भविष्य के लिए दुनिया को एक अमूल्य रत्न देने के लिए मैं अपना कर्तव्य पूरा कर रही हूँ। मेरे कर्तव्य में एक दायित्व है- अपनी संतति को महान संस्कार देना और उसे शरीर, मन व आत्मा से मज़बूत बनाना। मदालसा ने एक बेटे को महायोगी बना दिया तो दूसरे को राजा। बिनोबा भावे अपनी माँ की इस दुर्लभ कला से स्वयं भी अभिभूत हुआ करते थे।

माँ बच्चों को लायक बनाकर अपने-आप भी उच्च समाधि की तरफ बढ़ती जाती है। उसका योग और ध्यान एक ही है- बच्चे को सुयोग्य नागरिक बनाना। माता सुमित्रा ने अपने बेटों को बड़ी निष्ठा से पाला और समझा दिया कि अपनी ‘मैं’ को कभी आगे नहीं रखना। राम वनगमन के समय सुमित्रा के पास जाकर लक्ष्मण ने कहा- माँ! मैं वन को जाना चाहता हूँ, भ्राता राम के साथ। मैं वहाँ उनकी सेवा करूँगा। जब लखन ने माँ से अनुमति माँगी, तब माता सुमित्रा ने उपदेश किया था कि वन में रहते हुए तुममें कुछ न कुछ मोह जागेगा, लेकिन कभी भी भटकना नहीं। तुम्हारे सामने एक ही लक्ष्य होना चाहिये, वह है- ‘भाई की सेवा’। अगर तुम्हें अपने पिता की याद आये, अपनी माता का ध्यान आए, यह सुन्दर सी अयेाध्या याद आये, तो हे लक्ष्मण! उस समय राम में अपने पिता को देखना, सीता में अपनी माँ को ढूँढना और वन में हवा में लहराते पेड़-पौधों व खिले हुए सुन्दर-सुन्दर फूल-पत्तियों को प्यार से देखना और मान लेना कि यही मेरी प्राणप्रिय अयोध्या है। इस भाव को गहरे तक बिठा लेना, वही वनक्षेत्र तुम्हें अयोध्या प्रतीत होने लगेगा। कभी भी कर्तव्य से और सेवा से विमुख नहीं होना। भरे गले से माँ ने लक्ष्मण से कहा था- बेटा! आज यही मेरा उपदेश है तेरे लिए। और, माँ ने अपने प्रिय पुत्र को वन जाने की अनुमति दी थी।

सुनीति ने अपने नन्हें से बालक ध्रुव को समझाया था कि सांसारिक पिता की नहीं, विश्व पिता की चाहत करो और उसकी गोद में बैठने की कोशिश करो। पाँच साल के बच्चे ध्रुव ने माँ के उपदेश को महान संकल्प में बदल डाला और साधना-इतिहास की कठोरतम तपस्या की। आज ब्रह्माण्डीय आकाश में माता सुनीति के उसी अमर बालक को पूरी दुनिया ध्रुवतारे के रूप में देखती है और सबसे प्रकाशमान इस नक्षत्र के दर्शन करके प्रसन्न होती है।

इसलिए हे विश्व की माताओं! निज धर्म का निर्वहन पूरी निष्ठा और कुशलता के साथ कीजिए। एक दिन न तुम होगी और न तुम्हारा बालक व बालिका। लेकिन, तुम्हारी और तुम्हारी सन्तान की अमर कहानियाँ इस नश्वर संसार में सदैव कही व सुनी जाएँगी। अपनी कोख को धन्य करके श्रेष्ठ माता की पदवी पा लेना।

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