August 4, 2021

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मायावती की UP से ज्यादा पंजाब में दिलचस्पी क्यों – सिर्फ दलित मुद्दा या कुछ और?

मायावती (Mayawati) ने यूपी चुनाव से पहले पंजाब को लेकर सक्रिय हैं. बीएसपी का सुखबीर बादल (Sukhbir Badal) की पार्टी अकाली दल से चुनावी गठबंधन हुआ है- कहीं ये बीजेपी (BJP) को फायदा पहुंचाने वाला कदम तो नहीं है?

मायावती ((Mayawati)) भले ही बाहर कितना भी हाथ पांव क्यों न मारती रही हों, लेकिन सियासी सरमाया तो उनका उत्तर प्रदेश में ही है. अगर ऐसा न होता तो बीएसपी को स्थापित करने पंजाब से कांशीराम उत्तर प्रदेश का रुख ही क्यों करते?

दलित वोट बैंक के हिसाब से भी देखें तो आबादी के हिसाब से पंजाब में दबदबा ज्यादा ही है, हालांकि सूबे के करीब दो दर्जन सीटों पर ही दलित समुदाय का दबदबा कायम है – और वैसी ही 20 विधानसभा सीटों पर मायावती 2022 में अपने उम्मीदवार उतारने जा रही हैं. उत्तर प्रदेश में जहां दलित समुदाय की आबादी 22 फीसदी के आसपास है, वहीं पंजाब में ये 30 फीसदी से ज्यादा है.

मायावती ने पंजाब विधानसभा चुनाव के लिए शिरोमणि अकाली दल नेता सुखबीर बादल (Sukhbir Badal) के साथ बीएसपी का गठबंधन किया है – ऐसा पहली बार तो नहीं लेकिन 25 साल बाद दोहराया जा रहा है. ठीक वैसे ही जैसे 2019 के आम चुनाव में मायावती ने अखिलेश यादव की समाजवादी पार्टी के साथ हाथ मिलाया था. 1996 में बीएसपी के संस्थापक कांशीराम ने अकाली दल नेता प्रकाश सिंह बादल के साथ गठबंधन कर सफलता पायी थी, लेकिन तब भी साल भर बाद ही दोनों अलग हो गये, बिलकुल वैसे ही जैसे मायावती ने यूपी में सपा-बसपा गठबंधन तोड़ दिया था.

तब अकाली दल ने बीएसपी से गठबंधन तोड़ने के बाद बीजेपी से ही हाथ मिलाया था, लेकिन तीन कृषि कानूनों को लेकर किसानों के समर्थन के नाम पर वो रिश्ता भी टूट गया. अब फिर से अकाली दल और बसपा साथ आ गये हैं जिसे पंजाब पहुंच कर अमलीजामा पहनाने वाले बीएसपी महासचिव सतीशचंद्र मिश्र ऐतिहासिक मौके के तौर पर पेश कर रहे हैं. बीएसपी नेता का दावा है कि ये अकाली दल और बसपा गठबंधन अब पंजाब की सबसे बड़ी सियासी ताकत हो गयी है.

मायावती के पंजाब में बादल परिवार के साथ हाथ मिलाने को लेकर आ रही खबरों के बीच ट्विटर पर ट्रेंड कर रहा है – #UP_मांगे_BMP. BMP यानी बहुजन मुक्त पार्टी. जिस तरह पार्टी के नाम से साफ है, मकसद को लेकर भी कोई दो राय नहीं होनी चाहिये. 2012 में बनी ये बिहार विधानसभा का चुनाव भी लड़ चुकी है. पप्पू यादव की जन अधिकार पार्टी की अगुवाई में बने प्रगतिशील लोकतांत्रिक गठबंधन में ये पार्टी भीम आर्मी वाले चंद्रशेखर आजाद रावण की आजाद समाज पार्टी के साथ गठबंधन का हिस्सा थी.

पंजाब में मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह सत्ता में वापसी की कोशिश कर रहे हैं और ऐसे में ये गठबंधन निश्चित तौर पर कांग्रेस के लिए ही चैलेंज पेश करने जा रहा है. कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी वाड्रा तो मायावती को बीजेपी (BJP) की अघोषित प्रवक्ता तक कह चुकी हैं.

मायावती का ये फैसला अपने हिसाब से तो बेस्ट ही होगा, लेकिन बाकियों के लिए थोड़ा हैरान करने वाला है – क्योंकि उत्तर प्रदेश में उनके राजनीतिक अस्तित्व के लाले पड़ चुके हैं और वो पहले बिहार चुनाव लड़ रही थीं, अब पंजाब पहुंच गयीं. क्या यूपी में मायावती का मन भर चुका है?

अकाली दल के साथ गठबंधन को लेकर बीएसपी महासचिव सतीश मिश्रा चाहे जैसे भी दावे करें, लेकिन चुनावी गठबंधन का मकसद क्या है – ये किसे नुकसान और किसे फायदा पहुंचा रहा है, इसी बात पर निर्भर करता है. अगर ऐसा नहीं होता है तो ये वोटकटवा कैटेगरी में ही आएगा.

BSP और अकाली दल गठबंधन क्यों?

पंजाब में अकाली दल और बीएसपी गठबंधन के बनने के पीछे कई कारण हैं. तकनीकी पहलू तो यही है कि 2017 के विधानसभा चुनाव के मुकाबले 2019 के आम चुनाव में बीएसपी के वोट शेयर में डबल से भी ज्यादा इजाफा दर्ज किया गया है. 2017 के विधानसभा चुनाव में बीएसपी को सिर्फ 1.50 फीसदी वोट मिले थे, जबकि 2019 के आम चुनाव में ये बढ़ कर 3.52 पहुंच चुका है.

1996 में दोनों दलों के बीच हुआ चुनावी गठबंधन बेहद सफल रहा. पंजाब की 13 लोक सभा सीटों में से अकाली-बसपा गठबंधन ने 11 सीटें जीत ली थी – और कांग्रेस को महज दो सीटों से संतोष करना पड़ा था. ये बात अलग है कि बीएसपी को 3 सीटें ही मिली थीं और अकाली दल को 8 सीटें.

बीएसपी ने तब होशियारपुर, फिल्लौर और फिरोजपुर संसदीय सीटें जीती थी, लेकिन 1997 में ही विधानसभा चुनावों के पहले कांशीराम ने अकाली दल से गठबंधन तोड़ लिया – और तभी अकाली दल ने बीजेपी के साथ चुनावी गठबंधन कर लिया था.

 

किसानों के मुद्दे पर बीजेपी का साथ और एनडीए छोड़ देने वाले अकाली दल को भी एक साथी की शिद्दत से तलाश रही होगी. पंजाब के पंचायत चुनावों में तो लोगों ने कांग्रेस के पक्ष में खुल कर वोट किया और बाकी सबको एक तरफ से किनारे लगा दिया था. विधानसभा चुनाव के नतीजे भी बिलकुल ऐसे ही होंगे, ऐसा तो नहीं कहा जा सकता, लेकिन पूरी तरह पलट जाएंगे ऐसा भी नहीं लगता.

गठबंधन के लिए पंजाब पहुंचे बीएसपी महासचिव सतीश मिश्रा ने बताया कि गठबंधन की घोषणा के लिए मायावती ने कार्यक्रम इसलिए टाल दिया क्योंकि कोरोना वायरस संकट के बीच उनके पहुंचने से भीड़ होती और ये लोगों के लिए ठीक नहीं होता.

सुखबीर सिंह बादल और सतीश मिश्रा ने संयुक्त रूप से गठबंधन की घोषणा की. सुखबीर बादल ने कहा कि 25 साल पहले जो राजनीतिक रिश्ता बना था वो उसी को आगे बढ़ाने की कोशिश करेंगे. लगे हाथ सुखबीर बादल ने पांच बार मुख्यमंत्री रहे अपने पिता प्रकाश सिंह बादल के शासन में दलितों के लिए किये गये काम गिनाये और आरोप लगाया कि कैप्टन अमरिंदर सिंह ने कुर्सी पर बैठते ही वे सारी चीजें बंद कर दी.

गठबंधन की तरफ से ये भी साफ कर दिया गया कि पंजाब विधानसभा की कुल 117 सीटों में से 97 पर अकाली दल और बाकी 20 पर बीएसपी चुनाव लड़ेगी – जालंधर पश्चिमी, जालंधर उत्तरी, फगवाड़ा, करतारपुर, होशियारपुर, टांडा, दसूहा,बस्सी पठाणा, महिल कलां, नवांशहर, श्री चमकौर साहिब, लुधियाना नार्थ, पठानकोट, सुजानपुर, भोआ, मोहाली, श्री आनंदपुर साहिब, अमृतसर नार्थ, अमृतसर सेंट्रल और पायल विधानसभा क्षेत्र.

अब ये समझना भी जरूरी हो गया है कि दलितों को चुनावी मुद्दा बनाने का आइडिया न तो अकाली दल का है और न ही बीएसपी – ये जरूर है कि सुखबीर बादल ने सत्ता में आने पर डिप्टी सीएम की कुर्सी दलित समुदाय को देने की घोषणा कर रखी है.

क्या एक दलित डिप्टी सीएम की कुर्सी के लालच में मायावती यूपी से दौड़ती हुई पंजाब पहुंच गयी हैं – या गठबंधन के पीछे इरादा कुछ और ही है?

BSP और अकाली दल गठबंधन से फायदा किसे होगा?

अकाली दल और बीएसपी गठबंधन की एक ही खास बात है – 2022 के विधानसभा चुनाव में दलित समाज की स्थिति को मुद्दा बनाना. यही वजह है कि इस चुनावी गठबंधन के असली मकसद को लेकर पहले से ही सवाल खड़े हो जा रहे हैं.

ध्यान देने वाली बात ये है कि चुनावों से पहले ये मुद्दा बीजेपी की तरफ से उछाला गया है – पंजाब का अगला मुख्यमंत्री दलित समुदाय से हो.

 

सुखबीर बादल के भी दलित डिप्टी सीएम के ऐलान के पीछे भी बीजेपी का दलित सीएम वाला आइडिया है. बीजेपी की पहल के बाद तत्काल प्रभाव से सभी दलों में दलितों को रिझाने के लिए होड़ मची हुई है. सबको अपना अपना फायदा नजर आने लगा है और मौके का फायदा उठाते हुए कांग्रेस के भीतर से भी दलित सीएम का मुद्दा जोर पकड़ने लगा है.

दलित सीएम का मुद्दा कांग्रेस के भीतर उठे या बाहर, निशाने पर तो मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह ही हैं. कैप्टन अमरिंद सिंह के विरोधी खेमे के दलित नेता चरणजीत सिंह चन्नी ने भी दलित मुख्यमंत्री की मांग शुरू कर दी है. अपनी डिमांड को मजबूत बनाने के लिए चन्नी ने विधायकों की मीटिंग बुलाकर आगे का इरादा भी जता दिया है. चन्नी की तरह कैप्टन एक और विरोधी नेता शमशेर सिंह दुल्लो भी दलित मुख्यमंत्री की मांग को आगे बढ़ा रहे हैं. शमशेर सिंह कह रहे हैं कि अगर कांग्रेस को सत्ता में वापसी करनी है तो पंजाब में किसी दलित नेता को मुख्यमंत्री का चेहरा घोषित कर देना चाहिये.

अव्वल तो पंजाब में गठबंधन पार्टनर की जरूरत बीजेपी को थी – और मायावती के साथ गठबंधन होने की सूरत में बीजेपी पंजाब में मजबूत हो सकती थी, लेकिन दोनों दलों के बीच असली लड़ाई तो यूपी में है. यूपी में बीजेपी जहां सत्ता में वापसी के लिए उन दलों को भी साथ लेना शुरू कर दिया है, हाल तक जिनकी परवाह भी नहीं नजर आ रही थी – अपना दल वाली अनुप्रिया पटेल और निषाद पार्टी के संजय निषाद.

अब सवाल ये उठता है कि दलित मुख्यमंत्री के बीजेपी के प्रस्ताव पर सुखबीर बादल और मायावती ही क्यों तेजी से आगे बढ़ीं?

अकाली दल और बीएसपी गठबंधन सीधा असर ये तो होना ही है कि दलित वोट अगर एकजुट हो जायें तो कैप्टन अमरिंदर सिंह को ही घाटा होगा – और फायदा उठाने की स्थिति में अगर अरविंद केजरीवाल की आम आदमी पार्टी भी नहीं है तो ये कवायद बीजेपी के पक्ष में जाएगी.

पंचायत चुनावों के नतीजे अगर कोई फीडबैक दे रहे हैं तो बीजेपी करीब करीब हाशिये पर ही पहुंच चुकी है, लेकिन कांग्रेस के कमजोर होने की स्थिति में अगर अकाली-बीएसपी गठबंधन और आम आदमी पार्टी की वजह से कांग्रेस डैमेज होती है तो पूरा फायदा तो बीजेपी को ही मिलेगा.

छह महीने पहले केंद्र की बीजेपी सरकार ने 11वें दौर की बातचीत में कृषि कानूनों को 18 महीने होल्ड करने का प्रस्ताव दिया था, लेकिन किसानों ने नामंजूर कर दिया. हो सकता है किसानों को भी ये समझ में आ गया हो कि बीजेपी सरकार कानूनों को पंजाब चुनाव के नतीजे आने तक टालने की कोशिश कर रही है. अगर किसान नेता मान गये होते तो बीजेपी के प्रति किसानों का गुस्सा थोड़ा कम हो सकता था. मगर जो बीजेपी चाहती थी वो हो न सका.

बीएसपी और अकाली दल भले ही गठबंधन को पंजाब की सबसे बड़ी राजनीतिक ताकत बतायें, लेकिन अब तक ऐसा कोई संकेत तो नहीं मिला है कि कैप्टन अमरिंदर सिंह को कोई जोरदार टक्कर देने जा रहा है. कम से कम बाहर से तो ऐसा ही लगता है, हां, अंदर ही अंदर कांग्रेस में ही भीतरघात की साजिश चल रही हो तो बात और है.

अगर कैप्टन अमरिंदर सिंह भी पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी की तरह पहले के मुकाबले ज्यादा सीटें जीतने में कामयाब रहते हैं तो बात और है, लेकिन अगर जैसे तैसे बहुमत हासिल करते हैं तो उन पर भी कमलनाथ सरकार जैसा खतरा मंडराता रहेगा. तब तो और भी ज्यादा जब नवजोत सिंह सिद्धू चुनाव बाद ज्योतिरादित्य सिंधिया जितने ताकतवर बन जाते हैं – बीजेपी के लिए ऑपरेशन लोटस का रास्ता आसान हो जाएगा.

अब अगर पंजाब के साथ साथ उत्तर प्रदेश में भी चुनावों के दौरान कांग्रेस मायावती पर बीजेपी के साथ साथ सांठ गांठ का इल्जाम लगाती है तो बीएसपी नेता के पास क्या जवाब होगा? आखिर मायावती कैसे समझाएंगी कि वो कांग्रेस के खिलाफ यूपी से लेकर पंजाब तक बीजेपी की मदद नहीं कर रही हैं?

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