July 7, 2022

Such Ke Sath

सच के साथ

मुद्रा: राजनीति में जातिवाद कितना सही कितना ग़लत;

गणतंत्र भारत में जैसे जैसे लोकतंत्र मजबूती की ओर अग्रसर होता जा रहा है वैसे वैसे ही देश में छोटी व बड़ी सभी जाति अपना वोट बैंक उजागर कर अपनी राजनीतिक शक्ति प्रगट करने हेतु अपने अपने जातिगत संगठन बना रहे हैं। स्थानीय स्तर से लेकर राष्ट्रीय स्तर तक के अधिसंख्य राजनेता अपनी अपनी जातिगत पहचान बताते हुए बड़े गौरव के साथ इन जातिगत संगठनों के मंचों पर बैठ व भाषण देते हुए आसानी से देखे जा सकते हैं। सत्तारुढ़ राजनेता अन्य सभी राजनेताओं की तरह ही प्रत्येक जाति की संख्या को देखते हुए अपना वोट बैंक बनाने हेतु भारत व प्रदेश को जातियों के आधार पर देखता है। स्वतंत्रता के 70 वर्षोंं में अगर भारत की जनता ने कोई चीज व अहसास खोया है तो वह है भारतीय होने का। अब भारत में रहने वाले की पहचान भारतीय न होकर किसी जाति विशेष – वैश्य, ठाकुर, जाट, ब्राहमण, कश्यप, सैनी, पाल (गडरिये), धींमर, कहार, कुम्हार, माली इत्यादि 4 हजार से ज्यादा जातियों से होकर रह गई है। देश के लोकतंत्र में वोट बैंक के लालच में स्पष्ट रुप से जातिवादी राजनीति की जा रही है। चुनावों के दौरान घर, घर, मौहल्ले -मौहल्ले, गांव-गांव, नगर-नगर सभी को विभिन्न जातियों में बांट कर जीत या हार के लिए प्रत्याशित मतों की गणना जाति के आधार पर ही की जा रही है जो कि अभी नहीं तो पांच दस साल में अपना विकराल रुप धारण कर लेगी। वर्तमान में जातिवाद की राजनीति से जो सबसे दुखद पहलू उभरा है वह है कि अब महापुरुषों को भी जातिवाद की राजनीति ने डस लिया है।

एक पुरुष महापुरुष तभी हो सकता है जब वह सम्पूर्ण समाज के जनकल्याण के लिए विचार रखता हो तथा उसके लिए कार्य भी करता हो। उस महापुरुष की नीतियों, रीतियों, विचारों, पूजन अर्चना को जाति विशेष की नजर से देखना समाज के साथ बहुत अन्याय है तथा महापुरुषों को जातिवादी संकीर्णता की जंजीरों में जकड़ देना है। महापुरुष कभी भी एक जाति का नहीं होता। वह देश और समाज का होता है।

समाज और देश की उन्नति के लिए हर युग में सभी जातियों की सामाजिक समरसता की जरुरत है परन्तु जातिवादी संगठन जाति में व्याप्त कुरीतियों व बुराइयों के निवारण के लिए कोई कार्य नहीं कर पाते हैं। बस वे अपनी जाति से संबंधित किसी महापुरुष की जयन्ती ही मनाते रहते हैं तथा सत्तारुढ़ राजनेता से यह अपेक्षा करते रहते हैं कि उनकी जाति के महापुरुष की जयन्ती के दिन सरकार अवकाश घोषित करे व उनकी जाति को दलित व पिछड़ी घोषित कर किसी न किसी प्रकार सरकारी नौकरियों में आरक्षण की सुविधा दिलवा दे जैसे उत्तरप्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री श्री मुलायम सिंह यादव ने किया था। उन्होंने वैश्यों को राजनीतिक रुप से खुश करते हुए वैश्य समाज की मांग पर अग्रकुल शिरोमणि महाराजा अग्रसेन की जयन्ती पर सार्वजनिक अवकाश की घोषणा की व उनकी शिक्षाओं को पाठ्य पुस्तकों में शामिल करने की पहल की। इसी प्रकार वे कायस्थों को खुश करने के लिए चित्रगुप्त की जयन्ती पर भी उत्तरप्रदेश में सार्वजनिक अवकाश घोषित करने की मांग भी कर रहे हैं।

महाराजा अग्रसेन की सम्पूर्ण शिक्षा, दर्शन व नीतियां केवल वैश्यों के लिए ही कारगर व महत्त्वपूर्ण नहीं हैं बल्कि सम्पूर्ण समाज के लिए उनकी शिक्षा, दर्शन व नीतियां अत्यंत महत्त्वपूर्ण हैं। अत: महाराजा अग्रसेन को मात्र वैश्यों का ही महापुरुष कहना ठीक नहीं है। भारत की स्वतंत्रता में बढ़ चढ़ कर भाग लेने वाले व विश्व ने जिसको महात्मा व देश ने जिसको राष्ट्रपिता और प्रदेश- गुजरात ने जिसको बापू जैसा मान सम्मान वाला नाम देकर जाना, उस मोहनदास करमचंद गांधी को बनिया (वैश्य) बता कर हम उस प्रवृत्ति को दिखा रहे हैं जिस ओर हमारा लोकतंत्र बढ़ रहा है। महात्मा गंधी का दर्शन व शिक्षाएं सम्पूर्ण मानव जाति के लिए अनुकरणीय हैं तथा उनके जैसी अतुलनीय शख्सियत को जाति में बांधना उनका घोर अपमान करना है।

उसी प्रकार देश के प्रथम गृह मंत्री लौह पुरुष सरदार वल्लभ भाई पटेल को कुर्मी, प्रधानमंत्री व नये भारत के निर्माता जवाहर लाल नेहरु को ब्राह्मण, राष्ट्रनिर्माता डा. भीमराव अम्बेडकर को महार बता कर राजनीति की जाती है। उसके बाद तो जितने भी राजनेता हुए उन सभी को उनकी विशेष जाति में ही बांध कर राजनीतिक विचार मंथन किया जाता है जिससे समाज में जातिगत द्वेष ही उत्पन्न होता है। वर्तमान में तो राजनेता महापुरुषों के साथ साथ देवी, देवताओं, ऋषि मुनियों तक को जाति विशेष के रंग में रंगने की कोशिश कर रहे हैं।

उनके पूजन अर्चना के समय केवल उन्हीं जातियों का वर्चस्व रहता है। उदाहरणार्थ – महर्षि बाल्मीकि को सफाईकर्मी, महर्षि रैदास को चर्मकार, विश्वकर्मा को बढ़ई, भगवान चित्रगुप्त को कायस्थ, भगवान कुबेर को वैश्य, भगवान परशुराम को ब्राह्मण, भगवान नामदेव को छिंपी समाज से जोड़ कर देखने की प्रवृत्ति सम्पूर्ण भारत देश के लिए हानिकारक है। ऐसे अनगिनत उदाहरण हैं। भगवान राम का दर्शन करने वाले व राम के काम को अपना समझ कर करने वाले निषाद राजा निषाद के अहोभाग्य को हम केवल निषाद जाति के दायरे में ही लाते हैं।

उसी प्रकार भगवान राम को गंगा पार ले जाने वाले अनन्य भक्त केवट को केवल केवट जाति से ही जोड़ कर देखना ठीक नहीं है। तमिलनाडु के रामनाथपुरम् में एक बार केवट व अनुसूचित वर्ग के लोगों के बीच संघर्ष हो गया था तो मुख्यमंत्री करुणानिधि ने सभी राजनीतिक दलों की बैठक बुला कर हिंसात्मक संघर्ष रोकने के उपायों पर विचार किया था। उसके बाद तमिलनाडु में जातिगत सम्मेलनों पर सरकार की ओर से प्रतिबंध लगा दिया गया था। तमिलनाडु में द्रविड़ दलों ने जाति प्रथा को घृणात्मक रुप से बढ़ावा दिया था जिसका परिणाम केवट व अनुसूचित वर्ग में हुए संघर्ष के रुप में सामने आया।

ब्राह्मण आधिपत्य से मुक्ति के नाम पर वहां लोगों ने राम बनाम रावण की उपासना का अभियान भी चलाया एवम् राम, सीता व लक्ष्मण की मूर्तियों को जूतों की माला पहना कर जुलूस निकाले गये परन्तु इन जुलूसों में वहां की अनुसूचित जातियों ने कोई भागीदारी नहीं की जिससे यह अभियान शीघ्र ही समाप्त हो गया। हमारे देश के राजनेताओं ने देश में चल रही जातिगत पंचायतों को भी खिलौना बनाना शुरु कर दिया तो जातिगत पंचों के फैसले (जो जाति में किसी बुरी प्रथा को रोकने के लिए फैसले ले लिया करते थे) भी समाप्त हो गए। अब तो सभी जगह विशुद्ध रुप से राजनीतिक लाभ लेने के लिए जातिगत सम्मेलन आयोजित किये जाते हैं। वर्ष 1970 के बाद से तो विशुद्ध जातिवादी राजनीति करने वाले राजनेता ही उभर कर सामने आये हैं।

इससे विशुद्ध रुप से समाजवादी, साम्यवादी, राष्ट्रवादी राष्ट्रीय दल पिछडऩे लगे हैं जिससे अब वर्ण संघर्ष खुलकर होने लगा है। क्षेत्रीय दल जातिगत आधार पर उभर कर इसलिए सामने आयें क्योंकि कांग्रेस के विकल्प के रुप में एक दल नहीं उभर सका था। राजनीतिक उत्थान के लिए जातिगत सम्मेलनों का सहारा सभी राजनीतिक दल ले रहे हैं जिससे वंशवाद व पारिवारिक कल्याण के नाम पर राजनेता फलीभूत हो रहे हैं। जातिगत संगठनों को विशिष्ट जाति के लाभ व कल्याण के लिए बनाये जाने में कतई कोई बुराई नहीं है परन्तु उन संगठनों को राजनीतिक मंच बनाना राष्ट्रहित में कतई नहीं है।

स्वतंत्रता से पूर्व भी विभिन्न जातिगत संगठन थे परन्तु वे अपनी जाति में व्याप्त कुरीतियों से लड़ते रहते थे तथा शिक्षा, स्वास्थ्य एवम् समाज सुधार के क्षेत्रों में कार्य करते थे। वर्तमान में सामाजिकता से राजनीति की तरफ आते इन जातिगत संगठनों के सम्मेलनों में राजनीतिक महत्त्वाकांक्षी राजनेताओं को आने से नहीं रोका गया तो देश को जातिवादी राजनीति के दुष्परिणाम भुगतने पड़ेंगे। जातिवाद से ग्रस्त हमारे राजनेता अपनी जाति के लोगों की शिक्षा, रोजगार, स्वास्थ्य इत्यादि के लिए सड़कों पर नहीं उतर रहे हैं। वे मात्र सत्ता के लिए अपनी जातियों का उपयोग भर कर रहे हैं तभी देश के स्वतंत्रता व आरक्षण के 59 वर्षों में अभी तक किसी भी जाति का इतना उत्थान व कल्याण नहीं हो पाया है कि किसी भी जाति ने यह माना हो कि अब उनकी जाति का कल्याण हो गया है और उन्हें आरक्षण की सूची से अलग कर दिया जाय।

इसका मतलब है कि आरक्षण से पहले जो जातियों की आर्थिक व सामाजिक स्थिति थी वह उनकी आज भी है अर्थात आरक्षण का कोई लाभ इन जातियों को नहीं पहुंच पा रहा है। महापुरुषों की शिक्षाओं को सम्पूर्ण भारत में फैलाना चाहिए। उनको जातिवादी के डंक से डसना देश के साथ सम्पूर्ण मानव जाति के साथ विश्वासघात व अकल्याणकारी हेागा। महाराजा अग्रसेन बाल्मीकि, रैदास, झूलेलाल, गुरु नानक, गुरु गोविन्द सिंह, महात्मा गांधी, सरदार पटेल, अम्बेडकर, नेहरु, इत्यादि किसी एक जाति के नहीं अपितु सम्पूर्ण भारत के हैं।

अत: शहर शहर, सड़क सड़क पर लगी महापुरुषों की मूर्तियों व उनके द्वारा प्रदत्त शिक्षाओं को जाति के शिंकजे में कसना उचित नहीं है।

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