June 29, 2022

Such Ke Sath

सच के साथ

यहां ईमानदार कौन है?

सोचता हूं कि यहां ईमानदार कौन है फिर
सोचता हूं कि शायद ईमानदार वहीं है जिसे लूटने का मौका नहीं मिला।
कई लोग कहते हैं कि अगर ऊपर बैठा हुआ व्यक्ति ईमानदार हो तो नीचे वाले भी ईमानदार हो जाते हैं। लेकिन यहां हम देख रहे हैं कि ऊपर बैठा व्यक्ति ईमानदार है, लेकिन वह अपने नीचेवालों की बेईमानी को देखे जा रहा है या फिर अनदेखा कर रहा है।
क्या खुद ईमानदार होना ही सबकुछ है, बेईमानों को रोकने का काम आपका नहीं है? यह तो वैसे ही हुआ कि किसी के बच्चे लोगों के घरों के शीशे तोड़ें और वह बच्चों को रोकने की जगह यह कहे कि मैंने कोई शीशा नहीं तोड़ा और मैं शीशे तोड़े जाने के सख्त खिलाफ हूं। या किसी अखबार के रिपोर्टर पैसे लेकर खबरें लिखें और संपादक कहे कि मैंने तो कभी पैसे नहीं मांगे और मैं पैसे लेकर खबरें लिखे जाने का समर्थन नहीं करता। अगर टॉप के बंदे का बेदाग होना ही एकमात्र क्राइटेरिया है तब तो दाऊद इब्राहीम भी बेकसूर है क्योंकि मेरी जानकारी में उसने खुद तो कभी किसी की जान नहीं ली होगी, यह काम तो उसके गुर्गों ने किया होगा।

सरसरी निगाह से जब मैं अपने देश के हर वर्ग की तरफ देखता हूं, उनके क्रियाकलापों का आकलन करता हूं तो सहज ही प्रश्न उठता है कि यहां हे कौन ईमानदार?
बड़े उद्योगपति, फिल्म के लोग, कारोबारी, राजनेता, सरकारी कर्मचारी, प्रायवेट कंपनियां, व्यापारी, दुकानदार, खोमचेवाले, मजदूर, खेल और खिलाड़ी, पत्रकार, लेखक, कलाकार व बाकी के जो भी कोई कुछ कर रहा है या न कर रहा है–कौन है इनमें ईमानदार, किस पर आप भरोसा कर सकते हैं? और यदि आपने भरोसा किया तो क्या आपने चोट नहीं खाई?
मुझे तो याद भी नहीं आता कि कभी कोई ऐसा काम, लेन-देन, खरीद-फरोख्त या किसी तरह का व्यवहार किया हो और कोई ईमानदार व्यक्ति मिला हो। हां, किसी को अवसर ही ना मिले तो ईमानदार बनने में हर्ज ही क्या है?
यहां मूल रूप से मैं रुपयों संबंधी ईमानदारी की ही बात कर रहा हूं। लेकिन यदि मिलावट, टेक्स चोरी, नियमों को तोड़ना, अपने फायदे के लिए अपने प्रभाव का स्तेमाल करना, आचार-विचार, सत्ता हासिल करने के लिए कुटिलताएं, अनुशासनहिनता, लापरवाही, गैर-जिम्मेदारी जैसी कसौटियों से देखूं तो पता लगेगा कि शायद ही कोई हो जो एक अच्छा शहरी, अच्छा नागरिक या देशवासी निकले।
लतामंगेशकर अपने घर के बाहर सालों से फ्लाईओवर नहीं बनने दे रही, जबकि लाखों आम लोगों को रोज ट्रैफिक की भयंकर समस्या से गुजरना पड़ता है, लेकिन लतामंगेशकर, नाम ही काफी है?
सचिन तेंडूलकर के कितने ही कारनामे छन-छन कर आते हैं, चाहे वो विदेशी मंहगी कार का हो, या अपने आलीशान आवास का?
हर गली-मुहल्ले में प्रभावशाली लोग, पैसे वाले, नेता के मिलने वाले, अफसर कारपोरेशन का पानी अपनी तरफ अधिक ले लेते हैं…इस तरह की फायदे तो आप हर तरफ देख सकते हैं, कितना कुछ होता है?
जितने भी तरह के पुरस्कार, उपहार, अवॉर्ड मिलते हैं, सब में कुछ न कुछ चाल बाजी जरूर होती है। मैंने अपनी आंखों से छोटे-मोटे लेखक को भी विदेश यात्राएं करते देखा है। जिस पार्टी का वे समर्थन करते होते हैं, वह पार्टी जब शासन में आती है तो अपने लेखक को विदेश यात्रा भी करवा देती है। और तमाम तरह की विदेश यात्राओं में सरकारी, राजनैतिक, सामाजिक लोग अपने-अपने लोगों को विदेश यात्रा करवा ही देते हैं।
हर ट्रैफिक सिग्नल पर करोड़ों लोग हमेशा नियम तोड़ते हैं। कहीं क्यू लगवाकर देख लो?
इतनी अनुशासनहीनता, इतनी अराजकता, इतनी मनमानी, इतना भ्रष्टाचार, इतनी बेईमानी, हैरानी होती है। और आज ये करोड़ों-करोड़ों निरंकुश लोग, मनमानी करने वाले लोग, शॉर्टकट से अपना काम निकलवाने वाले लोग कैसे सुधरेंगे, कौन सुधारेगा। मुझे कोई आशा नहीं दिखती क्योंकि पूरे देश का यही हाल है, लगभग सभी बड़ी पार्टियों की किसी न किसी राज्य में सरकार है और वहां के हालात भी कोई बहुत अच्छे नहीं हैं तो वे केंद्र में आ भी जाएंगे तो कर क्या लेंगे?
यही कारण है कि मैं आपातकाल को इस देश का सबसे अधिक स्वर्णिम काल कहता हूं। मानता हूं कि कुछ ज्यादतियां हुई थी, लेकिन देश का बहुत बड़ा वर्ग सुधर रहा था, काश कि सुधरने की वह प्रक्रिया जारी रह पाती, लेकिन हत्यारों ने सब नष्ट कर दिया, बरबाद कर दिया। मेरी नजर में इस देश का सबसे बड़ा खलनायक, लोकनायक है? कभी ईमानदारी से इतिहास लिखा जायगा तो मेरी यह बात भी लिखी जाएगी।
सच, मुझे कोई आशा नहीं दिखती, कैसे आशा करूं? ऐसी कौन-सी बात हो रही है जिससे लगे कि कल कोई सुधार हो पाएगा, करेगा कौन?
हां, बातें करने में हम होशियार हैं, कुछ नेता, यही कर रह हैं, लुभावनी बातें, लार टपक रही है, प्रधानमंत्री पद के लिए, लेकिन बातों को हकीकत में बदलना वे अपने राज्य में नहीं कर पाए तो इस विशाल देश में कैसे करेंगे और तब जब कि दस-पंद्रह छोटी-मोटी पार्टियों के सहयोग कुर्सी मिलेगी। दलों के दल-दल में ऐसी टांग फसेगी कि पूरा समय अपने को कुर्सी पर चिपकाए रखने में ही बित जाएगा।

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