June 29, 2022

Such Ke Sath

सच के साथ

यह रहा देश का सर्वकालिक मंत्रिमंडल

अमूमन क्रिकेट में सर्वकालिक टीम बनाने का चलन है। दिग्गज क्रिकेटर, मीडिया संस्थान और क्रिकेट से जुड़ी कुछ संस्थाएं ऐसी सूची जारी करती रही हैं। मगर क्या राजनीति में ऐसा कोई प्रयोग हो सकता है? देश की आजादी के 71 वर्ष बाद यदि आज हम देश के सर्वकालिक मंत्रिमंडल की कल्पना करें, तो उसका स्वरूप कैसा होगा?

 

पता नहीं कभी किसी ने इस तरह का आकलन किया है या नहीं, लेकिन ऐसे समय जब देश के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू और पहले उप प्रधानमंत्री सरदार वल्लभ भाई पटेल को नए तरह से परिभाषित करने की कोशिशें हो रही हैं और 16 मई, 2014 को भारतीय राजनीति में एक नए प्रस्थान बिंदु की तरह दर्ज किया जा रहा है, तब यह देखना वाकई दिलचस्प होगा कि यदि देश का कोई सर्वकालिक मंत्रिमंडल बनाया जाए तो वह कैसा होगा।

भारतीय राजनीति के एक विनम्र छात्र होने के नाते मैंने यह कोशिश की है। हालांकि इसमें जोखिम बहुत है, क्योंकि न तो राजनीति समय का इंतजार करती है और न ही किसी की परवाह करती है। फिर परिस्थितियों के साथ राजनीति और नेतृत्व की जरूरतें बदलती भी हैं।

ऐसे समय जब भारत को नई वैश्विक व्यवस्था में एक बड़ी ताकत के रूप में देखा जा रहा हो, तब यह काम और भी कठिन हो जाता है। लेकिन चलिए कोशिश करते हैं, ऐसा सर्वकालिक मंत्रिमंडल बनाने की। चूंकि देश की शुरुआती राजनीति कांग्रेस केंद्रित थी और बाद में कांग्रेस से निकले अनेक नेताओं ने या तो अपनी पार्टी बनाई या किसी दूसरी पार्टी में शामिल हो गए तो इसका असर विभिन्न सरकारों पर भी पड़ा।

पंडित जवाहर लाल नेहरू से लेकर नरेंद्र मोदी तक देश में अब तक 14 प्रधानमंत्री हो चुके हैं। इनमें ऐसे राजनीतिक भी शामिल हैं, जो कभी खुद किसी प्रधानमंत्री के अधीन मंत्री रहे, तो ऐसे भी लोग हैं, जिन्होंने देश के राष्ट्रपति के पद को सुशोभित किया।

इस सर्वकालिक मंत्रिमंडल में कई पूर्व राष्ट्रपतियों और पूर्व प्रधानमंत्रियों तक को जगह नहीं मिली, तो ऐसी किसी भी कवायद में देश में नेहरू मंत्रिमंडल के खिलाफ सबसे मुखर रहने वाले राम मनोहर लोहिया को जगह देनी ही पड़ेगी। इसी तरह भारतीय राजनीति के इतिहास में सिर्फ एक ऐसा मौका आया जब भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी ने केंद्र की सरकार में हिस्सेदारी की थी।

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वहीं माकपा ने केंद्र की सरकारों को बाहर से समर्थन जरूर दिया, मगर वह कभी सरकार का हिस्सा नहीं रही। इसके बावजूद इन पार्टियों में ऐसे नेता रहे हैं, जिनके बिना यह सर्वकालिक मंत्रिमंडल पूरा नहीं होगा। चूंकि इन सात दशकों में सरकार का स्वरूप और आकार भी बदला है, कई नए मंत्रालय गठित हुए हैं, तो कई कई मंत्रालयों को मिलाकर एक कर दिया गया, इससे भी ऐसी कोई सरकार का गठन आसान नहीं है। इसका एक तरीका यह हो सकता है कि इस मंत्रिमंडल में प्रमुख मंत्रालयों को शामिल किया जाए।

आइये 2016 की शुरुआत में यह देखने की कोशिश करते हैं कि यह सर्वकालिक मंत्रिमंडल किस तरह का हो सकता हैः

प्रधानमंत्रीः चलिए शुरुआत करते हैं प्रधानमंत्री पद से। 15 अगस्त, 1947 के बाद भारत को ऐसी दुनिया में जगह बनानी थी, जो दूसरे विश्व युद्ध के बाद उथल-पुथल से गुजर रही थी। आज भारत न केवल आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर है, बल्कि एक बड़ी वैश्विक ताकत बनने की राह पर है। दो कारणों से पंडित जवाहर लाल नेहरू सर्वकालिक कैबिनेट के प्रधानमंत्री पद के लिए मेरी पसंद हैं। पहला यह कि उन्होंने आधुनिक भारत की बुनियाद रखी थी, जिस पर आज देश खड़ा है और दूसरा यह कि दुनिया को आज उनके जैसे दूरद्रष्टा की जरूरत है, जो वैश्विक ताकतों के बीच संतुलन कायम कर सके। नेहरू में गहरा इतिहास बोध तो था ही, वह आधुनिकता और औद्योगिकीकरण के भी पैरोकार थे।

 

उप प्रधानमंत्री और गृह मंत्रीः भारत में अब तक सात उप प्रधानमंत्री हुए हैं, सरदार वल्लभ भाई पटेल, मोरारजी देसाई, जगजीवन राम, चरण सिंह, यशवंत राव चव्हाण, देवीलाल और लालकृष्ण आडवाणी। हालांकि आज यह बताने की कोशिशें हो रही हैं कि वल्लभ भाई पटेल नेहरू की जगह यदि पहले प्रधानमंत्री होते तो देश की तस्वीर कुछ और होती। मगर मुझे लगता है कि पटेल सर्वकालिक मंत्रिमंडल में उप प्रधानमंत्री पद के सर्वाधिक उपयुक्त उम्मीदवार हैं। इस चयन के साथ ही गृह मंत्री पद की जिम्मेदारी पटेल से बेहतर कौन संभाल सकता है, जिन्होंने स्वतंत्रता के तुरंत बाद देश को एकजुट रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। कश्मीर से लेकर पूर्वोत्तर के अलगाववाद और मध्य भारत में माओवाद की चुनौतियों से निपटने के लिए उन जैसे मजबूत इरादे वाले गृह मंत्री की ही जरूरत है। इसके बावजूद यह नहीं भूलना चाहिए कि इस देश को गोविंद वल्लभ पंत, सरदार स्वर्ण सिंह के साथ ही इंद्रजीत गुप्त जैसे गृह मंत्री मिले हैं। गुप्त अब तक केंद्र में मंत्री बनने वाले दो कम्युनिस्टों में से एक थे। इनके अलावा सी राजगोपालाचारी और कैलाशनाथ काटजू नेहरू की कैबिनेट में गृह राज्य मंत्री थे। सर्वकालिक मंत्रिमंडल में गोविंद वल्लभ पंत और इंद्रजीत गुप्त को गृह राज्य मंत्री के रूप में शामिल किया जा सकता है।

वित्त मंत्रीः ऐसे देश में जहां वित्त मंत्री रहे अनेक नेता प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति पद तक को सुशोभित कर चुके हों, इस पद की तलाश बहुत कठिन होगी। फिर भी बहुत कठिन फैसला करते हुए लगता है कि ऐसे समय जब यूरोप और अमेरिका छोटे-छोटे झटके भी सह नहीं पाते और चीन की कहानी में भी लोच दिखता है, मनमोहन सिंह वित्त मंत्री के रूप में सबसे उपयुक्त हो सकते हैं। मनमोहन सिंह के जूनियर मंत्रियों के रूप में नेहरू मंत्रिमंडल में वित्त मंत्री रहे सी डी देशमुख और यूपीए सरकार में वित्त मंत्री रहे पी चिदंबरम उनके जूनियर हो सकते हैं।

 

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विदेश मंत्रीः जनता सरकार में यह जिम्मेदारी निभाने वाले पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी सर्वकालिक मंत्रिमंडल में यह काम बखूबी कर सकते हैं। उनके जूनियर के रूप में दिवंगत पूर्व प्रधानमंत्री इंद्र कुमार गुजराल सबसे उपयुक्त लगते हैं। गुजराल ने पड़ोसी देशों के साथ संबंध मजबूत करने की जो ड्राक्ट्रिन दी थी, वह आज भी मौजूं है।

रक्षा मंत्रीः देश में अब तक कोई महिला रक्षा मंत्री नहीं बनीं, लेकिन बांग्लादेश युद्ध में अपना पराक्रम दिखा चुकीं पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी यह जिम्मेदारी निभा सकती हैं। रक्षा राज्य मंत्री के रूप में सरदार स्वर्ण सिंह और महज चार महीने के लिए प्रधानमंत्री का पद संभालने वाले चंद्रशेखर के नाम ठीक लगते हैं। चंद्रशेखर ने अपने मंत्रिमंडल में रक्षा मंत्रालय अपने पास रखा था।

कृषि मंत्रीः इस पद पर हरित क्रांति के जनक कहे जाने वाले सी सुब्रमण्यम से काबिल कौन हो सकता है। पूर्व प्रधानमंत्री चौधरी चरण सिंह और मोराररजी देसाई की सरकार में यह जिम्मेदारी संभाल चुके सुरजीत सिंह बरनाला कृषि राज्य मंत्री हो सकते हैं।

विधि मंत्रीः इसके लिए नेहरू मंत्रिमंडल में यह जिम्मेदारी संभालने वाले डॉ भीमराव अंबेडकर से उपयुक्त कोई और नहीं हो सकता।

संसदीय कार्यमंत्रीः लोकसभा के पूर्व अध्यक्ष और लंबे समय तक माकपा से सांसद रहे संविधानविद सोमनाथ चटर्जी यह जिम्मेदारी बखूबी निभा सकते हैं।

रेल मंत्रीः मोरारजी देसाई की जनता सरकार में रेल मंत्री रहे मधु दंडवते सर्वकालिक मंत्रिमंडल में इस पद के लिए सबसे उपयुक्त हैं। उनके जूनियर के रूप में माधव राव सिंधिया हो सकते हैं।

सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्रीः नेहरू के मुखर विरोधी राम मनोहर लोहिया कभी किसी मंत्रिमंडल का हिस्सा नहीं रहे, मगर भारत की गहरी समझ को लेकर उन्होंने संसद के भीतर और बाहर गहरी छाप छोड़ी थी। यों तो उन्हें विदेश मंत्री से लेकर गृह मंत्री तक कोई भी जिम्मेदारी दी जा सकती थी, लेकिन इस सर्वकालिक मंत्रिमंडल में वह सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्रालय के सुयोग्य पात्र नजर आते हैं।

 

मानव संसाधन मंत्रीः यह जिम्मेदारी नेहरू मंत्रिमंडल में शिक्षा मंत्री रहे अबुल कलाम आजाद बखूबी निभा सकते हैं और पूर्व प्रधानमंत्री नरसिंह राव इस विभाग में राज्यमंत्री के लिए उपयुक्त होंगे।

ग्रामीण विकास मंत्रालयः यह मंत्रालय अपेक्षाकृत नया है, लेकिन इस पद के लिए जय जवान जय किसान का नारा देने वाले पूर्व प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री से काबिल कोई दूसरा नहीं हो सकता।

सूचना एवं प्रसारण मंत्रीः सर्वाधिक दस वर्ष तक यह पद संभालने वाले शास्त्रीय संगीत के मर्मज्ञ बी वी केसकर इस पद के दावेदार हो सकते हैं, लेकिन वह इसलिए उपयुक्त नहीं हैं, क्योंकि उन्होंने अपने कार्यकाल के दौरान रेडियो से क्रिकेट कमेंट्री और हिंदी फिल्मी गीतों के प्रसारण पर रोक लगा दी थी! नेहरू के मंत्रिमंडल में यह जिम्मेदारी निभा चुके पूर्व उप प्रधानमंत्री जगजीवन राम यह जिम्मेदारी निभाएं तो कैसा रहेगा?

नागरिक उड्डयन मंत्रीः पायलट के रूप में दूसरे विश्व युद्ध में हिस्सा ले चुके और अपनी एयरलाइन कंपनी चला चुके बीजू पटनायक इस पद के सबसे काबिल दावेदार लगते हैं।

उद्योग मंत्रीः वित्त मंत्रालय और प्रधानमंत्री रह चुके मोरारजी देसाई इस पद के लिए सबसे उपयुक्त लगते हैं।

श्रम मंत्रीः ट्रेड यूनियन से अपने राजनीतिक जीवन की शुरुआत करने वाले जॉर्ज फर्नांडीज यह जिम्मेदारी बखूबी संभाल सकते हैं। उनके साथ सीपीआई के गुरुदास गुप्ता को राज्यमंत्री के रूप में यह जिम्मेदारी दी जा सकती है, जोकि एटक के अध्यक्ष भी रहे हैं।

अल्पसंख्यक मामलों के मंत्रीः इस पद के लिए आरिफ मोहम्मद खान सबसे उपयुक्त लगते हैं।

आदिवासी मामलों के मंत्रीः लोकसभा अध्यक्ष रहे पी ए संगमा यह जिम्मेदारी बेहतर तरीके से निभा सकते हैं।

वन एवं पर्यावरण मंत्रीः इस मंत्रिमंडल में शामिल कद्दावर नेताओं की तुलना में जयराम रमेश युवा लगते हैं, लेकिन यूपीए सरकार में यह जिम्मेदारी निभा चुके रमेश इस पद के लिए सबसे उपयुक्त लगते हैं।

इस सर्वकालिक मंत्रिमंडल में बहुत से नाम छूट गए होंगे, इसका यह मतलब नहीं है कि वह काबिल नहीं थे। यह भी संभव है कि जिन लोगों को इसमें शामिल किया गया है, उनसे कहीं अधिक काबिल मंत्री भी देश को मिले हों। मगर नए वर्ष में जरा कल्पना करके देखिए कि देश को यह मंत्रिमंडल मिले तो उसका प्रदर्शन कैसा रहेगा।

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