June 26, 2022

Such Ke Sath

सच के साथ

राजनीति का उद्देश्य क्या है?

संसार में कहीं भी और कभी भी राजनीति को स्थायी रूप से विनम्रता और शालीनता से जोड़कर नहीं देखा गया। सत्तापक्ष में और विपक्ष में भी यह गुण कभी-कभी किसी मकसद से देखा जाता है, फिर वह ऐसे विलुप्त हो जाता है, जैसे सूरज उग जाने के बाद तारे। लेकिन राजनीति के इस व्यावहारिक पक्ष से अच्छी तरह परिचित लोग भी ऐसा मानते हैं कि अभी की भारतीय राजनीति में कटुता का स्तर पिछले पचास-साठ वर्षों में बने इसके सामान्य मानकों से कहीं ज्यादा है। दोनों पक्षों के अपने-अपने तर्क हैं और कोई भी अपने को असभ्य, कुतर्की या अशालीन मानने को हरगिज तैयार नहीं होगा। स्पष्ट है कि इन राजनेताओं को अपना लहजा बदलने के लिए कोई समझा भी नहीं सकता।
अतीत पर नजर डालें तो इस संदर्भ में महर्षि पतंजलि की एक सूक्ति ध्यान में आती है- ‘जब आप किसी महान उद्देश्य या किसी असाधारण परियोजना से अनुप्राणित होते हैं तो आपके विचार अपने बंधन तोड़ देते हैं। मन सीमाओं के पार चला जाता है, चेतना हर दिशा में फैल जाती है और आप स्वयं को एक नए, विराट, आश्चर्यजनक संसार में पाते हैं। सुषुप्त शक्तियां, क्षमताएं और मेधाएं जाग्रत हो उठती हैं और आप पाते हैं कि आपका कद इतना बड़ा है, जिसका आपने कभी सपना भी नहीं देखा था।’ जो लोग अभी भारत की सत्ता संभाल रहे हैं, या कभी इसको संभालने की उम्मीद बांधे हुए हैं, उन्हें सोचना चाहिए कि क्या वे इस देश को लेकर किसी महान उद्देश्य, किसी असाधारण योजना से अनुप्राणित हैं?
जैसी अभूतपूर्व कटुता अभी सत्तापक्ष और विपक्ष के बीच देखी जा रही है, उससे ऐसा लगता है कि इस सवाल का जवाब ‘हां’ नहीं है। बहरहाल, लोकतांत्रिक व्यवस्था की यह विशेषता है कि इसमें हर दल को अपने दस्तावेजों में अपने लक्ष्यों-उद्देश्यों की घोषणा करनी होती है। राजनेताओं को यदि समय मिले तो उन्हें चुनावी घोषणापत्रों में ही सिर खपाने के बजाय अपने पार्टी दस्तावेज भी अच्छी तरह पढ़ने चाहिए। अगर वे यह याद रखें कि अपनी युवावस्था में किन आदर्शों से प्रेरित होकर उन्होंने यह रास्ता पकड़ा था, तो विरोधियों में भी उन्हें सहयोगी दिखने लगेंगे।

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