September 27, 2022

Such Ke Sath

सच के साथ

राजनीति का पोषक विकास हो न कि जाति;

 

‘आज की भारतीय राजनीति का पोषक: जातिवाद’
शायद से हम एक ऐसी सदी में आ गए है जहाँ से, हम कह सकते है कि भारतीय राजनीति में एक बहुत बड़ा बदलाव हमे देखने को मिल रहा है। एक बहुत बड़ा फेरबदल हुआ है जहां पर, लोग आगे आकर ‘समाज कल्याण की बीड़ा’ उठाने का प्रयास कर रहे है।
लेकिन क्या ये सच है या फिर एक साजिश है हमारी राजनेताओं और पार्टियों की ‘लोगो को गुमराह कर राजनीति से उठ रहे उनके विश्वास को पुनः पाने का’?
भारतवर्ष में जिस समय से राजनीति की नींव रखी गयी थी देखा ये गया था कि कुछ ही मुट्ठीभर लोग है जो कि बहुसंख्यक जनता पर शासन कर रहे है या कर सकते है। अगर अच्छे मोटे पैसो के साथ आप जातिवाद का मसाला घोलने में सफल हो गए,तो ये आपकी जीत सुनिश्चित करने में एक बहुत बड़ा भागीदार साबित होता नजर आया।
लेकिन ऐसी क्या आवश्यकता आन पड़ी की राजनीति में हमे जातिवाद जैसे ‘अराजक तत्व’ की ज़रूरत महसूस हुई?
एक तरफ जहाँ हमारे आदरणीय नेतागण बात करते है सामाजिक उत्थान की, डीजीटीकर्ण की और आर्थिक रूप से सशक्त होने की वही दूसरी ओर धर्म और जाति की राजनीति करने से भी बाज़ नही आते।
इससे साफ झलकता है कि लोगो का क्यों सरकार और राजनीति से विश्वास उठ रहा है।
60 या 80 के दशक की भारतीय राजनीतिक इतिहास में चले तो हमे देखने को मिलेगा की उस वक़्त के हमारे समाज कल्याण के गदावर नेता जैसे लोहिया,जय प्रकाश नारायण और चौधरी चरण सिंह आदि इनके पास जनता को अपने तरफ आकर्षित करने का,देश और समाज हितकारी बात करने की एक अनूठी खुभी और तेज़ था।
लेकिन समय के साथ-साथ इन्होंने ने भी इस बात को जानने और समझने की कोशिश की केवल,जनता के सामने मुद्दे रखने से कुछ नही होगा।
आवश्यकता है ‘अपने लोगो की’, उन लोगो की जो की ‘एक ही सामाजिक तबके’ के हो और इसने जन्म दिया जातिवाद की राजनीति को।
और इसका कुप्रभाव न ही केवल राष्ट्रीय या राज्य स्तर की राजनीति तक सीमित रहा अपितु, छात्र राजनीति में भी अपनी गंध फैला गया। जहाँ शिक्षा हमे धर्म, जाती और अन्य किसी भी प्रकार के भेदभाव से ऊपर उठना सिखाती है,वही चुनावी सरगर्मी आते ही इन्ही शिक्षा के मंदिरों में,चंद छात्र अपनी चुनावी फायदे के लिए ‘तुम किस जात के हो’? जैसे सवालो से अन्य छात्रों को घेर लेते है।
अगर आने वाले सालो में हम इस कुरीति को मिटाने के लिए कोई सार्थक कदम उठाने में सक्षम नही हो पाए तो फिर वो दिन भी दूर नही जब हम ‘मानव विकास सूची'(Human Development Index) में खुद को पिछड़े देशो की श्रेणी में पाएंगे।
तो आइए एक सशक्त भारत की ओर कदम बढ़ाए और भारत को विश्वगुरु का तमगा दिलाने के लिए, इस देश मे पनप रही हर छोटी-बड़ी सामाजिक अराजकताओ कोे निकाल बाहर फेके।
और इस लेख के शीर्षक को बदलकर गर्व से कह सके
‘आज की भारतीय राजनीति का पोषक:विकास’!

1 thought on “राजनीति का पोषक विकास हो न कि जाति;

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