September 27, 2022

Such Ke Sath

सच के साथ

राजनीति में चेहरे पर चेहरा क्यू;

रावण की लंका सोने की थी। बहुत सारा निवेश आया होगा तभी तो बनी होगी सोने की लंका। उसके हित-मित्र, चाटुकार बड़े मायावी थे। स्वर्ण-मृग बनकर अपने यार के लिए वनवासियों की बीवियों को रिझाकर छल से उठा लिया करते थे। दशानन चिढ़ता बहुत था। निंदा तो छोड़िए, अपनी जरा-सा आलोचना भी बरदाश्त नहीं कर पाता था। इसी बात पर अपने भाई विभीषण को निकाल फेंका। पौराणिक आख्यान गवाह हैं कि रावण का सर्वनाश हो गया। विभीषण को लंका का राजपाट मिला। लंका सोने की ही रही। लेकिन उस सोने पर राजा का ही नहीं, प्रजा का भी हक हो गया। लंका में रामराज्य आ गया।



एडोल्फ हिटलर, रहनेवाला ऑस्ट्रिया का। आगे नाथ, न पीछे पगहा। अंदर से बड़ा ही भीरु किस्म का शख्स। अपने अलावा और किसी को कुछ नहीं समझता था। मंच पर ऐसा बमकता था कि लगता था कि धरती और आकाश के बीच उसके अलावा कुछ है ही नहीं। सत्ता लोलुप और शातिर इतना कि पराए मुल्क में जाकर राष्ट्रवाद का नारा दे दिया। यहूदियों को निशाना बनाया। उनके खिलाफ नफरत भड़का कर बाकियों को अपने पीछे लगा लिया। जर्मन लोग उसके दीवाने हो गए। लेकिन जर्मनी के वही लोग आज उससे बेइंतिहा नफरत करते हैं।





वहां किसी को हिटलर कह दो तो वह आपके खिलाफ मानहानि का मुकदमा ठोंक देगा। मुट्ठी भर सिरफिरों को छोड़ दें तो जर्मनी का बच्चा-बच्चा हिटलर से नफरत करता है। अपने इतिहास से हिटलर को मिटाने के लिए अभी साल भर पहले उस नगरपालिका ने पुराने रजिस्टर से हिटलर का नाम काट दिया जिसने इस ऑस्ट्रिया-वासी को जर्मन नागरिकता दी थी। हिटलर का भी सबसे बड़ा दोष यही था कि वह चिढ़ता बहुत था। अपनी किसी भी तरह की आलोचना को बरदाश्त नहीं कर पाता था। इतिहास गवाह है कि एक सुनसान बंकर में उसका मृत शरीर पाया गया।




कहने का मंतव्य यह है कि आलोचना न सह पाना, मामूली बात पर चिढ़ जाना बहुत बड़ा दुर्गुण है। इतना बड़ा कि आपका सत्यानाश तक कर सकता है। अपने यहां राजा जनक को सबसे बड़ा योगी इसीलिए माना गया है कि वे सब कुछ के बीच रहते हुए भी असंपृक्त रहते थे। राग-द्वेष, वैर-प्रीति, यश-अपयश से ऊपर थे। गीता में योगिराज कृष्ण ने स्थितिप्रज्ञता का बखान किया है। तो, अपने पंगेबाज टाइप बंधुओं से मैं विनती करना चाहता हूं कि दशानन के चेहरे मत बनो। यह मत साबित करो कि उसमें और तुम में नाभिनाल संबंध है क्योंकि उसकी नाभि को भेदकर कोई भी राम उसका विनाश कर सकता है। तुम और हम आम नागरिक हैं भाई जो अपने देश, अपनी माटी और अपनी परंपरा से बेपनाह मोहब्बत करते हैं। हम उस मायावी का पाप अपने ऊपर क्यों लें?





आखिर में एक बात और। नाम पंगेबाज रखा है तो उसकी मर्यादा का पालन करो। पंगेबाज नाम का मतलब है कि वह बड़े संयत भाव से, शांत मन से पंगा लेगा। चिढ़ेगा नहीं। अरे, मेरी बात का जवाब देना ही था तो मेरी ही तरह देते। चिढ़ जाने से बुद्धि और विवेक का नाश हो जाता है। बंधुवर, मर्यादा पुरुषोत्तम राम की परंपरा को अपनाओ। 


दशानन का दसवां चेहरा मत बनो।

1 thought on “राजनीति में चेहरे पर चेहरा क्यू;

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