June 29, 2022

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राष्ट्रीय प्रौद्योगिकी दिवस: देश को पावरफुल बनाने में 11 मई का है बड़ा योगदान, जानें कैसे

राष्ट्रीय प्रौद्योगिकी दिवस: देश को पावरफुल बनाने में 11 मई का है बड़ा योगदान, जानें कैसे

11 मई का दिन भारत के इतिहास में कई कारणों से अहम है। एक तो इसी दिन भारत ने 1998 में दूसरी बार परमाणु परीक्षण किया था। आइए इसके अलावा और अहम घटनाओं को जानते हैं…

11 मई को हर साल राष्ट्रीय प्रौद्योगिकी दिवस मनाया जाता है। यह दिन देश की तकनीकी क्रांति और उसको पावरफुल बनाने में बहुत मायने रखता है।

11 मई को राष्ट्रीय प्रौद्योगिकी दिवस क्यों?
इसी दिन यानी 11 मई को राजस्थान के पोकरण परीक्षण श्रृंखला में भारत ने दूसरी बार सफलतापूर्वक परमाणु परीक्षण किया। उस समय देश के प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी थी। दो दिन बाद देश में दो और परमाणु हथियारों का परीक्षण हुआ। इस परीक्षण के साथ ही भारत दुनिया के उन छह देशों में शामिल हो गया जिनके पास परमाणु शक्ति है। इसी की याद में 11 मई को राष्ट्रीय प्रौद्योगिकी दिवस मनाया जाता है। इसके अलावा कई और अहम तकनीकी क्रांति इसी दिन संभव हुई थी। आइए उनके बारे में और राष्ट्रीय प्रौद्योगिकी दिवस के बारे में खास बातें जानते हैं…

हंस-3 ने भरी थी उड़ान
भारत के स्वदेशी विमान हंस ने 1998 में इसी दिन उड़ान भरी थी। हंस-3 को नैशनल एयरोस्पेस लैबरेटरीज द्वारा विकसित किया गया था। वह दो सीटों वाला हल्का सामान्य विमान था। उसका इस्तेमाल पायलटों को प्रशिक्षण देने, हवाई फोटोग्राफी, निगरानी और पर्यावरण से संबंधित परियोजनाओं के लिए होता है।

त्रिशूल मिसाइल
11 मई, 1998 को ही रक्षा अनुसंधान और विकास संगठन (डीआरडीओ) ने त्रिशूल मिसाइल का आखिरी परीक्षण किया था। फिर उस मिसाइल को भारतीय वायुसेना और भारतीय थलसेना में शामिल किया गया था। त्रिशूल जमीन से हवा में मार करने वाले मिसाइल है जो तेज प्रतिक्रिया देती है। यह छोटी दूरी की मिसाइल है। त्रिशूल को भारत के एकीकृत निर्देशित मिसाइल विकास कार्यक्रम के तहत तैयार किया गया था। इसी परियोजना के तहत पृथ्वी, आकाश और अग्नि मिसाइलों को बनाया गया।images(102)

विश्‍व तकनीक दिवस: तकनीक ने बदली जिंदगी, दुनिया आ गई मुट्ठी में

दिल्ली में बैठा डॉक्टर सहजनवा के गांव के गंभीर मरीज का ऑनलाइन इलाज कर रहा है। मोबाइल की चिप व सोलर एनर्जी को बिजली में बदलने वाली बैटरी की क्षमता बढ़ाई जा रही है। ईंट, सरिया व गिट्टी के बगैर जिस घर की पहले कल्पना तक नहीं की जाती थी, वह बिना सामग्रियों के बनने लगे हैं। अपराधियों की धर पकड़ और तमाम अनसुलझे अपराधों की गुत्थियां सुलझाने में भी मदद मिल रही है। यह सब संभव हुआ है तकनीक के इस्तेमाल से। तकनीक के इस्तेमाल ने आम लोगों की जिंदगी आसान बनने लगी है। लोगों के दैनिक जीवन से जुड़ी समस्याएं दूर होने लगी हैं। इलाज, शिक्षा, शोध, व्यापार व रहन सहन आसान हो रहा है। बैटरी से चलने वाला हल हर घंटे जोतेगा एक एकड़ खेतएमएमएमयूटी व डीडीयू में लोगों की रोजमर्रा की दिक्कतें दूर करने पर एक दर्जन से अधिक शोध हो रहे हैं। मोबाइल की चिप व सोलर एनर्जी को बिजली करंट में बदलने वाली बैटरी की क्षमता बढ़ाने पर दोनों संस्थानों में शोध हुए हैं। एमएमएमयूटी में प्रोफेसी डीके द्विवेदी की टीम लैब में बैटरी की क्षमता बढ़ाकर 18 फीसदी तक पहुंचाने में कामयाब हो चुकी है। डीडीयू के भौतिकी विभाग में असिस्टेंट प्रोफेसर भी यह क्षमता बढ़ाने पर काम कर रहे हैं। मटेरियल की खोज दोनों संस्थानों में की जा रही है ताकि न्यक्लियर विस्फोट से होने वाले हानिकार प्रभाव को रोका जा सके। डीडीयू के गणित विभाग में ब्लैक होल का अध्ययन किया जा रहा है। एमएमएमयूटी में मैकेनिकल इंजीनियरिंग विभाग की शिक्षिका डॉ. स्वाती गंगवार की टीम सस्ते हास्पीटल वेस्ट मैनेजमेंट प्लांट के निर्माण पर काम कर रही है। डॉ. स्वाती के अनुसार उनकी टीम को अंतिम चरण के कुछ प्रयोग करने बाकी रह गए हैं। हास्पीटल का कचरा (खून, शरीर से ऑपरेशन कर निकाले गए खराब अंग आदि) या तो अभी जमीन में गड्ढा खोद कर दबा देते हैं या फिर उन्हें जलाया जाता है। इसमें घातक विषाणु होते हैं, जो भविष्य में लोगों पर घातक असर डालते हैं। इन्हें बिना ट्रीटमेंट निस्तारित करना घातक है। इसके लिए अभी जो प्लांट प्रयोग किए जाते हैं वह बेहद लाखों रुपये में आते हैं, इसलिए सस्ते प्लांट की जरूरत है।सिसवा के दसवीं के छात्र राहुल सिंह बैट्री से चलने वाला हल व दवाएं आदि छिड़काव के लिए ड्रोन तैयार कर रहे हैं। राहुल ने बताया कि उनके द्वारा तैयार बैट्री चालित हल से दो घंटे में दो एकड़ से अधिक क्षेत्रफल तक खेत की जुताई हो जाएगी। इसी तरह वह जो ड्रोन तैयार कर रहे हैं, वह भी बैट्री से चलेगा। एक बाद चार्ज के बाद यह ड्रोन आधे में करीब एक एकड़ फसल में दवाओं का छिड़काव करेगा। एमएमएमयूटी के छात्र छोटे छोटे ऐप तैयार कर नोट्स व लेक्चर साझा कर रहे हैं। अच्छे नोट्स के लिए भाग दौड़ समाप्त हो गई है। मैकेनिकल इंजीनियरिंग विभाग के वर्कशॉप में मक्के के दाने कम से अलग करने वाली मशीन, पहाड़ और समतल पर समान रुप से रफ्तार भरने वाली रेसिंग बाइक का निर्माण सफलता पूर्वक पूरा हो चुका है।दिल्ली, लखनऊ से डॉक्टर कर रहे मरीजों का इलाजग्रामीण अंचल में गंभीर बीमारियों से जूझ रहे मरीजों को इलाज के लिए अब दिल्ली लखनऊ की भागदौड़ नहीं करनी पड़ रही है। मरीजों के घर के पास के ही पीएचसी या सीएचसी पर वहां के डॉक्टरों से ऑनलाइन इलाज की सुविधा मिल रही है।

 

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टेली-मेडिसिन व टेली-कांफ्रेसिंग के प्रयोग से जिले के 12 सीएचसी और पीएचसी को जोड़ा जा रहा है। टेली-मेडिसिन से चरगांवा प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्र(पीएचसी) का इलाज 2018 में शुरू हुआ। शासन ने इसके लिए स्वयंसेवी संस्था वर्ल्ड हेल्थ पार्टनर्स(डब्लूएचपी) को चुना है। संस्था के तकनीकी सलाहकार सोमेश सिंह ने बताया कि इस सुविधा के लिए पीएचसी पर पहुंचे मरीज को अपने मोबाइल से संस्था के कॉल सेंटर पर मिस्ड कॉल करना करना पड़ता है। दिल्ली में स्थित कॉल सेंटर के सुपर स्पेशियलिस्ट डॉक्टर मरीज से संपर्क करते हैं। बीमारी के लक्षणों के आधार पर जांच और दवाओं की जानकारी विशेषज्ञ द्वारा पीएचसी पर मौजूद डॉक्टर को दी जाती है। मरीजों को दवा और पैथोलॉजी जांच की सुविधा पीएचसी में ही मिलती है। पीएचसी से जुड़े चार हेल्थ सब सेंटर को भी इससे जोड़ा गया है। हर सेंटर की एक एएनएम को टैबलेट दिया है। इसमें एएनएम को अपने क्षेत्र में टीकाकरण के लिए चिन्हित मासूमों का ब्योरा दर्ज करना है। एएनएम को मासूम के टीकाकरण की अगली डोज की पूर्व सूचना काल सेंटर से दी जा रही है। कैम्पियरगंज, पाली, सहजनवा, भटहट, घघसरा, बड़हलगंज, चौरीचौरा, पिपराइच, गगहा और कौड़ीराम समेत 11 सीएचसी और पीएचसी में टेली-मेडिसिन से इलाज हो रहा है। इस टेली-मेडिसिन में डॉक्टर लखनऊ में बैठते हैं। वह इंटरनेट के वेब कैमरे की मदद से मरीज से सीधे संवाद करते हैं। इसमें मददगार पीएचसी का डॉक्टर होता है। सीएमओ डॉ. श्रीकांत तिवारी ने बताया कि टेली-मेडिसिन व टेली-कांफ्रेसिंग के जरिए इलाज में मरीजों से रिस्पांस बेहतर मिला है। कोशिश की जा रही है कि सभी पीएचसी व सीएचसी में चरणबद्ध तरीके से इसे लागू किया जा सके। तकनीक से दुकानदार ने रंगे हाथ पकड़वाया चोर तकनीक की मदद से आरएल मोबाइल शॉप के मालिक पंकज कुमार ने अपनी दुकान की न सिर्फ रोकने में कामयाबी पाई थी बल्कि चोर को भी गिरफ्तार करवाया था। घटना पांच नवम्बर 2018 की रात की है। शाहपुर थाने से पांच सौ मीटर की दूरी पर पासपोर्ट आफिस के सामने पंकज की आरएल मोबाइल शॉप के नाम दुकान है। पंकज ने दुकान में सीसी कैमरा लगवाया है और तकनीक का सहारा लेते हुए उसे मोबाइल फोन से जोड़ लिया है। वह रात में जब उठते हैं तब मोबाइल के जरिये दुकान की जांच जरूर कर लेते हैं। जिस रात चोर उनकी दुकान में घुसे थे, उस रात भी उन्होंने वही किया तो दुकान के अंदर एक युवक दिखा जो मोबाइल समेट रहा था। पंकज ने तुरन्त ही शाहपुर थाने पर सूचना दी। मौके पर पहुंची शाहपुर पुलिस ने चोर को रंगेहाथ गिरफ्तार कर लिया। पंकज की तरह ही तमाम लोग तकनीक का इस्तेमाल कर घर और दुकान की सुरक्षा कर रहे हैं। यही नहीं ज्यादातर अपराधों में बदमाशों को पकड़ने के लिए पुलिस भी नए तकनीक का इस्तेमाल करती है। सर्विलांस टीम चौबीस घंटे इसी तकनीक के सहारे काम में लगी रहती है। मोबाइल लोकेशन, टॉवर लोकेशन, सीसी कैमरा, आदि माध्यमों से पुलिस बदमाशों को पकड़ने में तकनीक का इस्तेमाल करती है।बिना ईंट-सीमेंट के 15 दिन में बना रहे घरईंट, सीमेंट, गिट्टी आदि के बगैर भवन निर्माण कभी कोई सोच भी नहीं सकता था। तकनीक ने अब इस धारणा को बदल दिया है। आशियाना के लिए महीनों का इंतजार करना अब गुजरे दिनों की बात हो गई है। बिल्डरों के भरोसे बहुमंजिली इमारतों के दौर में अपनी जमीन, अपनी छत की चाह रखने वाले लोग एलजीएस के साथ ही पुआल से बने आवास को तरजीह देने लगे हैं। शहर में विदेशों की तकनीक से पुआल के बोर्ड और स्टील से इको फ्रेंडली मकान बनने लगे हैं।

 

 

होम लोन की सहूलियत के दौर में लोग 15 से 45 दिन में अपने घर में प्रवेश कर रहे हैं। ईंट, सरिया, मौरंग बालू आदि की झंझट को देखते हुए गोरखपुर में एलजीएस (लाइट गेज स्टील) तकनीक पर मकान बनने लगे हैं। इस तकनीक से 1000 वर्ग फीट जमीन पर महज 30 दिन में मकान बन रहे हैं। कंक्रीट वाले भवन की तुलना में लागत भी करीब 25 फीसदी कम आ रही है। गोरखपुर में पहला आवासीय भवन रानीडिहा में बनकर तैयार भी हो गया है। 1400 वर्ग फीट में तीन मंजिला मकान सिर्फ 60 दिन में बनकर तैयार हुआ है। जीडीए के अधिशासी अभियंता अवनिन्द्र सिंह का कहना है कि लोग सस्ती और जल्दी वाले तकनीक की तरफ बढ़ रहे हैं। मदन मोहन मालवीय प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय में प्रोफेसर गोविन्द पांडेय का कहना है कि ईंट को लेकर एनजीटी की बंदिशों में और दिक्कतों को देखते हुए आर्किटेक्ट दूसरे विकल्पों की तरफ बढ़ रहे हैं।

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