August 9, 2022

Such Ke Sath

सच के साथ

रेवड़ी तो गरीबों को दी जाती है अमीर तो लड्डू खा रहा है

(Image by: Google)

 

सरकार का आंकड़ा कहता है कि भारत के महज 10 प्रतिशत कामगार महीने में 25 हजार रूपये से ज्यादा कमाते हैं। यानी 90 फीसदी कामगारों की कमाई 25 हजार रूपये से कम है। इनकी जिंदगी के बारे में सोचिए। क्या यह ढंग के मकान में रह पाते होंगे? ढंग का खाना खा पाते होंगे? ढंग का कपड़ा पहन पाते होंगे? अपने बच्चों को ढंग की शिक्षा दे पाते होंगे? इन सबके साथ महंगाई को भी जोड़ते चले जाइये। इस तरह से सोचते चले जाइये कि भारत के 90 फीसदी कामगारों की जिंदगी कितनी बीहड़ है? इसका अंदाज़ा लग जाएगा।

इस भयावह हकीकत के बाद भी अगर भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी बुंदेलखंड एक्सप्रेसवे उद्घाटन के दौरान कहते हैं कि ‘हमारे देश में रेवड़ी कल्चर को बढ़ावा देने की कोशिश हो रही है। मुफ्त की रेवड़ी बांटकर वोट बटोरने का कल्चर लाने की कोशिश हो रही है। ये रेवड़ी कल्चर देश के विकास के लिए बहुत घातक है.” तो इसका मतलब है कि सरकार को आम लोगों की तकलीफों से कोई मतलब नहीं। इससे कोई मतलब नहीं कि वह जनकल्याणकारी है या नहीं? अगर जनसभा के बीच में प्रधानमंत्री रेवड़ी बांटने की बात कर रहे हैं तो इसका मतलब है कि आम लोगों के बीच ऐसा धड़ा भी मौजूद है जो यह मानता है कि सरकार रेवड़ियां बांटती है। इन सबको जोड़कर कहा जाए तो मतलब यह बनता है कि भारत के तमाम लोगों को पता नहीं है कि उनके जीवन में सरकार का क्या रोल है? और सरकार उन्हें यह कहकर बरगला रही है कि मुफ्त का कल्चर देश को बर्बाद करना है।

यह पूरा भ्रम सरकार को लेकर इस समझ से निकलता है कि अगर सरकार मुफ्त में लोगों को सुविधाएँ देगी तो वह कंगाल हो जाएगी। जब से श्रीलंका में कर्ज की वजह से आर्थिक संकट शुरू हुआ है तबसे तो गोदी मीडिया के जरिये खुलकर लोगों को बताया जाने लगा है कि अगर मुफ्तखोरी बंद नहीं की गयी तो भारत का हाल भी श्रीलंका की तरह हो जायेगा। भारत के विदेश मंत्री एस जयशंकर ने कहा है कि श्रीलंका से सबक लेते हुए ‘मुफ्त के कल्चर’ से बचना चाहिए।

सबसे पहले अर्थव्यवस्था को लेकर एक सामान्य सी बात है, जिसकी अनदेखी हर जगह कर दी जाती है। अर्थव्यवस्था का मतलब केवल पैसे का प्रबंधन नहीं होता है। यह सोच हमें गलत निष्कर्षों तक ले जाती है। अर्थव्यवस्था का मतलब होता है संसाधनों का इस तरीके से बंटवारा है कि सब लोग गरिमा पूर्ण जीवन जी पाएं। और इसके लिए पैसा एक तरह के औजार का काम करता है। सामान और सेवाओं के लेनदेन का जरिया होता है।

इस आधार पर अगर भारतीय अर्थव्यवस्था को देखा जाए। तो भारतीय अर्थव्यवस्था में आर्थिक विषमता की खाई साल 1990 के बाद से लेकर अब तक खतरनाक रूप लेते आई है। कॉर्पोरटे घरानों ने जमकर कमाई की है, जिन लोगों के लिए प्रधानमंत्री मोदी रेवड़ियां बांटने शब्द का इस्तेमाल कर रहे हैं, वह गरीब से गरीब होते चले गए हैं।

मार्सेलस इन्वेस्टमेंट के सौरभ मुखर्जी और हर्ष शाह का विश्लेषण बताता है कि भारत की 20 बड़ी कंपनियों के पास भारत की अर्थव्यवस्था में होने वाले कुल मुनाफे का 70 फ़ीसदी हिस्सा है। साल 1990 में मुनाफे में हिस्सेदारी का यह आंकड़ा महज 14 फ़ीसदी हुआ करता था। यानी 1990 के बाद बड़ी कंपनियों ने संसाधन के हिसाब से उनका हक खूब मारा है, जिनकी संसाधनों तक पहुंच हमेशा से कम ही रही है।ऑक्सफैम हर साल भारत सहित दुनिया में मौजूद आर्थिक विषमता की रिपोर्ट प्रकाशित करता है। इन सबका मतलब यही है कि देश में बड़ी परेशानी मुफ्त में रेवड़ियां बांटना नहीं है, बल्कि बड़ी परेशानी यह है कि आर्थिक नीतियां ऐसी हैं कि संसाधनों का बंटवारा समतामूलक नहीं है। फूड, फर्टीलाइजर, फ्यूल, राशन जैसे तमाम चीजों पर सरकार की तरफ से आम लोगों को जितने रूपये की मदद मिलती है,उसका कई गुना सरकार की जनविरोधी आर्थिक नीतियां आम लोगों से छीन लेती हैं।

केवल इतना ही सोचिये कि रोजगार की दर भारत में 40 प्रतिशत के आसपास है। यानि रोजगार करने लायक 60 प्रतिशत आबादी के पास किसी तरह कामकाज नहीं है। जिस 40 प्रतिशत आबादी के पास कामकाज है, उसमें तकरीबन 90 प्रतिशत अधिक इनफॉर्मल सेक्टर में काम करते हैं। इनफॉर्मल सेक्टर  कामकाज के नाम पर भयंकर शोषण की जगह है। भारत सरकार के इ श्रम पोर्टल से पता चलता है कि तकरीबन 94 प्रतिशत आबादी 10 हजार प्रति महीने से कम कमाती है। ऐसे में सोचिये कि भारत की आर्थिक नीतिया कैसी हैं? यहाँ पर बुनियादी सुविधाएँ कितने लोगों को मिलती होंगी? कितने लोग बुनियादी सुविधाओं से मरहूम हो जाते होंगे। यहाँ पर ऐसी नीति की जरूरत है जिससे बुनियादी सुविधाएं लोगो को मिले न कि ऐसी नीति की बुनियादी हकों को मारकर
मुठी  भर लोगों को फायदा पहुँचता रहे और देश ढंग से चलाने का भ्रम बना रहे।

साल 2019 में सरकार ने कॉर्पोरेट टैक्स में कटौती की। कॉर्पोरेट टैक्स की दर 30 प्रतिशत से घटाकर 22 प्रतिशत (सरचार्ज आदि शामिल होने पर 35 प्रतिशत से 26 प्रतिशत) कर दी गई थी। जबकि यहां पर भयंकर कमाई होती है। यहाँ से सरकार को ज्यादा टैक्स वसूलना चाहिए।  यहाँ पर लोगों को पूछना चाहिए कि क्या इस छूट को सरकार द्वारा कॉर्पोरेट को दी जाने वाली रेवड़ी कही जाएगी या नहीं? कॉरपोरेट टैक्स में कटौती के अलावा मोदी सरकार लगातार कॉरपोरेट सेक्टर को रेवड़ियां बांटती रही है। 2014-15 और 2020-21 के बीच मोदी सरकार ने कॉरपोरेट करदाताओं को 6.15 लाख करोड़ रुपये की विभिन्न छूट, रियायतें और छूट दी। इसे ‘कर प्रोत्साहन’ कहा जाता है। इसी तरह बैंकों द्वारा कोर्पोर्टे सेक्टर को दिए गए 10.72 लाख करोड़ रुपये के कर्ज को बट्टे खाते में डाल दिया गया है। इस तरह खोजते चले जाएंगे तो सरकार द्वारा कॉर्पोरेट को दी गयी रेवड़ियों का बोरा तैयार हो जायेगा।  यह सब आर्थिक नीतियों के तहत बांटी गयी रेवड़ियां है। अगर भीतर खाने खोजने लगेंगे तो दिखेगा पूरे हिंदुस्तान को इस तरह से रच दिया गया है कि यहां सरकार और पूंजीपति मिलकर रेवड़ियां खा रहे हैं और जनता भूखे मर रही है। उसके ऊपर नसीहत दी जा रही है कि गरीबों में रेवड़ियां बांटने से देश का विकास रुक रहा है।

एक मिशाल और लीजिये बुजुर्गों के रेल टिकट पर उन्हें छूट मिलती थी। सरकार को इस छूट की वजह से 1500 करोड़ के आस पास नहीं मिलता था।  सरकार ने इस छूट को बंद कर दिया है। जबकि कोविड महामारी के दौरान जब पूरी दुनिया का कामकाज बंद था तब सेंटर फॉर मॉनिटरिंग इंडियन इकोनॉमी के नवीनतम आंकड़ों के मुताबिक बीएसई (जिसे पहले बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज के नाम से जाना जाता है) में सूचीबद्ध कंपनियों ने 2021-22 में 9.3 लाख करोड़ रुपये का मुनाफा कमाया। यह पिछले वर्ष की तुलना में 70 प्रतिशत ज्यादा था। महामारी से पहले यानी 2010-11 और 2019-20 के बीच हर साल के औसत मुनाफे से तकरीबन तीन गुना ज्यादा था। सोचिये इतना मुनाफा इन्होंने कैसे कमाया ? क्या सरकारी नीतियों के जरिये रेवड़ियां बांटे बिना यह संभव है? अगर सरकार कॉर्पोरेट सेक्टर पर ढंग से नियंत्रित करती तो उसे 1500 करोड़ रूपये से कई गुना राजस्व इकठ्ठा होता।

कुलमिलाजुलाकर कहने का यह मतलब है कि एक लोककल्याणकारी राज्य के लिए लोगों के कल्याण के लिए बनाये गयी योजनाओं को रेवड़ियां बांटना कहना ही गलत है।  तब तो और गलत है जब यह बोली भारत के प्रधानमंत्री की हो। राज्य बना ही इसलिए ही क्योंकि  संसाधनों का बंटवारा सबके साथ बराबर हो पाए। छिना झपटी न हो। मार पीट न हो। कम बेसी न हो।  यह राज्य का बुनयादी काम है कि हर तरह की वंचनाओं के साथ न्याय करे। अगर वह ऐसा नहीं करता तो वह कुछ दूसरा हो सकता है कि लेकिन राज्य नहीं। मतलब मुफ्त राशन देना, सब्सिडी देना, बुजुर्गों की आर्थिक मदद करना जैसे काम राज्य के काम है।  राज्य इससे पीछे नहीं हट सकता। तब तो बिलकुल भी पीछे नहीं हट सकता जब भारत जैसी भयंकर गरीबी हो।

चलते- चलते एक बात और देखिये। दक्षिण अमेरिका का देश चिली अपने देश का संविधान बनाने जा रहा है। दुनिया में कई संविधानविद चिली के संविधान के मसौदे की तारीफ़ कर रहे हैं। सबका कहना है कि अगर चिली का संविधान लागू हुआ तो वह उन कमियों को पूरा करेगा जो बीसवीं शताब्दी के मध्य के दौर में बनी संविधान में है। बीसवीं शताब्दी के दौर का संविधान सामजिक और आर्थिक गैरबराबरीयो को पहचानता है।  यह भी कहता है कि ऐसा कोई नियम कानून नहीं होना चाहिए जिससे भेदभाव वाला हो। जिससे गैर बराबरी बढे। लेकिन कुछ ठोस नहीं कहता जिससे मौजूदा भेदभाव कम हो। यही ठोस काम चिली का संविधान करने जा रहा है। मुफ्त शिक्षा,मुफ्त आवास, मुफ्त खाना, मुफ्त इलाज – हर वह सामान और सेवा मुफ्त जो गरिमापूर्ण जीवन से जुड़ी हुई है।

 

रेवड़ी कल्चर:

मुफ्त की रेवड़ी कल्चर पर पीएम मोदी के बयान पर सियासत भी हुई. हालांकि, एक महीने पहले ही आई रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया की रिपोर्ट में कहा गया था कि राज्य सरकारें मुफ्त की योजनाओं पर जमकर खर्च कर रहीं हैं, जिससे वो कर्ज के जाल में फंसती जा रहीं हैं.

इसे ऐसे समझ सकते हैं कि हाल ही में पंजाब सरकार ने हर परिवार को हर महीने 300 यूनिट फ्री बिजली और हर वयस्क महिला को हर महीने 1 हजार रुपये देने की योजना शुरू की है. इन दोनों योजनाओं पर 17 हजार करोड़ रुपये खर्च होने का अनुमान है. लिहाजा, 2022-23 में पंजाब का कर्ज 3 लाख करोड़ रुपये से ज्यादा होने का अनुमान है. आरबीआई ने चेताया है कि अगर खर्च और कर्ज का प्रबंधन सही तरह से नहीं किया तो स्थिति भयावह हो सकती है.

‘स्टेट फाइनेंसेस: अ रिस्क एनालिसिस’ नाम से आई आरबीआई की इस रिपोर्ट में उन पांच राज्यों के नाम दिए गए हैं, जिनकी स्थिति बिगड़ रही है. इनमें पंजाब, राजस्थान, बिहार, केरल और पश्चिम बंगाल है.

 

कैसे कर्ज के जाल में फंस रहे हैं राज्य?

आरबीआई ने अपनी इस रिपोर्ट में CAG के डेटा के हवाले से बताया है कि राज्य सरकारों का सब्सिडी पर खर्च लगातार बढ़ रहा है. 2020-21 में सब्सिडी पर कुल खर्च का 11.2% खर्च किया था, जबकि 2021-22 में 12.9% खर्च किया था.

रिपोर्ट के मुताबिक, सब्सिडी पर सबसे ज्यादा खर्च झारखंड, केरल, ओडिशा, तेलंगाना और उत्तर प्रदेश में बढ़ा है. गुजरात, पंजाब और छत्तीसगढ़ की सरकार ने अपने रेवेन्यू एक्सपेंडिचर का 10% से ज्यादा खर्च सब्सिडी पर किया है.

रिपोर्ट में कहा गया है कि अब राज्य सरकारें सब्सिडी की बजाय मुफ्त ही दे रहीं हैं. सरकारें ऐसी जगह पैसा खर्च कर रहीं हैं, जहां से उन्हें कोई कमाई नहीं हो रही है. फ्री बिजली, फ्री पानी, फ्री यात्रा, बिल माफी और कर्ज माफी, ये सब ‘freebies’ हैं, जिन पर राज्य सरकारें खर्च कर रहीं हैं.

आरबीआई का कहना है कि 2021-22 से 2026-27 के बीच कई राज्यों के कर्ज में कमी आने की उम्मीद है. राज्यों की ग्रॉस स्टेट डोमेस्टिक प्रोडक्ट (GSDP) में कर्ज की हिस्सेदारी घट सकती है. गुजरात, महाराष्ट्र, दिल्ली, कर्नाटक और ओडिशा की सरकारों का कर्ज घटने का अनुमान है.

 

हालांकि, कुछ राज्य ऐसे भी जिनका कर्ज 2026-27 तक GSDP का 30% से ज्यादा हो सकता है. इनमें पंजाब की हालत सबसे खराब होगी. उस समय तक पंजाब सरकार पर GSDP का 45% से ज्यादा कर्ज हो सकता है. वहीं, राजस्थान, केरल और पश्चिम बंगाल का कर्ज GSDP के 35% तक होने की संभावना है.

 

अब देखिए लड्डू कल्चर क्या है :

रेवड़ी कल्चर में आपने देखा कि आम इंसानो को सरकारो द्वारा छोटी छोटी मदद दी जाती है लेकिन लड्डू कल्चर में अरब पतियों के हजारो करोड़ रुपए को माफ कर दिया जाता है । केंद्र की एनडीए सरकार ने पिछले 7 सालों में करीब 11 लाख करोड़ रुपये के लोन माफ किए हैं, जो यूपीए सरकार के तुलना में 5 गुना ज़्यादा है. इसका खुलासा आरटीआई में हुआ है और इससे कहीं ना कहीं बैंकों के कमज़ोर हो रहे हालात के बारे में समझा जा सकता है.

 

आरटीआई से मिली जानकारी के अनुसार केवल कोरोना के 15 महीनों में 2,45,456 करोड़ रुपये के लोन को माफ किया गया. सरकारी बैंकों ने 1,56,681 करोड़ रुपये के लोन राइट ऑफ किए जबकि निजी बैंकों ने 80,883 करोड़ के और फॉरेन बैंकों ने 3826 करोड़ लोन माफ किए. NBFC ने भी 1216 करोड़ के लोन माफ किए हैं जबकि शेड्यूल कॉमर्स बैंक ने 2859 करोड़ रुपये के लोन राइट ऑफ किए.

 

पिछली सरकार की तुलना में इन कर्ज़ों के राइट ऑफ में 5 गुना बढ़ोतरी हुई है.

 

आर्थिक मामलों के विशेषज्ञ पंकज जायसवाल कहते हैं, ”लोन ज़्यादातर बिज़नेस कैटेगरी वालों के NPA हुए हैं. यह 100-200-500 करोड़ के लोन हैं. जो रिटेल लोन हैं, जैसे वेहिकल या होम लोन हैं, उसके आपको कम ही ऐसे मामले मिलेंगे क्योंकि यह सिक्योर्ड होते हैं. लेकिन बड़े लोन कानून तिकड़म अपनाते हैं और प्रॉसेस काफी लंबा चला जाता है.”

 

आरटीआई से मिली जानकारी में लगभग सभी बड़े बैंक शामिल हैं जिन्होंने लोन नहीं चुकता किए जाने पर उसे राइट ऑफ किया है और कहीं ना कहीं बैंकों के आर्थिक हालात को लेकर अब सवाल उठने लगे हैं.

 

आमदनी से ज्यादा खर्च ने और बनाया कर्जदार

चाहे राज्य सरकार हो या केंद्र सरकार, हर किसी को कर्ज की जरूरत पड़ती है. दुनियाभर की सरकारें भी कर्ज लेकर ही देश चलातीं हैं. लेकिन जब ये कर्ज बढ़ता जाता है तो उससे दिक्कतें बढ़नी शुरू हो जाती हैं. ऐसा ही श्रीलंका के साथ हुआ. श्रीलंका कर्ज लेता रहा और एक समय ऐसा आया कि वो उसे चुकाने की स्थिति में नहीं रहा और उसने खुद को दिवालिया घोषित कर दिया.

हमारे देश में भी सरकारों का राजकोषीय घाटा लगातार बढ़ता जा रहा है. केंद्र सरकार का भी और राज्य सरकार का भी. देश में एक भी ऐसा राज्य नहीं है, जिसका खर्च उसकी आमदनी से कम हो. हर सरकार अपनी आमदनी से ज्यादा ही खर्च कर रही है. इस खर्च को पूरा करने के लिए कर्ज लेती है.

 

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