August 9, 2022

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लखनऊ विश्वविद्यालय की पूर्व कुलपति रुपरेखा वर्मा का पर्चा बाटते वीडियों हुआ वायरल, जानिए क्या है पर्चे में 

एलयू की पूर्व कुलपति डॉ. रूपरेखा वर्मा का एक वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा है. वायरल वीडियो में एलयू की पूर्व कुलपति सड़कों पर राहगीरों को पर्चे बांट रहीं हैं. आइए जानते हैं क्या है पूरा मामला…

 

न्यूज डेस्क 08 जुलाई|लखनऊ विश्वविद्यालय  की पूर्व कुलपति डॉ. रूपरेखा वर्मा का एक वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा है. वीडियो में लखनऊ विश्वविद्यालय की पूर्व कुलपति लखनऊ की सड़कों पर राहगीरों को पर्चे बांटते हुए नजर आ रही हैं. यह वीडियो चर्चा का विषय बना हुआ है, वायरल वीडियो में पूर्व कुलपति सड़कों पर 1857 की क्रांति के पर्चे बांट रही हैं.

 

प्रोफेसर रूपरेखा वर्मा द्वारा बांटे जा रहे पर्चे 1857 की क्रांति के घटनाक्रम से जुड़े हुए हैं. वर्ष 1857 की क्रांति में लखनऊ के चिनहट इलाके की भूमिका इस आंदोलन में रही है. इसलिए पर्चे बांटने के लिए चिनहट को ही चुना गया. इन पर्चों के ऊपर एक लाइन लिखी है ‘नफरत की लाठी तोड़ो, आपस में प्रेम करो देश प्रेमियों’. इस पर्चे के अंत में लिखा गया है कि आइए इस शुरुआत में अपना साथ दीजिए. खुद जुड़िए और और औरों को जोड़िए. जुल्म जब बढ़ते हैं-फूल और खिलते हैं.

 

 

लखनऊ यूनीवर्सिटी की पूर्व कुलपति डॉ. रूपरेखा वर्मा का सड़क पर पर्चे बांटने का वीडियो खूब सुर्खियां बटोर रहा है. बांटे जा रहे पर्चे 1857 की क्रांति से जुड़े हैं. इसके अलावा एलयू की पूर्व कुलपति ने इन पर्चों के माध्यम से कई सवाल उठाए हैं. पर्चों में लिखा कि फेसबुक, व्हाट्सएप और टीवी चैनल पर जिस हिसाब से एक दूसरे के खान-पान, पहनावे, यहां तक कि रंगों और नामों से नफरत देखने को मिल रही है. उसे देखकर यकीन नहीं होता कि कभी हमारा निरक्षर मुल्क भी इससे कहीं ज्यादा समझदार था. जैसे आज का पढ़ा-लिखा मिडिल क्लॉस है. इन्हीं दिनों में हिन्दू-मुसलमान, किसानों, मजदूरों, महिलाओं-बच्चों की आम जनता यानी हर जाति धर्म के लोगों ने अपनी एकता और भाईचारे के दम पर पूरी दुनिया में कहीं न हारने वाली हेनरी लॉरेंस की गोरी फौज को लखनऊ में ध्वस्त कर दिया था.

 

 

यूजर्स का ये रहा कमेंट
इस उम्र में प्रो. रूप रेखा वर्मा के जोश, जज्बे और उत्साह को जिसने भी देखा वह उनका मुरीद हो गया. ट्विटर पर एक व्यक्ति ने इस वीडियो को शेयर किया तो नवीन दत्त नाम के यूजर ने लिखा की ‘आंखें नम हो गई आप लोगों के जज्बात देखकर. उन्होंने आगे लिखा कि एक बार प्रोफ़ेसर वर्मा के चरण छूने की इच्छा हो रही है. मुझे शक है वह हाड़-मांस कि नहीं लेकिन खाली इस्पात की बनी हैं.’

 

कुछ लोगों ने बड़े फख्र से लिखा कि ‘मैं उनका स्टूडेंट रहा हूं. फेसबुक पर एक यूजर ने लिखा कि आप जैसे लोगों की वजह से ही दुनिया कायम है. तो एक अन्य यूजर ने प्रोफेसर वर्मा को सच्चा देशभक्त लिखा.

लोगों से की ये अपील
इन पीले पर्चे में देश का गौरवशाली इतिहास लिखा था लेकिन अंत में यह भी लिखा था कि ‘हम जानते हैं इस दौर में देश का मौसम उदास है, मगर हम यह भी जानते हैं कि अगर हम सब हर निराशा या जुल्म को फेंक कर एक हो जाएं तो हर ओर फिर से फूल खिला देंगे.’

 

लोगों से अपील की गई कि ‘आइये इस शुरुआत में अपना साथ दीजिए, खुद जुड़िए औरों को जोड़िए.’ प्रो. रूप रेखा वर्मा ने कहा कि फिर आंदोलन की जरुरत है. उन्होंने कहा कि आंदोलन कोई खून खराबा नहीं होता. इसका मतलब होता है कि जुट करके उद्देश्य के लिए जनता के बीच जाकर काम करना, जिससे सबका सहयोग उसमें मिल सके. इस समय जो आंदोलन करना है वह आपस में विभाजन की जो कोशिशें हो रही वह ना हो. हम सब मिलकर के देश को आगे बढ़ाएं. हमारी आर्थिक स्थिति बिगड़ रही है, बेरोजगारी और महंगाई के हालात खराब हो रहे हैं, देश पीछे जा रहा है. अगर हम आपस में ही लड़ते रहेंगे तो देश को आगे बढ़ाने का तो दूर हम ही टुकड़ों में बट जाएंगे.

 

प्रो. रूपरेखा वर्मा का कुलपति के तौर पर कार्यकाल आज भी याद किया जाता है. इसी लखनऊ विश्वविद्यालय में वे लंबे समय तक फिलॉसफी की प्रोफेसर और विभागाध्यक्ष भी रही. रिटायर होने के बाद भी वह महिलाओं के अधिकार और अन्य सामाजिक मुद्दों को लेकर काम कर रही हैं.

 

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