June 29, 2022

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सच के साथ

विकास का पहिया विनाश के रास्ते पर चलता हुआ!

धरती तो धरती अंतरिक्ष में भी मानव कर रहा है कचडा़

यहां पर हम कह सकते हैं कि विकास का पहिया विनाश के रास्ते पर, ये कचड़ा निस्तारण आज वैज्ञानिकों के लिए किसी चुनौती से कम नहीं है मैंने एक युवा वैज्ञानिक Muhammad Shadab Khan जी से इस बारे में जानना चाहा जो कि उत्तर प्रदेश के बस्ती जिले के रहने वाले हैं वर्तमान में फ्रांस में नैनो सेटेलाइट पर काम कर रहे हैं,
तो उन्होंने बताया कि ये चिंता का विषय तो है लेकिन इसपर दुनिया के वैज्ञानिक रिसर्च कर रहे हैं।

अब मैं आप को बताना चाहता हूं कि पिछले पचास वर्षो के दौरान अंतरिक्ष में भेजे गए उपग्रहों, प्रयोगशालाओं और अन्य मिशनों से निकले कचरे का ढेर चक्कर लगा रहा है.

इस कचरे में हज़ारों नट बोल्ट, दस्ताने, उपग्रहों से उतरा पेंट, ईंधन टैंक और ढेरों ऐसी चीज़े हैं जो अंतरिक्ष-मिशनों के लिए भारी ख़तरा हैं.
– रिपोर्ट के मुताबिक अंतरिक्ष में धरती के आसपास स्पेस जंक (स्पेस का कचरा) के 6 लाख से भी ज्यादा टुकड़े तैर रहे हैं। इसमें विमान, रॉकेट्स, सैटेलाइट्स और स्पेस स्टेशन के खराब हो चुके पार्ट्स भी शामिल हैं। अब ये कचरा इतना ज्यादा बढ़ता जा रहा है कि इसकी वजह से पृथ्वी के बाहर एक जाल सा बनता जा रहा है।
अंतरिक्ष में फैला कचरा 7-8 किलोमीटर प्रति सेकेंड की रफ्तार से अपनी कक्षा में घूमता है और एक छोटे-से टुकड़े के भी किसी उपग्रह से टकराने पर भारी नुक़सान हो सकता है

प्रो यूआर राव
भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संस्थान के पूर्व अध्यक्ष प्रोफेसर यूआर राव का मानना है कि ‘अंतरिक्ष में फैला कचरा 7-8 किलोमीटर प्रति सेकेंड की रफ्तार से अपनी कक्षा में घूमता है और एक छोटे-से टुकड़े के भी किसी उपग्रह से टकराने पर भारी नुक़सान हो सकता है.’

“लेकिन अंतरिक्ष बहुत विशाल है इसलिए इसके टकराने की आशंका काफी कम रहती है.”

अनुमान है कि एक सेंटीमीटर से कम आकार के करोड़ों टुकड़े अंतरिक्ष में घूम रहे हैं.

अंतरिक्ष में घूम रहे कबाड़ में 45 वर्ष पहले छोड़ा गया अमरीका का दूसरा उपग्रह वेनगार्ड-1 अभी भी पृथ्वी के चक्कर लगा रहा है.

1965 में जब पहली बार अमरीकी अंतरिक्ष यात्री एडवर्ड व्हाइट यान के बाहर निकले तो उनका एक दस्ताना गिर गया और 28000 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से एक महीने तक अंतरिक्ष में चक्कर लगाता रहा.

अंतरिक्ष स्टेशन मीर ने अपने अभियान के पहले 10 वर्षों के दौरान दो सौ से भी ज़यादा कूड़े के थैले अंतरिक्ष में छोड़े थे.

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हल क्या है?

 सवाल यह है कि क्या यह कबाड़ कभी ख़त्म होगा?

इस पर प्रथम भारतीय अंतरिक्ष यात्री विंग कमांडर राकेश शर्मा का कहना है कि समय गुज़रने के साथ-साथ काफी कचरा पृथ्वी के वातावरण में आते हुए रगड़ खाने के कारण जल जाता है या फिर समुद्र में गिर जाता है.

अंतरिक्ष में मानव निर्मित कचरा चिंताजनक हद तक
इस कचरे को ख़त्म करने का एक तरीक़ा है मानवीय प्रयासों से इसे वापस धरती पर लाना.

प्रोफेसर यूआर राव के अनुसार अंतरिक्ष के कचरे को समाप्त करना या वापस धरती पर लाना एक बेहद कठिन और ख़र्चीला काम है.

लेकिन इस कचरे पर बाहरी अंतरिक्ष के लिए गठित संयुक्त राष्ट्र समिति और नासा जैसी संस्थाएँ नज़र रखती हैं.

मानवीय गतिविधियों के चलते अंतरिक्ष का वातावरण प्रदूषित होता जा रहा है और अंतरिक्ष में भेजे जाने वाले मिशनों की संख्या में वृद्धि के चलते दुर्घटना की आशंकाएँ भी बढ़ रही हैं.

विंग कमांडर राकेश शर्मा का कहना है कि अब समय आ गया है कि अंतरिक्ष में उपग्रह, प्रयोगशालाएँ और शटल भेजने वाले देश स्थिति की गंभीरता को समझें ताकि अरबों रूपए ख़र्च करके अंतरिक्ष में भेजे जाने वाले मिशन नाकाम न हों और मानवीय विकास में सहायता हो.

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क्यों तैर रहा कचरा?
– अंतरिक्ष और इससे जुड़ी खोज के लिए कई देशों की स्पेस एंजेसियां लगातार काम करती रहती हैं। इसके लिए कई रॉकेट और सैटेलाइट जैसे उपकरण अंतरिक्ष में भेजे जाते हैं। अंतरिक्ष में भेजे जाने वाले रॉकेट और सैटेलाइट का कुछ ही हिस्सा जमीन पर लौटता है। आमतौर पर स्पेसशिप का वजन कम करने के लिए इस्तेमाल पूरा होने पर शेल को वहीं छोड़ दिया जाता है। यहीं चीजें अंतरिक्ष में जीरो ग्रैविटी की वजह से तैरती रहती हैं।

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 क्या हैं खतरे?
भविष्य में अंतरिक्ष भेजे जाने वाले स्पेस शटल्स और रिसर्च प्रोग्राम्स के लिए ये अब सबसे बड़ा खतरा बन गए हैं। अंतरिक्ष में तैरने वाले इन टुकड़ो की लंबाई 1 सेन्टीमीटर से 10 सेन्टीमीटर के बीच है। हर साल इस कचड़े की वजह से एक न एक सेटेलाइट नष्ट हो जाती है। जबकि ये स्पेस शटल्स को भी भारी नुकसान पहुंचा सकता है। वहीं इनकी दिशा बदलना भी हमारे लिए खतरनाक है।

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इन देशों ने फैलाया ज्यादा कचरा
– स्पेस साइंटिस्ट रिची कार्मिशेल ने 3डी विज्युल्स से दिखाया कि हमारी धरती इससे किस तरह घिर चुकी है। रिची ने बताया कि इस कचरे को फैलाने में अमेरिका, रूस और चीन सबसे आगे हैं।

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