July 7, 2022

Such Ke Sath

सच के साथ

विज्ञान विनाश या विकास कर रहा है!

विज्ञान ने बढ़ती आबादी की जरूरतों को पूरा करने के लिए जो साधन खोजे हैं या जिन साधनो का अविष्कार किया हैं, आज वो ही हमारे लिए प्राणघातक अथवा दुखदायी बन चुके हैं।

हम पुरातन ज्ञान के अनुसार विश्लेषण करें, तो प्रकृति स्वयं में पूर्णता का समावेश लिए रहती हैं। प्रकृति में वो सब चीज, जिनकी हमें आवश्यकता हो सकती हैं, पहले से ही मौजूद हैं। हम उनकी सुरक्षा व उपयोग कर अपना जीवन आसानी से गुजार सकते हैं। हमने जंगलो का बड़े स्तर पर विनाश कर दिया, जिससे हमारी बहुमूल्य जड़ीबूटियां विलुप्त हो गई। जंगलो के विनाश व प्रदूषण के चलते, स्थानीय पर्यावरण में परिवर्तन आने लग गया। परिणाम यह हुआ कि कई चीजे हमारे लिए असरकारक नहीं रही।

विज्ञान ने आवागमन हेतु यातायात के साधनो का भारी विकास किया हैं। आप एक दिन में देश के किसी भी कोने में पहुँच सकते हो। जल थल व नभ, तीनो ही मार्गों से यातायात के क्षेत्र में क्रांतिकारी व अविश्वनीय बदलाव देखने को मिल रहे हैं, परन्तु इसका फायदा यह मिला कि, हमारी दौड़ लम्बी हो गयी। हम जानवरों पर बैठकर, बैलगाड़ी से या पैदल यात्रा करके भी अपना कार्य या व्यवसाय कर लेते थे, उसकी जगह आज हवाईजहाज, पानी के जहाज, रेल, बस, कार, ट्रक, ट्रेक्टर, दुपहिया वाहन आदि की मदद से यात्रा करने लगे हैं, परन्तु हमारे पास समय फिर भी कम पड़ने लगा हैं। इन द्रुत गति वाले साधनो के उपयोग के बाद भी समय बचा पाने में असमर्थ हैं। पहले से ज्यादा भागमभाग होने लगी हैं, व्यस्तता बढ़ गई हैं। इन साधनो से फिर मिला क्या?

कोई शारीरिक आराम की बात या समय के बचत की बात कर सकता हैं, परन्तु आप गहराई से विचार करेंगें तो लगेगा कि वास्तव में न तो शारीरिक सुख सुविधा प्राप्त हुई हैं, और न ही समय में बचत हुई हैं। आज किसी के पास समय नहीं हैं। हर आदमी भागता हुआ नजर आता हैं।

हमारी यात्रा का क्षेत्र विशाल हो गया। व्यापार का दायरा बढ़ गया। रिश्ते नाते दूर दराज में होने लगे। एक ही परिवार कई देशों में रहने लग गया। इन सब के पीछे धन की आवश्यकता भी बढ़ने लगी। व्यक्ति के जीवन का मुख्य कार्य धनोपार्जन करने तक रह गया। न तो विज्ञान के साधनो से शुकुन प्राप्त हुआ और न ही समय की बचत हो पाई। हम शारीरिक सुख प्राप्ति की भी बात सोचें, तो वो भी मिथ्या हैं। हमारा शरीर कमजोर हो गया। क्षमता घट गई। आज के समय में इंसान के शुक्राणुओं में भी चिंताजनक गिरावट देखने को मिल रही हैं। आदमी और औरत, दोनों की सन्तान उत्पति व उसके लालन पालन की क्षमता कमजोर हो चुकी हैं। धैर्य, साहस, सहन शक्ति, त्याग, बलिदान, अपनत्व, संकोच, सच्चाई, दृढ़ता, सेवा, समर्पण, सदाचार जैसे गुणो का लोप हो चुका हैं। हम किस आधार पर हमारी शारीरिक क्षमता में कोई वृद्धि दर्ज कर सकते हैं?

यातायात के साधनों के विकास के साथ ही उनका व्यवसायिक उपयोग शुरू हो गया। हर वस्तु, हर चीज़, देश दुनिया के कोने कोने में पहुँचने लगी। कश्मीर की सेव कन्याकुमारी में, तो न्यूजीलैंड की कीवी भारत में मिलने लगी। भारत का आम अमेरिका में तो इटली के अंगूर चाइना में मिलने लगे। मशीनरी, खनिज, मानव निर्मित उत्पाद आदि का परिवहन तो समझ में आता हैं, परन्तु फल, फूल, सब्जियाँ, दही, दूध, मक्खन, पनीर, मिठाइयाँ जैसे नित्य उपयोग की चीजो का परिवहन होने लग गया। इन चीजो को सुरक्षित ले जाने हेतु इनमें रसायन डाले जाने लगे। फलो को कच्चा ही तोड़ा जाने लगा। फिर उनको कृत्रिम तरीके से पकाया जाने लगा। कोई भी वस्तु अपने प्राकृतिक गुण धर्म में नहीं रही। यह सब करने का कोई विशेष औचित्य या प्रयोजन नहीं हैं, परन्तु धनोपार्जन के लक्ष्य की प्राप्ति में सरकारे भी मूक दर्शक बनी हुई हैं। मानवाधिकार व पर्यावरण की बाते करने वाले लोग, विकसित देश, बुद्धिजीवी वर्ग, डॉक्टर, वैज्ञानिक, कोई भी इन चीजों का विरोध करता नजर नहीं आ रहा हैं। किसी को यह विनाश नजर नहीं आ रहा हैं।

जब नजर आने लगेगा, तब तक शायद बहुत देर हो चुकी होगी।

शेष अगली कड़ी में—-

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