June 26, 2022

Such Ke Sath

सच के साथ

विपक्ष के पास कौन सा विकल्प?

कोलकाता में विपक्ष की मेगा रैली के बाद भी यह सवाल अपनी जगह कायम है कि अगले आम चुनाव को लेकर जारी अपनी मुहिम में क्या वह थोड़ा भी आगे बढ़ा है? क्या जनता के सामने वह बीजेपी सरकार के एक मजबूत विकल्प का दावा पेश कर पाया है? सचाई यह है कि विपक्ष के भीतर अभी इतनी गांठें दिख रही हैं कि उसकी एकजुटता को लेकर भी संदेह होता है। उससे बुरी बात यह कि विपक्ष की तरफ से कोई वैकल्पिक अजेंडा पेश किया जाना तो दूर, अब तक इसकी कोई संभावना भी नहीं नजर आई है। कोलकाता रैली में मौजूद 22 दलों के नेताओं ने मोदी सरकार की निंदा-भर्त्सना के सिवा और कुछ नहीं किया। उन्होंने यह तो कहा कि मोदी सरकार युवाओं को रोजगार देने में विफल हो रही है लेकिन यह नहीं बताया कि कल को अगर खुद उनकी सरकार आती है तो उसके पास रोजगार देने का क्या फॉर्म्युला होगा?
कांग्रेस ने पिछले दिनों किसानों पर एक स्टैंड जरूर लिया, जिसका उसे फायदा भी मिला, लेकिन इस बारे में बाकी दलों की क्या राय है? दूसरे शब्दों में कहें तो गैर-कांग्रेसवाद के दौर में साझा वैकल्पिक नीतियों की बात की जाती थी, जबकि गैर-बीजेपीवाद के नाम पर मोदी विरोध भर सुनने को मिल रहा है। विपक्षी गठबंधन के लोहिया, जेपी और वीपी सिंह जैसे पुरोधाओं ने अपने वैकल्पिक कार्यक्रम देश के सामने पेश किए थे, लेकिन अभी की गैर-बीजेपी गोलबंदी में ऐसा कोई अजेंडा नदारद है। यह भी साफ नहीं है कि मोदी को हटाने का चुनावी सूत्र क्या होगा? आपसी तालमेल का आलम यह है कि यूपी में एसपी-बीएसपी ने गठबंधन की घोषणा करते वक्त कांग्रेस से बात करना भी जरूरी नहीं समझा और बीएसपी सुप्रीमो मायावती आए दिन कांग्रेस को ही कोसती रहती हैं। जिस बंगाल में विपक्षी एकता का इतना विराट प्रदर्शन हुआ, वहां लेफ्ट पार्टियों का सत्ताधारी तृणमूल से कोई संवाद नहीं है और कांग्रेस का भी किसी के साथ जाना मुश्किल लगता है।
पहले के ज्यादातर विपक्षी गठबंधनों में लेफ्ट की अहम भूमिका थी जबकि अभी वह अलग-थलग है। कांग्रेस की भूमिका इस जमावड़े में क्या होने वाली है, यह प्रश्न भी संभवत: चुनाव नतीजे आने तक अनुत्तरित ही रहने वाला है। ऐसा लगता है कि देश के काफी बड़े हिस्से में कांग्रेस को बीजेपी के साथ-साथ क्षेत्रीय दलों से भी लड़ना पड़ेगा। लोकसभा की 237 सीटों पर ऐसा तिकोना मुकाबला संभव है। इसका फायदा बीजेपी को मिलेगा या नहीं, यह आगे पता चलेगा, पर लोगों के मन में सवाल जरूर होगा कि मोदी के खिलाफ एकजुट होने वाले इतने सारे दल सीटों पर न्यूनतम तालमेल के लिए भी राजी क्यों नहीं हैं? इससे राष्ट्रीय स्तर पर विपक्ष की चुनौती कमजोर होगी और वह जनता में स्थिर सरकार की उम्मीद नहीं जगा पाएगा। बहरहाल, अभी चुनाव की रणभेरी बजने में कम से कम दो महीने का वक्त है। इस समय का इस्तेमाल विपक्ष अपनी तस्वीर सुधारने में कर सकता है।

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