June 24, 2022

Such Ke Sath

सच के साथ

शिक्षा का व्यवसायीकरण अनुचित है।

अप्रैल का महीना आते हैं पैरेंट्स इस सोच में पड़ जाते हैं कि, बच्चों का एडमिशन कहा कराया जाए , कहां कम फीस में अच्छी पढ़ाई होती है। जिसका जिम्मेदारी हमारी व्यवस्था है क्र्यूकि सरकारी स्कूलों में पढ़ाने के नाम पर कुछ लोगों को केवल और केवल अपनी सैलरी के लगाव रहता है , जिसका परिणाम ये होता है कि अपने बच्चों के जागरूक पैरेंट्स बच्चों के नाम सरकारी स्कूलों और कॉलेजों में न लिखाकर किसी प्राइवेट स्कूल कालेज में लिखाते है , और यहां तो पढाई होती है लेकिन आर्थिक समस्याये आ जाती है।

हमारे देश में शिक्षा के क्षेत्र का क्या महत्व है ये किसी को बताने की जरूरत नहीं है। भारत के करोड़ों बच्चे हर सुबह अपना बस्ता लेकर स्कूल जाते हैं। हर माता-पिता की तमन्ना रहती है कि उनका बच्चा पढ़-लिखकर एक काबिल इंसान बने और दुनिया में खूब नाम रोशन करे। इन स्वप्नों को पूरा करने में स्कूल और हमारे देश की शिक्षा व्यवस्था बहुत बड़ी भूमिका निभाते हैं।

ज़ाहिर सी बात है किसी भी देश की संपन्नता उस देश की जनसंख्या के साक्षरता अनुपात पर निर्भर करती है। यद्यपि संपन्नता के लिए साक्षरता के अलावा अनेकों अन्य कारण भी होते हैं, लेकिन यह पूर्ण विश्वास के साथ कहा जा सकता है कि बिना शिक्षा के किसी देश राज्य या परिवार की प्रगति संभव नहीं है। शिक्षा के बिना मानव पशु के समान है, क्योंकि शिक्षा ही सभ्यता एवं संस्कृति के निर्माण में सहायक होती है और मानव को अन्य प्राणियों की तुलना में श्रेष्ठ बनाती है।

लेकिन विडंबना यह है कि लोगों के जीवन को गढ़ने वाली यह पाठशाला आजकल एक ऐसा व्यवसाय का रूप ले चुकी है.. जिसने अच्छी शिक्षा को पैसे वालों की बपौती बना कर रख दिया है। यहाँ तो अब साधारण तथा मध्यमवर्गीय परिवार बस बड़े स्कूलों को दूर से टकटकी लगाकर देखते हैं और सोचते हैं कि काश उनका बच्चा भी ऐसे स्कूलों में पढ़ पाता।

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आजकल शहरों में तो क्या, गांवों में भी शिक्षा का व्यवसायीकरण हो गया है। यदि आंकड़ों को देखा जाए तो सरकारी स्कूलों में केवल निर्धन वर्ग के लोगों के बच्चे ही पढऩे के लिए आते है, क्योंकि निजी शिक्षा संस्थाओं के फीस के रूप में बड़ी-बड़ी रकमें वसूली जाती है, जिन्हें केवल पैसे वाले ही अदा कर पाते है।

आज अच्छी और उच्च शिक्षा का व्यवसायीकरण हो रहा है। निजी शिक्षण संस्थानों के संचालक मनमर्जी की फीस वसूल कर रहे है या यूँ कहें शिक्षा का बाज़ार लगाकर लूट मचा रखी है। जहाँ एक तरफ जितनी स्कूल की फीस बढ़ती जा रही है, वहीँ दूसरी तरफ उतना ही शिक्षा का स्तर गिरता जा रहा है। लेकिन क्या कभी आपने सोचा है की इस सबके लिये कही ना कही हम सब भी जिम्मेदार हैं।

पता नहीँ हम सब किस रेस में आगे निकलने की कोशिश कर रहे है। ज्यादातर लोगों की यह सोच है कि शहर का सबसे महंगा स्कूल ही सबसे अच्छा स्कूल है, और हम अपने बच्चों को उसी महंगे रेस का हिस्सा बना देते है।

स्कूल में एडमिशन की रेस

आज के दौर मैं आपके मनपसंद स्कूल में प्रवेश लेना ही अपनेआप में एक बडी चुनौती हो गया है। मध्य वर्गीय परिवार अपने बच्चों को उनकी पसंद के स्कूल में नही पढ़ा सकते आज आलम यह है की नर्सरी कक्षा की फीस ही करीब एक लाख रुपए हो गयी है। यदि आपको अच्छे स्कूल मॆ बच्चे को पढ़ाना है तो आपके बैंक अकाउंट में अच्छी खासी रकम होनी चाहिये। वरना आपका अपने बच्चे को अच्छे कहे जाने वाले स्कूल में पढ़ाने का सपना बस एक सपना बन कर ही रह जायेगा।

हमारी सरकारों को चाहिए कि इसके प्रति कोई उचित कदम उठाए।।

शिक्षा व्यापार नहीं संस्कार है।

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