May 20, 2022

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सच के साथ

सामान की कीमतों के अंत में .99 या .14 या 999 रुपए लगाने का सीक्रेट क्या है, इसका दुकानकार और ग्राहकों पर कितना असर होता है?

Why Do Most Prices End in 99: सेल के दौरान चीजों की कीमत को .99 रुपए के अंकों के साथ पेश किया जाता है. ऐसे कस्टमर जो सामान खरीदते समय कीमत पर अधिक ध्यान देते हैं वो ऐसी चीजों को अधिक खरीदते हैं, पर ऐसा होता क्यों है, जानिए…

 

ऑफलाइन स्‍टोर (Offline Stores) हो या ऑनलाइन शॉपिंग (Online Shopping), ज्‍यादातर सामानों की कीमत के अंत में 99 लिखा होता है. कई ऐसे स्‍टोर्स भी होते हैं जहां पर सिर्फ 99 रुपये में हर सामान बेचा किया जाता है. कभी सोचा है कि 99 के पीछे का सीक्रेट क्‍या है. इसका सीक्रेट समझने के लिए कई वैज्ञानिकों ने रिसर्च की. रिसर्च के जरिए यह समझने की कोशिश की कि 99 के फेर से ग्राहकों पर क्‍या असर (Consumer Behavior) पड़ता है और व्‍यापारियों या ऑनलाइन स्‍टोर्स (Online Stores) चलाने वाली कंपनियों का टर्न ओवर कितना प्रभावित होता है. जानिए, इससे ग्राहकों पर कितना और कैसे असर पड़ता है… 

शोधकर्ताओं की रिपोर्ट कहती है, कीमतों के अंत में 99 या 999 होने से इसका सीधा असर कंज्‍यूमर की सायकोलॉजी पर पड़ता है और उनका व्‍यवहार बदलता है. नतीजा, वो ऐसे सामान को ज्‍यादा खरीदते हैं. जानिए, इसकी वजह क्‍या है?

 

 

इसलिए ग्राहक को .99 वाली कीमत कम लगती है

लाइव साइंस की रिपोर्ट कहती है, ऐसा कई देशों में किया जा रहा है. फ्रीड हार्डेमेन यूनिवर्सिटी के मार्केटिंग के एसोसिएट प्रोफेसर  ली ई हिब्‍बेट कहते हैं, किसी भी चीज की कीमत में .99 लिखा होना एक थ्‍योरी पर आधारित है. वह कहते हैं, इंसान हमेशा लिखी हुई चीजों को दाईं से बाईं ओर पढ़ता है. इंसान के दिमाग में हमेशा पहला अंक ज्‍यादा याद रहता है, इसलिए दुकानदार अंत में 99 अंक का प्रयोग करते हैं ताकि उन्‍हें कीमत कम लगे. इसे एक उदाहरण से समझ सकते हैं. 

जैसे- मान लीजिए किसी चीज की कीमत 500 रुपये है, लेकिन उसे 499 रुपये लिखा जाता है. इससे इंसान के दिमाग में उस सामान की कीमत चार सौ रुपये रहती है. 99 वाले हिस्‍से पर ज्‍यादातर ग्राहक गौर नहीं करते. मनोवैज्ञानिक तौर पर इंसान को 500 रुपये के मुकाबले 499 रुपए काफी कम लगते हैं, जबकि सिर्फ 1 रुपये का फर्क होता है. 

हार्वर्ड बिजनेस रिव्‍यू की रिपोर्ट कहती है, सेल के दौरान चीजों की कीमत को  .99 रुपए के अंकों के साथ पेश किया जाता है. ऐसे कस्‍टमर जो सामान खरीदते समय कीमत पर अधिक ध्‍यान देते हैं वो .99 प्राइस वाले टैग को देखकर यह समझते हैं कि वो कम कीमत पर सामान खरीद रहे हैं. 

इसका एक और फायदा दुकानदारों को मिलता है

रिपोर्ट के मुताबिक, 99 पर खत्‍म होने वाली चीजों की कीमत से दुकानदारों को एक फायदा और भी मिलता है. इसे एक उदाहरण से समझ सकते हैं. जैसे- अगर कोई ग्राहक 599 रुपये का सामान खरीदता है तो कैश पेमेंट करते समय 600 रुपए दे देता. अध‍िकतर दुकानदार न तो 1 रुपए वापस करते हैं और न ही ग्राहक उनसे पैसे मांगते हैं. कुछ मामलों में दुकानदार एक रुपए की टॉफी दे देता है. इस तरह दुकानदार या तो एक रुपए बचा लेते हैं या फिर इस बहाने अपने दूसरे प्रोडक्‍ट को बेच देता है. इस तरह एक-एक रुपए बचाकर दुकानदार का ही फायदा होता है.

वैज्ञानिकों का कहना है, सामान की कीमतों में लिखे 99 अंक से कंज्‍यूमर का व्‍यवहार बदलता है इसलिए यह रणनीति मार्केटिंग में अपनाई जाती है. मनोवैज्ञानिक तौर पर इसका असर देखने को मिलता है, रिसर्च में इसकी पुष्टि भी हुई है.

 

वस्तुओं की कीमतें 99 या 999 रुपये आदि में क्यों लिखी जातीं हैं?
इस बात को नज़र अंदाज नहीं किया जा सकता हैं कि एक रुपये कम करके लिखने से विक्रेता (seller) को बहुत फायदा होता है. परन्तु कैसे?

इसके पीछे दो मुख्य कारण हो सकते हैं, आइये देखते है उन कारणों को..

1. फ्रीड-हार्डमेन यूनिवर्सिटी, हेंडरसन (Freed-Hardeman University in Henderson) के मार्केटिंग के एक सहयोगी प्रोफेसर Lee E. Hibbett के अनुसार एक रुपये कम करना एक psychological market strategy होती है यानी मनोवैज्ञानिक तरीके से ग्राहक को उस सामान को खरीदने के लिए तैयार करना. जैसे किसी मॉल में शौपिंग करते वक्त एक सूट पसंद आजाता है और उस पर प्राइस टैग होता है 799 रुपये का. क्या आपने कभी ध्यान दिया है कि जब हम किसी नंबर को पढ़ते है तो लेफ्ट से राईट करते है ताकि उस नंबर की रेंज (range) पता चल सके. इसको और अच्छे से समझने की कोशिश करते है. मान लीजिये किसी ने बताया की उसका AC  24,490 रुपये का आया था, तो हमारा माइंड या दिमाग सेट होता है कि AC 24,000 रुपये का आया है. क्योंकि हमने लेफ्ट वाली फिगर (figure) पर ध्यान दिया है. बाकि 490 को 24,000 कुछ रुपये मान कर छोड़ दिया. इसी प्रकार से जब लोग प्राइस टैग पर 799 रुपये देखेंगे तो कुछ लोग उसको 800 रूपये ही मानकर खरीदने का निर्णय लेंगे पर कुछ लोग ऐसे भी होंगे जो लेफ्ट की फिगर देख कर 700 कुछ रुपये मानकर उसे खरीदने का निर्णय लेंगे. बस विक्रेताओं (seller) को ऐसे ही लोगो का इंतेज़ार रहता है.

तो यानी ये एक psychological market strategy के तहत ग्राहकों को आकर्षित करने के लिए और अपनी बिक्री को बढ़ाने के लिए प्राइस टैग पर एक रुपये कम करके दाम को लिखते हैं.

 

 

2-दूसरा कारण यह हो सकता है कि एक रुपये कम लिखकर विक्रेता (seller) का ही फायदा होता है. आइये जानते हैं कैसे?

जब हम किसी सुव्यवस्थित रिटेलर आउटलेट पर 799 रुपये का सामान खरीदतें है तो ज्यादातर पेमेंट करते वक्त हम एक रुपये वापिस नहीं लेते है और छोड़ देते है, यह सोच कर की इतनी बड़ी जगह से सामान खरीद रहें है और एक रुपये के लिए काउंटर पे खड़े है. इसलिए हम काउंटर वाले व्यक्ति को बोल देते है कि रख लो भाई और कभी-कभी काउंटर वाला व्यक्ति एक रुपये की जगह कोई मामूली सी टॉफी दे देता है. क्या आप जानते है ऐसा करने में भी विक्रेता का ही फायदा है वो ऐसे की लगभग 100 टॉफी का पैकेट मात्र 25 या 30 रुपये में आजाता होगा और इस तरह से उनकी 25 या 30 रुपये की टॉफी 100 रूपये में बिक जाती हैं, इस तरह से भी हो गया न उनका फायदा. कभी-कभी हम टॉफी देखकर लेते भी नहीं है कि ये टॉफी अच्छी नहीं है और उसको छोड़ देते है, इस तरह से भी उनका फायदा हो जाता है.

उदाहरण: मान लीजिये किसी कंपनी के भारत में 150 रिटेल आउटलेट है और हर आउटलेट पर औसत 100 कस्टमर एक रुपये वापिस नहीं लेते तो 365 दिनों में —- 150 *100 *365 = 54,750,00 या 54 लाख रूपये से ज्यादा हुआ.

यानी की 54,750,00 रुपये हम लोग छोड़ देते है, जो कि किसी भी बुक ऑफ अकाउंट में रिकॉर्ड नहीं होते हैं. मतलब ये एक प्रकार की ब्लैक मनी हुई क्योंकि इस मनी की किसी भी बिल पर कोई एंट्री नहीं होती है. इसलिए फायदा हर तरह से विक्रेता (seller) का ही हो जाता है. तो अब आगे से एक रुपया वापिस लेना न भूले और न ही छोड़े.

यहां तक की एरिक एंडरसन (Eric Anderson), नॉर्थवेस्टर्न यूनिवर्सिटी के केलॉग स्कूल ऑफ़ मैनेजमेंट में मार्केटिंग के प्रोफेसर और डंकन सिमेस्टर (Duncan Simester), एम.आई.टी. के स्लोअन स्कूल ऑफ मैनेजमेंट में प्रबंधन लेख के प्रोफेसर, ने अपने लेख में लिखा की जब हमने एक विक्रेता से अपने प्राइस टैग पर एक रूपये बढ़ाने के लिए कहा क्योंकि आप आम तौर पर कीमतों में बढ़ोतरी के लिए एक वस्तु की मांग की उम्मीद करते हैं तो विक्रेता संतुष्ट नहीं हुआ क्योंकि रियायती वस्तु (discounted item) दिखाने से ही बिक्री अच्छी होती है. साथ ही लिखते हैं कि जब दाम को $34 से  $39 किया तो वह मांग में वृद्धि करने में सक्षम रहे परन्तु जब उन्होंने $34 से  $44 किया तो मांग में कोई वृद्धि नहीं हुई.

तो ये दो कारण होते है रिटेल आउटलेट के केस में. परन्तु इस तरह के प्राइस ई-कॉमर्स वेबसाइट पर भी होते हैं मगर वहां सिर्फ पहला कारण ही काम करता है यानी मनोवैज्ञानिक वाला क्योंकि ऑनलाइन शौपिंग करते वक्त हम ज्यादातर पेमेंट डेबिट या क्रेडिट कार्ड, इंटरनेट बैंकिंग के द्वारा कर देते हैं और उतना ही करते है जितना प्राइस टैग पर लिखा होता है. इसलिए कह सकते है कि ई-कॉमर्स से शौपिंग करने से ब्लैक मनी नहीं बनती है.

उपरोक्त कारणों से आप समझ गए होंगे की क्यों सामान या वस्तु की कीमत को एक रुपये कम करके लिखा जाता है या वस्तुओं की कीमतें 99 या 999 रुपये आदि में क्यों लिखी जातीं हैं.

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