January 16, 2021

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सिर्फ 26 शब्दों के कानून से कैसे खफा रहे ट्रंप, क्यों बदल नहीं सके सिस्टम?

नई दिल्ली|अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप (President Donald Trump) और सत्तारूढ़ रिपब्लिकन पार्टी (US Republican Party) के कई सदस्य काफी समय से एक अस्पष्ट लेकिन अहम कानून पर नाराज़गी समय-समय पर ज़ाहिर करते रहे हैं. भले ही इसमें कुछ बदलावों की गुंजाइश से इनकार न किया जा सके, लेकिन इंटरनेट (Internet) और सोशल मीडिया के लिहाज़ से यह कानून (Social Media Law) काफी अ​हमियत रखता है. यह भी आप जानते हैं​ कि हाल में वॉशिंग्टन डीसी के कैपिटल हिल (Capitol Hill Violence) में जो हिंसा ट्रंप समर्थकों ने की, उसके चलते ट्विटर और फेसबुक ने ट्रंप के अकाउंट ही सस्पेंड (Trump Accounts Suspend) कर दिए.

पहले भी ट्विटर और ट्रंप के बीच जंग जैसे हालात रहे हैं और ट्रंप ने कई बार धमकी भरे लहजे में ट्विटर पर एक्शन लेने की बात भी कही. लेकिन अमेरिकी राष्ट्रपति ऐसा कदम सच में उठा नहीं सका. क्या आपको नहीं लगता कि कोई अहम कानून बीच में आ रहा है? आप उस कानून या सिस्टम के बारे में कितना जानते हैं?

 

 

क्या है सेक्शन 230?
अमेरिका में कम्युनिकेशन डिसेंसी एक्ट, 1996 में सेक्शन 230 काफी अहम है. यूं तो यह पूरा एक्ट ही इसलिए बनाया गया था ताकि ऑनलाइन पॉर्न को नियंत्रित किया जा सके यानी बच्चों को पॉर्न मुहैया कराए जाने को अपराध मानकर दोषियों के खिलाफ कार्रवाई की जा सके. कुल मिलाकर इस एक्ट के ज़रिये ‘अश्लील और अशोभनीय’ कंटेंट पर कंट्रोल किया जाता है.

इस एक्ट में बाद में सेक्शन 230 जोड़ा गया था. आसान भाषा में इसका मतलब यह है कि इंटरनेट पर जो भी वेबसाइटें यूज़र कंटेंट वाली हैं यानी कोई भी यूज़र जहां अपनी बात कर सकता है, वहां किसी किस्म के कंटेंट के लिए प्लेटफॉर्म को कानूनी तौर पर ज़िम्मेदार नहीं माना जाएगा.

 

 

 

तो, यह कानून महत्वपूर्ण क्यों है?
26 शब्दों के इस सिस्टम से आप ये समझिए कि सोशल मीडिया का ज़बरदस्त दौर शुरू हुआ. फेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम जैसे कई प्लेटफॉर्म इन्हीं शब्दों की बुनियाद पर कानूनी हैं. दूसरा पहलू यह है कि इसी व्यवस्था के चलते गलत सूचनाओं, प्रोपैगैंडा, हेट स्पीच और फेक न्यूज़ समेत कुछ और आपराधिक गतिविधियां भी ऑनलाइन प्लेटफॉर्मों पर बढ़ती रहीं.

बिज़नेस और सामाजिक जीवन में रोज़मर्रा का हिस्सा हो जाने के बाद यह ज़रूरी भी हो जाता है कि सोशल मीडिया को नियंत्रित करने संबंधी बेहतर कानून हों. ऐसे में, सेक्शन 230 एक तरह से सोशल मीडिया का बचाव करता है कि वो प्लेटफॉर्म पर आ रही सूचनाओं के लिए ज़िम्मेदार नहीं हैं.

आखिर ट्रंप की नाराज़गी क्यों रही और क्या हुआ?
ट्रंप ने लगातार सोशल मीडिया को इस बात के लिए निशाना बनाया कि वहां विपक्षी विचारधारा वाली बातों पर कोई लगाम नहीं है. विपक्ष के सोशल मीडिया को कुचलने के लिए जब ट्रंप ने फेसबुक और ट्विटर जैसी दुनिया की बड़ी कंपनियों पर लगाम कसने की बातें कहीं, तो यह भी हुआ कि ट्विटर ने ट्रंप के उन पोस्ट पर फ्लैग, वॉर्निंग टैग लगाने शुरू किए, जो भ्रामक या बरगलाने वाले थे. अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव के दौरान ट्रंप यूं बौखलाते दिखे :

‘बिग टेक कंपनियों’ को अमेरिका ने एक तोहफा दे रखा है ‘सेक्शन 230’, जो उनकी ढाल बन गया है, लेकिन अस्ल में यह राष्ट्रीय सुरक्षा और चुनावी शुद्धता के लिए गंभीर खतरा बन गया है. हमारा देश कभी सुरक्षित नहीं रह सकता, अगर यह सिस्टम जारी रखा गया…
क्यों मज़बूत है सेक्शन 230?
इसके बाद सेक्शन 230 को खत्म किए जाने की कवायद भी ट्रंप प्रशासन ने की और एक नया बिल तक तैयार किया गया. लेकिन, मंसूबा कामयाब हो नहीं सका. वास्तव में, सेक्शन 230 का प्रावधान हटाना अमेरिकी संविधान के हिसाब से ‘अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता’ के मौलिक अधिकार को खत्म करने वाला कदम माना गया. इसे कुचलने के एक कदम से कई तरह के बिज़नेस एक झटके में खत्म होने तक का खतरा खड़ा है.

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डोनाल्ड ट्रंप प्रशासन ने सोशल मीडिया नियंत्रित करने के लिए नया बिल तैयार करवाया था.

जानकारों ने साफ कहा कि सेक्शन 230 में बदलाव की गुंजाइश है, लेकिन सोच समझकर. ऐसा करना मुनासिब नहीं है कि आप एक झटके में इसे पूरी तरह से खत्म कर दें.

भारत पर असर डालता है यह सिस्टम?
जब दुनिया आपस में जुड़ी हुई है और खासकर वर्चुअल वर्ल्ड में तो सरहदें हैं ही नहीं, तो किसी भी कोने का मामला किसी और कोने से जुड़ा न हो या वहां असर न डाले, ऐसा मुमकिन नहीं है. अब देखिए 2016 में यूरोपीय संघ ने डेटा प्रोटेक्शन रेगुलेशन सिस्टम बनाया तो वह भी सेक्शन 230 का ही विस्तारित रूप माना जाता है.

जब आप किसी वेबसाइट पर जाते हैं और वो वेब कंपनी कुकीज़ को एक्सेप्ट करने का मैसेज देती है, तो इसका मतलब है कि यूज़र को वो कंपनी ट्रैक कर रही होती है. इन तमाम पहलुओं के मद्देनज़र अभी भारत में इंटरनेट और सोशल मीडिया को लेकर कानूनी व्यवस्थाएं काफी शुरूआती और कमज़ोर दौर में हैं. ऐसे में, जब भारत जैसे देश इस दिशा में कानून बनाने के बारे में विचार कर रहे हैं तो सेक्शन 230 को लेकर पूरी बहस भारत के बहुत काम की हो जाती है.

गौरतलब है कि भारत में भी बीजेपी की आईटी सेल के इनचार्ज अमित मालवीय भी ट्विटर पर ट्रंप की तर्ज़ पर इल्ज़ाम लगा चुके हैं. ट्विटर उनके ट्वीट्स को भी ‘धूर्त मीडिया’ जैसी चेतावनी से टैग कर चुका है. ऐसे में आप समझ सकते हैं कि इस बारे में अमेरिका में हो रही बहस भारत में भविष्य की व्यवस्थाएं तय करने में काफी अहम हो जाती है.

हमारी आवाज दबाई नहीं जा सकती: ट्रंप

इस ऑफिशियल अकाउंट से ट्रम्प ने लिखा, हम भविष्य में एक नया प्लेटफॉर्म बनाएंगे। हमारी आवाज दबाई नहीं जा सकती। ट्विटर हमारे अधिकार को दबाने में लगा है। ट्विटर ने डेमोक्रेट के साथ मिलकर मेरा अकाउंट ट्विटर से हटवा दिया। 7 करोड़ 50 हजार लोगों के आवाजों को दबाया नहीं जा सकता। आपको बता दें कि फेसबुक ने भी उनके FB और इंस्टाग्राम अकाउंट पर दो हफ्ते के लिए रोक लगा दी थी। सोशल मीडिया साइट ने ट्रम्प के एक वीडियो को विवादित बताया था।

ट्रंप के तीन मंत्रियों का इस्तीफा

कैपिटल हिल में हुई हिंसा के बाद डेमोक्रेट सांसदों के साथ राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की ही पार्टी के रिपब्लिकन सांसद भी उनके खिलाफ हो गए हैं। इन नेताओं ने देश को शर्मसार करने वाली घटना के लिए भीड़ को प्रोत्साहित करने के आरोप में ट्रंप पर महाभियोग चलाने की खुलकर मांग की है। इस बीच, ट्रंप के करीबी तीन मंत्रियों ने घटना के खिलाफ इस्तीफे दे दिए हैं। इस्तीफा देने वाले मंत्रियों में शिक्षामंत्री बेटसे देवोस, परिवहन मंत्री इलेन चाओ और स्वास्थ्य व मानव सेवा सहायक मंत्री एलिनोर शामिल हैं। ये तीनों महिलाएं हैं।

ट्रंप पर महाभियोग चलाने की मांग

उधर, डेमोक्रेट सांसदों ने ट्रंप के खिलाफ महाभियोग चलाने की बात कही। इसके बाद ट्रंप प्रशासन के वरिष्ठ अधिकारियों ने भी 25वें संशोधन की धारा चार के तहत अपनी ही कैबिनेट से ट्रंप को जबरन हटाने की संभावना पर विचार शुरू कर दिया है। ट्रंप ऐसे पहले राष्ट्रपति हैं, जिनपर एक कार्यकाल के दौरान दूसरी बार महाभियोग चल सकता है। इससे पहले साल 2019 में भी ट्रंप पर महाभियोग चला था।

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