इतिहास

फटेहाल जनता के अमीर नुमाइंदे

हमारे देश का इसे दुर्भाग्य ही कहेंगें कि यहां का वोट देने वाला आम मतदाता दिन प्रतिदिन गरीब होता जा रहा है, जबकि गरीब वोटरों के वोटो से जीतने वाला जनप्रतिनिधी तेजी से अमीर बनता जा रहा है। लोकतंत्र में संसद और विधानसभा देश की जनता का आईना होती हैं। अब राजनीति सेवा नहीं पैसा कमाने का जरिया बन गई है। आज लाभ के इस धन्धे में नेता करोड़पति बन रहे हैं। राजनीति में यह समृद्धि यूं ही नहीं आई है, इसके पीछे किसी न किसी का शोषण और कहीं न कहीं बेईमानी जरूर होती है।

 

 
यदि देश की अधिकांश आबादी गरीब और तंगहाल है तो हमारे ज्यादातर सांसद और विधायक भी गरीब होने चाहिए, ताकि वे आम आदमी का दर्द महसूस कर उसके कल्याण के लिए सही ढंग से कानून, नियम कायदे बना पाएंगे। जब चुनाव लडने के लिए करोड़ों रूपयों की दरकार हो तब चुनाव में आम आदमी की भूमिका केवल वोट देने तक सिमट जाती है। वह चुनाव लडने की तो कल्पना भी नहीं कर सकता। राजनीति करने वाले राजनेता जिनको बहुत अधिक वेतन नहीं मिलता है वो किस बूते बड़े शहरों में करोड़ो रूपयो वाले महलनुमा आलिशान बंगलो में रहते हैं तथा लाखों-करोड़ो की गाडियो में घूमते हैं?

 

 
एक चुनाव से दूसरे चुनाव के 5 बरसों के अन्तराल में जनप्रतिनिधियों की सम्पति में 10 गुना से 20 गुना तक वृद्धि हो जाती है। जबकि देश की आर्थव्यवस्था 8 फीसदी तक नहीं बढ़ पा रही है। इसमें दो राय नहीं कि सरकारी दफ्तरों में स्थानीय स्तर से लेकर नौकरशाहों के बीच तक भ्रष्टाचार की उलटी गंगा बह रही है। लेकिन एक बात तो स्पष्ट है कि राजनीतिक नेतृत्व ईमानदार हो तो मातहत कैसे भ्रष्टाचार कर सकते हैं? वास्तव में देश के भीतर भ्रष्टाचार की एक शृंखला बन चुकी है। देश में व्याप्त राजनीति में मूल्यों के पतन से भ्रष्टाचार की फसल लहलहा रही है। लेकिन सबसे भचताजनक बात यह है कि राजनीति में धन व बल के बढ़ते वर्चस्व के चलते माफिया व आपराधिक तत्व राजसत्ता पर काबिज होने लगे हैं जिसके चलते भ्रष्टाचार का निरंतर पोषण जारी है।

 

 

महंगी होती चुनाव प्रणाली ने इसे और प्रोत्साहित किया है। चुनाव में हुए खर्च को चुने गये जन प्रतिनिधि कई गुणा लाभ के साथ वसूलते हैं। जाहिर तौर पर यह पैसा भ्रष्ट आचरण, दलाली, कमीशन व ठेकों से उगाहा जाता है। फिर कमजोर नेतृत्व ने राजसत्ता को बरकरार रखने के लिए जिस तरह माफिया व अपराधियों का सहारा लिया उसके घातक परिणाम अब हमारे सामने आने लगे हैं। न्यायालयों की न्यायिक सक्रियता गाहे-बगाहे सरकारों को फटकार लगाकर स्थिति को सुधारने की कोशिश करती है लेकिन आपेक्षित परिणाम सामने नहीं आ रहे हैं।

 
एशोसियशन फार डेमोक्ट्रेटिक राइट ने देश के तमाम सांसदो और विधायको के चुनाव लड़ते वक्त दिये गये शपथपत्र को जांचा परखा तो सच यही उभरा कि देश में चाहे 75 करोड़ लोग बीस रुपये रोज पर ही जीवन यापन करने पर मजबूर हो लेकिन संसद और विधानसभा में जनता ने जिन्हे चुन कर भेजा है, उसमें 75 फिसदी यानी 4852 नुमाइन्दो में से 3460 नुमाइन्दे करोड़पति है। लोकसभा के 543 सांसदो में 445 सांसद करोड़पति है, तो राज्यसभा के 194 सदस्य करोड़पति है। देश भर के 4078 विधायको में से 2825 विधायक करोड़पति है। फिर ये सवाल किसी के भी जहन में आ सकता है तो फिर सांसदो-विधायको के जनता से कैसे सरोकार होते होगें। क्योकि जरुरते ही जब अलग -अलग है, जीने के तौर तरीके, रहन-सहन,आॢथक स्थिति ही अलग अलग है तो फिर आम जनता से जुड़ाव कैसे होते होगें? रिपोर्ट के मुताबिक 229 सांसदों में से 51 सांसदों ने हलफनामा दिया है कि उनके खिलाफ आपराधिक मुकदमे दर्ज हैं। वहीं 20 राज्यसभा सांसदों के खिलाफ गंभीर आपराधिक मुकदमे दर्ज हैं।

 
कहने को तो राजनीति को समाज तथा राष्ट्र सेवा का माध्यम समझा जाता है। राजनीति में सक्रिय किसी भी व्यक्ति का पहला धर्म यही होता है कि वह इसके माध्यम से आम लोगों की सेवा करे। समाज व देश के चहुंमुखी विकास की राह प्रसस्त करे। ऐसी नीतियां बनाए जिससे समाज के प्रत्येक वर्ग का विकास हो, कल्याण हो। आम लोगों को सभी मूलभूत सुविधाएं मिल सकें। रो

 

शिक्षा, स्वास्थय जैसी जरूरतें सभी को हासिल हो सकें। राजनीति के किसी भी नैतिक अध्याय में इस बात का कहीं कोई जिक्र नहीं है कि राजनीति में सक्रिय रहने वाला कोई व्यक्ति इस पेशे के माध्यम से अकूत धन-संपत्ति इकट्ठा करे। नेता अपनी बेरोजगारी दूर कर सके। अपनी आने वाली नस्लों के लिए धन-संपत्ति का संग्रह कर सके। अपनी राजनीति को अपने परिवार में हस्तांरित करता रहे तथा राजनीति को सेवा के बजाए लूट, भ्रष्टाचार, सांप्रदायिकता, भेदभाव, कट्टरता, जातिवाद, गुंडागर्दी का पर्याय समझने लग जाए। परंतु हमारे देश में कम से कम राजनीति का चेहरा कुछ ऐसा ही बदनुमा सा होता जा रहा है।

 

 

समय-समय पर हमारे देश की सर्वोच्च अदालत से लेकर विभिन्न राज्यों के उच्च न्यायालयों ने इस प्रकार के पेशेवर किस्म के भ्रष्ट व देश को बेच खाने वाले अपराधी किस्म के नेताओं को लेकर कई बार तल्ख टिप्पणियां की हैं। परन्तु ऐसे भ्रष्ट नेताओं पर अदालतो की टिप्पणी का प्रभाव क्या होगा? अफसोस तो इस बात का है कि कई बार अदालती हस्तक्षेप होने के बावजूद राजनेताओं के ढर्रे में सुधार आने के बजाए इसमें और अधिक गिरावट आती जा रही है।

 
हमारे जनप्रतिनिधि अपना चुनाव खर्च की व्यवस्था भी पूंजीपतियों से करवाते है। क्या कोई भी व्यक्ति बिना किसी काम के किसी को पैसा अर्थात चंदा देता है। सांसद या विधायक बनाने के बाद के उनकी संपत्ति में बेहताशा बढ़ोतरी हो जाती है। लखपति करोड़पति हो जाता है। करोडपति अरबपति हो जाता है वो भी केवल पांच साल में। ये लोग संसद में सवाल पूछने के लिए भी उद्योगपतियों से पैसे लेते है। सरकार का विरोध या समर्थन करने के लिए भी पैसे व पद कि मांग करते है। सांसद या विधायक निधि से होने वाले काम में भी कमीशन लेते है।

 

 
हमारे देश के सांसदों की माली हालत का अंदाज तो इसी बात से लगाया जा सकता है कि आज दोनों सदनों के सांसदों की घोषित सम्पति दस हजार करोड़ रूपए से अधिक है। सांसदों पर आरोप लगता है कि उनके पास घोषित से अधिक अघोषित संपत्ति है। आज राजनीति कमाई का सबसे अच्छा जरिया बन गई है। चुनाव लडने वाले नेताओं की संपत्ति में पांच वर्ष में औसत 134 प्रतिशत वृद्धि बड़े-बड़े उद्योगपतियों को चौंकाती है। कुछ मामलों में तो संपत्ति में वृद्धि की दर एक हजार प्रतिशत से ज्यादा देखी गई है। इसीलिए अब समृद्ध व्यापारी और उद्योगपति भी सांसद, विधायक बनने लगे हैं।

 

 
पिछले दिनों एक बार फिर सर्वोच्च न्यायलय ने भ्रष्ट नेताओं पर प्रहार करते हुये कई सांसदों तथा विधायकों की संपत्ति में हुए पांच सौ गुणा तक के इजा$फे पर सवाल खड़ा करते हुए यह जानना चाहा कि यदि ऐसे जनप्रतिनिधि यह बता भी दें कि उनकी आमदनी में इतनी तेजी से बढ़ोतरी उनके किसी व्यापार की वजह से हुई है तो भी सवाल यह उठता है कि सांसद और विधायक होते हुए कोई व्यापार या व्यवसाय कैसे कर सकता है। सर्वोच्च न्यायालय ने यह भी कहा कि अब यह सोचने का वक्त आ गया है कि भ्रष्ट नेताओं के विरुद्ध कैसे जांच की जाए। उच्चतम न्यायालय ने यह भी कहा कि जनता को यह पता होना चाहिए कि नेताओं की आय क्या है। इसे आखिर क्यों छुपा कर रखा जाए।

 

 
आज सांसद, विधायक व अन्य कोई छुटभैया नेता भी महंगी गाडियों में घूमते हैं। राजधानी के बड़े होटलों में ठहरते हैं। कोई उनसे यह नहीं पूछता कि अचानक उनके पास इतना धन कहां से आ गया है। वो सब नेता अपने घर से तो लाकर पैसा खर्च करते नहीं हैं। उनके द्वारा खर्च किया जा रहा पैसा सत्ता में दलाली कर कमाया हुआ होता है जिसे जमकर उड़ाते हैं। जब तक सत्ता की दलाली का खेल बन्द नहीं होगा तब तक राजनीति में नैतिकता, सुचिता की बाते करना बेमानी ही होगा।

(ये लेखक के निजी विचार है)

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