देश

किसान – बेचारा या देश का सहारा

images(12)
भारत एक कृषि प्रधान देश है, यहाँ विश्व के अन्य देशों की अपेक्षा सर्वाधिक भू-भाग पर खेती की जाती है I इस देश की कुल भूमि का ४७.४८ प्रतिशत भू-भाग कृषि कार्यो के अंतर्गत आता है I भारत की लगभग ६० प्रतिशत जनसँख्या कृषि कार्यो में सलंग्न है परन्तु उनका देश की सकल घरेलू उत्पादन में कृषि योगदान १३.५ प्रतिशत है ।

किसान बेचारा: मुख्य समस्यायें

आधुनिकता के विकास की होड़ में किसान अपने आपको लाचार व ठगा सा महसूस करता है जि‍सके अंतर मे अनेक कारण है।

१. लघु व खंडित कृषि जोतें –

भारत में पिछले कई दशकों से कृषि जोतों के औसत आकार में निरंतर गिरावट आयी है ।  वर्ष १९९५-९६ में कृषि जोत का औसत आकार १.४१ हेक्टेयर था जो कि वर्ष २०१०-११ में घट कर १.१५ हेक्टेयर रह गया।  भारतीय कृषि गणना (२०११) के अनुसार देश में लगभग ८० प्रतिशत किसान लघु व सीमान्त की श्रेणी में आते हैं Iजो केवल ४१% खेती को ही जोतते हैI यह किसान केरल, प. बंगाल, बिहार, पूर्वी उ.प्र में सर्वाधिक है, जिनके पास कृषि जोत का औसत आकार १.० (है.) से कम है व कुछ हिस्सों में यह आकार ०.५ (है.) से भी कम है I इन लघु जोतों पर कृषि निवेशो का प्रयोग अनार्थिक होता है व साथ में जोतें बिखरी होने से कृषि कार्य में समय व साधन का अपव्यय भी होता है I

२. कृषि की उपलब्धता–

भारत में कृषि के क्षेत्र में  विभिन्न कृषि आगतों यथा सिंचाई, उर्वरक, कीटनाशक, कृषियंत्र, अधिक उपजाऊ किस्म के बीज आदि का प्रयोग तुलनात्मक रूप से काफी कम किया जाता है I किसानों को समय पर अच्छे गुणवत्तापूर्ण बीज नहीं मिल पाते है I कृषि लागतो में अप्रत्याशित अधिक वृद्धि से कृषि आदान उसकी पहुँच से दूर है । खाद, उर्वरको, कीटनाशको में मिलावट करके नकली आदान बेचकर कंपनी बाले उसका शोषण करने को आतुर रहते हैंI

३. सिंचाई के साधनों का अभाव-

कृषि में मानसून की अनिश्चितता व वर्षा जल का अनियमित वितरण, कृषि उत्पादन में नकारात्मक प्रभाव डालते है। अतः कृषि की सफलता के लिए सिंचाई एक महत्वपूर्ण प्रक्रिया है। डॉ. वाल्टेयर के शब्दों में, जल और खाद दोनों ही किसान की आवश्यकता है ।

भारत देश में कृषि योग्य भूमि का मात्र 40% भाग सिंचित हैं, शेष 60% कृषि भाग असिंचित एवं मानसून पर निर्भर हैं I अन्य देशों की तुलना में यह प्रतिशत बहुत कम है मिश्र में १००%, जापान में ७०% तथा पाकिस्तान में ५० % कृषि क्षेत्र में सिंचाईं की सुविधा है । वर्मा (२००४) ने अपने अनुसंधान से पाया की फसलो में टपक सिचाईं के अनुप्रयोग  से उपज व जल बचत में सार्थक वृद्धि होती है I

भारतीय प्रबंधन संस्थान, अहमदाबाद, रिपोर्ट (२०१४ ) के रिपोर्ट के अनुसार भारत में सूक्ष्म सिंचाई की  स्थिति अभी ठीक नहीं हैI सुक्ष्म सिंचाई के अंतर्गत कुल क्षेत्रफल लगभग ५ मिलियन हेक्टेयर आता है I जिसमें से ३.०६ मिलियन हेक्टेयर व १.९० मिलियन हेक्टेयर फब्बारा सिंचाई, टपक सिंचाई के अंतर्गत क्रमशः आता है I

 

४. मशीनीकरण का अभाव-

गरीब किसानों के पास खेती के उपयुक्त साधन नहीं है।

५. अपर्याप्त भंडारण क्षमता-

अनाजों, फल व सब्जियों के अत्यधिक उत्पादन के बाद इनका उचित भण्डारण की कमी से नुकसान होता है।

६. पूँजी का अभाव-

अन्य उद्योग धंधो की तरह कृषि में भी आजकल पूँजी की आवश्यकता होती है I आधुनिक युग में कृषि लागतो में वृद्धि के कारण सामान्य किसान तकनीकी खेती के बारे में सोच भी नहीं सकते है I ज्यादातर किसान को कृषि कार्यो हेतु क़र्ज़ लेना पड़ता है I एक अध्यन के अनुसार किसान क़र्ज़ का उपयोग कृषि कार्यो हेतु सर्वाधिक (७३.६१ %)करता है जबकि अन्य खर्चे  गृह निर्माण, शिक्षा, स्वास्थ्य व सामाजिक कार्यो के लिए करता है I

 

७. प्राकृतिक आपदायें –

खाद्य व कृषि संगठन की रिपोर्ट के अनुसार एक कृषि में चौथाई नुकसान प्राकृतिक आपदाओं की वजह से विकाशसील देशों में होता हैI इन प्राकृतिक आपदाओं में बाढ़, सूखा, ओलावृष्टि, बेमौसमी वर्षात व कीट/रोगों का अचानक प्रकोप  भी शामिल है I

८. दोष पूर्ण विपणन व्यवस्था-

बिडंबना है जब भी कृषि उत्पाद बाज़ार में आता है तो उसके मूल्य निरंतर गिरने लगते है और बिचौलिए उसके माल को सस्ती दरों पर खरीद लेते है I दुर्भाग्य है की संबधित लोग औधोगिक क्षेत्रों के उत्पादन के दरें लागत, मांग वपूर्ति को ध्यान में रखते हुये निर्धारित करते है किन्तु किसान की जिंसों का मूल्य या तो सरकार या क्रेता द्वारा निर्धारित किया जाता है उसमें  भी तत्काल नष्ट होने बाले उत्पाद की बिक्री के समय किसा असहाय दिखाई देता हैI संगठित बाजारों की कमी, दलालों की एक लम्बी श्रंखला,भंडार गृहो की कमी, कृषि मूल्यों की अनभिज्ञता व मंडी में व्यापक भ्रष्टाचार के कारण किसान मजबूरी में घाटे का सौदा करता है या जिंसों को उहीं फेक कर चला आता है I

किसान: देश का सहारा

मानव सभ्यता के विकास से लेकर वर्तमान स्थिति तक देश में कृषि का आर्थिक व सामाजिक विकास महत्वपूर्ण योगदान रहा है I कृषि को विकास का एक महत्वपूर्ण स्तम्भ माना गया है Iकिसान को देश का सहारा बनाने बाले निम्नलिखित कारको की विवेचना विस्तृत करेंगें I

कृषि अर्थव्यवस्था में भूमिका-

कृषि में लगभग ६०% भारत की जनसँख्या सलंग्न है यह उनको अपने गाँव में ही रोजगार देती हैI इसीलिए कृषि को भारतीय अर्थव्यवस्था की रीढ़ की हड्डी कहते हैI वर्ष २०१३-१४ में कृषि का राष्ट्रीय सकल आय में १३.५% योगदान था जो पिछले कई दशको से निरंतर घट रहा है फिर भी भारत आज भी कृषि पर निर्भर है I
अंतरार्ष्ट्रीय व्यापार में कृषि का योगदान

कृषि उत्पादों से विदेशी विनिमय की प्राप्ति होती हैIआर्थिक विकास की प्रारम्भिक अवस्था में विदेशी विनिमय की प्राप्ति अत्यधिक आवशयक होती हैIभारतीय रिज़र्व बैंक (२०१६) के अनुसार कृषि उत्पादों का देश के कुल निर्यात में १० प्रतिशत हिस्सा है जिसने कि वर्ष २०१४ में लगभग २५० अरब रुपये के मूल्य की विदेशी मुद्रा अर्जित करने में सहयोग दिया I

देश का अन्नदाता-

निरंतर जनसंख्या वृद्धि के कारण खाद्यानों की मांग बढ़ रही है खाद्य पदार्थो की आपूर्ति देश में किसान निरंतर कर रहे है वर्ष: २०१४-१५ में देश में अनाज उत्पादन २५७ मिलियन टन, अंडा उत्पादन ७८  अरब अंडे प्रति वर्ष,मछली उत्पादन १० मिलियन टन,पोल्ट्री मीट उत्पादन ३ मिलियन टन  व देश ने विश्व का १८.५% दूध उत्पादन करके प्रथम स्थान पाया हमारे बागबानी किसानों ने बागबानी का रिकॉर्ड उत्पादन २८३ मिलियन टन कर के और कमाल कर दिया I जिससे देश की खाद्य व पौषक सुरक्षा को मजबूती मिलेंगीI

पर्यावरण व पारिस्थितिकी संतुलन-

खेती, पशुपालन, कुक्कट पालन, मत्स्य पालन, कृषि वानिकी क्रियायों को करने के साथ साथ किसान पर्यावरण व पारिस्थितिकी से सदियों से जुड़ा है Iकिसान का पशु पक्षी वन संपदा के साथ प्रकृति से गहरा लगाव रहा है वह मिटटी में जन्मा, मिटटी में ही कर्म किया व जरूरत पड़ने पर प्रकृति के रक्षा के लिए चाहे अपने प्राणों की आहुति क्यों न देनी पड़ी हो उह कभी भी नहीं हिचकिचायाI इतिहास से लेकर वर्तमान तक उसने कई बलिदान दिए I जिसमें विश्नोई आन्दोलन (१७३०)चिपको आन्दोलन (१९७३)जंगल बचाओ आन्दोलन (१९८०)अप्पिको आन्दोलन (१९८३ ) व अन्य अनगिनत आन्दोलन करके उसने समय समय पर पर्यावरण व पारिस्थितिकी में संतुलन बनाये रखने के लिए कई बलिदान दिएI

 

जैव विविधिता सरंक्षण

भारत जैव विविधिता की दृष्टि से एक संपन्न राष्ट्र हैIजैव विविधिता सरंक्षण में भारतीय किसानो का योगदान सदियों से अदुभुत है Iयहाँ कम से कम १६६ फसले प्रजातियाँ व ३२० जंगली फसल प्रजातियों का उद्भव माना जाता हैIकिसानो ने सदियों से बहुमूल्य बीजो की विविधिता का सरंक्षण कर महत्वपूर्ण जिम्मेदारी का निर्वहन का सन्देश दिया हैI उत्तराखंड में किसानो ने बीज बचाओ  आन्दोलन (१९९०) शुरू करके परम्परागत बीजों की विलुप्त होती प्रजातियों का सरंक्षण करने की मुहिम छेड़ी जिसमे घर घर गाँव गाँव जाकर चावल की लगभग २०० किस्मों, राजमा की १५० किस्मों तथा बीजों की कई प्राज़तियो को लुप्त होने से बचाया इसी दिशा में नवधान्य आन्दोलन (१९९५) भी कार्य कर रहा है जिसने अब तक १५०० किस्मों के बीजो का सरंक्षण किया हैI                          
सांस्कृतिक विरासत का संरक्षण-

भारत की सांस्कृतिक विरासत विश्व में श्रेष्ठ व विविधापूर्ण जाता है प्राचीन समय में भारत को विश्व गुरु कहा जाता थाIभारतीय किसानों ने अभी तक सभी तीज, त्यौहार, ग्रामीण संस्कृति को सहेज कर रखा है I जो अनेकता में एकता का धोतक है कृषि से सम्बंधित सभी त्योहारों को विशेषकर हर्ष व उल्लास के साथ खूब मनाते है I

कृषक सशक्त्तिकरण के प्रभावशाली उपाय

आज के इस भौतिकवाद युग में किसानों को लाचार व बेचारा बना दिया है अतः कृषक सशक्त्तिकरण के लिए प्रभावशाली कदम उठाने की ज़रूरत है जिससे वह बेचारा न रहकर सिर्फ देश का एक मज़बूत सहारा बन सकेI इसके लिए सिर्फ यदि किसान अपने उत्पाद का सही मूल्य पा लेता हे तो वह सक्षम बन जायेगा I इसके लिए भारत सरकार ने ई-राष्ट्रीय कृषि बाज़ार की अभी हाल में शुरुआत की है लेकिन देखना यह है की इन बिचौलियों, साहूकारों  के जाल से मुक्त होकर वह कितना अपना उत्पाद सही कीमत पर विक्रय कर पायेगा I निम्नलिखित दिशा में कार्य करने की जरुरत हैं I

कृषि मूल्य स्थायीकरण
किसानो के हितो का सरंक्षण
उपभोक्ताओं के लाभों का सरंक्षण
कृषि एवम उधोग की परस्पर निर्भरता
आर्थिक विकास और समृद्धि के साथ कृषि को जोड़ा जाये
कृषि एवं उधोग में टकराव ठीक नहीं
कृषि क्षेत्र में कॉरपोरेट

इन क्षेत्रो  के अलावा किसान का समन्वित विकास जरुरी है जिसमें कृषकों की सभी आवश्यकताओं को ध्यान में रखकर योजनाएं बनाई जावे ।   कृषको को न केवल उत्पादन बढ़ाने की जानकारी प्रदान कराई जावे बल्कि घरेलु स्तर पर प्रसंस्करण की तकनीकें, मूल्य संवर्धन , कृषि विविधीकरण , कृषि वानिकी  व क्षेत्र विशेष की देशज तकनीकों में सुधार कर  उसे स्वावलम्बी  बनाया  जाए  ।

 

कैसे सुधरेगी किसानो और खेती की दशा ?

लगभग ८० प्रतिशत किसान लघु व सीमान्त की श्रेणी में आते हैं । अतः कृषको के उत्थान  की योजनाएं विशेषकर लघु व सीमान्त  कृषको को ध्यान में रखकर बनाई जानी चाहिए ।

जब तक आर्थिक विकास और समृद्धि के साथ कृषि को नहीं जोड़ा जायेगा तब तक माननीय प्रधान मंत्री जी का सपना सन २०२२ तक किसान की आय दोगुनी करने का कैसे सच होगा ?यह लक्ष्य पाने हेतु तथा निरंतर प्रगति हेतु निम्नलिखित सुझावों को लागू करने की ज़रूरत है I

किसानो की आमदनी बढाई जानी चाहिए । उन्हें क़र्ज़ नहीं बल्कि नियमित आय चाहिए I

किसान को कृषक के साथ साथ कृषि उधमी बनाना है I
लघु व सीमान्त किसानो के लिए वेतन आयोग का गठन किया जाना चाहिए I

सार्वजनिक वितरण प्रणाली व न्यूनतम समर्थन मूल्य तंत्र को सुधारने की ज़रुरत हैं I

पंचायत स्तर पर एक कृषि क्लिनिक या कृषि अस्पताल खोलने की व्यवस्था होनी चाहिए I

भारतीय कृषि प्रशासनिक सेवा का गठन किया जाना चाहिए, जो जिला कृषि व्यवस्था, विपणन, कृषि आपदा, कृषि व्यापार, कृषि नीतियों का प्रभावी रूप से क्रियान्वयन कर सकें I

भारत में कृषि शिक्षा व अनुसंधान पर और जोर दिया जायें I कृषि शिक्षा को अनिवार्य विषय के रूप में १०वी तक पाठ्यक्रम में शामिल किया जाये I

प्राकृतिक संसाधनों पर जनसँख्या का निरंतर दवाब खाद्य सुरक्षा के लिए भविष्य में  एक  चिंतनीय विषय बन सकता है । हमारे सामने उत्पादन व उत्पादकता में वृद्धि करना ,  प्राकृतिक संसाधनों का सूझबूझ के साथ दोहन व कृषि को फायदे  का सौदा बनाना  एक मुख्य चुनौती है ।   आदिकाल से वर्तमान तक किसानो का  मानव सभ्यता  के विकास  व संसाधनों के संरक्षण में  उल्लेखनीय योगदान रहा है । अतः किसान हितेषी नीतियां, तकनीकियां  व प्राकृतिक संसाधनों  का विवेकपूर्ण उपयोग से ही हम सतत विकास की परिकल्पना कर सकते है ।

~जय किसान~

 

 

 

Leave a Reply

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out /  Change )

Google photo

You are commenting using your Google account. Log Out /  Change )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out /  Change )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out /  Change )

Connecting to %s

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.