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ब्रिटेन भारत से कितनी दौलत लूट कर ले गया?

बादशाह की सालगिरह है और मुग़ल रिवायत के मुताबिक़ उन्हें तौला जाना है. इस मौक़े पर ब्रिटिश राजदूत सर थॉमस रो भी दरबार में मौजूद हैं.

समारोह पानी में घिरे एक चौकोर चबूतरे पर आयोजित की जा रही है. चबूतरे के बीचों-बीच एक विशालकाय स्वर्ण पन्नी चढ़ी तराज़ू स्थापित है. एक पलड़े में कई रेशमी थैले रखे हुए हैं, दूसरे में खुद चौथे मुग़ल शहंशाह नुरूद्दीन मोहम्मद जहांगीर सावधानी से सवार हुए.

भारी लबादों, ताज और सोने और आभूषण समेत शहंशाह जहांगीर का वज़न तक़रीबन ढ़ाई सौ पाउंड निकला. एक पलड़े में ज़िल्ले-इलाही बैठे हैं, दूसरे में रखे रेशमी थैले बारी बारी तब्दील किए जाते रहे. पहले मुग़ल बादशाह को चांदी के सिक्कों से तौला गया, फिर तुरंत ही गरीबों में बांट दिया गया. इसके बाद सोने की बारी आई, फिर आभूषण, बाद में रेशम और आख़िर में दूसरी बेश-क़िमती चीज़ों से बादशाह सलामत के वज़न की तुलना की गई.

ये वो दृश्य है जो आज से तक़रीबन ठीक चार सौ साल पहले मुग़ल शहंशाह नुरूद्दीन मोहम्मद जहांगीर के दरबार में ब्रिटिश राजदूत सर थॉमस रो ने देखा और डायरी में नोट कर लिया. लेकिन दौलत के इस हैरत कर देने वाले प्रदर्शन ने सर थॉमस को शक में डाल दिया कि क्या बंद थैले वाक़ई हीरे-जवाहारात या सोने से भरे हुए हैं, कहीं इनमें पत्थर तो नहीं?

सवाल ये है कि एक दूरदराज से छोटे से द्वीप पर बसे देश का राजदूत इस समय भारत में क्या कर रहा था?


इंग्लिस्तान के साथ समझौता ‘शान के ख़िलाफ़’दरअसल, सर थॉमस एक ख़ास मिशन पर भारत आए थे. इनकी कोशिश थी कि किसी न किसी तरह से एक समझौते पर हस्ताक्षर करवा लें जिसके तहत एक छोटी सी ब्रिटिश कम्पनी को भारत में व्यापार का अधिकार हासिल हो जाए.
लेकिन जैसा कि सर थॉमस की डायरी से पता चलता है, ये काम इतना आसान साबित नहीं हुआ और इस सिलसिले में मेहनती अंग्रेज़ राजदूत को सख्त पापड़ बेलने पड़े. इसकी वजह ये थी कि मुग़ल शहंशाह पूरी दुनिया में सिर्फ़ ईरान के सफ़वी बादशाह और उसमानी ख़लीफ़ा को अपना प्रतिद्वंद्वी समझते थे.
इनकी नज़र में इंग्लिस्तान एक छोटा सा अप्रत्याशित द्वीप था, इसके किसी मामूली बादशाह के साथ बराबरी के स्तर पर समझौता करना इनकी शान के ख़िलाफ़ था.
हालांकि सर थॉमस ने हिम्मत नहीं हारी, और वो तीन साल की कड़ी मेहनत, राजनयिक दांव-पेंच और तोहफ़े देकर जहांगीर से तो नहीं, लेकिन वली अहद शाहजहां से आज से ठीक चार सौ साल पहले अगस्त 1618 में एक समझौते पर हस्ताक्षर करवाने में कामयाब रहा, जिसके तहत इस कम्पनी को सूरत में खुलकर कारोबार करने की इजाज़त मिल गई.
इस कम्पनी का नाम ईस्ट इंडिया कम्पनी था और ये घटना इसके इतिहास में मील का पत्थर साबित हुई. ये पहला मौक़ा था कि मुग़ल हुकूमत ने सीधे तौर पर एक यूरोपीय देश के साथ बाक़ायदा व्यापारिक समझौता करके इसकी एक कम्पनी को प्रोत्साहन दिया था.
ये कुछ ऐसी ही घटना थी जैसे मशहूर कहानी के ऊंट को बद्दू ने अपने खेमे में सर दाख़िल करने की इजाज़त दे दी थी!
सर थॉमस को जहांगीर के साथ दूसरे पलड़े में तुलने वाली दौलत पर यक़ीन करने में हैरत हुई थी, लोकिन उनके तय समझौते के नतीजे में ब्रिटेन अगले साढ़े तीन सौ सालों में भारत से जो दौलत समेट कर ले गया, उसके बारे में अर्थशास्त्रियों ने कुछ अनुमान लगाने की कोशिश ज़रूर की है.

  • इसका वर्णन आगे चलकर आएगा, पहले ये देखते हैं कि ईस्ट इंडिया कम्पनी और ब्रिटिश राज के भारत पर सत्ता के दूसरे असर क्या पड़े जो महज़ लूटने से कहीं अधिक भयानक थे.

इतिहास का चौथी भयानक रक्तपात
अमरीकी इतिहासकार मैथ्यू वाईट ने ‘द ग्रेट बुक ऑफ़ हॉरिबल थिंग्स’ के नाम से एक पुस्तक लिखी है, जिसमें उन्होंने इतिहास की सौ भयानक रक्तपातों की समीक्षा पेश की है, जिनके दौरान सबसे ज़्यादा इंसानी जानें ख़त्म हुईं. इस पुस्तक में इतिहास की चौथी भयानक रक्तपात ब्रिटिश दौर में भारत में आने वाला अकाल है, जिनमें वाईट के मुताबिक़ दो करोड़ 66 लाख भारतीयों की जानें ख़त्म हुई.

इस संख्या में वाईट ने दूसरे विश्व युद्ध के दौरान बंगाल में आने वाले अकाल की गिनती नहीं की, जिसमें 30 से 50 लाख के क़रीब लोग मारे गए थे.

अगर इस अकाल को भी शामिल कर लिया जाए तो ईस्ट इंडिया कम्पनी और ब्रिटिश सरकार के दौरान तीन करोड़ के क़रीब भारतीय अकाल के कारण जान से हाथ धो बैठे.

भारत की गिनती दुनिया की सबसे उपजाऊ इलाक़ों में होती थी और अब भी होती है, फिर इतने लोग क्यों भूखों मर गए?

वाईट ने इन अकालों की वजह ‘व्यापारिक शोषण’ बताया है. इसके विवरण के लिए हम सिर्फ़ एक अकाल का ज़िक्र करते हैं जो 1769 में बंगाल में ही आया था.

नोबेल पुरस्कार प्राप्त अर्थशास्त्री अमर्त्य सेन ने इस अकाल में होने वाली मौतों की संख्या एक करोड़ बताई है. इस दौर का एक दृश्य एक अंग्रेज़ ही की ज़बानी देखिए :

‘दसियों लाख लोग चंद बाक़ी हफ़्तों तक ज़िन्दा रहने की आस लिए मर गए जो उन्हें फ़सल तैयार होने तक गुज़ारने थे. उनकी आंखें इन फ़सलों को तकती रह गईं, जिन्हें इस समय पकना था जब उन्हें बहुत देर हो जाती.’

शानदार फ़सल के अंदर ढांचेफ़सलें तो अपने वक़्त पर तैयार हुईं, लेकिन उस समय वाक़ई बहुत देर हो चुकी थी. 1769 की यही कहानी पौने दो सौ साल बाद एक बार फिर पूर्वी बंगाल में दोहराई गई.
टाईम्स ऑफ़ इंडिया का 16 नवम्बर 1943 का कतरन : ‘पूर्वी बंगाल में एक भीषण मगर आम दृश्य ये था कि आधी सदी की सबसे शानदार फ़सल के दौरान पड़ा हुआ गला-सड़ा कोई इंसानी ढ़ांचा नज़र आ जाता था.’
साहिर लुधियानवी ने इस अकाल पर नज़्म लिखी थी, जिसके दो शेर —
पचास लाख फ़सुर्दा, गले सड़े ढांचे
निज़ाम-ए-ज़र के ख़िलाफ़ एहतजाज करते हैं
ख़ामोश होंटों से, दम तोड़ती निगाहों से
बशर बशर के ख़िलाफ़ एहतजाज करते हैं
अकाल तो प्राकृतिक आपदा के श्रेणी में आते हैं. इसमें ईस्ट इंडिया कम्पनी का क्या क़सूर? प्रसिद्ध दार्शनिक विल ड्यूरान्ट इस बारे में लिखते हैं :
‘भारत में आने वाले ख़ौफ़नाक अकालों की बुनियादी वजह बेरहमी से किए गए शोषण, संसाधन के असंतुलित आयात और ठीक अकाल के दौरान क्रूर तरीक़ों से मंहगे टैक्सों की वसूली थी कि भूख से हलाक होते किसान उन्हें अदा नहीं कर सकते थे… सरकार मरते हुए लोगों से भी टैक्स वसूल करने पर तुली रहती थी.’
एक छोटी सी कम्पनी इतनी शक्तिशाली कैसे हो गई कि हज़ारों मील दूर किसी देश में करोड़ों लोगों की ज़िन्दगी और मौत पर हावी हो जाए?
इसके लिए हमें इतिहास के कुछ और पन्ने पलटने होंगे.
1498 में परतगेज़ी मुहिम जो वास्कोडिगामा ने अफ़्रीका के दक्षिणी कोने से रास्ते ढूंढ कर भारत को समुद्री रास्ते के ज़रिए यूरोप से जोड़ दिया था. आने वाले दशकों के दौरान धौंस, धमकी और दंगा-फ़साद का इस्तेमाल करके परतगेज़ी बहरे-ए-हिन्द के तमाम व्यापारों पर क़ाबिज़ हो गए और देखते ही देखते पुर्तगाल की क़िस्मत का सूरज आधे आसमान पर जगमगाने लगा.
इनके देखा-देखी डच अपने तोप वाहक नौसेना जहाज़ लेकर बहर-ए-हिन्द में आ धमके और दोनों देशों के बीच लड़ाई-झगड़ा होने लगा.
जब पुर्तगालियों ने भारत का इतिहास पलट कर रख दिया
इंग्लिस्तान ये सारा खेल बड़े ग़ौर से देख रहा था, भला वो इस दौड़ में क्यों पीछे रह जाता? इसलिए महारानी एलिज़ाबेथ ने इन दो देशों के नक़्शे-क़दम पर चलते हुए दिसम्बर 1600 में ईस्ट इंडिया कम्पनी स्थापित करवा कर इसे एशिया के देशों के साथ पूर्ण स्वामित्व के साथ व्यापार का इजाज़त-नामा कर दिया.
लेकिन अंग्रेज़ों ने एक काम किया जो इनसे पहले आने वाले दोनों यूरोपीय देशों से नहीं हो सकता था. उन्होंने सिर्फ़ युद्ध के व्यापार पर सारी उर्जा खर्च नहीं की बल्कि दूतावास के काम पर भरपूर ध्यान दिया. यही वजह है कि उन्होंने थॉमस रो जैसे मंझे हुए राजदूत को भारत भेजा ताकि वो ईस्ट इंडिया कम्पनी के लिए बंद दरवाज़ा खोल दे.
मुग़लों की तरफ़ से आज्ञा मिलने के बाद अंग्रेज़ों ने भारत के विभिन्न तटीय शहरों में एक के बाद एक अपने व्यापारिक अड्डे स्थापित करने शुरू कर दिए, जिन्हें फैक्ट्रियां कहा जाता था. इन फैक्ट्रियों से उन्होंने मसालों, रेशम और दूसरी चीज़ों का व्यापार शुरू कर दिया जिसमें उन्हें ज़बरदस्त फ़ायदा तो होता रहा, लेकिन जल्द ही मामला बस व्यापार से आगे बढ़ गया.

•••जोड़ तोड़चूंकि ईस्ट इंडिया कम्पनी की दूसरे यूरोपीय देशों से अक्सर लड़ाईयां चलती रहती थीं और ये एक दूसरे का माल लूटने में कोई शर्म महसूस नहीं करते थे, इसलिए अंग्रेज़ों ने अपनी फैक्ट्रियों में बड़ी संख्या में स्थानीय सिपाही भर्ती करना शुरू कर दिया. अधिक समय नहीं गुज़रा कि ये फैक्ट्रियां फैलकर क़िलों और छावनियों की शक्ल अख़्तियार करने लगीं.
जब कम्पनी की सैन्य और आर्थिक हालत मज़बूत हुई तो इसके अधिकारी स्थानीय रियासतों के आपसी लड़ाई झगड़ों में शामिल होने लगे. किसी राजा को सिपाहियों के दस्ते भिजवा दिए, किसी नवाब को अपने दुश्मन नीचे करने के लिए तोपें दे दीं, तो किसी को सख्त ज़रूरत के समय पैसा उधार दे दिया. इस जोड़-तोड़ के ज़रिए उन्होंने धीरे-धीरे अपने पंजे तटीय इलाक़ों से दूर तक फैला दिए.
लगातार फैलाव के इस सफ़र में सबसे अहम मोड़ 1757 में लड़ी जाने वाली जंग-ए-पलासी है, जिसमें ईस्ट इंडिया कम्पनी के एक क्लर्क राबर्ट क्लाईव के तीन हज़ार सिपाहियों ने बंगाल के नवाब सिराजुद्दौला की 50 हज़ार फौज को शिकस्त दी.
कैसे शिकस्त दी, ये कहानी ‘मोतालाए पाकिस्तान’ की पुस्तक में दर्ज है. बस इस कहानी का नैतिक नतीजा याद रखिए कि जंग के बाद क्लाईव ने सिराद्दौला का सदियों से जमा किया हुआ ख़ज़ाना समुद्री जहाज़ों से लदवा कर बिल्कुल इसी तरह लंदन पहुंचा दिया जिस तरह 18 साल पूर्व नादिर शाह दिल्ली की दौलत दोनों हाथों से निचोड़ कर ईरान ले गया था.
लेकिन क्लाईव ने तमाम दौलत शाही ख़ज़ाने में जमा नहीं करवाई बल्कि अपने लिए भी कुछ हिस्सा रख लिया, जिसकी क़ीमत आज कल के हिसाब से तीन करोड़ डॉलर बनती है. इस पैसे से ब्रिटेन में एक शानदार महल बनवाया और व्यापक ज़मीनें खरीदी जिसका नाम ‘पलासी’ रखा. यही नहीं, उसने पैसा देकर न सिर्फ़ अपने लिए बल्कि अपने बाप के लिए भी संसद की सीट खरीद ली. बाद में इसे ‘सर’ का ख़िताब भी अता कर दिया गया.
‘हाथ इतना हौला क्यों रखा!’

लेकिन इसी दौरान बंगाल में आने वाले ख़ौफ़नाक अकाल और उसके नतीजे में सूबे की एक तिहाई आबादी के ख़त्म हो जाने की ख़बरें इंग्लिस्तान पहुंचना शुरू हो गई थीं जिनका कारण लॉर्ड क्लाईव की पॉलिसियों को क़रार दिया गया.
लाट साहब पर उंगलियां उठने लगीं, करते करते नौबत संसद में अनुबंध पेश होने तक जा पहुंची. ये अनुबंध तो खैर मंज़ूर नहीं हो सका, क्योंकि उस ज़माने में संसद के एक चौथाई के लगभग सदस्यों का खुद ईस्ट इंडिया कम्पनी में हिस्सा थे.
बहस के दौरान क्लाईव ने समझदारी से काम लेते हुए अपनी दौलत के बारे में कहा कि, ‘मैं तो खुद सख्त हैरान हूं कि मैंने हाथ इस क़दर ‘हौला’ क्यों रखा!’ वर्ना वो चाहते तो इससे कहीं अधिक माल व सोना समेट कर ला सकते थे.
••हालांकि भारत में बरपा होने वाली क़यामत के प्रभाव किसी न किसी हद तक क्लाईव के दिल व दिमाग़ पर असरअंदाज़ होने लगे और उसने बड़ी मात्रा में अफ़ीम खाना शुरू कर दिया. नतीजा ये निकला कि वो 1774 में अपने कमरे में रहस्यमय हालत में मुर्दा पाया गया.
ये पहेली आज तक हल नहीं हो सका कि क्लाईव ने आत्महत्या की थी या अफ़ीम की अधिक खुराक जानलेवा साबित हुई. लेकिन ये बात बिल्कुल स्पष्ट है कि उसकी भारत में रणनीतियों के बाद ईस्ट इंडिया कम्पनी जिस रास्ते पर चल पड़ी वो भारत की आज़ादी के लिए ज़रूर जानलेवा साबित हुई.
इस दौरान मुग़ल कुछ अपनी अयोग्यता और कुछ विदेशी हमलों से इस क़दर कमज़ोर हो चुके थे कि वो दूर ही दूर से अंग्रेज़ों के रसूख को दिन दोगुना, रात चौगुना बढ़ते देखने के अलावा कुछ न कर सके. ऐसे में पलासी की जंग के सिर्फ़ आधी सदी बाद ईस्ट इंडिया कम्पनी के सिपाहे की संख्या ढ़ाई लाख से पार हो गई और उन्होंने बंगाल से निकल कर भारत के बड़े हिस्से पर अपने वर्चस्व क़ायम कर लिया.
मुग़ल शहंशाह कम्पनी के वज़ीफ़े पर आश्रित
नौबत यहां तक पहुंच गई कि 1803 के आते आते दिल्ली के तख्त पर बैठा मुग़ल शहनशाह शाह आलम ईस्ट इंडिया कम्पनी के वज़ीफ़ा पर आश्रित होकर रह गया. एक ज़माना था कि इसी शाह आलम के पुर्ख जहांगीर के आगे ब्रिटिश राजदूत सर थॉमस रो के घुटनों के बल झुकता था, अब ये हालत थी कि इसे ईस्ट इंडिया कम्पनी के एक क्लर्क को झुक कर पूरे बंगाल का अख़्तियार-नामा पेश करना पड़ा.
ये बात हैरान कर देने वाली है कि ये सारा काम ब्रिटिश सरकार ने नहीं, बल्कि एक कम्पनी ने किया जिसका सिर्फ़ एक उसूल था, हर मुमकिन हथकंडे इस्तेमाल करके अपने हिस्सेदारों के लिए अधिक से अधिक मुनाफ़ा कमाना. ये कम्पनी लंदन के एक इलाक़े में एक छोटी सी बिल्डिंग से काम करती थी और स्थापना के एक सदी बाद तक भी इसके स्थायी
कर्मचारियों की संख्या सिर्फ़ 35 थी.
लेकिन इसके बावजूद दुनिया के इतिहास में कोई कम्पनी ऐसी नहीं गुज़री जिसके पास इस क़दर ताक़त हो.
अगर आपको शिकायत है कि आज की मल्टीनेशनल कम्पनियां बहुत ताक़तवर हो गई हैं और वो विभिन्न देशों की पॉलिसियों पर असरअंदाज़ हो रही हैं, तो अब ज़रा सोचकर देखिए कि गूगल, फेसबुक, एप्पल, माईक्रोसॉफ्ट और सैमसंग मिलकर एक कम्पनी बन जाएं जिसके पास अपनी आधुनिक हथियारों से लैस फौज हो और जो देश उनके प्रोडक्ट्स को खरीदने से इंकार करे, ये कम्पनी इस पर चढ़ दौड़े.
अफ़ीम क्यों नहीं खरीदते?ईस्ट इंडिया कम्पनी से बिल्कुल यही काम चीन के साथ किया. ये कम्पनी भारत में अफ़ीम उगाती थी लेकिन सारी की सारी इसके अधिकारी नहीं खा जाते थे बल्कि इसका बड़ा हिस्सा चीन ले जाकर महंगे दामों पर बेचा जाता था. जब चीनियों को अहसास हुआ कि ये तो हमारे साथ घपला हो रहा है, तो उन्होंने आगे अफ़ीम खरीदने से क्षमा मांग ली.
कम्पनी अपने मुनाफ़े में कमी को कैसे बर्दाश्त करती. इसने 1839 कुछ तोप वाहक जहाज़ चीन भेज कर चीन का दक़ियानूसी नौसेना बेड़ा तहस नहस कर दिया. चीनी शहनशाह ने अपनी ग़लती स्वीकार करते हुए न सिर्फ़ अफ़ीम की आयात पर पाबंदी हटा ली बल्कि बतौर जुर्माना हांगकांग भी ब्रिटेन को दे दिया जो 1997 में कहीं जाकर वापस चीन को मिला.
इस दौरान ईस्ट इंडिया कम्पनी ने भारत में अपनी पेश-क़दमी जारी रखी और एक के बाद एक रियासत, एक के बाद एक रजवाड़ा इनकी झोली में गिरता रहा. 1818 में इन्होंने मरहटों की सल्तनत हथियाई, इसके बाद अगले कुछ दशकों में सिक्खों को शिकस्त देकर तमाम पश्चिमी भारत यानी आज के पाकिस्तान पर भी क़ाबिज़ हो गई. अब दर्रा-ए-ख़ैबर से लेकर बर्मा और हिमालय की बर्फ़ानी चोटियों से लेकर रास कुमारी इनका राज था.
अब ऊंट ने खेमे में घुस कर बद्दू को मुकम्मल तौर पर बेदख़ल कर दिया था.
ये कहानी यूं ही चलती रही, लेकिन फिर बदक़िस्मती ने घेरे डाल दिए. 1857 में कम्पनी के अपने ही तन्ख्वाह पाने वाले सिपाहियों ने बग़ावत कर दी जिसके दौरान बड़े पैमाने पर खून खराबा हुआ. इस ज़माने में अख़बार आम हो गए थे. इन सारी गड़बड़ियों की ख़बर इंग्लिस्तान तक पहुंची. होते होते कम्पनी की धारणा इतना हो गee कि आख़िरकार संसद को जनता के दबाव में इस कम्पनी के राष्ट्रीयकरण का फ़ैसला करना पड़ा और भारत सीधे ब्रिटिश सरकार के अंतर्गत आकर महारानी विक्टोरिया के ‘ताज का सबसे नायाब हीरा’ बन गया.
ईस्ट इंडिया कम्पनी फिर भी कुछ साल घिसट घिसट कर ज़िन्दगी गुज़ारती रही, लेकिन कब तक. आख़िर 01 जून 1874 को पौने तीन सौ साल की लंबी शान व शौकत के बाद ये कम्पनी भंग हो गई.
•••न कोई जनाज़ा न कोई मज़ारआज लंदन में लीडन हॉल स्ट्रीट पर जिस जगह कम्पनी का हेडक्वार्टर था, वहां बैंक की चमचमाती इमारत खड़ी है, और कहीं कोई स्मृति, कोई मूर्ति, यहां तक कि कोई बोर्ड तक स्थापित नहीं है. न कोई जनाज़ा उठा, न कहीं मज़ार बना.
कम्पनी की भले ही कोई स्मृति हो न हो, लेकिन उसने जो काम किया उसके प्रभाव को अब तक महसूस किया जा सकता है.
शायद ये बात जानकर बहुत से लोगों को हैरानी हो कि इस कम्पनी के प्रभुत्व से पहले औरंगज़ेब आलमगीर के दौर में भारत दुनिया का अमीर देश था और दुनिया की कुल जीडीपी का एक चौथाई हिस्सा पैदा करता था. जबकि इसी दौरान इंग्लिस्तान का हिस्सा सिर्फ़ दो फ़ीसद था.
भारत की ज़मीन उपजाऊ और हर तरह के संसाधन से मालामाल थी, और लोग मेहनती व हुनरमंद थे. यहां पैदा होने वाले सूती कपड़े और मलमल की मांग दुनिया भर में थी, जबकि शिपिंग और स्टील के उद्योग में भी भारत से कोई आगे नहीं था.
ये सारी सूरतेहाल पलासी के जंग के बाद बदल गई और जब 1947 में अंग्रेज़ यहां से गए तो सिकन्दर के विपरीत इनकी झोली भरी हुई और भारत के हाथ खाली थे.
•••दुनिया का ग़रीब तरीन देश’भारत के पूर्व प्रधानमंत्री प्रसिद्ध अर्थशास्त्री मनमोहन सिंह ने इसी तरफ़ इशारा करते हुए कहा था :
‘इसमें कोई शक नहीं कि ब्रिटेन सरकार के ख़िलाफ़ हमारी शिकायतों की ठोस आधार मौजूद है… 1700 में भारत अकेला दुनिया की 22.6 फ़ीसद दौलत पैदा करता था, जो तमाम यूरोप के समग्र हिस्से के तक़रीबन बराबर थी. लेकिन यही हिस्सा 1952 में घिर कर 3.8 फ़ीसद रह गया. 20वीं शताब्दी के आगाज़ पर ‘ताज-ए-ब्रितानिया का सबसे नायाब हीरा’ हक़ीक़त में प्रति व्यक्ति आय के हिसाब से दुनिया का सबसे गरीब देश बन गया था.’
अब इस सवाल की तरफ़ आते हैं कि अंग्रेज़ों अंग्रेज़ों के दो सौ साल के शोषण ने भारत को कितना नुक़सान पहुंचाया.

इस सिलसिले में विभिन्न लोगों ने विभिन्न अंदाज़े लगानेकी कोशिश की है. इनमें से ज़्यादा प्रशंसनीय अनुमान अर्थशास्त्र के विशेषज्ञ और पत्रकार मेहनाज़ मर्चेन्ट की रिसर्च है. इनके मुताबिक़ 1757 से लेकर 1947 तक अंग्रेज़ों के हाथों भारत को पहुंचने वाले आर्थिक नुक़सान की कुल रक़म 2015 के फ़ॉरेन एक्सचेंज के हिसाब से 30 खरब डॉलर बनती है.
ज़रा एक मिनट रूक कर इस रक़म का अंदाज़ा लगाने की कोशिश कीजिए. इसके मुक़ाबले पर नादिर शाह बेचारे दिल्ली को दिल्ली से सिर्फ़ 143 अरब डॉलर लूटने ही पर संतोष करना पड़ा था.
चार सौ साल पहले जहांगीर के दरबार में अंग्रेज़ राजदूत को शक था कि क्या वाक़ई भारत इतना अमीर है कि इसके शहनशाह को सोने चांदी और हीरे जवाहारात में तौला जा सकता है, और कहीं दूसरे पलड़े में दरबारियों ने रेशम की थैलियों में पत्थर तो नहीं डाल दिए?
अगर किसी तरह सर थॉमस रो को वापस लाकर उन्हें ये आंकड़ें दिखा दिए तो शायद उनका भ्रम हमेशा के लिए दूर हो जाए.


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