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रामधारी सिंह दिनकर जी की क़लम से

प्रिय पाठकवृन्द्! अंग्रेजों ने भारत में अपने साम्राज्य को सुदृढ़ बनाए रखने के लिए हिन्दू-मुसलमान में तो फूट   डाली ही, हिन्दू समाज को भी आर्य द्रविड़ में बाँटा और आर्यों को विदेशी आक्रमणकारी व द्रविड़ों को भारत के आदि (मूल) वासी प्रचारित किया। उस षड्यंत्रा का शिकार हुए भारतीय लेखक अंग्रेजों के चले जाने के बाद भी यही लिख रहे हैं और बच्चे यही पढ़ रहे हैं कि यह देश (भारत) उनकी या उनके पूर्वजों की मूल (जन्म) भूमि नहीं है अर्थात् भारत एक सराय है। इसकी न तो अपनी कोई संस्कृति है, न सभ्यता है, और न इतिहास है। समय-समय पर आक्रमणकारी इसे लूटते रहे और अपनी संस्कृति व सभ्यता इस पर थोपते रहे। इसे जैसे अंग्रेजों न लूटा, मुसलमानों नेलूटा, उसी तरह आर्यों ने भी आक्रमणकारी के रूप में आकर इसे लूटा था। सोचिये, क्या हम आर्य (आज के हिन्दू,  सिक्ख, बौद्ध, जैन आदि) लुटेरों के वंशज हैं? यदि आर्य विदेशी थे, तो उन्होंने अपने तथाकथित मूल देश को छोड़कर यह क्यों कहा?
गायन्ति देवा: किल गीतकानि, धन्यास्तु ते भारत भूमि भागे।
स्वर्गापवर्गास्पदमार्ग भूते, भवन्ति भूयः पुरुषाः सुरत्वात्।।
(देवता भी यही गान करते हैं कि जिन्होंने स्वर्ग और अपवर्ग के मार्गभूत भारत में जन्म लिया है, वे पुरुष हम देवताओं से भी अधिक धन्य हैं।)

यह कैसी विडम्बना है कि हमें हमारे ही देश में यह पढ़ाया जाए कि वास्कोडिगामा ने भारत की खोज की थी। यह बात पुर्तगाल वाले कहें तो कहें पर हमें तो यही कहना चाहिए कि 1498 ई0 में पुर्तगाल का कोई व्यक्ति प्रथम बार भारत आया था। भारत तो पहले ही संसार में प्रसिद्ध था। भारत का विदेशों से व्यापार होता था, भारत के धर्मप्रचारक पूरे संसार में घूमते थे। जनश्रुति तो यह भी है कि ईसामसीह ने कई वर्ष भारत में शिक्षा प्राप्त की थी। फिर भारत को वास्कोडिगामा क्या खोजता? पर हमें इतने से ही शान्ति नहीं हुई, अपितु इस देश के वासी होकर भी हमने (पं0 जवाहर लाल नेहरू ने) ”डिस्कवरी आॅफ इण्डिया“ (भारत की खोज) पुस्तक ही लिख दी। (कई वर्ष से यह पुस्तक हरियाणा विद्यालय शिक्षा बोर्ड द्वारा आठवीं कक्षा में हिन्दी विषय में पढ़ाई जा रही है) देश का एक कथित महान नेता ऐसा लिख रहा है, यह मानकर उनकी बातों को देशवासियों ने सम्मान दिया और हम अपनों के धोखे में आकर अपने ही देश में विदेशी बन गये। देश के बहुसंख्यक निवासियों के पूर्वजों को बार-बार विदेशी लिखना और आक्रमणकारी तुर्क, मंगोल, मुगल आदि  को भारतीय लिखना भारत की खोज है या आक्रमणकारियों का यशोगान? क्या हमें नहीं पता कि हमें महान किसे कहना चाहिए- हमारे पूर्वजों की स्वतंत्राता, सम्पदा व धर्म को लूटने वाले सिकन्दर, अकबर आदि को या उनसे टकराने वाले पारस, प्रताप आदि को? बाबर बहादुर हो सकता है, काबुल के लिए। हमारे लिएतो क्रूर (पराजित हिन्दुओं के सिर काटकर मीनार बनवाने वाला) आक्रमणकारी ही था। फिर हम विदेशियों की भाषा

क्यों बोलें?

एक बार नेता जी सुभाष ने कहा था- ”मैं भारतीय हूँ और बिना किसी अतिरिक्त प्रयास किए ही भारत को भलीभांति जानता हूँ इसलिए मुझे ‘डिस्कवरी आॅफ इण्डिया’ या ‘हिन्दुस्तान की कहानी’ जैसी पुस्तक लिखने की आवश्यकता नहीं है।“ अर्थात् नेहरू जी ने शिक्षा-दीक्षा के स्तर पर अंग्रेज, सांस्कृतिक स्तर पर मुसलमान व सिर्फ जन्म से हिन्दू होकर भारत को खाजने की अपेक्षा सब प्रकार से भारतीय होकर खोजा होता, तो अधिक उपयुक्त होता। अनेकता में एकता का नारा लगाने वाले झूठ बोलते हैं। एकता तो भाषा, भाव व विचारों की समानता में ही हो सकती है।

यह ठीक है कि जो जहाँ पैदा होता है, मरने के बाद उसी मिट्टी में मिलना चाहता है। कई वर्ष (दो बार – 1923 व 1940 ई0) कांग्रेस के अध्यक्ष रहे और स्वतंत्राता के बाद भारत के शिक्षामंत्राी बने मौलाना अबुल कलाम आजाद ने मरते समय यदि एसी ही इच्छा (मेरी मिट्टी मक्का में सुपुर्दे खाक कर दी जाए) व्यक्त की हो, तो कोई अश्चर्य की बात नहीं। फिर भी वे ‘भारत की खोज’ के लेखक की दृष्टि में आदरणीय राष्ट्रवादी हैं, तो वीर सावरकर, सुभाष, भगतसिंह, चन्द्रशेखर आजाद आदि की उपेक्षा क्यों? बाबर को भी उसकी इच्छा के अनुसार काबुल में दफनाया गया था, फिर भी लेखक ने उसकी प्रशंसा के पुल बाँधे हैं, पर राणा सांगा का नाम भी नहीं लिखा। व्यक्तिगत पसन्द के आधार पर इतिहास नहीं लिखा जाता। जब इतिहास से स्वातंत्रयवीरों के बलिदानी पृष्ठ यूं गायब होते रहेंगे, तो पीढि़यों को राष्ट्र के लिए बलिदान की प्रेरणा कहाँ से मिलेगी? (इसकी समीक्षा शान्ति धर्मी जीन्द ,मो0-09416253826) ने पुस्तक रूप में छापी है) …… दिलवाने के लिए नेहरू जी ने जनता के आदरणीय कवि रामधारी सिंह ‘दिनकर’ से ‘संस्कृति के चार अध्याय’ नामक ग्रन्थ लिखवाया। दिनकर जी को इसे लिखने में बहुत परिश्रम करना पड़ा, क्योंकि वे तो मूलतः कवि थे और कवित्व ही उनके यश का कारण था। उन्हें राज्यसभा का सदस्य (1952-63 ई0) बनाना और विदेश यात्राओं का अवसर प्रदान करना कदाचित् इस ग्रन्थ को लिखवाने की पृष्ठभूमि तैयार करना था। 1955 ई0 में महाकवि ने यह ग्रन्थ लिखा और बहुत जल्दी (मार्च 1956) यह छप गया। इसकी प्रस्तावना स्वयं नेहरू जी ने लिखी अर्थात् महाकवि को जिस विषय (भारत मूलतः मिश्रित संस्कृति का देश है) पर लिखना था, वह प्रधानमंत्री जी ने निर्धारित कर दिया।

भारत की जनता अपने प्यारे कवि के बदले दृष्टिकोण से हैरान हो गई और ग्रन्थ की तीखी आलोचना हुई। तृतीय संस्करण (सितम्बर 1962) की भूमिका में दिनकर जी ने लिखा है- ”मेरी स्थापनाओं से सनातनी भी दुःखी हैं और आर्यसमाजी तथा ब्राह्मसमाजी भी। उग्र हिन्दुत्व के समर्थक तो इस ग्रन्थ से काफी नाराज हैं।“ फिर भी इस ग्रन्थ के लिए नेहरू जी ने 6 नवम्बर 1956 को साहित्य अकादमी पुरस्कार से दिनकर जी को स्वयं सम्मानित किया और अगले महीने ग्रन्थ का पुनः प्रकाश न हुआ। साथ ही महाकवि को पुनः विदेश यात्रा का भी अवसर मिला।

यद्यपि तृतीय संस्करण में बहुत कुछ बदला गया था, तथापि 2008 के संस्करण को भी पूर्णतः निर्दोष नहीं कहा जा सकता। ‘संस्कृति के चार अध्याय’ ग्रन्थ के कुछ आपत्तिजनक स्थल देखकर पाठक स्वयं अनुभव करेंगे कि नेहरू जी द्वारा प्रदत्त पद व सम्मान के दबाव में आकर दिनकर जी ने निर्दयतापूर्वक सत्य की हत्या की है। देखियेः
1. भारतीय संस्कृति सामासिक है- इसका निर्माण भारत की मूल जाति नीग्रो, आग्नेय, द्रविड़ आदि के साथ आर्यों (विदेशियों) के मिलन से हुआ। (पृ0 4 व अनेक बार)
2.  वैदिक ऋषि मांसाहारी थे। (पृ0 33)
3.  अथर्ववेद में मारण, मोहन, वशीकरण और उच्चाटन आदि विद्याओं का ही वर्णन है। (पृ0 86)
4.  उपनिषदों में बहुत सी बातें परस्पर विरोधी हैं। (पृ0 95)
5. आर्यस्थान, आर्यावत्र्त आदि नाम गलत हैं।इस देश का सही नाम भारतवर्ष, हिन्दुस्तान या इंडिया ही हो सकता है। इसी प्रकार हिन्दू नाम बहुत व्यापक है और आर्य नाम संकीर्ण है। (पृ0 78)
6. महमूद (गजनवी) की चढ़ाई के समय हिन्दू धूलकणों के समान उड़ गये और जीवित लोगों के मुख में उनकी कहानी मात्रा शेष रही। (पृ0 268)
7.  सिक्ख धर्म हिन्दुत्व और इस्लाम के मिलने से जनमा था। (पृ0 342, 466, 477)
8.  अकबर सचमुच महान था। भारत की एकता की समस्या को उसने ठीक पहचाना था। (पृ0 327)
9.   छह शास्त्रों और अठारह पुराणों को उन्होंने (स्वामी दयानन्द ने) एक ही झटके में साफ कर दिया। (पृ0 476)
10. स्वामी जी ने संहिताओं को तो प्रमाण माना, किन्तु उपनिषदों पर वही श्रद्धा नहीं दिखायी।…. युग-युग से पूजित गीता को उन्होंने कोई महत्व नहीं दिया और राम-कृष्ण आदि को तो परम पुरुष माना ही नहीं। (पृ0 478)
11. (वेद में त्रिकाल ज्ञान मानकर) स्वामी जी ने एक नूतन अन्धविश्वास को जन्म दिया। (पृ0 478)

12. केवल वेद को प्रमाण मानने का कुफल यह हुआ कि इतिहासवालों में भी यह धारणा चल पड़ी कि भारत की सारी संस्कृति और सभ्यता वेदवालों अर्थात् आर्यों की रचना है।… स्वामी जी ने आर्यावत्र्त की जो सीमा बाँधी है, वह विन्ध्याचल पर समाप्त हो जाती है। आर्य-आर्य कहने और वेद-वेद चिल्लाने तथा… आज दक्षिण भारत में आर्य-विरोधी आन्दोलन उठ खड़ा हुआ है। (पृ0 479)
13. हमारा धर्म पण्डितों (शास्त्रों के विद्वानों) की नहीं, सन्तों और द्रष्टाओं की रचना है।… रामकृष्ण (परमहंस) के आगमन से धर्म की यही अनुभूति प्रत्यक्ष हुई।… उनके समकालीन अन्य सुधारक और सन्त पृथ्वी के वासी थे एवं पृथ्वी से ही वे ऊपर की ओर उठे थे। किन्तु रामकृष्ण (1836-86 ई0) देवी अवतार की भाँति आये। पृथ्वी पर वे भटकती हुई स्वर्ग की किरण के समान आये। (पृ0 490-91)
14. हिन्दू जाति का धर्म है कि वह जब तक जीवित रहे, विवेकानन्द की याद उसी श्रद्धा से करती जाए; जिस श्रद्धा से वह व्यास और वाल्मीकि की याद करती है। (पृ0 504)
15. सर सैयद (अहमद खाँ) में साम्प्रदायिकता थी या नहीं, यह सन्दिग्ध विषय है। वैसे, वे उन्नीसवीं सदी के उन भारतीय महापुरुषों में थे, जो इन क्षुद्र भावनाओं से बहुत ऊँचे थे। (पृ0 583)
16. पाकिस्तान के प्रबल समर्थक सर मुहम्मद इकबाल की विचारधारा पर 21 पृष्ठ लिखे हैं, जबकि किसी राष्ट्रवादी कवि या क्रांतिकारी वीर की विचारधारा के दर्शन भी नहीं। गाँधी जी की अहिंसा और राम नाम का विचित्रा गुणगान करके ही सब कुछ समाप्त कर दिया।
17. अकबर ने मुस्लिम-आतंक से पीडि़त हिन्दुओं का पक्ष जिस वीरता से लिया था, जवाहरलाल जी उसी वीरता के साथ मुसलमानों का पक्ष ले रहे हैं।(पृ0 628)

प्रिय पाठकवृन्द! यदि आज भारत का कोई नेता (रघुवंश प्रसाद-राजद, बिहार) भारत के प्राचीन ऋषियों को गोमांसभक्षी बताए और डाॅ0 अम्बेडकर का समर्थक बनकर कोई सांसद (मल्लिकार्जुन खड़गे-कांग्रेस) आर्यों को विदेशी बताकर भारत के गृहमंत्राी श्री राजनाथ सिंह का विरोध करे, फिर भी हिन्दुओं में इसके विरुद्ध कोई प्रतिक्रिया न हो, तो लगता है कि षड्यंत्राकारियों द्वारा प्रयुक्त विष अपना प्रभाव दिखा गया है। यह अलग बात है कि डाॅ0 अम्बेडकर के नाम का लबादा ओढ़ने वाले सांसद को यह भी नहीं पता कि डाॅ0 साहब आर्यों को भारत के मूल निवासी मानते थे, विदेशी नहीं। और दिनकर जी व नेहरू जी ने जिन स्वामी विवेकानन्द की दैवीशक्ति का गुणगान किया है, वे तो आर्यों को विदेशी कहने वालों को अपने सिद्धान्तसहित डूब मरने को कहते थे। फिर भी उल्टा -सीधा लिखकर कोई ‘भारत रत्न’ बन गया और कोई ‘पद्म भूषण’ ले गया। ऐसी अन्धेरगर्दी में सत्य की खोज करना भोले विद्यार्थियों के वश की बात नहीं है।

जब गाँधी जी के पटशिष्य आचार्य विनोबा भावे किसी नाटक को प्रमाण मानकर अपनी पुस्तक ‘गीता प्रवचन’ में ऋषि वशिष्ठ को गोमांसभक्षी लिखते हों; अहिंसा के पुजारी गाँधीजी ‘आरोग्य की कुंजी’ पुस्तक में दूध को मांसाहार और अण्डे को शाकाहार मानते हों व सम्पूर्ण हिन्दुत्व के विश्वप्रचारक स्वामी विवेकानन्द मांसाहार न त्यागकर भारत के प्राचीन ब्राह्मणों (ऋषियों) पर मांसाहार का लांछन लगाते हुए कहते हों- ”इसी भारत में कभी ऐसा समय था, जब कोई ब्राह्मण, बिना मांस खाये ब्राह्मण न रह जाता था; तुम वेद पढ़ो, देखोगे, जब संन्यासी या राजा मकान में आता था, तब किस तरह और कैसे बकरों और बैलों के सिर धड़ से जुदा होते थे।“ (स्वामी विवेकानन्द जी से वार्तालाप, (पृ0 48)

तो फिर इतिहास बिगाड़ने का दोष केवल अंग्रेजों को क्यों दिया जाये? क्या उपरोक्त सभी महापुरुष और उन्हें बड़े-बड़े सम्मान से लादने वाले हम सब इसके दोषी नहीं हैं? माना कि अंग्रेजों ने धूर्तता की थी, पर हमने उसे क्यों  ढोया? स्वामी विवेकानन्द प्रो0 मैक्समूलर की खुशामद करके उनसे अपने गुरु रामकृष्ण की जीवनी तो लिखवा गये,  पर कभी आर्यों के विदेशी होने के उनके सिद्धान्त को बदलने की नहीं कही। नेहरू जी अपनी पुस्तकों में विदेशी लेखकों के प्रमाण बिना किसी तर्क-वितर्क के लिखते रहे। दिनकर जी ने कुछ ऊहापोह तो की, पर स्थापना उन्हीं के     विचारों की रखी। जैसे- आर्यों के विषय में कई बार लिखा है- आर्य और द्रविड़, दोनों प्रकार के लोग, इस देश में अनन्त काल से रहते आये हैं और हमारे प्राचीनतम साहित्य में इस बात का कोई प्रमाण नहीं मिलता कि ये दोनों जातियाँ बाहर से आयीं अथवा इन दोनों के बीच कभी लड़ाइयाँ भी हुई थीं। (पृ0 10) इससे इस बात पर भी अच्छा प्रकाश पड़ता है कि द्रविड़ों को आर्यों से भिन्न मानना कितना भ्रामक और मूर्खतापूर्ण है। (पृ0 37)

फिर भी लगभग 20 बार आर्यों को विदेशी लिखा है। आर्य या वेद विषय में किसी संस्कृतग्रन्थ या आर्यसमाज के संस्थापक व वेदों के प्रकाण्ड विद्वान् स्वामी दयानन्द को कहीं प्रमाण नहीं माना। साथ ही स्वामी दयानन्द के विषय में रामकृष्ण परमहंस के विचार लिखे हैं- ”दयानन्द से भंेट करने गया।… वे वैखरी अवस्था में थे। रात-दिन लगातार शास्त्रों की ही चर्चा किया करते थे। अपने व्याकरण-ज्ञान के बल पर उन्होंने अनेक शास्त्रा-वाक्यों के अर्थ में उलट-फेर कर दिया है। ‘मैं ऐसा करूँगा, मैं अपना मत स्थापित करूँगा’ ऐसा कहने में उनका अहंकार दिखायी देता है।“ दिनकर जी ने इस पर कोई टिप्पणी भी नहीं की। इसका अर्थ है कि ये उन्हीं के विचार हैं, जो परमहंस के माध्यम से प्रकट हुए। अन्यथा योगी अरविन्द या रवीन्द्रनाथ टैगोर के विचार भी दिये जा सकते थे, जबकि स्वामी विवेकानन्द के विषय में दिये हैं। योगी अरविन्द ने ऋषि दयानन्द की प्रशस्ति में लिखा है-

”वह दिव्य ज्ञान का सच्चा सैनिक, विश्व को प्रभु की शरण में लाने वाला योद्धा, मनुष्यों और संस्थाओं का शिल्पी तथा प्रकृति द्वारा आत्मा के मार्ग में उपस्थित की जाने वाली बाधाओं का निर्भीक और शक्तिशाली विजेता था।…“ ”वेदों की व्याख्या के विषय में मेरा पूरा विश्वास है कि चाहे इनकी अन्तिम व्याख्या कुछ भी हो, दयानन्द उसके सत्यसूत्रों के प्रथम आविष्कत्र्ता के रूप में स्मरण किये जायेंगे। यह दयानन्द की सत्य का साक्षात्कार करने वाली दृष्टि ही थी, जिसने पुराने अज्ञान तथा लम्बे युग से चली आती नासमझी को बीच से चीरकर सत्य को सीधे देखा और अपनी दृष्टि को वहाँ केन्द्रित किया, जो महत्त्वपूर्ण था।

और रवीन्द्रनाथ टैगोर ने लिखा है- ”मेरा सादर प्रणाम हो, उस महान् गुरु दयानन्द को, जिसकी दृष्टि ने भारत के आत्मिक जीवन के सब अंगों को प्रदीप्त कर दिया। जिस गुरु का उद्देश्य भारतवर्ष को अविद्या, आलस्य और प्राचीन ऐतिहासिक तत्त्व के अज्ञान से मुक्त कर सत्य और पवित्राता की जागृति में लाना था; उसे मेरा बारम्बार प्रणाम है।“

चलो, व्यक्ति की अपनी पसन्द है, दिनकर जी ने नहीं लिखा। पर जब यही पसन्द अपनाते हुए योगी अरविन्द ऋषि दयानन्द के वाक्य ‘वेदों में विज्ञान का भी मूल है’ के समर्थन में कहते हैं कि यह अत्युक्ति नहीं, अल्पोक्ति है, तेा दिनकर जी को परेशानी क्यों हुई? अंग्रेजों की नौकरी करते हुए जनता के देशभक्त कवि ने लोगों को अंग्रेजों के पक्ष में लड़ने का प्रचार किया। नेहरू ने सांसद बनाया, तो कवि ने आर्यों और उनकी संस्कृति के विदेशी होने का प्रचार किया। दिनकर जी के संकीर्ण दृष्टिकोण की पुनरावृत्ति करते हुए 2003 ई0 (भाजपा के शासनकाल) में एन0सी0ई0आर0टी0 द्वारा बारहवीं कक्षा के लिए प्रकाशित इतिहास पुस्तक में रामकृष्ण व स्वामी विवेकानन्द का गुणगान व आर्यसमाज का अवमूल्यन करते हुए नूतन अन्धविश्वास और आर्यावत्र्त की समीक्षा विषय ज्यों का त्यों लिखा तथा यह भी लिखा- ”साथ ही इन (स्वामी दयानन्द) के अनुयाइयों ने सिद्धान्तों के मंडन के स्थान पर दूसरे मतों के खंडन करने की प्रवृत्ति ज्यादा विकसित की।“ (पृ0 121)

प्रबुद्ध पाठकों को कवि रामधारी सिंह दिनकर द्वारा लिखित पुस्तक ‘संस्कृति के चार अध्याय’ का दिग्दर्शन इसलिए करवाया है ताकि भविष्य में इतिहास पर होने वाले अपनों के भी आक्रमण से सावधानी रखी जाए। धर्म के आधार पर देश को बाँटकर भी इसे धर्मनिरपेक्ष (पंथनिरपेक्ष) बनाने वाले नेताओं ने अल्पसंख्यक समुदाय के लोगों को विशेष नागरिक बनाकर जो अदूरदर्शिता दिखाई थी, उसी को आगे बढ़ाते हुए वर्तमान जहरीली राजनीति ने आज हिन्दू समाज (भटका हुआ आर्य) के अंगों (बौद्ध, जैन, सिक्ख आदि-बुद्ध, महावीर, गुरु तेग बहादुर आदि को हिन्दू आदरणीय मानता है) को भी अलग-अलग कर अल्पसंख्यक घोषित किया जा रहा है। सुना है स्वामी विवेकानन्द (रामकृष्ण परमहंस) के शिष्य भी स्वयं को अल्पसंख्यक घोषित करवाने के लिए प्रयासरत हैं।

पूरा हिन्दू समाज कहीं तो गुरुओं के खेमों में बँटा है, कहीं जाति के घेरे में घिरा है। वैदिक संस्कृति के चिह्न (गाय, ऋषि, वेद, आर्य, योग आदि) पराए बन गए हैं। अतः इन पर आक्रमण होने से किसी हिन्दू को पीड़ा नहीं होती। अतीत का सत्य तो यही है कि महात्मा बुद्ध के काल तक इस देश में ‘आर्य’ शब्द चलता था। अतः बुद्ध, महावीर आदि के वर्तमान शिष्यों के पूर्वज आर्य थे। इस्लाम के आगमन पर आर्य हिन्दू कहलाने लगे। अतः इस काल में मुस्लिम बने लोगों के पूर्वज हिन्दू या आर्य कहे जा सकते हंै। पूजा पद्धति बदलने से पूर्वज तो नहीं बदलते। भारत का कोई भी सम्प्रदाय कुछ सुविधाओं के लाभ हेतु अपने ही देश में अल्पसंख्यक (असहाय) न बने। ईश्वर हम पर कृपा करे कि हम राष्ट्रहित में बाधा डालने वाली मत, मजहब , जाति की दीवारों को तोड़ सकें। इसी उद्देश्य से यह समीक्षा लिखी जा रही है। किसी की विद्वत्ता को चुनौती देना हमारा उद्देश्य नहीं है।

नहीं किसी से वैर, किसी का पक्ष नहीं है।
मिट जाए अन्याय ,धर्म का लक्ष्य यही है।।




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