अच्छी सोच

गरीबों का भला कैसे हो??

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन को दी गई चाय पार्टी के अवसर पर अपने संबोधन में कहा कि हमारे हर कार्य की दिशा कमजोर वर्गों के लाभ पर आधारित होगी इसलिए सभी सहयोगियों को भी इस पर अच्छी तरह से सोचना चाहिए कि वे जो कार्यक्रम बनाएं, ध्यान रखें कि उससे गरीबों का कितना हितसाधन होगा। गरीबी मिटाओ का नारा और इसके लिए कार्यक्रम कोई नए नहीं हैं। जो भी सरकारें आती हैं उनकी मजबूरी है कि वे गरीब का नाम लें, उनके उत्थान की बात भी करें। लेकिन आखिर क्या कारण है कि गरीबों की संख्या में वांछित कमी नहीं आ पा रही है, उलटे पूंजी, शक्ति और साधनों का केंद्रीकरण पांच प्रतिशत लोगों के हाथों में ही समाता जा रहा है। घोषित योजनाएं और कार्यक्रम सफल क्यों नहीं हो पा रहे हैं? क्या उसका मुख्य कारण यह नहीं है कि गरीबी मिटाओ एक दिखाऊ नारा बन गया है?

जो सामाजिक और आर्थिक कार्यक्रम बनते हैं उनका सबसे अधिक लाभ मुट्ठी भर लोगों को ही पहुंच रहा है। ऐसा क्यों होता रहा है? कहीं इसकी वजह यह तो नहीं कि संसद और विधानसभाओं में पहले की अपेक्षा अब करोड़पतियों की भरमार होती जा रही है। इन सबके अपने स्वार्थ हैं इसीलिए जो योजनाएं बनती हैं उनका लाभ ज्यादा आमदनी, ज्यादा साधन और ज्यादा सुविधाओं वाले लोगों को ही मिलता है। इसलिए यह हैरत की बात नहीं कि गरीबी रेखा से नीचे रहने वालों की स्थिति में बदलाव नहीं आ पा रहा है।

जिस भूमंडलीकरण की बड़ी आवश्यकता बताई जाती है उससे समाज के किस वर्ग को सबसे अधिक लाभ मिल रहा है? जिसे हम गरीब, असहाय बताते हैं उसके काम के अवसर बढ़ने के बजाय घट रहे हैं। अब तो अगर सड़क पर मिट््टी की पटाई का भी कार्य होता है तो उसमें मजदूरों के बजाय मशीनों का ही वर्चस्व रहता है। इसे आवश्यक इसलिए माना जाता है कि बदलाव की प्रक्रिया में हमें आधुनिक साधन अपनाने पड़ेंगे जो कम समय में अधिक कार्य कर सकें। जब ट्रैक्टर और हारवेस्टर खेतों में चलेंगे तो खेत मजदूर और फसल की कटाई करने वालों का काम छिनेगा ही। क्या हाथ से काम करने वालों और उनके लाभ के लिए समर्पित होने के कारण बड़ी मशीनों का उपयोग रोक देना चाहिए?

 

पहले भी यह सवाल उठा था और आज भी उठता है। रिक्शा चलाने वालों की संख्या घटेगी ही, अगर टेंपो, टैक्सी का विस्तार होगा। बैलगाड़ी से चलने या किसी काम को अंजाम देने में विलंब तो होता ही है, वह खर्च की दृष्टि से भी मशीनों का मुकाबला नहीं कर सकता। देश में गृह और कुटीर उद्योगों की संख्या निरंतर घटती जा रही है। उन्हें बचाने के लिए छूट और सहायता का कार्यक्रम बना लेकिन ये उद्योग बचाए नहीं जा सके।

चरखा स्वतंत्रता आंदोलन का एक प्रतीक बन गया था, गांधीजी उसे खुद चलाते थे। लेकिन हथकरघे के स्थान पर बिजली से चलने वाला करघा आया, पर अब वह भी बड़े उद्यमों की प्रतिस्पर्धा में पीछे छूट गया है। पहले तो कल-कारखानों के अभिनवीकरण का भी विरोध किया जाता था कि इससे मजदूरों की संख्या घटेगी लेकिन अब तो लक्ष्य होता है निर्धारित उत्पादन कितने कम समय और कितने कम खर्च में पूरा किया जा सके। इससे स्वाभाविक ही बेकारों की संख्या घटने के बजाय बढ़ेगी।

साक्षरता और शिक्षा किसी भी सभ्य समाज के लिए आवश्यक हैं। हमने प्रारंभिक से लेकर उच्च शिक्षा को ज्ञानपरक बनाने के बजाय रोजगारपरक बनाने का प्रयत्न किया, लेकिन पढ़े-लिखे बेकारों की संख्या घटने के बजाय बढ़ती ही जा रही है।

घर वाले भी झंखते हैं कि हमारा बच्चा न घर का रहा न घाट का। वह न खुरपी, कुदाल, फावड़ा और हल चलाने की ओर झुकेगा और न उसके लायक कोई काम उपलब्ध है जिसे करके वह अपना जीवनयापन कर सके। इसलिए शिक्षा भी ‘विद्या ददाति विनयम्’ के बजाय अपराधियों की संख्या बढ़ाने का ही काम कर रही है। कहा तो यह जाता है कि किसी क्षेत्र में एक बड़ा उद्योग और एक बड़ा विश्वविद्यालय खोल दीजिए और चार वर्ष बाद उस क्षेत्र में बड़े अपराधों का मूल्यांकन कीजिए, जो परिणाम सामने आएगा वह यही बताएगा कि अपराध तो चार गुना बढ़ गए लेकिन काम पाने वालों की संख्या घटती ही गई।

यह उद्यम और व्यवसाय में ही नहीं, सार्वजनिक क्षेत्र में भी हो रहा है। सार्वजनिक और सरकारी क्षेत्र में यह निर्देश है कि कर्मचारियों की संख्या हर वर्ष दस प्रतिशत घटाएं। आखिर ये कहां जाएंगे? इनका जीवनयापन कैसे होगा?

इन असहज प्रवृत्तियों के बढ़ने से अपराध कैसे रुकेगा? इसलिए मुख्य मसला तो यह है कि गरीबी मिटाने के लिए काम के अवसरों का सृजन करना होगा, यह किस क्षेत्र में किस प्रकार होगा? जिस प्रकार का समाज हम बना रहे हैं वह अब इस स्थिति में पहुंच गया है कि शीघ्र संदेश देने वाले टेलीग्राम की व्यवस्था समाप्त करनी पड़ी है क्योंकि वैकल्पिक साधन के रूप में हमें मोबाइल और इंटरनेट मिल गया है जिसका धड़ल्ले से इस्तेमाल हो रहा है।
ये सभी उत्पादककार्यों में सहायक नहीं कहे जा सकते, लेकिन इन्हें रोकना समय के चक्र को पीछे की ओर घुमाने के समान होगा। प्रगतिशील और उन्नति की दिशा में बढ़ने वाला समाज इसे स्वीकार नहीं करेगा। इसलिए मुख्य सवाल यह है कि काम के अवसर कैसे सृजित किए जाएं। खेती के लिए जोतों को हमने पुनर्योजित करने की नीति बनाई थी, क्योंकि सर्वाधिक जोतें केवल दस प्रतिशत लोगों के हाथों में सीमित थीं और साठ प्रतिशत लोग अलाभकर जोतों पर आश्रित थे। जोत हदबंदी अधिनियम से हम पुरानी स्थिति में कोई बड़ा सुधार नहीं कर सके। इसलिए प्रश्न उठता है कि हम गरीबी रेखा से नीचे रहने वालों को खपाएंगे कहां? श्रम क्षेत्र का दायरा घटा है, क्लर्कों और बाबुओं की संख्या भी उस अनुपात में नहीं बढ़ पाई है जिससे हम उन्हें खपा सकें।

हम चंद्रमा और मंगल के अभियानों के लिए अरबों रुपए विनियोजित कर सकते हैं क्योंकि वैश्विक प्रतिस्पर्धा में हमारे अस्तित्व-बोध के लिए यह हमें आवश्यक जान पड़ता है, लेकिन हम बेरोजगारों को सम्मानपूर्ण जीवन का अधिकार नहीं दे पा रहे हैं। उन्हें बेरोजगारी-भत्ता देने की बात आए तो यह कहा जाता है कि फिर तो ये पराश्रित होते जाएंगे, और क्या यह स्थिति किसी उन्नतशील समाज के लिए उचित मानी जाएगी?

आवश्यकता तो इस बात की है कि हर किसी के श्रम और बुद्धि का उपयोग किया जाए। लेकिन पुरानी और नई सरकारों द्वारा अपनाए गए कार्यक्रमों में इसके दर्शन कहां और कैसे हों, यह तय नहीं हो पा रहा है। हम गंदगी के स्रोतों को तो रोक नहीं पाएंगे, लेकिन गंगा जैसी नदियों की स्वच्छता का अभियान चलाएंगे। ऐसे अभियानों का लाभ अंतत: किसे मिल रहा है। जहां-जहां ऐसे कार्यक्रम चलते हैं वहां कुछ नए अरबपति अवश्य पैदा हो जाते हैं। व्यवस्था का आलम यह है कि घूस, बेईमानी, दगाबाजी, कालाबाजारी, कर-चोरी, ये समाज की आदत बनते जा रहे हैं। इसलिए जो विभिन्न कार्यक्रम अपनाए जाते हैं, नाम भले गरीबी मिटाने का हो, लाभ किन्हें मिलता है इसका मूल्यांकन करना आसान है। इस प्रकार मोदी का भाषण उपदेश मात्र है जिससे वास्तविक स्थितियों में कोई परिवर्तन आता नहीं दिख रहा है।

समाज उपदेशों से नहीं बल्कि साधनों से चलता और बदलता है। जिसके लिए उपदेश यही है कि आओ शुरुआत अपने घर से करें, अपने और अपने मन को बदलें लेकिन क्या यह निरर्थक उपदेश जैसा नहीं है? क्योंकि ऐसा बदलाव कितना आया है, यह कहीं दिखाई नहीं पड़ता। इसलिए गड्ढे को पाटने के लिए हमें जिससे वह बनता है उसे ही रोकना पड़ेगा, अमीरी की अधिकतम सीमा तय करनी पड़ेगी।

अगर कृषिभूमि की हदबंदी को हमने स्वीकार किया है तो अमीरी की अधिकतम सीमा के बारे में क्यों नहीं सोच सकते? यह सब नहीं होगा तो इन कार्यक्रमों का हश्र भी इंदिरा गांधी के गरीबी हटाओ जैसा होगा। इस नारे की बदौलत चुनाव में कांग्रेस और ज्यादा ताकतवर होकर उभरी थी। मगर गरीबों की हालत नहीं सुधरी, बल्कि गरीबी रेखा से नीचे जीने को मजबूर लोगों की संख्या और बढ़ गई। कुछ दिखाने के लिए भले ही प्रतीक निर्धारित हो जाएं लेकिन ये बदलाव के कारक नहीं हैं।

अगर हम अनुत्पादकखर्चों में कमी नहीं ला सके, विनाशक अस्त्रों पर अरबों रुपए खर्च करते रहे तो बात भले ही गरीब की करें, लेकिन उसे लाभ पहुंचने वाला नहीं। गरीब का नाम लेना उसके उत्थान के प्रति आस्था व्यक्त करना यह तो राजनीतिक संस्कृति का अंग बन गया है। कथन की कसौटी के लिए किसी खास पहचान की जरूरत नहीं बल्कि यह देखना काफी है कि यह किस आवश्यकता से प्रेरित है। क्योंकि चुनाव में सबसे अधिक वोट कमजोर वर्गों के ही पड़ते हैं, यह उनकी परंपरा में भी शामिल है कि हमें अपना मत देने का दायित्व निभाना है। यह वर्ग मतदान में निर्णायक भूमिका निभाता है। इसलिए गरीबों के लिए आंसू बहाने का कोई मौका हो, तो कोई भी राजनीतिक दल पीछे नहीं रहता। पर जल्दी ही सब कुछ भूल जाते हैं और न्यस्त स्वार्थों के दबाव में काम करते रहते हैं।

 

इमरजेंसी के बाद 1977 में चुनाव परिणाम क्या होंगे यह देश का न कोई ज्योतिषी बता सका न भविष्यवक्ता। पत्रकारों को भी इसका अनुमान नहीं था। प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी और उनके पुत्र संजय गांधी अगल-बगल रायबरेली और अमेठी जैसे पिछड़े क्षेत्रों से लड़ रहे थे। पूर्व अनुमान में कहीं भी इनकी हार की कल्पना नहीं की गई थी। लेकिन इस क्षेत्र में मतदान में गरीबों की भूमिका सर्वोपरि थी। जो इन्हें हर बार चुनते थे, उनका मन इस बार बिदक गया था। कारण कि हमने जिसका विश्वास किया वह इस योग्य नहीं निकला। इसलिए गरीबों को लाभ नारेबाजी और घोषणाओं से नहीं, बल्कि उसके लिए साधन और सुविधाओं में विस्तार से होगा।

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