अच्छी सोच

इतिहास जो हमें सिखाता है

कभी-कभी मुझसे उन सीखों के बारे में पूछा जाता है, जो इतिहास हमें दे सकता है। अमूमन यह माना जाता है कि अतीत का अध्ययन हमें वर्तमान और भविष्य के बारे में मार्गदर्शन दे सकता है। मगर, क्या ऐसा मानना ठीक है? उदाहरण के लिए, अगर राजनेताओं को अतीत की बेहतर जानकारी हो, तो क्या वे सत्ता का उपयोग ज्यादा बुद्धिमानी से करते हैं? बेहद प्रतिभाशाली और स्वतंत्र विचार रखने वाले इतिहासकार ए जे पी टेलर ऐसा नहीं मानते। उन्होंने एक बार फ्रांस के किसी राजा के बारे में कहा था, ‘मैं हमेशा सोचता हूं कि एक शासक के इतिहास का विद्यार्थी होने का वह एक खतरनाक उदाहरण था। इतिहास पढ़ने वाले ज्यादातर लोगों की तरह वह भी ऐतिहासिक गलतियों से यही सीखता था कि नई गलतियां कैसे हों।’
अमेरिका के हालिया राष्ट्रपतियों में से इतिहास को लेकर सबसे ज्यादा उत्सुक जॉर्ज डब्ल्यू बुश जूनियर थे। अतीत में हुए युद्धों और दिवंगत राजनेताओं पर लिखी मोटी-मोटी किताबें उनके बिस्तर के नजदीक की मेज पर सजी रहती थीं। येल और हार्वर्ड यूनिवर्सिटी से इतिहास के प्रोफेसर व्हाइट हाउस में भोजन के लिए आमंत्रित हुआ करते थे। ए जे पी टेलर के ठीक उलट ये प्रोफेसर अपने ज्ञान को लेकर बड़े-बड़े दावे करते थे। अतीत की समझ को लेकर अपनी विशेषज्ञता के दम पर इन्हें भरोसा थे कि वर्तमान की कामयाब विदेश नीतियों के निर्माण में ये अपना योगदान दे सकते हैं। इन इतिहासकारों और इनकी किताबों की बदौलत श्रीमान बुश बिल्कुल आश्वस्त थे कि 19वीं सदी के इंग्लैंड की तरह 21वीं सदी में बतौर ‘ग्लोबल पुलिसमैन’ अमेरिका को अपनी स्थिति मजबूत करनी चाहिए। इसके बाद अफगानिस्तान और इराक में अमेरिका की जो दुर्गति हुई, वह इतिहास से ली गई इसी सीख का नतीजा थी।

दरअसल, इतिहास कोई तकनीकी विषय न होकर एक मानवीय विषय है। इसका उद्देश्य है मनुष्य की समझ का विस्तार करना, न कि सामाजिक या राष्ट्रीय समस्याओं का हल ढूंढना। सच तो यह है कि कोई इतिहासकार न तो किसी प्रधानमंत्री को बेहतर सरकार चलाने का सुझाव दे सकता है, और न ही किसी सीईओ को उसकी कंपनी को ज्यादा फायदा पहुंचाने के नुस्खे बता सकता है।

 

बतौर इतिहासकार अपने तीस वर्ष के अनुभव के आधार पर मैं इस नतीजे पर पहुंचा हूं कि इतिहास एक और केवल एक सीख देता है कि कोई जीत या हार स्थायी नहीं होती। आमतौर पर लोग इस सीख को भुला देते हैं। याद कीजिए कि सचिन तेंदुलकर को यह एहसास होने में कितना वक्त लगा कि अब उनमें भारत की ओर से खेलने की क्षमता नहीं रही। वह बस खेले जा रहे थे। आखिरकार, सभी को शर्मिंदगी से बचाने के लिए बीसीसीआई ने वेस्ट इंडीज के साथ एक घरेलू सीरीज का आयोजन किया, ताकि वह 200 टेस्ट खेलने के जादुई आंकड़े को छू लें, और उन्हें डेल स्टीन और मॉर्ने मॉर्केल की गेंदबाजी को भी न झेलना पड़े।

तेंदुलकर से भी ज्यादा महान भारतीय हुए हैं, जो अपनी श्रेष्ठता का ठीक ढंग से आकलन नहीं कर पाए। 1958 में कश्मीर में छुट्टियां बिताने के दौरान नेहरू ने फैसला किया कि वह प्रधानमंत्री पद से सेवानिवृत्त हो जाएंगे, ताकि किसी युवा को मौका दिया जा सके। मगर जब वह दिल्ली लौटे तो उनके साथियों ने उन्हें अपने फैसले पर फिर से विचार करने को राजी कर लिया। अगर नेहरू अपने फैसले पर कायम रहते तो तो वह एक अत्यंत सफल राजनेता के तौर पर याद किए जाते, जिसने न केवल अंग्रेजों के खिलाफ लड़ाई में, बल्कि एक स्वतंत्र और लोकतांत्रिक राष्ट्र के निर्माण में बेहद असरदार भूमिका निभाई। बहरहाल, नेहरू प्रधानमंत्री बने रहे, और मुंदड़ा मामला, केरल सरकार की बर्खास्तगी और चीन युद्ध के कलंक से खुद को बचा नहीं पाए। अगर 1958 में नेहरू ने किसी युवा के लिए जगह छोड़ी होती, तो इतिहास आज उन्हें किसी और तरह से याद रखता।

व्यक्तियों की तरह शहर भी यह भूल सकते हैं कि कामयाबी को पाना मुश्किल है, मगर खोना बिल्कुल आसान है। दशक भर पहले बंगलूरू खुद को इंटरप्रैन्योरशिप के क्षेत्र में नव प्रवर्तनों के अग्रणी केंद्र के तौर पर देखता था। इसे भारत की ‘सिलिकॉन वैली’ होने का गौरव मिला हुआ था। यहां की संयत जलवायु, सर्वदेशीय संस्कृति और रिसर्च प्रयोगशालाओं की भरमार होने के बलबूते सोचा यह गया था कि यह देश के दूसरे शहरों से अलग होगा। मगर, हुआ इसका ठीक उलटा। आधारभूत संरचना की अनदेखी, स्थानीय राजनेओं की संकीर्ण सोच और यहां की कुछ प्रमुख कंपनियों में नेतृत्व संकट के चलते निवेशकों ने दूसरे शहरों की ओर रुख करने में भलाई समझी।

शहरों के साथ अगर ऐसा हो सकता है, तो राज्य कहां पीछे रहने वाले। कभी केरल को धार्मिक सहिष्णुता और लिंग समानता का पर्याय माना जाता था। मगर, पिछले कुछ वर्षों में यहां सांप्रदायिक हिंसा और इससे भी ज्यादा चिंताजनक बात यह है कि महिलाओं पर हमले भी हुए हैं। आठ राज्यों में हुए सर्वे में पाया गया कि केरल में महिलाएं सबसे ज्यादा असुरक्षित महसूस करती हैं।

 

इतिहास की एकमात्र सीख को लेकर मेरी जो समझ है, वह देशों पर भी लागू होती है। एडोल्फ हिटलर हजार साल के जर्मन साम्राज्य की बात करता था। अंग्रेजों ने शब्दों से ज्यादा पत्थरों का सहारा लिया। वॉयसराय पैलेस और नॉर्थ व साउथ ब्लॉक इसी उम्मीद में बनाए गए थे कि सैकड़ों वर्षों तक यहां उनका ही राज्य रहेगा। मगर ब्रिटिश औपनिवेशिक शहर के तौर पर दिल्ली का कार्यकाल नाजियों की तुलना में कुछ ही ज्यादा रहा।

स्पष्ट है कि चाहे व्यक्ति हो, संगठन, कंपनी या फिर देश हो, श्रेष्ठता कभी स्थायी नहीं होती। मैं तेंदुलकर का प्रशंसक हूं, क्योंकि मैं जानता हूं कि महान बल्लेबाज उनसे पहले भी हुए हैं, और उनके बाद भी होंगे। शहरों के उत्थान और पतन का गंभीर अध्ययन करने के बाद मुझे आश्चर्य नहीं हुआ जब काम करने या रहने के लिहाज से बंगलूरू की तुलना में मैंने हैदराबाद या दिल्ली को ज्यादा आकर्षक बनते देखा। मुझे यह स्वाभाविक लगा, क्योंकि मैं जानता हूं कि दूसरे देशों की वैश्विक श्रेष्ठता किस कदर अस्थायी रही है।

इतिहास का जो महत्व है, वह शैक्षिक है। दूसरे लोगों और अतीत की विस्तृत व्याख्या के जरिये इतिहासकार मनुष्य के व्यापक सामाजिक अनुभवों को वर्तमान पीढ़ी के साथ साझा करता है। दूसरों ने किस तरह का जीवन बिताया, कहां वे कामयाब हुए और कहां नाकामयाब, इन सबका ज्ञान व्यक्ति को खुद उसके जीवन की अनिश्चितताओं और विलक्षणताओं के प्रति जागरूक बनाता है। इतिहास का ज्ञान आम आदमी को इस योग्य बनाता है कि वह खुद का विश्लेषण कर सके और अपने डर पर काबू कर सके। राजनीति, व्यापार या खेल से जुड़े नेताओं की बात करें, तो इतिहास का ज्ञान किसी भी तरह के घमंड या शेखी की अचूक दवा है।

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