अच्छी सोच

गणतंत्र की चार चुनौतियां क्या है?

यदि 1947 में भारत कोई स्टार्ट-अप होता तो, सर्वाधिक जोखिम उठाने वाले किसी उद्यमी पूंजीपति ने भी इस दुस्साहसिक प्रयोग में निवेश नहीं किया होता। स्वतंत्र राष्ट्र के रूप में हमारे शुरुआती वर्षों में भविष्यवाणी की गई कि हम जल्द ही बिखर जाएंगे। ब्रिटिश भारतीय सेना के पूर्व कमांडर इन चीफ क्लाउड ऑचिनलेक के 1948 में लिखे इन शब्दों पर गौर करेंः ‘पंजाबी ठीक उसी तरह से मद्रासी से भिन्न हैं, जैसा कि स्कॉटिश किसी इतालवी से। अंग्रेजों ने इसे एकजुट करने की कोशिश की, लेकिन उसे स्थायी तौर पर कुछ भी हासिल नहीं हुआ। अनेक राष्ट्रों के किसी महाद्वीप से किसी एक राष्ट्र का निर्माण नहीं किया जा सकता।’
इन बुरा चाहने वालों के विपरीत हम एकजुट बने हुए हैं और कुछ हद तक लोकतांत्रिक भी हैं। हालांकि, जब हम एक गणतंत्र के रूप में 69 वर्ष पूरे कर रहे हैं, अपनी स्थिति पर विचार करना जरूरी लग रहा है। भारत टूटने वाला नहीं है, बावजूद इसके कुछ बड़ी दरारें कायम हैं। यहां हम ऐसी चार दरारों पर विचार करेंगे।

पहली दरार है, गहराता धार्मिक विभाजन। हमारे गणतंत्र के संस्थापकों ने खुद का जीवन यह सुनिश्चित करने में समर्पित कर दिया कि स्वतंत्र भारत में सभी धर्म के लोगों ( या जिनका कोई धर्म न हो उसे भी) को समान अधिकार प्राप्त होंगे। स्वतंत्रता प्राप्ति के कुछ समय बाद जवाहरलाल नेहरू ने निरंतर उठ रही उन आवाजों का कड़ाई से विरोध किया था, जिसमें पाकिस्तानियों द्वारा हिंदुओं को प्रताड़ित किए जाने के बदले भारत में मुसलमानों को दंडित किए जाने की मांग उठ रही थी। उन्होंने कहा था, इस तर्क से मैं जरा भी प्रभावित नहीं हूं। उन्होंने जोर देकर कहा, ‘हमारे धर्म निरपेक्ष सिद्धांत भारत में मुस्लिम नागरिकों के प्रति हमारी जिम्मेदारियां सुनिश्चित करते हैं।’ इन सिद्धांतों को आज हिंदुत्व बहुलतावाद के उभार से खतरा उत्पन्न हो गया है। भारत में मुस्लिमों को चीन के मुस्लिमों की तुलना में अपना धर्म मानने की आजादी है। लेकिन सांप्रदायिक दंगों के समय उन्हें बेतहाशा मुश्किलों का सामना करना पड़ता है। यहां तक कि शांति के समय भी उन्हें अस्वीकार किया जा सकता है या कलंकित किया जा सकता है। पिछले कुछ वर्षों के दौरान भीड़ की हिंसा की घटनाओं और स्पष्ट तौर पर सांप्रदायिक नागरिकता (संशोधन) विधेयक ने गणतंत्र को हिंदू पाकिस्तान बनने की दिशा में कुछ कदम और आगे धकेल दिया है।

गणतंत्र की दूसरी बड़ी दरार है, सामाजिक गैरबराबरी का मजबूती से कायम रहना। किसी विकासशील समाज में आर्थिक विकास की उच्च दर का अनुभव करते हुए बढ़ती हुई असमानताएं होंगी। यह चिंताजनक है, पर लोकतंत्र के दृष्टिकोण से अधिक चिंतानक स्थिति है, सामाजिक गैरबराबरी, जिसमें नागरिकों से जाति और लिंग के आधार पर भेदभाव किया जाता है।

संविधान ने छुआछूत को खत्म कर दिया है और महिलाओं को पुरुषों के बराबर का दर्जा दिया है। पर भारत में घर में और कार्यस्थल पर अनुसूचित जाति के लोगों और महिलाओं के साथ अक्सर समान नागरिक जैसा व्यवहार नहीं किया जाता। यह माना जाता था कि जातिगत भेदभाव खासतौर से गांवों में कायम है; रोहित वेमुला की त्रासदी ने दिखाया कि यह हमारे श्रेष्ठ विश्वविद्यालयों तक में फैल सकता है। इस बीच, हाल के दशकों में कार्यबल में महिलाओं की भागीदारी में गिरावट आई है और इसके साथ ही सार्वजनिक जगहों पर उनसे हिंसा की घटनाएं बढ़ी हैं।

अनुसूचित जातियों के लोगों और महिलाओं के साथ ही आदिवासियों को भी अक्सर भेदभाव का सामना करना पड़ता है। उनके जंगल, पानी, जमीन और खनिजों पर ताकतवर निहित स्वार्थी तत्व कब्जा कर लेते हैं और बदले में उन्हें कुछ भी नहीं मिलता। एक आंकड़ा ही सब कुछ बयान कर देता है, हमारी आबादी में आदिवासियों की हिस्सेदारी आठ फीसदी है, लेकिन ‘विकास’ परियोजनाओं के कारण विस्थापित होने वालों में चालीस फीसदी उन्हीं का हिस्सा है। संविधान सभा के अपने आखिरी भाषण में भीमराव आंबेडकर ने टिप्पणी की थी, ‘26 जनवरी, 1950 को हम अंतर्विरोधों से भरे जीवन में प्रवेश कर रहे हैं। राजनीति में हमारे पास समानता होगी और सामाजिक और आर्थिक जीवन में हमारे पास विषमता होगी। राजनीति में हम एक व्यक्ति एक वोट के सिद्धांत को मान्यता देंगे। हमारे सामाजिक और आर्थिक जीवन में, हमारे सामाजिक और आर्थिक ढांचे के आधार पर हम एक व्यक्ति एक मूल्य के सिद्दांत को अस्वीकार करना जारी रखेंगे। आखिर हम कब तक ऐसे अंतर्विरोधों से भरा जीवन जिएंगे?’ सत्तर वर्ष बाद भी वे अंतर्विरोध कायम हैं। यह पक्के तौर पर कहा जा सकता है कि दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र होने के हमारे दावे को हमारे राजनेताओं की शिथिलता और भ्रष्टाचार ने दूषित किया है। उच्च जाति के हिंदुओं द्वारा अनुसूचित जाति के लोगों और सभी जाति और धर्म के लोगों द्वारा महिलाओं के प्रति दैनंदिन जीवन में किए जाने वाले व्यवहार ने इसे कहीं अधिक दूषित किया है। तीसरी दरार पर्यावरण की बदतर होती स्थिति के रूप में देखी जा सकती है। हमारी नदियों की मौत, हमारे वनों का क्षरण, हमारी मिट्टी और वातावरण का प्रदूषित होना, ये सब भारत के आर्थिक विकास की भविष्य की संभावनाओं को लेकर परेशान कर देने वाले प्रश्न खड़े करते हैं। पर्यावरण को होने वाले नुकसान का सर्वाधिक प्रभाव गरीबों पर पड़ता है, इसलिए कोई भी राजनीतिक दल इस ओर ध्यान नहीं देता। हमारे पास वैज्ञानिक विशेषज्ञताएं हैं, जिनसे टिकाऊ विकास के रास्ते पर आगे बढ़ा जा सके, लेकिन ऐेसे विशेषज्ञों को अनसुना कर दिया जा रहा है, जैसा कि गाडगिल रिपोर्ट और केरल की बाढ़ के मामले में देखा जा सकता है।

चौथी दरार है, हमारे सार्वजनिक संस्थानों का क्षरण। इंदिरा गांधी ने प्रधानमंत्री के रूप में सबसे पहले ऐसे संस्थानों पर नियंत्रण करने की कोशिश की, जिनकी स्थापना स्वतंत्र और स्वायत्त रूप में संचालित होने के लिए की गई थी। उन्होंने जो शुरुआत की, उसे अन्य दलों और नेताओं ने आगे बढ़ाया। नौकरशाही और पुलिस आज सत्तारूढ़ दलों के हितों का ही खयाल रखते हैं। यही स्थिति सीबीआई और ईडी और कुछ हद तक रिजर्व बैंक की हो गई है। इस बीच, संसद तकरीबन कामकाजी नहीं रह गई है, राजनीतिक दलों को मिलने वाले चंदे में जरा भी पारदर्शिता नहीं है। एक-एक वर्ष बीतने के साथ ही हमारे संस्थान कम स्वतंत्र और अधिक समझौतावादी होते जा रहे हैं, जिसका भारत के दैनंदिन जीवन में नकारात्मक प्रभाव पड़ रहा है।

अगस्त, 1947 में हम औपनिवेशिक शासन से आजाद हुए थे और जनवरी, 1950 में हमने गणतांत्रिक संविधान को अंगीकार किया। अंग्रेज हमें जैसा छोड़ गए थे, सात दशक बाद हम उससे कहीं अधिक लोकतांत्रिक हो गए हैं। लेकिन पक्के तौर पर हमारे संविधान निर्माताओं ने जैसी कल्पना की थी, हम उससे कम लोकतांत्रिक हैं। वास्तव में, मैंने जिन दरारों का जिक्र किया है, वे कायम हैं, फिर केंद्र या राज्यों में किसी की भी सरकार हो। यदि हम हमारे गणतंत्र के संस्थापकों के सिद्धांतों की रक्षा करना चाहते हैं, तो हमें इन पर गौर करने और इन्हें दुरुस्त करने की जरूरत है।

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