अच्छी सोच

अमेरिकन गोबर , मानसिक गुलामी का परिणाम

कहानी पढ़िए और फिर आत्म मनन कीजिए, कार्य में परिणित….?

अमेरिकन गोबर के पैकेट:-

अमेरिकन गोबर दो रुपये, अमेरिकन गोबर दो रुपये की आवाज़ सुनकर कर्नाट प्लेस की भीड़ ऊधर ही दौड़ पड़ी.
यह आवाज़ पैकेटों से लदे हुए ट्रक से आ रही थी.
ट्रक पर चार सजे-धजे सेल्समैन कुछ पैकेट लिए खड़े थे, और यह आवाज़ उस पर बज रहे टेप प्लेयर से आ रही थी. उन चार कर्मचारियों ने पैकेट फाड़कर, सुंदर सजीली माचिस के आकर की डिब्बियां हाथ में ले ली थी.
अमेरिकन गोबर के नाम पर भीड़ उन डिब्बियों को खरीदने के लिए टूट पड़ी थी. आनन फानन में ही ट्रक खाली हो गया.

 

लोग डिब्बियां खरीदते हुए कह रहे थे, `आजकल दो रुपये में आता ही क्या है, चलो दो रुपये में अमेरिकन गोबर ही देखलें.’
ट्रक पर डिब्बी बेच रहे सेल्समैनों का व्यवहार, और बोलचाल इतनी शालीन थी कि हर कोई उनकी तारीफ कर रहा था. इन डिब्बियों के बिकने से आठ लाख से भी ज्यादा
रुपये इकट्ठे हो गये थे.

 
साथ ही खड़े बरगद के पेड़ के पास छिपे खड़े नेता जी, और वह पच्चीस साल का युवा यह सब देख रहे थे. नेता जी युवा के कायल हो गये थे, उसने जो कहा था करके दिखला दिया
था. नेता जी की आँखों के सामने अतीत तैरने लगा:
नेता जी पुद्दूलाल संसद से निकलकर अपने घर की ओर जा रहे थे. कर्नाट प्लेस के भीड़ भरे इलाक़े में पटरी पर जुटी भारी भीड़ को देखकर उन्होंने ड्राइवर से गाड़ी रोकने को
कहा. ड्राइवर ने गाड़ी रोक दी. नेता जी गाड़ी से उतारकर उस मजमें की ओर बढ़ गये.

 
एक पच्चीस साल के लगभग की आयु का, सुंदर सजीला युवक उस मजमे को लगाए था. युवक के बोलने में इतना माधुर था कि जिसके कान में भी उसकी आवाज़ पड़ जाती, वह उस ओर खींचा चला जाता था. युवक बाजिगरी दिखा रहा था.
खेल ख़त्म हुआ. खेल देखने वाले दर्शकों ने अपनी प्रवृत्ति के अनुसार उस बाज़ीगर युवक को पैसे दिए. युवक पैसे बटोर रहा था. सफेद खद्दरधारी नेता जी उसके पास जा पहुँचे.
युवक के कंधे पर प्यार भरा हाथ रखकर बोले, `बड़ी भीड़ जुटा रखी थी?’

 
युवक ने उस ओर ध्यान दिया. उसे समझते देर न लगी कि वह व्यक्ति कोई बड़ा नेता है. युवक ने अपने माथे पर हाथ मारते हुए कहा, `मान्यवर, यह क्या है, अगर मौका मिल
जाए तो गोबर को सोने के भाव बेच दूं. लेकिन भाग्य फूटा हो तो कोई क्या करे?’
युवक का कॉन्फिडेन्स और भाव भंगिमा देखकर नेता जी के चेहरे पर चमक आ गयी थी. वे युवक से बोले, `ऐसा है?’
`जी महोदय, ऐसा ही है.’
`तो अपना सामान बटोरो और मेरे साथ चलो.’
`कहाँ?’
`मेरे घर.’
`किस लिए?’
`गोबर को सोने के भाव बेचने वाली, मैं तुम्हारी कूव्वत परखूंगा,’
`क्यों?’
`अगर तुम अपनी बात के खरे निकले तो फिर मैं तुम्हारा भाग्य बदल दूँगा. आज से तुम्हारा सारा जिम्मा मेरा है.’
युवक ने अपना बाजिगरी का सारा सामान बटोरा, नेता जी की डिग्गी में डाल दिया, और उनके साथ चलने के लिए आगे बैठने लगा. नेता जी ने उसे पकड़कर अपने साथ पीछे बैठाते हुए कहा, `नहीं वहाँ नही, तुम्हारा स्थान मेरे साथ है. तुम मेरे साथ बैठोगे.’

 
नेता जी युवक को लेकर अपने घर पहुँचे. अपने साथ डाईनिंग टेबल पर बैठाकर तबियत से भोजन कराया. युवक ने ऐसा भोजन, और वह भी पेटभर, जीवन में पहली बार खाया था.
उसने सपने में भी न सोचा था कि जीवन में ऐसा भोजन,एक महल में डाईनिंग टेबल पर बैठकर, और वह भी पेटभर मिलेगा.
भोजन करने के बाद युवक के चेहरे पर तृप्ति के भाव थे.
नेता जी हर पल युवक की भाव भंगिमा देख रहे थे. नेता जी ने कहा, `थके हो, थोड़ी देर आराम करो, फिर बात करेंगे.’
`सर, ग़रीब, अभाव ग्रस्त को थकान नहीं होती है. जिसे थकान होती है वह ग़रीब नहीं होता है.’
`फिर भी कुछ देर आराम करो?’

 
घंटा दो घंटा आराम से लेटने के बाद युवक जाग बैठा था.
नेता जी उसके कक्ष में आए और उसे जगा हुआ देखकर बोले,
`अरे तुम तो पहले ही जगे बैठे हो.’
`जी, मुझे नींद ही कब आई?’
`अब यह बतलाओ कि तुम गोबर को सोने के भाव कैसे बेचोगे?’
`सर, इसमें बतलाने की कोई ज़रूरत नहीं है, जैसा मैं कहूँ करते जाओ, और उसे देखते जाओ. स्वयम् ही अपनी आँखों से देखोगे कि मैं यह सब कैसे करता हूँ?’
नेता जी ने युवक की बात पर सहमति की मुंडी हिलाई. उसे आराम से ठहरने के लिए एक कक्ष दे दिया गया, और खाने पीने का उचित प्रबंध कर दिया गया.

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युवक ने एक 100 मीटर के प्लॉट में अपनी योजना को आकार देना प्रारंभ कर दिया. करीब एक ट्रक गोबर मंगाया गया. गोबर को पाँच ढ़ेरियों में बाँट दिया. इन पाँच ढ़ेरों में अलग-अलग लाल, नीला, हरा, गुलाबी और पीला रंग मिला दिया गया. पाँचों ढ़ेरियों में पाँच तरह की बेहतरीन खुशबू मिला दी गयी. इन पाँच प्रकार के रंगीन, खुशबुदार गोबर को पाँच तरह की माचिस के आकार की सुंदर, रंगीन पेपर की सजीली डिब्बियों में, करीने से एयर टाइट पैक कर दिया गया, और इन डिब्बियों के बारह-बारह दर्जन के पैकेट बना दिए गये.
शालीन और मधुर आवाज़ में एक टेप तैयार कराई गयी,`अमेरिकन गोबर दो रुपया, अमेरिकन गोबर दो रुपया…………’ चार सलीके के, सजीले सेल्स मैंन अपायंट किए गये, और उन्हें उस युवक ने खुद व्यवहारिक ट्रैनिंग दी.

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नियत तिथि को, कर्नाट प्लेस पर, नियत की गई जगह पर,ट्रक भरकर अमेरिकन गोबर की डिब्बीयों बेचने के लिए भेज दी गयी थी.
यह सब तमाशा देखकर नेता जी विस्मित थे. उन्होंने ऐसा कर्मठ, और बात का धनी युवा अभी तक न देखा था. गोबर बिकने से इकट्ठा हुआ आठ लाख से ऊपर रुपया लेकर वे नेता
जी के घर आ गये. नेता ने पूछा, `बेटा तुम्हारा नाम क्या है?’
`सर, जो भी आप पुकारे वही मेरा नाम है.’
`क्या मतलब?’
`कभी माँ नहीं देखी, बाप नहीं देखा. फुटपाथ पर बचपन बीता है, और अनाथ आश्रम में शिक्षा दीक्षा हुई है. कौन नाम रखता मेरा?’
यह सुनकर नेता जी आँखें सजल थी. बोले, `न-न, ऐसा न कह?’
`सच तो यही है, कहूं कि न कहूं. कोई कालिया कह देता है, कोई लम्बू.’
`तेरे जैसे गोरे यूवक को कालिया?’

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`सर, कालिया रंग से नहीं तकदीर से पुकारा जाता है. काली तकदीर लेकर पैदा हुआ हो, सो कालिया ही तो हुआ?’
`नहीं कतई नहीं?’
`आप बड़े हैं, कहते हैं सो मान लेता हूँ.’
`कहाँ तक पढ़े हो, और स्कूल में क्या नाम लिखा था?
`दसवीं तक शिक्षा पाई है, और स्कूल का नाम दलबीर है.’
`तुम्हें सोने के भाव गोबर बेचने का विचार कैसे आया?’
`इस देश के लोगों की मानसिकता देखकर.’
`कैसे?’
`जिस देश में मानसिक गुलाम जनमानस रहता हो, वहाँ इस तरह के कारनामें करना सहज है.’
`बड़े बुद्धिमान हो.’
`सर, बुद्धिमान काहे का, गलियों में,फुटपाथ पर धक्के खाते-खाते यह सब देखा और गुना है.’
`तुम तो हमारे बड़े ही काम के हो, हमारी पार्टी में शामिल होवोगे?’
और इस पर दलबीर ने अपनी सहमति की मुंडी हिला दी.
विशेष: चित्र, कहानी को रोचक बनाने के लिए हैं, इन्हें अन्यथा न लें.

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कहानी क्रमश:—–उक्त व्यंग यथार्थ पर आधारित है, यूं तो घटनाएं अनेक है, जातियों की गुलामी, धर्मों की गुलामी आदि.

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