अखण्ड भारत

क्या हैं राजनीति के गिरते स्तर के कारण?

‘राज करने’ अथवा राज चलाने सम्बन्धी नीति को ही राजनीति कहा जाता है। लिहाज़ा स्पष्ट है कि राज करने या चलाने जैसी अति संवेदनशील एवं गम्भीर जिम्मेदारी को अंजाम देने के लिए इस पेशे में शामिल व्यक्ति को अत्याधिक योग्य, दक्ष, ईमानदार तथा कुशल नेतृत्व प्रदान कर पाने की क्षमता रखने वाला व्यक्ति होना चाहिए। अशोक सम्राट, चन्द्रगुप्त, चाणक्य जैसे राजनीति में सिद्ध पुरूषों से लेकर सुभाष चन्द्र बोस, महात्मा गांधी, पंडित नेहरू, सरदार पटेल, लालबहादुर शास्त्री तथा इंदिरा गांधी सरीखे देश के सुप्रसिद्ध राजनैतिक महापंडितों तक भारतीय राजनीति का इतिहास ऐसे तमाम राजनैतिक दिग्गजों के नामों से भरा पड़ा है जिन पर न सिर्फ भारत की जनता बल्कि स्वयं देश की राजनीतिक व्यवस्था भी गर्व करती है।

हमारे देश का सौभाग्य है कि प्राचीन काल से ही भारत को राजनीति के क्षेत्र में ऐसी तमाम योग्य एवं विलक्षण प्रतिभाएं मिलीं जिन्होंने अपने तमाम राजनीतिक फैसलों के द्वारा देश को आगे ले जाने, देशवासियों को न्याय देने, तथा देश की प्रगति और विकास में अपनी योग्यताओं एवं प्रतिभाओं का भरपूर इस्तेमाल किया। यदि हम आज के समय में पश्चिमी देशों की साम्राज्यवादी नीतियों के कारण विश्व के बिगड़ते हुए हालात पर नजर डालें तथा प्रभावित देशों में मच रही तबाही,बर्बादी एवं आए दिन होने वाले कत्ल-ए-आम पर गौर करें तो हमें अपने देश के कुशल राजनीतिज्ञों की योग्यता पर यह सोचकर और भी गर्व होता है कि 200 वर्षों की गुलामी के बाद भी बना किसी भीषण संघर्ष किए देश को अंग्रजों की गुलामी की बेडिय़ों से किस प्रकार मुक्ति दिलाई।

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देश की आजादी को आज 71 वर्ष बीत चुके हैं। स्वतन्त्र भारत दुनिया के अन्य विकासशील देशों की तुलना में तेजी से आगे बढ़ता हुआ विकसित देशों की श्रेणी में खड़ा होने की तैयारी कर रहा है। यह सत्य है कि देश के विकास सम्बन्धी इस महान उपलिबध में निश्चित रूप से हमारे ही देश के कुशल नेतृत्व का पूरा योगदान है। परन्तु यदि इसी सिक्के के दूसरे पहलू पर नजर डालें तो हमें कुछ ऐसे तथ्य भी नजर आते हैं जिन्हें देखकर हमारी नजरें शर्म से झुक जाती हैं।

दरअसल हमारे देश के कल के नेताओं में बलिदान का जज़्बा था, वे निःस्वार्थ सेवा भाव के साथ अपने पूरे कौशल एवं योग्यता के बल पर प्रभावी राजनीति किया करते थे। ऐसी राजनीति जिसमें कि नैतिकता एवं सिद्धान्त कूट-कूट कर भरे होते थे। ठीक इसके विपरीत आज की राजनीति मुख्य रूप से सत्ता प्राप्त करने के उद्देश्य को केन्द्र बिन्दु मानकर किया जाने वाला एक ऐसा पेशा बन कर रह गई है जिसमें अनेक अनपढ़, गुण्डे, बदमाश, लफंगे, स्वार्थी, धनार्जन की इच्छा रखने वाले, अखबार बाजी व प्रेसनोट की राजनीति कर अपने नाम को जनता के मध्य नियोजित तरीकों से उछालने वाले तथा छल कपट के द्वारा राजनीति के क्षेत्र में अपना नाम रौशन करने की कोशिश करने वालों की भीड़ नजर आती है। जिसके परिणाम स्वरूप देश में अपना नाम रौशन करने की कोशिश करने वालों की भीड़ नजर आती है। जिसके परिणाम स्वरूप देश में चारों ओर भ्रष्टाचार का वातावरण नज़र आ रहा है। आम लोगों का राजनीति तथा राजनीतिज्ञों पर से विश्वास कम होता जा रहा है।

 

राजनीति में नैतिकता की न सिर्फ कमी होती दिखाई पड़ रही है बल्कि ऐसा लगने लगा है कि राजनीति जैसे पवित्र पेशे के लिए नैतिकता की बात करना ही कोई अनैतिक वार्तालाप बनकर रह गया हो। पारदर्शिता नाम की चीज सियासत से खत्म होती जा रही है। इसी प्रदूषित एवं निम्न स्तरीय स्वार्थी एवं भ्रष्ट राजनीति की वजह से ही स्वयं देश के प्रधानमंत्री राजीव गांधी को यह स्वीकार करना पड़ा था कि विकास के नाम पर एक रूपया जब केन्द्र सरकार पंचायत के विकास कार्यों के लिए रवाना करती है तो पंचायत तक आते-आते वह एक रूपया मात्र 25 पैसे ही रह जाता है। स्वर्गीय राजीव गांधी का साफ कहना था कि 75 पैसे देश के खोखले राजनैतिक ढांचों तथा भ्रष्ट राजनैतिक एवं प्रशासनिक व्यवस्था की भेंट चढ़ जाते हैं। प्रश्न यह है कि यदि देश का राजनैतिक ढांचा चुस्त दुरूस्त एवं पारदर्शी हो तथा देश की व्यवस्था योग्य, ईमानदार, ज़िम्मेदार व कुशल लोगों के हाथों में हो तो क्या इस प्रकार के ह्रास की कल्पना की जा सकती है?

राजनीति में सक्रिय लोगों तमाम नेताओं पर हम नजर डालें तो हमें यह देखकर दुरूख होगा कि इनमें अनेक ऐसे लोग दिखाई देते हैं जो अशिक्षित होने के अलावा अपने जीवन के तमाम क्षेत्रों में असफल होने के बाद सफेद कुर्ते-पायजामे सिलवा कर समाज सेवा को बहाना बनाकर राजनीति में सक्रिय हो गये हैं। ऐसे तत्वों की सक्रियता एक ओर तो राजनीति के क्षेत्र में इसलिए भी बढ़ती गई क्योंकि देश की जनसंख्या के साथ-साथ बेराजगारी भी अपने चरम पर पहुंच चुकी है। दूसरी तरफ ऐसे अपरिपक्व एवं असमाजिक लोगों के राजनीति में बढ़ते प्रवेश को देखकर योग्य, ईमानदार तथा देश सेवा का जज़्बा रखने वाले उन तमाम लोगों ने अपने आपको राजनीति के क्षेत्र से दूर रखना शुरू कर दिया जो असमाजिक तत्वों की राजनीति में घुसपैठ को कतई उचित नहीं समझते थे।

 

शरीफ एवं सज्जन व्यक्तियों द्वारा राजनीति से मुंह मोड़ लेने की घटना ने तीसरे दर्जे के ऐसे लोगों को इतना अधिक प्रोत्साहित किया कि आज राजनीति में जहां इनका वर्चस्व साफ नजर आता है वहीं योग्य एवं सज्जन राजनीतिज्ञ या तो राजनीति के दल-दल से दूर होता जा रहा है या फिर सक्रिय होते हुए भी स्वयं को असहाय एवं निष्प्रभावी महसूस करने लगा है। आज का आधारहीन तथाकथित नेता अपने आकाओं को तोहफे भेंट कर, अखबार नवीसों को तमाम प्रकार की श्भेंट्य देकर अपने राजनैतिक आकाओं के पक्ष में उसकी तारीफों के पुल बांधने वाले प्रेस नोट जारी कर स्वयं को सफल राजनीतिज्ञ मानता है। कोई दूसरे देशों के झण्डे जलाकर अपनी राजनीति चटकाता है तो कोई अफसरों व अन्य वरिष्ठ नागरिकों को स्मृति चिन्ह भेंटकर उन्हें सम्मानित करने के बहाने अपना ही मान-सम्मान बढ़ाने का प्रयास करता है। कोई अपने साथ चार लोगों को लेकर सडक़ों पर दहशत फैलाने, कारों व जीपों में बैठकर तेज रफ़्तार से गाड़ी चलाने को ही सफल राजनीति मानता है तो कोई राष्ट्रीय राजमार्ग पर शहीदों की फोटो से लैस गाडिय़ों पर पिकनिक मनाए जाने की घटना को ‘रथयात्रा’ का नाम देकर स्वयं को लाल कृष्ण अडवाणी की श्रेणी में स्थापित करने का प्रयास करता है।

राजनीति में अपराधी भी काफी सक्रिय भूमिका अदा कर रहे हैं। इन अपराधियों की सक्रियता का केवल एक ही उद्देश्य होता है, अपनी जान बचाना तथा शासन प्रशासन का संरक्षण प्राप्त करना। जाहिर है अपने इस उद्देश्य के लिए वे किसी एक राजनैतिक दल के साथ किन्हीं सिद्धांतों के तहत बंधे नहीं होते। वे उसी दल के साथ होते हैं जो दल उनकी सुरक्षा की पूरी गारन्टी लेता हो।

उपरोक्त हालात को देखकर इस निर्णय पर पहुंचा जा सकता है कि देश की राजनीति के वर्तमान गिरते हुए स्तर के लिए काफी हद तक अकुशल, अयोग्य, भ्रष्ट व व्यवसायिक मानसिकता रखने वाले ढोंगी नेताओं की राजनीति में घुसपैठ जिम्मेदार है। यदि देश को इस नासूर से मुक्ति दिलानी है तो ऐसी व्यवस्था करनी पड़ेगी जिससे कि शिक्षित, योग्य, ईमानदार एवं नीतियों व सिद्धांतों पर विश्वास रखने वाले समर्पित लोग ही सक्रिय राजनीति में भाग ले सकें।

 

इस बार भारी संख्या में युवा वोट करेंगे और उनका मुद्दा होगा, भ्रष्टाचार दूर करो। लेकिन जिस निम्न स्तर की घृणित राजनीति शुरू हुई है, वह अफसोस करने लायक है। पहले मुजफ्फरनगर दंगे पर संकीर्ण राजनीति, फिर व्यक्ति विशेष पर टीका-टिप्पणी और अब सांविधानिक पदों पर बैठे लोगों द्वारा ही संविधान को न मानना। सत्ता प्रतिष्ठान में बैठने वाले कुछ भी बोलने से पहले मर्यादा का ध्यान नहीं रखते। आलोचना राजनीति का एक अभिन्न अंग है, पर स्वस्थ आलोचना का दौर अब खत्म-सा हो गया है। सपा, बसपा और खास तौर पर कांग्रेसी नेताओं ने तो भाषायी मर्यादा की सभी हदें पार कर दी हैं। आप और भाजपा, जैसी कुछ पार्टियों से स्वस्थ राजनीति की उम्मीद की जा सकती है, पर इनके नेता भी कई मौकों पर अपनी भाषायी सीमा लांघ जाते हैं। आप की तो पूरी राजनीति ही दूसरों को भ्रष्ट और खुद को ईमानदार बताने पर टिकी है।

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लोकसभा चुनाव 2019

 

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