अच्छी सोच

अब बच्चे लोरी नहीं सुनते !

‘चंदा मामा आरे आवा पारे आवा, नदिया किनारे आवा, सोने की कटोरिया में दूध-भात लिहे आवा, मुन्ना के मुंह में घुटूक…..‘ और लोरी का आखिरी शब्द पूरा होते-होते नन्हा बालक मुंह ऐसे चलाना शुरू करता है जैसे कि चंदामामा सचमुच अपने हाथों से उसे दूध-भात खिला ही रहे हों। इस तरह, लोरी के बोल में दूध-भात खाता और मां की मीठी थपकियों में समाए वात्सल्य के असीम संसार में विचरता हुआ बच्चा बड़ी सहजता से ‘निदिंया रानी‘ की गोद में समा जाता है।

लोरियों की अजब परंपरा चली आई है इस देश में। प्रकृति और संस्कृति के जाने कितने रूप संजो रखे हैं इन लोरियों ने। संस्कृति-परंपरा और भौगोलिक विविधता के साथ-साथ देश के अलग-अलग हिस्सों की लोरियों की छटा भी अनेक रूपों में निखरती दिखाई देती है। बालमन में उतरते हुए अंतस् की आंखें खोलें तो भोजपुरी लोरी की यह झलक देखने लायक है- ‘खंता-मंता खेली थै, कानी कौड़िया पाई थै, गंगा में बहाई थै, गंगा माई बालू देंय, उ बलुआ हम भुजवा के देई, भुजवा हम्मैं दाना देय, उ दनवा हम घसियरवा के देई, घसियरवा हम्मैं घास देय, उघसिया हम गइया के देई, गइया हम्मैं दूध देय, उ दुधवा हम मुन्ना के देई, मुन्ना पियै घुटूक से।‘ यह लोरी गंगा की आस्था और उसकी उपयोगिता से लेकर भारतीय समाज में गाय की महत्ता तथा लोक जीवन के आपसी अंतर्सबंधों का काफि गहरा और सहज बोध कराती दिखती है। सही कहें तो लोरी यहां भावी जीवन में एक-दूसरे के काम आने का अन्योन्याश्रित भाव और नैतिकता का बोध जगाने वाली अबोध शिशु की पहली पाठशाला बन जाती है।

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ऐसा नहीं है कि लोरियां सिर्फ बच्चे को पुचकारने की निरूद्देश्य और अर्थहीन अभिव्यक्तियों हैं। वे जीवन के किन्हीं गहरे उद्देश्यों से जोड़ने का महत्वपूर्ण काम करती हैं। जाने कितने बिंबों में प्रकृति का मानवीकरण करती लोरियां प्रकृति के साथ साहचर्य का एक परोपकारी भाव बचपन में ही अंकुरित कर देती हैं। माता-पिता, भाई-बहन, मामा-मामी, दादा-दादी, चाचा-चाची जैसे पारिवारिक संबंधों के प्यार-दुलार की अहमियत भी इन लोरियों के जरिये ही पहली बार नन्हे बालक के अंतर्मन तक पहुंचती है। लोरियों में मां के निश्छल स्नेह के इतने दृश्य उभरते हैं कि तुतलाती जुबान की सारी जिदें पूरी हो जाती हैं। स्नेह का भूखा बच्चा जब खेल-खिलौनों से भी आजिज आ जाता है और गुस्से में रो-रोकर हाथ-पांव पटकने लगता है तो मीठी थपकियों में सनी ये लोरियां रामबाण नुस्खा बन जाती हैं।

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स्दियों से मां का स्नेह बरपाती लोरियां बच्चे के स्वस्थ विकास के लिए कितनी जरूरी हैं, यह अब आधुनिक विज्ञान के पुरोधा भी महसूस करने लगे हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अध्ययन का निष्कर्ष है कि जो बच्चा प्यार के वातावरण में मां के सानिध्य में नींद लेते हैं, वे अलग सुलाए जाने वाले बच्चों की तुलना में बड़े होकर ज्यादा सुलझे इनसान बनते हैं। अब अबकि तमाम प्रयोगों से यह भी सिद्ध हो गया है कि गर्भस्थ शिशु पर भी मां की मानसिक स्थितियों का असर होता है, तो फिर इस संसार में आंखें खोल चुके शिशु पर ये लोरियां गहरा असर क्यों नहीं डालेंगी? यह अजीब बात है कि मां की लोरी सुनकर बच्चा अपने छोटे-मोटे शारीरिक कष्ट भूलकर गहरी नींद में सो जाता है। लोरी गुनगुनाती मां का स्पर्श पाकर नन्हा शिशु अपने-अपको सबसे ज्यादा सुरक्षित महसूस करता है और रोना-धोना भूलकर चुप हो जाता है।

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लेकिन दुर्भाग्य कि नए युग के बच्चे अब लोरी नहीं सुनने को पाते। आधुनिकता के रंग में रंगी माएं बहुत कम मिलेंगी जिन्हें लोरी की दो-चार लाइनें याद होंगी। आज की माओं को व्यवसाय से, नौकरी से, भांति-भांति के अपभोक्ता सामानों को जुटाने और उनकी सार-संभाल से फुरसत नहीं। कभी कुछ वक्त बचता भी है तो टीवी के अनगिन चैनलों पर दिन-रात चलने वाले धारावाहिक या फिल्में ज्यादा जरूरी लगते हैं। नई माओं के लिए बच्चे पालना जरूरी नहीं, बल्कि मजबूरी है। इसलिए बच्चों की चिल्ल-पों से निजात पाने के लिए उन्हें टीवी के सामने लिटा दिया जाता है, और इस तरह, कैतूहल में डूबी इन बच्चों की निगाहें टीवी के पर्दे को घूरती हुई किसी नए तरह के अनजाने संसार में अनायास ही प्रवेश कर जाती हैं। लोरी सुनने की उम्र में एक बच्चे के मानस पटल पर भय, हिंसा, आंतक, अश्लीलता और अनपेक्षित जिज्ञासाओं के हजारों-हजार दृश्य कितना बुरा असर छोड़ते हैं, इसके मनोवैज्ञानिक अध्ययन किसी स्वस्थ भविष्य का संकेत नहीं देते।

 
पश्चिम के उपभोक्तावाद ने हमारी संस्कृति के अनगिनत पहचान धूमिल कर दिए हैं, और लोरी जैसी परंपराएं भी इस धुंध में खोती जा रही र्हैं। इस सांस्कृतिक विस्मृति का ही नतीजा है कि आज के नन्हे-मुन्ने लोरियों की स्वर लहरियां नहीं, टीवी का शोर सुनते बड़े होते हैं। उनके सामने अब मां का वातत्सल्य छलकता, ममत्व से भीगा, हंसता, खिलखिलाता, लोरी गुनगुनाता चेहरा नहीं, बल्कि अनगिनत चैनलों पर सिगरेट का धुआं उड़ाते, शराब का पैग छलकाते, ईर्ष्या-देष, मार-पीट, छल-छद्म का खेल-खेलते, जिंदगी को विद्रूप बनाते- जाने कितने रंगों के वीभत्स चेहरे होते हैं।
उपभोक्तावाद ने संयुक्त परिवार की हमारी अवधारणा को भी काफी कमजोर कर दिया है। ऐसे में दादा-दादी, चाचा-चाची जैसे परिवार के ढेरों सदस्यों की गोद में लोरी सुनने के सुख से अब के बच्चे वंचित होते जा रहे हैं। सिर्फ मां-बाप तक सीमित होते जा रहे परिवारों की व्यस्त दिनचर्या में बच्चे कहीं तन्हा छूट गए हैं। इन परिस्थ्यिों का ही नतीजा है कि वात्सल्य से वंचित इस जमाने के नौनिहाल छोटी उम्र में ही अपराधी और उजड्ड प्रवृति के दिखाई देने लगे हैं। काश! हम आने वाले संकट की पहचान करते हुए इस देश की माताओं में अपने बच्चों के प्रति ठीक दायित्वबोध जगाने का कोई प्रभावि काम कर सकते तो लोरी जैसी जीवन-निर्माण की विधाएं भी पुनर्जीवित हो उठतीं।

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