अच्छी सोच

भारत मां के अमर सबूत बीर अब्दुल हमीद की जयंती पर नमन

राष्ट्रधर्म सर्वोपरि होता है अपनी शहादत से देशवासियो को यही सन्देश दिया था अमर शहीद वीर अब्दुल हमीद जी ने ।
उनके शहादत दिवस पर सत् सत् नमन है ।
मिट्टी में मिट्टी हो जाता मिट्टी का अनमोल रतन
भले पंखुड़ी धरा में बिखरे खुश्बू उसकी उड़े चमन ।।

**************

1965 के युद्ध में अब्दुल हमीद ने अपनी आरसीएल जीप से पाकिस्तान के अमेरिका से लिए हुए पैटन टैंकों को उड़ाकर दुनिया को हैरत में डाल दिया था। 10 सितंबर ही के दिन सुबह 10:30 बजे शहीद हो गए थे। इन्हें शहादत कैसे मिली बता रहे हैं उस युद्ध में हमीद के साथी और आरसीएल जीप के ड्राइवर रहे मोहम्मद नसीम…

10 सितंबर तक हमीद पाकिस्तान के 7 पैटन टैंक नेस्तनाबूद कर चुके थे। पाकिस्तान से हम असल उत्तर के मैदान में भिड़ रहे थे। वह हमें कुचल कर आगे निकलने की कोशिश में था। दरअसल उसका ईरादा अमृतसर पर कब्जे का था, लेकिन तीन दिन से हम उसे रोके हुए थे और आगे नहीं बढ़ने दे रहे थे। मैं उस आरसीएल जीप का ड्राइवर था। 10 सितंबर की सुबह 7 बजे ही आमने-सामने फायरिंग शुरू हो गई। पर हमें समझ नहीं आ रहा था कि फायर कहां से आ रहा है।

हमीद मुझे बोले कि नसीम, मुझे लग रहा है कि दुश्मन को हमारी पोजिशन का पता चल गया है। तुम तैयार रहना, हमें पोजिशन बदलनी होगी। हम तैयारी में जुट गए। कुछ ही देर बाद हमारी जीप पर टैंक का ट्रेसर राउंड आकर लगा। मैंने हमीद को कहा-जीप से उतर जाओ, दुश्मन को हमारी पोज़िशन का पता चल गया है। वह कभी भी गोला दाग सकता है। इतने मे बाकि साथी जीप से उतर गए, लेकिन हमीद नहीं उतरे वह गन को लोड करने में लग गए। मैंने हमीद को कंधे से खींचा और कहा जिद मत करो उतर जाओ। पर हमीद नहीं माने।

जीप को चीरते हुए निकल गया गोला, साथ ले उड़ा था अब्दुल हमीद का कंधा
मैंने हमीद को धक्का भी दिया और जैसे ही जीप से उतरा टन टैंक का गोला जीप को बाईं तरफ़ से चीरते हुए दाईं तरफ से बाहर निकल गया। तब तक मैं हमीद को पुकारते हुए खेत से गुजरती पानी की नाली में लेट चुका था। मैं सर जमीन से लगा रखा था। कुछ देर बाद जैसे ही मैंने गर्दन उठाकर देखा, हमीद कहीं नजर नहीं आया। गोला हमीद के छाती पर लगा और दाएं कंधे को साथ ले उड़ा था। मैं रेंगते हुए जीप की पिछली तरफ गया तो देखा कि आधा धड़ जमीन पर पड़ा जल रहा था। वहीं पर खून बिखरा हुआ है। कुछ दूर उसका कटा हुआ हाथ पड़ा था और एक टांग दूसरे खेत में पड़ी थी।

खेत में बिखर गए थे शहीद के शरीर के टूकड़े
खेत में आग भी लग गई थी। जैसे-तैसे मैंने हमीद के जल रहे आधे शरीर की आग को कपड़ों से बुझाया। हाथ उठाने गया तो देखा उस पर बंधी घड़ी चल रही है और सुबह के साढ़े दस बजे हैं। मैंने वो घड़ी हाथ से निकाल ली और हमीद से शरीर के टुकड़ों को समेटने में लग गया। इतने में हमारे सीनियर अफसर वहां आए और पूछा हमीद कहां है? मैंने उसके शरीर के टुकड़ों की तरफ इशारा किया और चुप हो गया। ऑफिसर कहने लगे इन्हें जल्दी से ढक दो। उसके बाद मैंने सबको समेटकर वहीं दफ़न करते हुए लड़खड़ाती ज़बान से फ़ातिहा पढ़ दिया और हमीद को हमेशा के लिए अलविदा कह दिया।

हमीद के यहीं निशां बाकी हैं- असल उत्तर निवासी लगाते हैं समाधि पर हर साल मेला
गांव चीमा में अब्दुल हमीद की समाधि बनी हुई है। यही वह जगह है जहां उनके शरीर के टुकड़ों को समेटकर नसीम ने दफ़न किया था। क़ाबिले ज़िक्र है कि अब्दुल हमीद की जीप पर गिरा पैटन टैंक का गोला उनके दाएं कंधे समेत आधे शरीर को ले उड़ा था। असल उत्तर व चीमां गांव के निवासी अब्दुल हमीद की समाधि पर हर साल मेला लगाते हैं। उनका कहना है कि वीर अब्दुल हमीद की वजह से वह जिंदा है। गांवों के लोग खुद के खर्च से ही यह मेला लगाते हैं।

हमार शौहर पीठ दिखाए के नहीं भागे…
वीर अब्दुल हमीद की पत्नी बीबी रसूलन देवी ने कहा – उन्हें फख्र ए अपने पति की शहादत पर, बता रहे हैं उस दिन के बारे में जब उन्हें यह मालूम चला कि उनके पति देश के लिए शहीद हो गए हैं। आज इन्होंने अपने गांव हाजीपुर में बहुत बड़ा कार्यक्रम रखा। हर साल होता है अब्दुल हमीद की याद में 10 सितंबर को
हमने रेडियो पर सुना कि कंपनी क्वार्टर मास्टर हवलदार अब्दुल हमीद शहीद हो गए हैं। सुनकर हम रोने लगे, लगा कि वे अब नहीं लौटेंगे। हमें याद आया उनका जंग पर जाना। उन्हें ख़बर मिली कि जंग छिड़ गई है तो जाने के लिए सामान बांधने लगे। बांधने वाली रस्सी टूटी तो सब बोले-ये तो अपशगुन है, लेकिन वे माने नहीं। घर से निकल पड़े। रास्ते में उनकी साइकिल की चेन टूटी, सब ने फिर उन्हें रोका। लेकिन वे कहां रुकने वाले थे, बस चल दिए कभी न लौटने के लिए। 11 सितंबर के दिन रेडियो पर ख़बर सुनकर भी हमारे ससुर पहलवान मोहम्मद उस्मान ख़लीफ़ा बोले, ‘नहीं, हमार बिटवा अभी जिंदा है। वे तब तक यह मानने को तैयार नहीं थे, जब तक उन्हें पुख्ता सबूत नहीं मिल गए। शामतक घर में लोगों का आना-जाना शुरू हो गया। गांव के लोगों ने ही ससुर को बताया कि रैंक नंबर 2639985 के अब्दुल हमीद शहीद हुए हैं।

यह खबर सुनकर क्या बोले थे उनके पिता
यह सुनकर ससुर जी बोले, रो मत ‘हमार बिटवा पीठ दिखाए के नहीं भागे। ऐसन काम करके शहीद हुए हैं कि दुनिया सैकड़न बरस याद रखे।’ गांव के लोग भी हमें कहने लगे कि हमीद बहुत बड़ा काम कर गए हैं। उस दिन के बाद से हम नहीं रोए क्योंकि हमार शौहर पीठ दिखाए के नहीं भागे थे। वीर अब्दुल हमीद के साथ-साथ हमें भी लोग वीर नारी बुलाने लगे। हमारी शादी 1951 में हुई थी, जब वे शहीद हुए तब हमारे पांच बच्चे थे, 4 बेटे एक बेटी। …और आज 13 पोते और 10 पोतियों की दादी हूं। हर साल हमने अपने गांव गाजीपुर में उनकी शहादत को नमन करते हैं। सेना के लोग भी आते हैं। आज भी हमने गाजीपुर में बहुत बड़ा कार्यक्रम रखा है, देशभर से लोग आ रहे हैं। उन्हें सलामी दी जाएगी। लोग जन्म लेते हैं और बिना कुछ किए ही मर जाते हैं, लेकिन मेरे शौहर ऐसा कुछ कर गए हैं उन्हें हमेशा याद रखा जाएगा।

 

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कम्पनी क्वार्टर मास्टर हवलदार अब्दुल हमीद (जुलाई १, १९३३ – सितम्बर १०, १९६५) भारतीय सेना की ४ ग्रेनेडियर में एक सिपाही थे जिन्होंने 1965 के भारत-पाक युद्ध के दौरान खेमकरण सैक्टर के आसल उत्ताड़ में लड़े गए युद्ध में अद्भुत वीरता का प्रदर्शन करते हुए वीरगति प्राप्त की जिसके लिए उन्हें मरणोपरान्त भारत का सर्वोच्च सेना पुरस्कार परमवीर चक्र मिला। यह पुरस्कार इस युद्ध, जिसमें वे शहीद हुये, के समाप्त होने के एक सप्ताह से भी पहले १६ सितम्बर १९६५ को घोषित हुआ।

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