इतिहास

प्रेम कहानी:आखिर क्या थी जवाहरलाल नेहरू और एडविना माउंटबेटन, पद्मजा औऱ कमला नेहरू के रिश्ते की सच्चाई?जिनके लिए जवाहरलाल नेहरू ने अपना सब कुछ दांव पर लगा दिया था!

13 नवंबर 1962 को अमेरिका के भारत स्थित राजदूत जॉन कैनेथ गालब्रेथ ने अमेरिकी राष्ट्रपति जॉन एफ कैनेडी को एक पत्र लिखा. भारत और चीन के बीच युद्ध के बादल मंडरा रहे थे. पत्र में गालब्रेथ ने ये लाइन भी लिखी, यहां नेहरू को छोड़कर कोई एेसा नेता नहीं है, जो बहुत लोकप्रिय हो. लेकिन उनके लचीले चरित्र और नेतृत्व को लेकर ढेर सारी बातें प्रचारित हैंं.ये वो दौर था जब प्रधानमंत्री हाउस की कहानियां राजनयिक सर्कल में काफी रस लेकर सुनाई जाती थीं. जवाहर लाल नेहरू की तमाम प्रेम कथाएं चर्चा का विषय थीं. उनके जीवन में एक नहीं कई महिलाएं थीं. नेहरू को लेकर महिलाओं में गजब का क्रेज भी था. वो उनकी ओर खींची चली आती थीं.ऐसी ही एक कहानी मुझे 50 के दशक तक देश के शीर्ष उद्योगपति रहे रामकृष्ण डालमिया की बेटी नीलिमा डालमिया अधर ने सुनाई. उन्होंने बताया कि उनकी मां दिनेश नंदिनी राजस्थान की उभरती हुई कवियित्री थीं. तब तक उनकी डालमिया से शादी नहीं हुई थी. वह नेहरू के प्यार में पागल थीं. हालांकि ये एकतरफा प्यार था.उन्हें पता चला कि नेहरू वर्धा में गांधी आश्रम आए हुए हैं. वह उनसे मिलने अकेली ही नागपुर से वर्धा पहुंच गईं. उन्होंने सीधे-सीधे नेहरू से प्यार का इजहार कर डाला. वह अपना घर तक छोड़ने को तैयार थीं. उन्होंने नेहरू से अनुरोध किया कि वह उनके साथ रहकर काम करना चाहती हैं. नेहरू तैयार नहीं हुए. ये लिखने का तात्पर्य केवल इतना है कि बताया जा सके कि उस समय शिक्षित और अभिजात्य महिलाओं में नेहरू का किस कदर क्रेज था. यही कारण भी है कि उनके जीवन में कई प्रेम कथाएं हैं, कई नायिकाएं, जो उन पर अधिकार जताती रहीं. उनके करीब रहीं.मृदुला साराभाई से निकटता मृदुला गुजरात के प्रसिद्ध उद्योगपति और धनाढ्य साराभाई परिवार की बेटी थीं. वह कांग्रेस की समर्पित कार्यकर्ता थीं. नेहरू के बहुत करीब थीं. हालांकि 1946 तक नेहरू उनमें दिलचस्पी खो चुके थे. एम ओ मथाई ने अपनी किताब रिमिनिसेंस ऑफ द नेहरू एज में उन्हें अजीबोगरीब महिला बताया. बाद में वह कश्मीर में शेख अब्दुल्ला के साथ काम करने लगीं. उन्हें कथित देशविरोधी गतिविधियों के लिए गिरफ्तार करके जेल में भी डाला गया.

 

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पद्मजा नायडू से रिश्ते : पद्मजा देश की स्वर कोकिला कही जाने वाली सरोजिनी नायडू की बड़ी बेटी थीं. वह पहले हैदराबाद के नवाब सालार जंग के प्यार में दीवानी हुईं. फिर नेहरू के करीब आ गईं. मथाई लिखते हैं, 1946 जब मैं उनसे इलाहाबाद में मिला, तब वह नेहरू के घर को संभालने में लगी हुईं थीं. फिर दिल्ली में उन्होंने यही किया. वह हमेशा नेहरू के बगल के कमरे में रहने पर जोर देती थीं. नवंबर के पहले हफ्ते में वह हमेशा हैदराबाद से नेहरू के आवास पर आ जाती थीं. ताकि नेहरू (14नवंबर), इंदिरा (19 नवंबर) और अपना (17 नवंबर) बर्थ-डे साथ मना सकें. इंदिरा को उनका आना अच्छा नहीं लगता था. न ही उनका वहां लंबा ठहरना. ये वो समय भी था, जब नेहरू की करीबी लेडी माउंटबेटन से भी बनी हुई थी.खबरें थीं कि नेहरू शादी के लिए प्रोपोज करेंगे .

 
1947 के जाड़ों में नेहरू को लखनऊ जाना था. सरोजिनी नायडू उत्तर प्रदेश की राज्यपाल थीं. खबरें फैलने लगीं कि नेहरूजी पद्मजा को शादी के लिए प्रोपोज करेंगे. नेहरू लखनऊ आए लेकिन लेडी माउंटबेटन के साथ. ये बात वहां पहले से मौजूद पद्मजा को खराब लगी. एक साल बाद जब उन्होंने नेहरू के बेडरूम में एडविना के दो फोटोग्राफ देखे तो खासी नाराज और आहत हुईं कि वहां उनकी कोई फोटो क्यों नहीं है. उन्होंने तुरंत वहां अपनी एक छोटी सी फोटो लगा दी.वह नेहरू से शादी करना चाहती थीं
1948 में पद्मजा जब हैदराबाद से सांसद चुनी गईं तो दिल्ली में प्रधानमंत्री हाउस में ठहरीं, वो भी नेहरू के बगल के कमरे में. बाद में उन्हें किसी तरह से वहां से भेजा गया. मथाई का मानना था कि वह नेहरू से शादी करना चाहती थीं लेकिन जब उन्हें लगा कि नेहरू के जीवन में केवल वही नहीं बल्कि कई स्त्रियां हैं. तो वह काफी उदास भी हुईं. हालांकि बाद में पद्मजा को पश्चिम बंगाल का राज्यपाल बनाया गया. उन्होंने इस पद पर खुद को बेहतर भी साबित किया. हालांकि कहा जाता है कि अगर इंदिरा बीच में नहीं होतीं तो नेहरू उनसे शादी कर सकते थे. यह बात खुद नेहरू की बहन विजयलक्ष्मी पंडित ने इंदिरा की करीबी दोस्त पुपुल जयकर को बताई थी. नेहरू की बहन विजय लक्ष्मी पंडित ने पुपुल जयकर को बताया था कि नेहरू अपनी बेटी इंदिरा को दुखी नहीं करना चाहते थे इसलिए उन्होंने पद्मजा से शादी नहीं की.

 

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क्यों नहीं की शादी : पुपुल ने अपनी किताब में लिखा, आधी सदी बाद मैंने विजयलक्ष्मी पंडित से नेहरू और पद्मजा के संबंधों के बारे में पूछा. उनका जवाब था, ‘तुम्हें क्या पता नहीं पुपुल कि वे वर्षों तक साथ रहे?’ यह पूछने पर कि उन्होंने पद्मजा से शादी क्यों नहीं की, उन्होंने जवाब दिया, ‘उन्हें लगा कि इंदु पहले ही बहुत सदमा झेल चुकी है, वे उसे और चोट नहीं पहुंचाना चाहते थे.’जब पद्मजा को गुस्सा आया
नेहरू के महिलाओं के प्रति अनुराग को लेकर भी काफी कुछ लिखा और कहा गया. प्रधानमंत्री हाउस के चीफ सेक्यूरिटी अफसर रूस्तम जी ने अपनी किताब में लिखा कि नेहरू को महिलाओं का साथ यकीनन भाता था. लेकिन आमतौर पर वो महिलाएं प्रखर औऱ मेघा वाली थीं. ‘इंडियन समरः द सीक्रेट हिस्ट्री ऑन एंड ऑफ एन एम्पायर’ के लेखक अलेक्स वॉन टेजमन ने कुछ समय पहले एक इंटरव्यू में कहा, एक बार पद्मजा ने गुस्से में एडविना की तस्वीर फेंक दी.ये श्रृद्धा माता कौन थीं
ये 1948 की बात है. एक युवा संन्यासिन बनारस से नई दिल्ली आई. उसका नाम श्रृद्धा माता था. वह संस्कृत में विद्वान थीं. कई सांसद उनके शिष्य़ थे. वह आकर्षक काया वाली सुंदर महिला थीं. पहले तो नेहरू ने उनसे मिलने से इन्कार कर दिया. फिर जब उनकी नेहरू से पहली मुलाकात हुई तो ये लंबी चली. फिर तो मुलाकातें लगातार ही होने लगीं. कहा जाता है कि उनका नेहरू पर प्रभाव भी दिखने लगा. वह सीधे प्रधानमंत्री हाउस में आती थीं. अक्सर रात में तब आती थीं जब नेहरू अपना काम खत्म कर चुके होते थे. बाद में वह गायब हो गईं. इसके कुछ दिनों बाद फिर बेंगलुरु से प्रधानमंत्री हाउस में उनके पत्रों का एक बंडल भेजा गया, जो नेहरू ने उन्हें लिखे थे. साथ में एक डॉक्टर का पत्र आया कि ये पत्र उन्हें उस महिला से मिले हैं, जो यहां चर्च अस्पताल में एक बच्चे को जन्म देने आई थी.नेहरू से थे रोमांटिक रिश्ते
बाद में कुछ समय गायब रहने के बाद उत्तर भारत लौटीं. उन्होंने जयपुर में अपना स्थायी ठिकाना बना लिया. वहां सवाई मानसिंह ने उन्हें रहने के लिए आलीशान किला दिया. बाद में जब इंडिया टुडे की एक रिपोर्टर ने उनसे मुलाकात करने में सफलता हासिल की. तब उन्होंने संकेतों में जाहिर किया कि उनके और नेहरू के बीच प्रगाढ़ रोमांटिक रिश्ते थे. बाद में कुछ लोगों ने साजिश रचकर उनके और नेहरू के बीच दूरियां बनाने की कोशिश की. हालांकि उनके जयपुर में रहने के दौरान नेहरू एक बार उनसे मिलने गए. श्रृद्धा माता का जिक्र बाद में खुशवंत सिंह ने भी अपनी किताब में किया. वह उनसे जब मिले तो श्रृद्धा माता ने उनसे नेहरू के करीबी का दावा किया.

 

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कैसे थे एडविना माउंटबेटन से रिश्ते
पंडित जवाहर लाल नेहरू के बारे में कई तरह की बातें कहीं जाती हैं। उनमें सबसे ज्यादा जिस पर चर्चा होती है वह नाम हैं हिंदुस्तान के अंतिम वाइसराय माउंटबेटन की पत्नी एडविना के बारे में। इसमें कोई शक नहीं कि नेहरू और लेडी एडविना माउंटबेटन के बीच काफी आत्मीय रिश्ते थे। 1947 के बाद वाले हिंदुस्तान के मुकद्दर का सबसे बड़ा फैसला हुकूमते बरतानिया की लेबर पार्टी लंदन में ले चुकी थी. लॉर्ड माउंटबेटन (डिकी) साइरिल रेडक्लिफ़ द्वारा हिंदुस्तान के नक़्शे पर बनाई हुई लकीरों की तफ़्तीश कर रहे थे. पंजाब और पूर्वी बंगाल दंगों की आग में झुलस रहा था. गांधी अकेले ही दंगों को संभाल रहे थे. सरदार पटेल सारे राजा-महाराजाओं को हांककर हिंदुस्तान में रखने का भागीरथी कार्य कर रहे थे. और इस सबके के बीच दो बेहद दिलचस्प और समझदार लोग अपने-अपने दिल में मुहब्बत की आग लिये एक-दूसरे के क़रीब आ रहे थे. उनमें से एक आज़ाद हिंदुस्तान का पहला प्रधानमंत्री बनने वाला था और दूसरा इस नए मुल्क के पहले गवर्नर जनरल की पत्नी.कहते हैं कि मोहब्बत वो आतिश है जो लगाए न लगे और बुझाये न बुझे. कब हो जाए, किससे हो जाए, कहां हो जाए और क्यों हो जाए, कोई नहीं जानता. जब यह आग लगी तब जवाहरलाल नेहरू की उम्र 58 थी और एडविना 47 की होने जा रही थीं. लेकिन मोहब्बत तो किसी भी उम्र की हो, बेपनाह ही होती है. हां, इन रिश्तों को कहां तक आगे ले जाकर देखा जाए, उसे लेकर जरूर भ्रम हैं. नेहरू और एडविना के बीच जो एक आत्मीयता पनपी, वो तब तक कायम रही, जब तक एडविना जिंदा रहीं. केएफ रूस्तमजी की डायरी के संपादित अंश किताब के रूप में प्रकाशित हुए. उसमें उन्होंने भी एडविना और नेहरू के प्यार पर चर्चा करते हुए लिखा, दोनों अभिजात्य थे. दोनों की रुचियां परिष्कृत थीं. दोनों एक दूसरे को काफी पसंद करते थे.उस अध्याय को क्यों रोका गया नेहरू कम उम्र में ही विधुर हो गए थे और फिर कमला कौल से उनका वैवाहिक जीवन भी सफल नहीं रहा था. यह बात ख़ुद नेहरू ने भी स्वीकार की है. कमला एक सीधी-सादी कश्मीरी लड़की थीं और नेहरू ने अपने सात साल के लंदन प्रवास में एक ख़्वाब जैसी जिंदगी जी थी – अच्छी पढ़ाई, शानदार सोहबतें, बेहतरीन शामें, हसीन रातें, खुली, उन्मुक्त और आज़ाद जिंदगी. एडविना और डिकी के बीच में भी सिर्फ एक ‘दोस्ती’ का रिश्ता रह गया था. इंग्लैंड में एडविना के कुछ रिश्ते पहले ही सुर्खियां बटोर चुके थे. जब डिकी हिंदुस्तान के वायसराय बनकर आये तब एडविना उनके साथ आना ही नहीं चाहती थीं. पर तक़दीर को कुछ और ही मंज़ूर था. पंडित नेहरू की शख्सियत को डिकी और एडविना दोनों ही पसंद करते थे और शायद इसका फायदा आज के हिंदुस्तान को विभाजन के वक्त भी मिला. जब बात कश्मीर पर आकर रुकी, तब एडविना ने एक अहम किरदार निभाया. मॉर्गन जेनेट ने अपनी किताब ‘एडविना माउंटबेटन: अ लाइफ ऑफ़ हर ओन’ में लिखा है कि वे नेहरू को समझाने मशोबरा – एक हिल स्टेशन – ले गईं. इस वाकये को एडविना ने अपनी चिट्ठी में क़ुबूल किया है, ‘तुम्हें (जवाहर ) मशोबरा ले जाकर तुमसे बात करना मेरा जूनून बन गया है…’वे पहले भी वहां जा चुके थे. दोनों के बीच में यह रिश्ता मई 1948 के पहले ही शुरू हो चुका था पर गहराया उसके बाद ही. मशोबरा की सैर में डिकी और बेटी पामेला भी उनके साथ थे. लॉर्ड माउंटबेटन, नेहरू और एडविना की बढ़ती दोस्ती को बहुत करीब से देख रहे थे. वे ऐसा क्यों कर रहे थे यह समझना आसान भी है और मुश्किल भी. जब मथाई ने रिमिनिसेंस ऑफ नेहरू लिखी तो उसमें उन्होंने एक अध्याय खासतौर पर नेहरू के जीवन में आई महिलाओं पर था. बाद ये अध्याय उन्होंने खुद ही प्रकाशित होने से रोक दिया. इस अध्याय की जगह प्रकाशक ने एक टिप्पणी लिखी कि चूंकि ये अध्याय लेखक का नितांत व्यक्तिगत अनुभव था और इसे उन्होंने बिना किसी निरोध के डीएच लारेंस शैली में लिखा था, जिसे लेखक ने खुद ही आखिरी समय में प्रकाशन से रोक लिया. नेहरू और एडविना का रिश्ता माउंटबेटन की जिंदगी के सबसे बड़े काम यानी विभाजन को आसान बना रहा था. वे यह भी समझते थे कि नेहरू के लिए एडविना उन्हें छोड़ नहीं सकतीं. इसलिए कहीं न कहीं वे इसे बढ़ावा भी दे रहे थे. ब्रिटिश इतिहासकार फिलिप जिएग्लर ने माउंटबेटन की जीवनी में एक चिट्ठी का जिक्र किया है जो डिकी ने अपनी बेटी पेट्रिशिया को लिखी थी. इसमें उन्होंने लिखा था – ‘तुम किसी से इसका ज़िक्र न करना पर यह हक़ीक़त है कि एडविना और जवाहर एक साथ बड़े अच्छे दिखते हैं और दोनों एक-दूसरे पर अपना स्नेह भी व्यक्त करते हैं. मैं और पामेला (उनकी दूसरी बेटी) वह सब कुछ कर रहे हैं जो उनकी मदद कर सकता है. मम्मी इन दिनों काफ़ी खुश रहती हैं…’ माउंटबेटन हर हाल में एडविना को खुश देखना चाहते थे. कई बार एडविना ने उनसे तलाक लेने की धमकी भी दी थी पर हर बार वे कुछ ऐसा कर जाते थे कि रिश्ता बना रह जाता. एडविना से उनका रिश्ता उनकी तरक़्क़ी का रास्ता भी था. नेहरू और एडविना के रिश्ते को हम उनकी लिखी हुए चिट्ठियों से भी समझ सकते हैं. एलेक्स वॉन तुन्जलेमन ने विस्तार से अपनी किताब ‘इंडियन समर’ में उन चिट्ठियों का ज़िक्र किया है. शुरुआत में दोनों के बीच ख़तों का रोज़ आदान-प्रदान हुआ. फिर हर हफ़्ते. बाद में यह सिलसिला महीने में एक बार पर आकर थम गया. जवाहरलाल जहां भी कहीं जाते, एडविना के लिए तोहफ़े ख़रीदते. उन्होंने इजिप्ट से लायी गयी सिगरेट, सिक्किम से फ़र्न – एक तरह का पौधा, और एक बार उड़ीसा के सूर्य मंदिर में उकेरी हुई कामोत्तेजक तस्वीरों की किताब एडविना माउंटबेटन को भेजी और लिखा, ‘इस किताब को पढ़कर और देखकर एक बार तो मेरी सांसे ही रुक गयीं. इसे मुझे तुम्हें भेजते हुए किसी भी तरह की शर्म महसूस नहीं हुई और न ही मैं तुमसे कुछ छुपाना चाह रहा था.’ एडविना इसके जवाब में लिखती हैं कि उन्हें ये मूर्तिया रिझा रही हैं. ‘मैं संभोग को सिर्फ ‘संभोग’ की तरह से ही नहीं देखती यह कुछ और भी है, यह आत्मा की खूबसूरती जैसा है…’ क्या वे ‘प्लेटोनिक लव’ की तरफ इशारा कर रही थीं या कुछ और! एडविना जाने के बाद कई बार हिंदुस्तान आयी और जब भी नेहरू इंग्लैंड गए, माउंटबेटन परिवार से मिले. वे वहां ज्यादातर वक़्त एडविना की सोहबत में गुज़ारते और डिकी हर बार ऐसे हालात भी पैदा कर देते थे माउंटबेटन के हिंदुस्तान से विदा होने से एक दिन पहले भारत सरकार ने उनके सम्मान में डिनर दिया था. खाने के बाद जवाहर लाल नेहरू ने एडविना के सम्मान में एक भाषण दिया जो उनकी मोहब्बत को साफ़-साफ़ इज़हार कर देता है. उसके कुछ अंश इस तरह से हैं: ..ईश्वर या किसी परी ने तुम्हें यह ख़बूसूरती, यह बुद्धिमत्ता, यह सौम्यता, यह आकर्षण और ऊर्जा दी है. और यही नहीं, तुम्हें इससे भी ज़्यादा मिला है और वह है – एक कमाल का इंसानी ज़ज़्बा और लोगों की सेवा का भाव. इन सब ख़ूबियों के मिले-जुले असर ने तुम्हें एक शानदार महिला बनाया है…’ इस भाषण को सुनने के बाद एडविना रो पड़ीं और जवाहर तो, जैसे कोई अपने महबूब के बिछड़ने पर रोता है, फूट-फूटकर रो दिए. कमाल है…! सदके इस भाव के, इस समर्पण के और इस ज़ज़्बात के! और फिर वह 21 जून 1948 का दिन… नेहरू के जीवन की ढलती हुई शाम का शायद सबसे उदास दिन. जो इसके बारे में मौजूद है उसके आधार पर दावे से कहा जा सकता है कि उगता हुआ सुर्ख़ सूरज भी उस दिन उनको ज़र्द लगा होगा. छह घोड़ों की बग्गी में सवार डिकी और एडविना किसी महाराजा और महारानी की तरह लग रहे थे. पर शायद किसी घोड़े को जवाहर की हालत का अंदाज़ा हो गया होगा और उसने आगे हिलने से मना कर दिया. उनकी विदाई को देखने आये लोगों में से किसी ने चीख कर कहा, ‘ये घोड़े भी नहीं चाहते कि आप लोग यहां से जाएं.’ नेहरू का दिल भी यक़ीनन ऐसा ही कह रहा होगा. पर ऐसा हुआ नहीं. उगते हुए सूरज के साथ, डिकी और एडविना हिंदुस्तान से रवाना हो गए और नेहरू ठगे से रह गए होंगे! एडविना जाने के बाद कई बार हिंदुस्तान आईं और जब भी नेहरू इंग्लैंड गए, माउंटबेटन परिवार से मिले. वे वहां ज्यादातर वक़्त एडविना की सोहबत में गुज़ारते और डिकी हर बार ऐसे हालात भी पैदा कर देते थे. एक बार वे नेहरू के साथ नैनीताल गईं. एक शाम जब उत्तर प्रदेश के गवर्नर का बेटा उन्हें शाम के भोजन पर आमंत्रित करने आया, तो उसने दोनों को आलिंगन में बंधे हुए देखा. उस आलिंगन के गवाह थे टाटा स्टील के होने वाले चेयरमैन रूसी मोदी. उनके पिता होमी मोदी उस समय उत्तर प्रदेश के गवर्नर थे. इधर हिंदुस्तान के राजनैतिक गलियारों में यह मशहूर हो चुका था कि ‘अगर राम के दिल में झांक कर देखें तो सीता मिलेंगी और नेहरू के दिल में अगर झांका तो एडविना…’ इस रिश्ते की वजह से कई बार दोनों के जीवन में उथल-पुथल भी रही और नेहरू का तो राजनैतिक जीवन ही दांव पर लग गया था. तब एडविना ने बुद्धिमत्ता का परिचय देते हुए नेहरू को कर्तव्य को प्राथमिकता देने की सलाह दी और अंततः कह दिया कि वे दोनों साथ नहीं रह सकते. ‘तुम कितनी समझदार हो’ नेहरू ने जवाब में लिखा, ‘पर ये विवेक मुझे बिलकुल भी संतुष्टि नहीं देता और जब कभी मैं वह मंज़र याद करता हूं जब मैंने तुम्हारा हाथ चूमकर तुम्हें अलविदा कहा था तो उसको याद करके मेरे दिल में हताशा उभर जाती है अंतिम समय में दुनिया की सबसे अमीर महिलाओं में से एक के पास अगर कुछ था तो बस नेहरू के लिखे हुए ख़त जो उनके दिल के सबसे क़रीब थे और जो उनकी सबसे बड़ी दौलत थी. एक बार एडविना बहुत बीमार पड़ीं और अपने ऑपरेशन से पहले उन्होंने डिकी को वे सारे ख़त दे दिए जो नेहरू ने उन्हें लिखे थे. उन्होंने कहा कि अगर वे नहीं बचीं तो उन ख़तों से वे वह सब जान सकते हैं जो कभी उनके और नेहरू के बीच रहा. डिकी ने वादाख़िलाफ़ी की और ख़त पहले ही पढ़ लिए. उस ऑपरेशन रूम से एडविना सही-सलामत बाहर आ गईं और उन ख़तों को पढ़ने के बाद भी डिकी उऩके साथ उतने ही सौम्य और समझदार बने रहे जैसे वे हमेशा थे. लेकिन एडविना इसके बाद ज़्यादा समय ज़िंदा नहीं रहीं. 21 फ़रवरी 1960 की सुबह साढ़े सात बजे उन्होंने आख़िरी सांस ली. उन्हें दिल का दौरा पड़ा था.

 

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अंतिम समय में दुनिया की सबसे अमीर महिलाओं में से एक के पास अगर कुछ था तो बस नेहरू के लिखे हुए ख़त जो उनके दिल के सबसे क़रीब थे और जो उनकी सबसे बड़ी दौलत थी. एडविना की अंतिम इच्छा का ध्यान रखते हुए उन्हें समुद्र में दफ़नाया गया था. इस काम को अंजाम दिया इंग्लैंड के जहाज़ ‘एचएमएस वेकफुल’ ने और अपने प्यार को अंतिम सलामी देने के लिए नेहरू ने गेंदे के फूलों के एक पुष्पचक्र के साथ हिंदुस्तानी जहाज़ ‘त्रिशूल’ वहां भेजा था. दोनों ने बेहद गरिमामय तरीक़े से अपने रिश्ते को निभाया और उसी गरिमामय ढंग से माउंटबेटन ने अपना फ़र्ज़ निभाया. कहते हैं कि मोहम्मद अली जिन्ना को किसी ने सलाह दी थी कि वे उन दोनों के रिश्ते को विभाजन में अपने फायदे के लिए इस्तेमाल करें. जिन्ना ने यह कहते हुए ऐसा करने से मना कर दिया कि यह रिश्ता एक निजी मामला है और वे इसका राजनैतिक इस्तेमाल नहीं करेंगे. तब की बात कुछ और ही थी. अब न ऐसे लोग हैं और न ऐसी राजनीति. एडविना 1936 में बग़दाद गयी थीं. एक शाम जब वे यूं ही घूम रही थीं तो एक भविष्य बताने वाले आदमी ने उन्हें जल्द किसी देश की महारानी बनने की बात कही. उन्हें तरह-तरह के जानवर पालने का शौक था. वे बग़दाद से एक गिरगिट ले आयी थीं जिसे उन्होंने ‘गांधी’ नाम दिया था. 11 साल बाद यह भविष्यवाणी सही हुई. 20 फ़रवरी 1947 को माउंटबेटन हिंदुस्तान के आख़िरी वाइसराय बने और बाद में भारत के पहले गवर्नर जनरल और वे महारानी!माउंटबेटन को फिल्मों का शौक था. सन 1942 में उन्होंने इंग्लैंड की सरकार की मदद से एक फिल्म बनवाई जिसका नाम था ‘इन व्हिच वी सर्व.’ यह माउंटबेटन के नेतृत्व में युद्धपोत ‘एचएम्एस केली’ के ‘क्रेते की लड़ाई’ में डूबने पर आधारित थी. नेऑल कोवार्ड द्वारा निर्देशित पिक्चर में नाविक की भूमिका एक नए कलाकार ने निभायी थी. उसके ठीक 40 साल बाद 1982 में उस ‘नए कलाकार’ ने तत्कालीन भारतीय प्रधानमंत्री के निवेदन पर और सूचना मंत्रालय के सहयोग से गांधी के जीवन पर अब तक की सबसे महान फिल्म निर्देशित की. जी हां, उस नए कलाकार का नाम था – सर रिचर्ड एटनबरो. अजीब इत्तेफ़ाक यह भी है कि नेहरू का जन्मदिन 14 नवंबर को है और एडविना का 28 नवंबर को. दोनों की मृत्यु दिल का दौरा पड़ने से हुई. गांधी की एक सरफ़िरे ने गोली मारकर हत्या कर दी थी और माउंटबेटन को आयरलैंड की आतंकवादी पार्टी आईआरए ने उनकी नाव को बम से उड़ाकर मार दिया था.

 

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कमला नेहरू के जवाहरलाल नेहरू के साथ रिश्ते !

कमला कौल नेहरू भारत के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू की पत्नी और पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी की मां थीं। स्वाधीनता आन्दोलन के दौरान उन्होंने नेहरु जी का साथ बखूबी निभाया और कई मौकों पर आन्दोलन में भाग भी लिया। कमला नेहरू को सौम्यता और विनम्रता की प्रतिमूर्ति के रूप में याद किया जाता है। कमला दिल्ली के एक परंपरागत परिवार में पैदा और बड़ी हुई थीं पर उन्होंने नेहरु परिवार में अपनी जिम्मेदारियों को बखूबी निभाया। कमला कौल जब मात्र सत्रह साल की थीं तब उनका विवाह जवाहरलाल नेहरू से हो गया। दिल्ली के परंपरावादी हिंदू ब्राह्मण परिवार से सम्बंध रखने वाली कमला के लिए पश्चिमी परिवेश वाले नेहरू ख़ानदान में एकदम विपरीत माहौल मिला जिसमें वह खुद को अलग-थलग महसूस करती रहीं। विवाह पश्चात नेहरु दंपत्ति की पहली संतान – इंदिरा – ने 17 नवम्बर 1917 को जन्म लिया। कमला ने नवम्बर 1924 में एक पुत्र को भी जन्म दिया परन्तु वो कुछ दिन ही जीवित रहा। विवाह पश्चात कमला नेहरु को स्वाधीनता संग्राम को समझने और नजदीकी से देखने का मौका मिला क्योंकि उनके पति जवाहरलाल और ससुर मोतीलाल दोनों ही आन्दोलन में सक्रीय थे। जब तक वो जीवित रहीं अपने पति जवाहरलाल नेहरू का कंधे से कंधा मिलाकर साथ दिया।सन 1921 के असहयोग आंदोलन के साथ वो स्वाधीनता आन्दोलन में कूदीं। इस आन्दोलन के दौरान उन्होंने इलाहाबाद में महिलाओं का एक समूह गठित किया और विदेशी वस्त्र तथा शराब की बिक्री करने वाली दुकानों का घेराव किया। उनके अन्दर गज़ब का आत्मविश्वास और नेतृत्व क्षमता थी जिसका परिचय उन्होंने आजादी की लड़ाई के दौरान कई बार दिया। एक बार जब जवाहरलाल नेहरु को सरकार विरोधी भाषण देने के आरोप में गिरफ़्तार किया गया तो कमला नेहरु ने आगे बढ़कर उस भाषण को पूरा किया। स्वाधीनता आन्दोलन के दौरान अंग्रेजी सरकार ने उनकी गतिविधियों के लिए उन्हें दो बार गिरफ्तार भी किया। जब गाँधी जी ने 1930 के नमक सत्याग्रह के दौरान दांडी यात्रा की तब कमला नेहरु ने भी इस सत्याग्रह में भाग लिया। कमला एक निडर और निष्कपट महिला थीं। वे जवाहरलाल नेहरू के राजनीतिक लक्ष्यों को समझती थीं और उसमें यथाशक्ति मदद भी करती थीं। सन् 1930 में जब कांग्रेस के सभी शीर्ष नेता जेलों में बंद थे तब उन्होंने राजनीति में जमकर रुचि दिखाई। समूचे देश की महिलाएं सड़कों पर उतर पड़ीं थीं और कमला भी इनमें से एक थीं। कमला दिखने में सामान्य थीं, लेकिन कर्मठता के मामले में उनका व्यक्तित्व असाधारण था। आजादी की लड़ाई के दौरान कमला नेहरु बहुत समय तक महात्मा गाँधी के आश्रम में भी रहीं। यहाँ वो गाँधी जी की धर्मपत्नी कस्तूरबा गाँधी के संपर्क में आयीं। इसी दौरान उनकी मित्रता जय प्रकाश नारायण की पत्नी प्रभावती देवी से भी हो गयी थी। जे.पी. उच्च शिक्षा के लिए अमेरिका चले गए थे उस दौरान प्रभावती गाँधी आश्रम में ही रहीं।कमला नेहरू का जन्म 1 अगस्त 1899 को दिल्ली के एक व्यापारी पंडित जवाहरलालमल और राजपति कौल के घर हुआ जो एक परंपरागत कश्मीरी ब्राह्मण परिवार था। कमला के दो छोटे भाई और एक छोटी बहन थी – चंदबहादुर कौल, कैलाशनाथ कौल और स्वरूप काट्जू। एक परंपरावादी हिंदू ब्राह्मण परिवार पली-बढ़ी होने के कारण हिंदू संस्कार कमला के चरित्र का एक प्रमुख हिस्सा थे। कमला बेहद शांत और शर्मीली प्रवित्ति की लड़की थीं। उनकी शिक्षा मूलतः घर पर ही हुई। शादी से पहले उन्हें अंग्रेजी भाषा का बिलकुल भी ज्ञान नहीं था।
लेकिन क्या आप को यह पता है जवाहरलाल नेहरु ने अपनी पत्नी के साथ क्या किया ?

 

जवाहरलाल नेहरु की पत्नी कमला नेहरु को टीबी रोग हो गया था .. उस जमाने में टीबी की दहशत ठीक ऐसा ही थी जैसे आज एड्स की है .. क्योंकि तब टीबी का इलाज नहीं था और इन्सान तिल-तिल… तड़प- तड़प कर पूरी तरह गलकर हड्डी का ढाँचा बनकर मरता था … और कोई भी टीबी मरीज के पास भी नहीं जाता था क्योंकि टीबी साँस से फैलती थी … लोग मरीजों को पहाड़ी इलाके में बने टीबी सेनिटोरियम में भर्ती कर देते थे नेहरु ने अपनी पत्नी को युगोस्लाविया [आज चेक रिपब्लिक] के प्राग शहर में दूसरे इन्सान के साथ सेनिटोरियम में भर्ती कर दिया कमला नेहरु पूरे दस सालों तक अकेले टीबी सेनिटोरियम में पल पल मौत का इंतजार करती रही.. लेकिन नेहरु दिल्ली में एडविना बेंटन के साथ इश्क करते रहे…सबसे शर्मनाक बात तो ये है कि इस दौरान नेहरु कई बार ब्रिटेन गये लेकिन एक बार भी उन्होंने प्राग जाकर अपनी धर्मपत्नी का हालचाल नहीं लिया नेताजी सुभाषचन्द्र बोस को जब पता चला तब वो प्राग गये .. और डाक्टरों से और अच्छे इलाज के बारे में बातचीत की .. प्राग के डाक्टरों ने बोला कि स्विट्जरलैंड के बुसान शहर में एक आधुनिक टीबी हास्पिटल है जहाँ इनका अच्छा इलाज हो सकता है तुरंत ही नेताजी सुभाषचंद्र बोस ने उस जमाने में 70 हजार रूपये इकट्ठे किये और उन्हें विमान से स्विटजरलैंड के बुसान शहर में हास्पिटल में भर्ती किया लेकिन कमला नेहरु असल में मन से बेहद टूट चुकी थीं.. उन्हें इस बात का दुःख था कि उनका पति उनके पास पिछले दस सालों से एक बार भी हालचाल लेने तक नहीं आया और गैर लोग उनकी देखभाल कर रहे हैं..दो महीनों तक बुसान में भर्ती रहने के बाद 28 February 1936 को बुसान में ही कमला नेहरु की मौत हो गयी उनके मौत के दस दिन पहले ही नेताजी सुभाषचन्द्र ने नेहरु को तार भेजकर तुरंत बुसान आने को कहा था .. लेकिन नेहरु नहीं आये..फिर नेहरु को उनकी पत्नी की मौत की खबर भेजी गयी .. फिर भी नेहरु अपनी पत्नी के अंतिम संस्कार में भी नहीं आयेअंत में स्विटजरलैंड के बुसान शहर में ही नेताजी सुभाषचंद्र बोस ने नेहरु की पत्नी कमला नेहरु का अंतिम संस्कार करवाया. जिस व्यक्ति ने अपनी पत्नी के साथ ऐसा व्यवहार किया उसे हम चाचा नेहरू कहते हैं।

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