अच्छी सोच

भाई के प्रति अपार प्रेम, समर्पण, सेवा भावना का प्रतीक है भरत का चरित्र

रामायण में वैसे तो कई ऐसे प्रसंग हैं, जो बड़े ही मार्मिक हैं और आपकी आंखों से अश्रुधारा बहा सकते थे, जैसे -: माता सीता का अपहरण, उनकी अग्नि परीक्षा, लव कुश का बाल पण, आदि। इन प्रसंगों की ही तरह एक बहुत ही चर्चित प्रसंग रहा हैं -राम भरत मिलाप का। यह प्रसंग इतना चर्चित है कि आज भी कोई बहुत समय बाद बड़ी ही प्रेम भावना से मिलता है तो लोग इसे राम भरत मिलाप की ही उपमा देते हैं। महाकवि तुलसीदास ने जिस विस्तार से भरत की कथा का वर्णन किया है। उतना विस्तार भगवान राम के अलावा किसी और को नहीं दिया।

 

 

जब महाराज दशरथ अपने सबसे बड़े पुत्र राम को राजा बनाने का निर्णय लेते हैं। इस निर्णय से सभी प्रसन्न होते हैं।

 
परन्तु महारानी कैकयी की दासी मंथरा इस संबंध में कैकेयी के मन में विष घोलती हैं और राम को राजा न बनने देने के लिए कैकेयी को उकसाती हैं। वैसे तो महारानी कैकेयी राम से बहुत प्रेम करती थीं, परन्तु वे उस समय मंथरा की बातों में आ जाती हैं और इसी कारण उन्होंने महाराज दशरथ को विवश कर दिया कि वे भगवान राम को 14 वर्षों का वनवास दें और भरत को राज्य दें।

 

 

जब ये सब घटनाएं हो रही थीं, तब राजकुमार भरत और राजकुमार शत्रुघ्न अपने नानाजी के घर गये हुए थे। उन्हें इन सब घटनाओं के बारे में कोई जानकारी नहीं थी। अपने पुत्र राम के वियोग में महाराज दशरथ की मृत्यु हो गई और ये दुखद समाचार सुनकर जब राजकुमार भरत और राजकुमार शत्रुघ्न वापस आए, तो उन्हें अपने बड़े भाई भगवान राम के साथ घटित हुई इस घटना के बारे में पता चला।

 

 

राज्य को कुशलता पूर्वक चलाने की जिम्मेदारी भी अब राजकुमार भरत पर आ चुकी थी और इस जिम्मेदारी को वे कतई नहीं निभाना चाहते थे क्योंकि वे ये जानते और समझते थे कि अयोध्या राज्य पर अधिकार उनके बड़े भाई राम का है और उनसे यह अधिकार छीनकर माता कैकेयी ने उन्हें यह अधिकार दिलाया है।

 

 

इस ग्लानि भाव से राजकुमार भरत भरे हुए होते हैं। साथ ही साथ वे अपने माता कैकेयी से भगवान राम के प्रति किये गये उनके दुर्व्यवहार के लिए रुष्ट भी हैं। इन सभी भावनाओं से घिरे होने के कारण और भगवान राम को वापस अयोध्या लाने के लिए वे अपने बड़े भाई भगवान राम से मिलने का निश्चय करते हैं। भरत को यह पता चलता है कि प्रभु श्री राम अपने छोटे भाई लक्ष्मण और पत्नि सीता के साथ चित्रकूट में ठहरे हुए हैं, तब राजकुमार भरत तुरंत ही उनसे मिलने के लिए चित्रकूट की ओर प्रस्थान करते हैं। उनके साथ उनका सैन्य दल भी होता है क्योंकि वे यह सुनिश्चित करना चाहते थे कि कहीं बड़े भाई श्री राम को कोई क्षति न पहुंचा सके, इसीलिए उनकी सुरक्षा हेतु वे सैनिकों के साथ जाते हैं।

 

 

वहीं दूसरी ओर चित्रकूट में भगवान श्री राम, लक्ष्मणजी और माता सीता अपनी कुटिया के बाहर शांति पूर्वक बैठे हुए हैं। तभी उन्हें कहीं से पदचाप और इस कारण धूल उड़ती हुई दिखाई देती है। कुछ ही समय में यह ध्वनि तीव्र हो जाती है और तभी कोई वनवासी उन्हें यह समाचार देता हैं कि “राजकुमार भरत अपनी सेना के साथ चित्रकूट पधार रहे हैं और जल्दी ही वे यहां पहुंच जाएंगे।

 

 

यह समाचार सुनकर लक्ष्मणजी बहुत क्रोधित हो जाते हैं तब भगवान श्री राम लक्ष्मणजी को समझाते हुए कहते हैं कि ‘शांत हो जाओ लक्ष्मण, भरत ऐसा नहीं हैं, उसके विचार बहुत ही उच्च हैं और उसका चरित्र बहुत ही अच्छा है, बल्कि वो तो स्वप्न में भी अपने भाई के साथ ऐसा कुछ नहीं कर सकता।’ राजकुमार भरत अपने बड़े भाई राम से मिलने को आतुर हैं और इसी कारण वे अपनी सेना में सबसे आगे चल रहे हैं और उनके साथ तीनों माताएं, कुल गुरु, महाराज जनक और अन्य श्रेष्ठी जन भी हैं। ये सभी मिलकर प्रभु श्री राम को वापस अयोध्या ले जाने के लिए आए हैं।

 

 

जैसे ही राजकुमार भरत अपने बड़े भाई श्री राम को देखते हैं, वे उनके पैरों में गिर जाते हैं और उन्हें दण्डवत प्रणाम करते हैं, साथ ही साथ उनकी आंखों से अविरल अश्रुधारा बहती है। भगवान राम भी दौड़कर उन्हें ऊपर उठाते हैं और अपने गले से लगा लेते हैं, दोनों ही भाई आपस में मिलकर भाव विव्हल हो उठते हैं, अश्रुधारा रुकने का नाम ही नहीं लेती और ये दृश्य देखकर वहां उपस्थित सभी लोग भी भावुक हो जाते हैं। अगले दिन जब भगवान राम, भरत, आदि पूरा परिवार, महाराज जनक और सभासद, आदि बैठे होते हैं तो भगवान राम अपने अनुज भ्राता भरत से वन आगमन का कारण पूछते हैं। तब राजकुमार भरत अपनी मंशा उनके सामने उजागर करते हैं कि वे उनका वन में ही राज्याभिषेक करके उन्हें वापस अयोध्या ले जाने के लिए आए हैं और अयोध्या की राज्य काज संबंधी जिम्मेदारी उन्हें ही उठानी हैं, वे ऐसा कहते हैं।

 

 

महाराज जनक भी राजकुमार भरत के इस विचार का समर्थन करते हैं। लेकिन श्री राम ऐसा करने से मना कर देते हैं, वे अयोध्या लौटने को सहमत नहीं होते क्योंकि वे अपने पिता को दिए वचन के कारण बंधे हुए हैं। राजकुमार भरत, माताएं और अन्य सभी लोग भगवान राम को इसके लिए मनाते हैं, परंतु वचनबद्ध होने के कारण भगवान श्री राम ऐसा करने से मना कर देते हैं।

 

 

तब राजकुमार भरत बड़े ही दुखी मन से अयोध्या वापस लौटने के लिए प्रस्थान करने की तैयारी करते हैं, परन्तु प्रस्थान से पूर्व वे अपने भैया राम से कहते हैं कि ‘अयोध्या पर केवल श्री राम का ही अधिकार हैं और केवल वनवास के 14 वर्षों की समय अवधि तक ही मैं उनके राज्य का कार्यभार संभालूंगा और इस कार्य भार को संभालने के लिए आप मुझे आपकी चरण – पादुकाएं मुझे दे दीजिये, मैं इन्हें ही सिंहासन पर रखकर, आपको महाराज मानकर, आपके प्रतिनिधि के रूप में 14 वर्षों तक राज्य काज पूर्ण करूंगा, परन्तु जैसे ही 14 वर्षों की अवधि पूर्ण होगी, आपको पुनः अयोध्या लौट आना होगा अन्यथा मैं अपने प्राण त्याग दूंगा।’

 

 

भगवान श्री राम भी अपने छोटे भाई भरत का अपार प्रेम, समर्पण, सेवा भावना और कर्तव्य परायणता देखकर उन्हें अत्यंत ही प्रेम के साथ अपने गले से लगा लेते हैं। वे अपने छोटे भाई राजकुमार भरत को अपनी चरण पादुकाएं देते हैं और साथ ही साथ भरत के प्रेम पूर्ण आग्रह पर ये वचन भी देते हैं कि जैसे ही 14 वर्षों की वनवास की अवधि पूर्ण होगी, वे अयोध्या वापस लौट आएंगे।

 

 

अपने बड़े भाई श्री राम के इन वचनों को सुनकर राजकुमार भरत थोड़े आश्वस्त होते हैं और उनकी चरण पादुकाओं को बड़े ही सम्मान के साथ अपने सिर पर रखकर बहुत ही दुखी मन से अयोध्या की ओर प्रस्थान करते हैं। अन्य सभी परिवार जन भी एक-दूसरे से बड़े ही दुखी मन से विदा लेते हैं।

 

 

जब राजकुमार भरत अपने राज्य अयोध्या लौटते हैं तो प्रभु श्री राम की चरण पादुकाओं को राज्य के सिंहासन पर सुशोभित करते हैं और वे स्वयं अपने बड़े भाई श्री राम की ही तरह सन्यासी वस्त्र धारण करके उन्हीं की तरह जीवन यापन करने का निश्चय करते हैं। वे अयोध्या के पास स्थित नंदीग्राम में एक साधारण सी कुटिया में रहते हैं और यहीं से प्रभु श्री राम के प्रतिनिधि के रूप में संपूर्ण राजकाज संभालते हैं और अपने भाई श्री राम के राज्य की रक्षा करते हैं।

 

 

इस प्रसंग का सबसे महत्व पूर्ण संदेश यह है कि भ्रातृत्व प्रेम यहां भगवान राम के आचरण से उनके उत्तम चरित्र और वचनबद्धता की प्रेरणा मिलती है। यह कथा राजकुमार भरत का अपने भाई के प्रति अपार प्रेम, समर्पण, सेवा भावना का ज्ञान कराती है साथ ही साथ उनकी कर्तव्य परायणता को भी उजागर करती है।

 

सेवा और समर्पण
” सिर भर जाऊ उचित यह मोरा, सबते सेवक धरम कठोरा ” – रामचरितमानस , यह चौपाई भरत मिलाप प्रसंग की है ,अयोध्या से प्रस्थान करते हुये भरत कहते है कि भैया राम नंगे पैर पैदल ही बन चले गये, जिसका कारण स्वयं को मानते हुये, रथ आदि वाहन का त्याग कर सिर के बल यात्रा करना उचित है । अपने पूज्य और आराध्य बड़े भाई राम के दुःख की संवेदना सेवक भरत के शब्दों में जिस मार्मिकता के साथ ध्वनित होती है ,उससे सेवा धर्म की प्रासंगिकता स्वयं स्पष्ट होती है । यहां हम सेवा धर्म के मर्म को हृदयंगम करने का प्रयत्न करेंगे और इसी निमित्त से सेवा सम्बन्धी मुलभूत और यथार्थ चिन्तन आपके समक्ष है ।

 
जिस कार्य से किसी को सुख मिले उसका नाम सेवा है और सेवा का जन्म जिस भाव से होता है उसे समर्पण कहते है । समर्पण के बिना सेवा का उदय होता ही नहीं । समर्पण कारण है और सेवा उसका कार्य है । सेवा के दो रूप है – स्वयं सेवा तथा लोक सेवा, दोनों ही लोक और परलोक की दृष्टि से सदा सर्वदा कल्याण के हेतु है । सेवा से अंतःकरण और चित्त की शुद्धि होती है जिससे पापो का क्षय होता है और भगवान से निकटता बढ़ती है ।मनुष्य की स्वाभाविक प्रवृत्ति है कि वह सबसे पहले अपने अस्तित्व और उसके संरक्षण के लिये प्रवृत्त होता है । इसके बाद मोह ममता वश अपने परिवार, कुटुम्ब और निकट सम्बन्धियो को अपना मानता है और उसके बाद स्वार्थ सिद्धि में सहायक जनो को भी अपना हितू मानने के कारण अपना मानता है । अतः इन्ही तक मनुष्य की चेष्टा व्यवहारिक रूप से सीमित रहती है परिणाम स्वरूप सेवा का क्षेत्र सीमित और संकुचित रहता है ।

 

 

वास्तव में सेवा वह है जो किसी दूसरे को सुख देने के लिये निष्प्रह और निष्काम भाव से की जाती है । मन से सबका हित चाहना ही सेवा है । ऐसा तभी सम्भव है जब हम सबमे स्वयं को देखे । ” आत्मवत् सर्वभूतेषु ” की भावना से दूसरे का सुख दुःख अपना सुख दुःख हो जाता है । पर की भेद दृष्टि ही नही रहती ,इस अवस्था में हमारी समस्त चेष्टाएँ सेवा रूप हो जाती है और किसी की भी सेवा स्वयं सेवा होती है । यह मनुष्य को आत्मतुष्टि प्रदान करती है ।इसमें कृतिमता, दिखावा, आडम्बर या अहंकार आदि के लिये कोई स्थान नही होता है ।इसप्रकार की सेवा पूर्णतः निष्काम होती है । निष्काम सेवा का अधिष्ठान यह भावना है कि संसार जगतनियंता की लीलास्थली है जिसमे वह परमप्रभु स्वयं विविधि रूपों में अपने खेल रचता है और स्वयं ही खेलता है ।उस महा प्रभु से साक्षात्कार करने का एक साधन तन, मन, धन, पद, प्रतिष्ठा,मोह, ममता और अहंकार का पूर्ण समर्पण है । तेरा तुझ को अर्पण क्या लागे मेरा की भावना से समस्त सांसारिक व्यवहार परमात्मा के है ,परमात्मा के लिये है ,हम निमित्त मात्र हैं , कठपुतली की भाँति उनके खेल के साधन है ।रामचरितमानस में गोस्वामी जी ने कहा है ” -सबहि नचावत राम गोसाई “, तो वास्तव में प्रभु को समर्पित साधक संसार के तत्व को जानकर संसार से आसक्त नही होता, वह अपनी हस्ती मिटाकर संसार में ,जलमे कमल की भाँति, रहता है । वह किसी की सेवा करना चाहता है अथवा कर रहा है ,ऐसा कोई भाव उसमे उदय नही होता ,उसकी समस्त चेष्टाएँ सेवा रूप होती है ।

 
व्यवहार जगत में लोक सेवा भी समानरूप से महत्वपूर्ण है आत्मा ही समष्टिरूप से परमात्मा है इस लिए लोकसेवा वास्तव में भगवान की ही सेवा है । लोक सेवा खूब करनी चाहिये । मनुष्य का वयक्तिगत अस्तित्व समाज सापेक्ष है । बिना समाज के सहयोग वह जी नही सकता ,जन्म से लेकर मृत्यु पर्यन्त मनुष्य का भरण पोषण, शिक्षा दीक्षा और विकास समाज से प्राप्त होता है अतएव वह समाज का ऋणी है । समाज के इस ऋण से मुक्त होने के लिये लोक सेवा परमावश्यक है । लोक सेवा प्रायः लोग समाज में स्वयं को विशिष्ट दिखाने के लिये करते है । अधिकांशतः लोकसेवा करने वालो का कोई न कोई स्वार्थ छिपा रहता है । कुछ समर्थ लोग अन्न ,वस्त्र, धन आदि के द्वारा दुसरो की सहायता करते है ,यह लोक सेवा की दृष्टि से सराहनीय है परन्तु जब ऐसी सेवा के पीछे अपने प्रभुत्व को प्रदर्शित करने अथवा यश लोलुपता या अन्य कोई निजी लाभ की भावना होती है तब वह कार्य सेवा की कोटि में नही रह जाता है वास्तव में सेवा के बदले में कुछ भी चाहना सेवा को बेच देना है, सेवा वह है जो निष्प्रह की जाय । इसके अतिरिक्क्त देश, काल और पात्र का विचार करके सेवा की जानी चाहिये । यथा गंगा के तट पर प्याऊ लगा देना सेवा नही है । लोक सेवा का एक नाम परोपकार भी है । हमारे प्राचीन ग्रंथो में परोपकार की महिमा का बहुत वर्णन किया गया है ।

 

 

महात्मा तुलसीदास ने मानस में कहा है –
” परहित सरिस धर्म नहि भाई, परपीड़ा सम नहि अधमाई ।”
महर्षि वेद व्यास कृत पुराण साहित्य के विषय में एक विद्वान समीक्षक ने कहा है – ” अष्टादस पुराणेषु व्यासस्य वचनद्वयम ।
परोपकारः पुण्याय पापाय परिपीडनम ।।”
जिस कार्य से दूसरे का उपकार हो उसके समान कोई धर्म नही है अर्थात अन्य कुछ करणीय नही है । परोपकार पुण्य का और परपीड़न पाप का माध्यम है । इसप्रकार लोक सेवा केवल दुसरो की सेवा नही है अपितु स्वयं के लिये भी कल्याणकारी है ।अतः लोकसेवा का बड़ा महत्व है परन्तु वह उदारता और दयाबुद्धि पूर्वक होनी चाहिये । धन, सम्पत्ति, शारीरिक सुख और मान बड़ाई, प्रतिष्ठा आदि को न चाहते हुये ममता, आसक्ति और अहंकार से रहित होकर मनसा, वाचा, कर्मणा ,धन और शरीर द्वारा सभी प्राणियो के हित में रत होकर उन्हें सुख पहुचने की चेष्टा करना लोकसेवा है ।

 

भारतीय संस्कृति लोकसेवा का आदर्श प्रस्तुत करती है , यह उद्घोष करती है –
” सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे सन्तु निरामया
सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मा कश्चिद् दुःखभागभवेत ।”
लोकसेवा भी बिना समर्पण के सिद्ध नही होती, उसके लिये भी ” बसुधैव कुटुम्बकम् ” और ” माता भूमिः पुत्रोहम पृथिव्याम् ” की भाव भावना से स्वयं को संस्कारित करने की साधना आवश्यक है ।उक्त भावना से संस्कारित व्यक्ति का दृष्टिकोण व्यापक हो जाता है, वह सम्पूर्ण मानव जाति को अपना परिवार और सम्पूर्ण धरती को मातृवत् प्रेम करता है । प्रेम समर्पण का आधार है, जिससे जो प्रेम करता है उसके प्रति उसका स्वाभाविक रूप से समर्पण होता है ।

 

 

साधन साध्य का कारक होता है , सेवा रूपी साध्य के साधन के विषय में विचार भी महत्वपूर्ण है । साध्य की सिद्धता साधन की पवित्रता, क्षमता, दक्षता और समर्थता पर निर्भर करती है । व्यवहारिक जीवन में प्यासे को पानी, भूखे को अन्न, नंगों को वस्त्र, बीमार को दवाई, अशिक्षित को शिक्षा, भयभीत को अभयदान आदि अनेक सेवा के साधन है । इन सभी की पवित्रता हमारे भीतर के भावानुसार ही होती है । भाव प्रमुख रूप से तीनप्रकार से सेवा को सिद्ध करने में सक्षम है । पहला – हम सब एक ही ईश्वर की सन्तान है अर्थात् हम सब एक दूसरे के बन्धु है, दसरा – आत्मदृष्टि से सभी एक है, और तीसरा – परमात्मा आत्मा रूप में सभी भुत प्राणियो में विद्यमान है । इनमे क्रम से उत्तरोत्तर श्रेष्ठ है ।
उपरोक्त भावो से सेवा, भगवान् के साक्षात्कार का साधन बन जाती है । सेवा में क्रिया की अपेक्षा भाव की प्रधानता है अस्तु उत्तम देश, काल और पात्र के प्राप्त होने पर भाव सहित न्यायानुकूल सेवा करनी चाहिये । अपने से बड़े, पूज्य, दुखी, लाचार जनो की सेवा अधिक महत्वपूर्ण है । जो भी मिले उसके साथ प्रसन्न भाव से और मधुर वाणी से प्रेमपूर्वक व्यवहार करना चाहिये । तन, मन, धन से दीन दुखियो, माता पिता और गुरुजनो की सेवा श्रेष्ठ है । सेवा का अवसर प्राप्त होना व्यक्ति का परमसौभाग्य है ।
सेवा के अनेक स्वरुप है- दुसरो को मान बड़ाई देना, रोगी की देख भाल और उसके मल मूत्र, घाव आदि की सफाई स्वच्छता,पत्तल उठाना, पैर धोना, आदि सेवा के ऐसे रूप है जो साक्षात भगवान की दया से प्राप्त होते है । भगवान की कृपानुभूति से ही यह सेवा सम्भव हो पाती है तदर्थ समर्पण ही मुख्य आधार और कारक है । समर्पण से अभिमान तिरोहित हो जाता है जिससे सेवा बन पाती है । सेवा में सर्वाधिक महत्व की बात यह है कि सेवा का बखान न किया जाय , सेवा की चर्चा करने से अभिमान के जाग्रत होने की सम्भावना रहती है अस्तु निष्काम और गोप्य भाव से सेवा करनी चाहिये ।

हरिः ॐ तत्सत्

 

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