अच्छी सोच

करसन भाई पटेल की सोच ने बनाया अरबपति, पढ़ें सफलता की कहानी

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ऐसा उद्योगपति जिनका बचपन गरीबी में बीता और कोई खास डिग्री भी नहीं ले पाई, वह अपनी सोच और मेहनत से आज ऐसी बुलंदी पर हैं कि लोग उनका नाम लेते नहीं थक रहे हैं।

 

 

नाम है करसन भाई पटेल। इन्होंने 1969 में वाशिंग पाउडर ‘निरमा’ शुरू किया। निरमा को इन्होंने लोगों से इस कदर जोड़ा कि लोग आज भी जनरल स्‍टोर में निरमा मांगने लगते हैं। बताया जा रहा है कि जब करसन भाई ने निरमा नाम से वॉशिंग पाउडर का कारोबार तब शुरू किया जब इस धंधे में उतरने के बारे में कोई सोच भी नहीं रहा था।

 

 

उस वक्त कुछ गिनी चुनी ही विदेशी कंपनियां थी जो डिटर्जेंट का काम कर रही थीं। लेकिन उन्होंने चंद रुपयों से यह काम कैसे शुरू किया और निरमा को कैसे एक ब्रांड बनाया यह कहानी भी प्रभावित करने वाली है।

 

घर-घर बेचने वाले बने अरबों के मालिक:

अहमदाबाद के रहने वाले करसन भाई अपने घर के अहाते में ही निरमा पाउडर बनाने की शुरुआत की। यह काम तब कोई कंपनी नहीं बल्कि एक आदमी कर रहा था तो तो माल तैयार होने के बाद इसे बेचने की दिक्कत थी।

 

 

करसन भाई ने हिम्मत की और खुद ही अपना माल लेकर लोगों के घर-घर पहुंचाने लगे। उनके माल की लोकप्रियता कैसे बढ़े इसलिए उन्होंने एक तरकीब निकाली। तरकीब यह थी कि वह अब निरमा के हर पैकेट पर कपड़े साफ न होने पर पैसे वापस करने की गारंटी देने लगे।

 

 

इसका फायदा हुआ यह लोगों में इनके पाउडर के प्रति भरोसा बढ़ गया और फिर लोग आसानी से इनके माल को खरीदने लगे। इतना ही नहीं उनका माल और तेजी से बिके इसके लिए उन्होंने बेहद कम कीमत पर ही अपना पाउडर बेचते।

 

 

जब सबसे सस्ता वाशिंग पाउडर 13 रुपए प्रति किलो था तब ये अपना पाउडर तीन रुपए प्रति किलो ही बेचा। जैसा कि लोगों की चाह होती है कि उन्हें सस्ती और सबसे अच्छी चीज मिले और करसन भाई का फार्मूला इस चाहत में फिट बैठ गया। अब करसन भाई पटेल का धंधा निकला और एक दिन ऐसा आया जब निरमा देश का जाना पहचाना ब्रांड बन गया।

 

 

आज करसन भाई की कंपनी में करबी 14 हजार कर्मचारी हैं। 2004 के आंकड़ों के अनुसार, निरमा कंपनी का टर्नओवर 50 करोड़ डॉलर से भी ज्यादा है जो अब 100 करोड़ डॉलर हो गया होगा।

फोर्ब्स के ‌के अनुसार, एक साल में आठ लाख टन निरमा डिटर्जेंट बिकता है।

 

 

 

बेबस समझ कर रौंदी गई मिट्टी ही एक दिन मीनार बनती है:

 

साठ के दशक में गुजरात सरकार के भू विज्ञान विभाग की लैब में एक 24 साल का युवक काम करता था… पारिवारिक पृष्ठभूमि बेहद साधारण… लेकिन उसे सरकारी नौकरी कभी रास नहीं आई…. वो एक लैब असिस्टेंट था…. लेकिन उसका दिमाग हमेशा कुछ अलग करने को बेताब रहता था.

उन दिनों भारतीय उद्योग जगत के FMCG क्षेत्र में एकमात्र कम्पनी का साम्राज्य हुआ करता था और वो थी “हिन्दुस्तान लीवर”….. हिन्दुस्तान लीवर के सैकड़ों प्रोडक्ट उन दिनों उच्च मध्यम वर्ग और मध्यम वर्ग की पसंद हुआ करते थे….

 

 

उन्हीं दिनों HLL (हिन्दुस्तान लीवर लिमिटेड) ने कपड़े धोने के लिए अपना एक डिटर्जेंट पाउडर लांच किया था… जिसे नाम दिया गया ”सर्फ” (SURF)… .जिसकी कीमत 60 के दशक में 15 रुपये थी…. यानी ये उत्पाद आम मध्यम वर्गीय परिवार की पहुंच से दूर था.

 

 

तब 15 रुपये की कीमत हुआ करती थी…. ये देख कर उस युवक के दिमाग में एक विचार कौंधा… उसने विचार किया कि महिलाओं के लिए कपड़े धोना बड़ी मेहनत का घरेलू काम है…

 

 

निम्न वर्ग में उस समय तक डिटर्जेंट पाउडर की पहुंच नहीं हो पायी थी… तब लोग टिकिया से काम चलाते थे… जिसे पहले पीसना पड़ता था… इसके बाद उसे कूट कर बारीक पाउडर बनाया जाता था… तब जाकर उससे कपड़े साफ़ किये जाते थे.

 

 

युवक ने सोचा कि अगर इन निर्धन परिवारों को भी डिटर्जेंट पाउडर मुहैया कराया जाए तो इन्हें कपड़े धोने में आसानी होगी…लेकिन उन दिनों साबुन की तुलना में कपड़े धोने का वाशिंग पाउडर करीब तीन गुना महंगा होता था….

 

 

युवक ने सोचा कि अगर सस्ता और अच्छी क्वालिटी का पाउडर बनाया जाय तो गरीब जनता उसे हाथों हाथ लेगी…. इसके बाद युवक तन मन से अपने इस काम में जुट गया.

 

 

लैब में काम करने और रसायनों को समझने का अनुभव उसके काम आया और साल भर की कड़ी मेहनत के बाद उसने एक पीला पाउडर बनाने में सफलता प्राप्त ली… इससे कपड़े धोने से झाग निकलता था.

 

 

युवक ने इसे बनाने में ऐसी रणनीति बनायी थी कि वो इस पाउडर को कम मूल्य में बनाकर भी थोड़ा बहुत मुनाफा कमा लें… शुरू शुरू में युवक ने फैसला किया कि वो इस पाउडर को नो प्रॉफिट नो लॉस पे बेचेगा.

 

 

इसके लिए युवक ने फैसला किया कि वो खुद ही इस प्रोडक्ट को बेचेगा… ना कोई सेल्स मैन रखेगा और ना ही कोई फर्म बनाएगा…. उसने घर में हाथों से बिना मशीन के अपने हाथों से मिक्स करके पीला डिटर्जेंट पाउडर बनाना शुरू किया और हर रविवार को साइकल से गाँव-गाँव घूम-घूम कर इसकी मार्केटिंग शुरू की.

 

 

वो गाँव के गरीब तबकों में जाता… लोगों को बताता कि उसका बनाया ये पाउडर किसी भी तरह से किसी अन्य महंगे डिटर्जेंट पाउडर से कम नहीं है… वो लोगों से विनती करता कि एक बार इस पीले पाउडर को जरुर आजमायें… और अगर अच्छा ना लगे तो तुरंत रिजेक्ट कर दें.

 

 

धीरे धीरे उस युवक ने फैब्रिक वॉश मार्किट में क्रान्ति ला दी…. गरीबों के लिए साबुन और अमीरों के लिए डिटर्जेंट पाउडर वाली आम धारणा को उसने ध्वास्त कर दिया… और साठ के अंतिम दशक में यानी 1969 में उसने अपने वाशिंग पाउडर को ब्रांड नेम दिया.

 

 

ये नाम उसने अपनी बेटी के नाम पर दिया था जिसकी मृत्यु कुछ साल पहले ही हुई थी… नाम था निरमा…. महज़ छोटी सी पूंजी लेकर धंधा शुरू करने वाले इस इंसान को आज लोग करसन भाई पटेल के नाम से जानते हैं. उद्योग जगत आज इन्हें डिटर्जेंट किंग के नाम से जानता है.

 

 

निरमा ने 70 के दशक में बाजार में सफलता के झंडे गाड दिए… सभी वर्ग में अपनी सरल और सुलभ पहुंच के लिए निरमा ने अपना स्लोगन रखा “सबकी पसंद निरमा “…

 

 

आज निरमा के देश भर में कई स्थानों पर कारखाने चलते हैं… अहमदाबाद, मेहसाणा, वडोदरा, भाव नगर, छ्त्राल, पोरबंदर… निरमा ने 2008 में अमेरिकी कम्पनी सेल्स वैली कारपोरेशन का अधिग्रहण किया है जिसके बाद वो दुनिया की सातवीं सबसे बड़ी सोडा एश उत्पादक कंपनी बन चुकी है.

 

 

आज करसन भाई पटेल की वजह से अहमदाबाद को लोग डिटर्जेंट सिटी के नाम से जानते हैं… निरमा 25 फीसदी मार्केट शेयर के साथ आज भारत में डिटर्जेंट किंग है… भारत के 8 हज़ार करोड़ के डिटर्जेंट कारोबार में उसकी हिस्सेदारी कुल 35% है…

 

 

और यही नहीं…. कभी साइकल से घूम कर पाउडर बेचने वाले करसन भाई पटेल की निरमा ने करीब 15 हज़ार लोगों को रोज़गार दिया है जिससे उनकी रोज़ी रोटी चलती है… निरमा ने ये साबित कर दिया कि अगर जज़्बा और हिम्मत हो तो आप हिन्दुस्तान लीवर जैसी शक्तिशाली बहुराष्ट्रीय कम्पनी को भी धूल चटा सकते हैं.

 

 

90 के दशक में निरमा ने कपड़े धोने वाले साबुन के बाद नहाने के साबुन बनाना शुरू किया… उन दिनों भारतीय मार्किट में सबसे बड़ा ब्रांड सिंथोल माना जाता था जो कि गोदरेज का प्रोडक्ट था… निरमा ने सिंथोल जैसे प्रोडक्ट को परास्त किया.

 

 

करसन भाई पटेल के चर्चे अब हार्वर्ड विश्वविद्यालय में केस स्टडी का विषय बन गए… कि आखिर बिना किसी प्रतिष्ठित कालेज से MBA किये एक आम गुजराती कैसे हिन्दुतान लीवर जैसी दिग्गज कम्पनी को धूल चटा सकता है.

 

 

निरमा ने ना सिर्फ उद्योग जगत में नयी ऊंचाइयों को छुआ बल्कि उसने निरमा एजुकेशन एंड रिसर्च फाउंडेशन जैसा शिक्षण संस्थान भी खोला है ताकि नयी प्रतिभाओं को व्यापार के गुर सिखाये जाएँ…

 

 

कभी साइकल से चलने वाले करसन भाई पटेल आज 2 बिलियन डॉलर वाली निरमा समूह के मालिक है… करसन भाई पटेल जैसे लोग हमें सिखाते हैं कि सपने छोटे मत देखो…. बड़े सपने देखो… भले ही उसे पूरा करने का प्रयास छोटा हो….

कहीं पढ़ा था –

एक टहनी एक दिन पतवार बनती है, एक चिंगारी दहक अंगार बनती है
जो सदा रौंदी गयी बेबस समझ कर, मिट्टी वही एक दिन मीनार बनती है.

 

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‘निरमा गर्ल’ कौन है, 50 वर्षों से उसकी एक ही तस्‍वीर क्‍यों है?

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निरमा वॉश‍िंग पाउडर का एड जिंगल भारतीय टीवी की दुनिया के सबसे मशहूर विज्ञापनों में से एक है। 90 के दशक के लोगों की जुबान पर आज भी यह जिंगल चढ़ा हुआ है। इस जिंगल ने एक दौर में इस वॉश‍िंग पाउडर की बिक्री में जबरदस्‍त इजाफा कर दिया था। बच्‍चों से लेकर बड़े तक सभी दुकानों पर जाकर यही वॉश‍िंग पाउडर मांगते थे। लेकिन इसी के साथ एक सवाल भी सभी के मन में बना रहा है कि आख‍िर डिटर्जेंट पाउडर के पैकेट पर बनी वह बच्‍ची कौन है?

 

 

इस बच्‍ची का नाम है निरूपमा
जी हां, डिर्जेंट पैकेट के पाउडर के पैकेट पर एक लड़की सफेद फ्रॉक पहने नजर आती है। समय के साथ टीवी विज्ञापन में अलग-अलग कैरेक्‍टर्स भी आए, लेकिन पैकेट पर ऊपर बनी यह बच्‍ची तब से अब तक एक ही है। ऐसे में यह दिलचस्‍पी बढ़ जाती है कि आख‍िर यह बच्‍ची है कौन। असल में इस बच्‍ची का नाम निरूपमा था, जिसके नाम पर ही वॉशिंग पाउर का नाम ‘निरमा’ रखा गया। निरूपमा हमारे बीच नहीं है।

 

 

हादसे में हो गई थी निरूपमा की मौत

साल 1969 की बात है। गुजरात के करसनभाई ने निरमा वॉशिंग पाउडर की शुरुआत की। करसन भाई की एक बेटी थी। नाम निरूपमा था, लेकिन प्यार से सभी उसे निरमा बुलाते थे। निरूपमा अभी स्‍कूल में ही पढ़ रही थी कि एक दिन एक हादसे में उसकी मौत हो गई। करसनभाई और उनके परिवार पर दुखों का पहाड़ टूट पड़ा। एक पिता होने के नाते करसन भाई कि यही ख्‍वाहिश थी कि एक दिन उनकी बेटी दुनिया में खूब नाम कमाए। अपने जिगर के टुकड़े को खो देने का दुख करसनभाई को अंदर तक तोड़ चुका था। लेकिन फिर उन्‍होंने वहीं से हिम्‍मत भी पाई। उन्‍होंने तय किया कि वह निरमा को अमर कर देंगे।

 

 

इसलिए है एक ही तस्‍वीर
करसन भाई ने निरमा वॉशिंग पाउडर की शुरुआत की और पैकेट पर निरमा की तस्वीर लगानी शुरू कर दी। तब के दौर में तस्‍वीरें कम ही खींची जाती थीं। ऐसे में निरूपमा की झूमती हुई इस सुंदर सी तस्‍वीर को पैकेट पर जगह दी गई। लेकिन बाजार में उतरने और कंपीटिशन के कारण करसन भाई को बहुत दिक्‍कतें भी आईं। एक दौर तो ऐसा भी आया, जब लगा कि उनका यह सपना कभी पूरा नहीं हो पाएगा।

 

 

ऑफिस के रास्‍तें में साइकिल पर बेचते थे पाउडर
उस समय बाजार में दूसरे अच्‍छे डिटर्जेंट की कीमत 15 रुपये प्रति किलो थी। करसनभाई ने निरमा को महज साढ़े तीन रुपये प्रति किलो के दर से बेचना शुरू किया। कम आमदनी वाले परिवारों के लिए यह अच्‍छा विकल्‍प था। करसनभाई सरकारी नौकरी भी करते थे। बेटी के नाम को अमर बनाने का सपना लिए वह पहले ऑफिस का काम करते फिर साइकिल से लोगों के घरों में वॉशिंग पाउडर बेचते। धीरे-धीरे अहमदाबाद में इस डिटर्जेंट को सभी जानने लगे।

 

 

उधारी के कारण होने लगा घाटा

 

वॉश‍िंग पाउडर बनाने से लेकर बेचने तक का काम करसनभाई खुद करते थे। काम बढ़ा तो उन्होंने अपनी नौकरी भी छोड़ दी। दूसरे लोगों को भी अपने काम से जोड़ा, जो दुकानों पर जाकर वॉश‍िंग पाउडर बेचते थे। लेकिन इसी के साथ थोड़ी समस्या भी आने लगी। दुकानदार उधारी पर माल वॉश‍िंग पाउडर उठाने लगे। जब पैसे देने का समय आता तो आना-कानी भी शुरू हो जाती। व्‍यापार में घाटा होने लगा।

 

 

बाजार से गायब कर दिए सारे पैकेट
करसनभाई समझ नहीं पा रहे थे कि अब क्‍या किया जाए। उन्‍हें यह लगने लगा था कि वह हार गए हैं। लेकिन फिर उन्‍हें एक उपाय सूझा। उन्‍होंने तय किया कि वह एक टीवी विज्ञापन बनवाएंगे। टीम की मीटिंग बुलाकर विज्ञापन बनाने का फैसला किया गया। यह शानदार जिंगल तैयार हुआ। लेकिन इसी के साथ करसनभाई ने एक और प्‍लान बनाया। उन्‍होंने विज्ञापन के टीवी पर आने से पहने बाजार से निरमा के सारे पैकेट उठवा लिए।

 

 

जिंगल और टीवी विज्ञापन ने बनाया पॉपुलर
टीवी पर विज्ञापन आया। जिंगल जुबान पर चढ़ गया। लोग बाजार में वॉशिंग पाउडर ढूंढ़ने लगे। अब दुकानदारों के लिए निरमा डिटर्जेंट रखना और बेचना मजबूरी बन गई। इस तरह यह वॉश‍िंग पाउडर देशभर में पॉपुलर हो गया। साथ ही करसनभाई का निरूपमा को अमर बनाने का ख्‍वाब भी पूरा हो गया।

 

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