अच्छी सोच

सिकुड़ती दुनिया; उभरते सवाल

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आसपास एक नजर डालें तो ऐसा महसूस होता है कि हम एक बीमार समय में जी रहे हैं। काफी दिनों बाद एक संबंधी के जाना हुआ तो शुरुआती कुछ मिनट आपस में बातचीत के बाद वहां मौजूद करीब दस लोगों में से ज्यादातर की नजर अपने स्मार्टफोन में डूब गई। बीच-बीच में भले ही वे औपचारिकता के लिए हां-हूं कर देते थे, लेकिन उनका ध्यान मोबाइल की स्क्रीन में था। यहां तक कि बच्चे भी खेलने या बात करने के बजाय मोबाइल के स्क्रीन में कुछ देख कर हंस-खेल रहे थे। दरअसल, आजकल लोग अपने कामों में इतने अधिक व्यस्त हैं कि उनके पास ठीक से खाने-पीने तक का समय भी नहीं है।

 

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बच्चों पर गौर करें तो एक तरह से झटका लगता है, क्योंकि स्कूली और घर की पढ़ाई का बोझ उठा लेने के बाद बाकी वक्त वे स्मार्टफोन पर व्यस्त रहते हैं। यों आजकल लोगों का लगभग हर काम घर बैठे फोन या लैपटॉप पर ही हो जाता है। मां-पिता बिना कुछ सोचे-समझे अपने बच्चों के हाथों में फोन थमा देते हैं, यह जानते हुए भी कि इससे बच्चों का भविष्य खराब होगा। न केवल पढ़ाई-लिखाई बाधित होने, बल्कि सेहत और बनते हुए मन-मस्तिष्क में एक परोक्ष बाधा खड़ी करने के लिहाज से भी। बच्चों का छोटी उम्र में फोन का बेलगाम इस्तेमाल करना सही नहीं है। इससे उनकी आंखें तो कमजोर हो ही सकती हैं, कई बार इंटरनेट पर मौजूद कुछ अवांछित सामग्री भी हैं जो अगर बच्चों की नजर में आ जाती है तो उन्हें अपनी जद में ले लेती है।

 

 
सोशल मीडिया के फायदे और नुकसान दोनों हैं। लेकिन इधर यह देखने में आ रहा है कि बच्चे अपनी पढ़ाई के बजाय अपना बहुत सारा समय सोशल मीडिया पर बर्बाद करने लगे हैं। थोड़ा बारीक नजर डालें, तब पता चलता है कि जब से सोशल मीडिया का प्रयोग बेतहाशा बढ़ा है, तब से हमारे चारों तरफ मानसिक बीमारियां भी बढ़ गई हैं। हर वक्त स्मार्ट फोन के स्क्रीन में डूबे रहना कब एक लत बन जाता है, हमें इसका पता भी नहीं चलता। स्क्रीन पर बहुत ज्यादा समय बिताने के कारण आंखों पर भी बहुत बुरा असर पड़ता है।

 

 
पिछले कुछ समय से ऐसी खबरें आई हैं, जिनसे पता चलता है कि इंटरनेट और सोशल मीडिया साइबर अपराध के लिए एक आसान जगह हो गई है। बच्चों की निजी जानकारियां, फोटो, वीडियो आदि चुरा लेना और उन्हें ब्लैकमेल करना या डराना-धमकाना एक आम बात होती जा रही है। ज्यादा उम्र के बच्चे और यहां तक कि उनके हमउम्र भी डराने-धमकाने के इस खेल में शामिल पाए जाने लगे हैं। इसके अलावा, युवा, अधेड़ और कई बार बुजुर्ग भी इसका शिकार होने से नहीं बच पाए हैं।
सच यह है कि इस तरह की व्यस्तता की वजह से सामाजिक जीवन में भी असहजता आई है। लोग एक दूसरे पर विश्वास करने के बजाय शक करने लगे हैं। ऐसे तमाम मामले सामने आए, जिनमें सोशल मीडिया के मंचों पर फैली किसी गलतफहमी की वजह से दो लोग या समुदाय आमने-सामने खड़े हो गए। सच यह है कि गलत और भ्रामक सूचनाओं का प्रवाह सबको नुकसान पहुंचा रहा है।

 

 

इनकी वजह से बच्चों का ध्यान पढ़ाई से निकल कर दूसरी बेमानी गतिविधियों की ओर जाने लगता है। इस ओर शायद लोगों का ध्यान नहीं जाता कि आजकल के बच्चे घर से बाहर निकल कर एक भी खेल नहीं खेलते और न ही अपने बंधे-बंधाए दायरे से निकल कर नए दोस्त बनाते हैं। दोस्त के नाम पर सोशल मीडिया के संपर्क के दोस्त ज्यादा होते हैं और असल जिंदगी में कम। यह समझना मुश्किल नहीं है कि सोशल मीडिया पर विकसित हुए दोस्ती के संबंध कितने उपयोगी साबित होते हैं।

 

 
इन दिनों हम जब भी हम बाहर जाते हैं तो अक्सर बच्चों को आइसक्रीम, कुल्फी, पिज्जा, बर्गर आदि की ओर ही भागते देखते हैं। बच्चों ने अब स्वाद के लिए खाना शुरू कर दिया है और पौष्टिक खाना कम कर दिया है। बल्कि वे यह सोच कर तो खाते ही नहीं कि उनके लिए क्या पौष्टिक खाना है और किससे उनकी सेहत बेहतर होगी। बच्चों के माता-पिता भी उन्हें चिप्स, कुरकुरे, बर्गर, पिज्जा वगैरह खिलाते हैं और उनके साथ खुद भी खाते हैं। यह समझने की जरूरत नहीं लगती कि ऐसा करना बच्चों के स्वास्थ्य के लिए सही नहीं है। वैसे भी खाने-पीने की चीजों में बहुत मिलावट की जाती है और स्वस्थ भोजन मिलना मुश्किल होता जा रहा है।

 

 
इन सब चुनौतियों से निपटने के लिए सरकार या दूसरों की राह देखने के साथ-साथ अगर हम खुद ही पहल करें तो किसी साधन को अपने और इस दुनिया के लिए उपयोगी बना सकते हैं। इसकी उपयोगिता को ही देखते हुए अब चुनाव जैसी लोकतांत्रिक गतिविधियों के लिए भी सोशल मीडिया और इंटरनेट का सहारा लिया जाने लगा है, क्योंकि आज यह संचार का सबसे अहम जरिया बन चुका है। दरअसल, सोशल मीडिया का सही तरीके से प्रयोग किया जाए तो इसके फायदे भी हैं। जरूरत बस इसे ठीक से समझने की है।

 

 

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