अच्छी सोच

कप्तान रानी रामपाल: मेरी टीम में हर खिलाड़ी कप्तान है

 

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खेलों की दुनिया की एक पुरानी कहावत है कि एक अच्छी टीम का कप्तान भी अच्छा होता है. पर इस कहावत का उल्टा यानी एक अच्छा कप्तान अपनी टीम को अच्छी बना सकता है भी उतना ही सही है. ख़ासकर भारतीय महिला हॉकी टीम की कप्तान रानी रामपाल के कप्तानी सफ़र को देखकर तो ऐसा ही कहा जा सकता है. रियो ओलंपिक्स में निराशाजनक प्रदर्शन के बाद से भारतीय महिला हॉकी टीम के खेल का ग्राफ़ लगातार ऊपर जा रहा है. इस अच्छे प्रदर्शन के पीछे बेशक टीम की खिलाड़ियों का सामूहिक योगदान तो है ही, साथ ही स्टार फ़ॉरवर्ड खिलाड़ी और कप्तान रानी रामपाल का अनुभव भी टीम के काम आ रहा है.
टीनएज सनसनी के तौर पर भारतीय महिला हॉकी जगत में दस्तक देनेवाली इस खिला‌ड़ी से फ़ेमिना ने उनके निजी जीवन, शुरुआती संघर्ष, सफलता-असफलता, कप्तानी के अनुभव समेत विभिन्न मुद्दों पर बातचीत की.

 

 

हॉकी खेलने की बात बताकर लगा, मानो बड़ी ग़लती कर दी हो
रानी रामपाल हरियाणा के जिस शहर शाहबाद मरकंडा से आती हैं, वह भारतीय महिला हॉकी के गढ़ के रूप में जाना जाता है. वहां की कई लड़कियां भारत के लिए खेल चुकी हैं. वहां की ओबोहवा ने रानी को भी हॉकी का रुख़ करने के लिए प्रेरित किया. हॉकी से शुरुआती जुड़ाव के बारे में रानी कहती हैं,‘‘मैं जिस स्कूल में मैं पढ़ती थी, उसकी नौ लड़कियां भारत के लिए खेल चुकी थीं. उन्हें देखकर हमें लगता था कि हमें भी हॉकी खेलनी चाहिए. हमारे यहां हॉकी के अलावा कोई दूसरा खेल भी नहीं था. इसके अलावा यह भी सुना था कि खेलने से नौकरी मिलती है. खेलने से स्कूल के बाद के बचे हुए समय का भी इस्तेमाल हो जाता था.’’

 
लेकिन रानी के सामने समस्या यह थी कि उनका परिवार आर्थिक तंगी से जूझ रहा था. उनके पिता तांगा चलाकर परिवार का गुज़ारा कर रहे थे. इसके अलावा आज से क़रीब डेढ़-दो दशक पहले हरियाणा में लड़कियों के लिए स्पोर्ट्स चुनना बहुत मुश्क़िल था. ऐसे में जब रानी ने हॉकी खेलने के अपने फ़ैसले के बारे में बताया तो उन्हें अजीबोग़रीब रिऐक्शन से दो-चार होना पड़ा. ‘‘मैं बहुत ही ग़रीब परिवार से हूं. उन दिनों यह पूरी तरह से पुरुष प्रधान राज्य हुआ करता था. वहां लड़कियों को घर से बाहर तक नहीं निकलने दिया जाता था. जब मैंने अपने माता-पिता को बताया कि मैं हॉकी खेलना चाहती हूं, तब उनका पहला रिऐक्शन बड़ा अजीब था. ऐसा लगा मानो मैंने उन्हें कुछ ग़लत बोल दिया हो. वैसे ग़लती उनकी भी नहीं थी, क्योंकि वे बहुत ज़्यादा पढ़े-लिखे भी नहीं थे और समाज से बहुत डरते थे. उन्हें लगता था कि लड़की है, तो पता नहीं क्या हो जाएगा.’’
परिवार के डर को बढ़ाने का काम किया पड़ोसियों और रिश्तेदारों ने, जिनसे उनके माता-पिता ने राय ली थी. ‘‘मेरे घरवालों ने जब इस बारे में उनसे पूछा कि क्या इसे हॉकी खेलने देना चाहिए. लगभग सभी का जवाब था ‘नहीं’. उनका कहना था,‘यह लड़की है इसको हॉकी खेलने दोगे तो आपकी इज़्ज़त मिट्टी में मिला देगी.’ इन्हीं सबके वजह से उनके मन में डर बैठ गया था. लेकिन काफ़ी ज़िद करने के बाद वे मान गए. मैंने भी उनसे वादा किया कि मुझे मौक़ा तो देखकर देखिए अगर मैंने इस फ़ील्ड में अच्छा नहीं किया, तो आपकी सारी बातें मानूंगी. मैं उनकी शुक्रगुज़ार हूं कि उन्होंने मेरी बात मान ली,’’ बताती हैं रानी.

 

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सख़्त कोच, जिन्होंने भाइयों की शादी के लिए भी नहीं दी छुट्टी
सात साल की रानी के परिवार वालों ने उनका दाख़िला कोच बलदेव सिंह की अकैडमी में कराया. सख़्त कोच के नाम से मशहूर बलदेव सिंह के यहां की कई खिलाड़ी भारत के लिए खेल रही थीं. न जाने कितने ही लोगों को उनकी वजह से नौकरी मिली थी. वे ज़्यादातर ग़रीब घरों के बच्चों को अपनी अकैडमी में लेते थे. उनका मानना था कि ग़रीब घरों के बच्चे अधिक मेहनत करते हैं. किसी के साथ कोई भेदभाव नहीं करते थे. वे कहते थे,‘जो अच्छा खेलेगा, वही टीम में खेलेगा. उनका कोई फ़ेवरेट नहीं होता था.’ रानी के पैरेंट्स को भी लगा कि एक अच्छे कोच के मार्गदर्शन में ट्रेनिंग लेने पर उनकी बेटी का भी अच्छा ही होगा.

 

 

हार्ड टास्क मास्टर कहे जानेवाले बलदेव सिंह के बारे में रानी कहती हैं,‘‘हमारे कोच बलदेव जी बहुत स्ट्रिक्ट कोच हैं. उनका यह मानना है कि खिलाड़ियों को डिसिप्लिन्ड और पंक्चुअल होना चाहिए. अनुशासन के मामले में उनके लिए यह बात मायने नहीं रखती थी कि कौन-सा खिलाड़ी नैशनल टीम में खेल रहा है, कौन-सा नहीं. अनुशासन के नियम सबके के लिए समान थे. वे कहते थे,‘अगर आप ग्राउंड में आए हो तो कुछ सीखना है. यहां आकर टाइप पास नहीं करना है.’ उस समय मानो हमारे लिए कोई त्यौहार, छुट्टी या फ़ैमिली फ़ंक्शन्स होते ही नहीं थे. मेरे दो बड़े भाई हैं, यहां तक कि उन्होंने मुझे उनकी शादी के लिए भी छुट्टी नहीं दी थी. उनका कहना था कि अगर आपको खेलना है, कुछ बनना है तो सबकुछ भूलना पड़ेगा.’’

 

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बलदेव सिंह के मार्गदर्शन में जब रानी ने नैशनल लेवल पर अच्छा परफ़ॉर्म करना शुरू किया तो घरवालों को लगने लगा कि उनकी बेटी सही लाइन पर है.

 

छोटी-सी लड़की, भारतीय टीम में पहुंच गई
शाहबाद मरकंडा की अकैडमी में ऐसा माहौल था कि बहुत कम उम्र में ही खिलाड़ी भारत के ‌लिए खेलना शुरू कर देते थे. कोच बलदेव सिंह का भी लक्ष्य होता था कि जितनी जल्दी हो सके खिलाड़ियों को इंडियन टीम में पहुंचाना है. रानी इसका कारण बताती हैं, ‘‘अलावा हमारे कोच सर को 38 साल की उम्र में नौकरी मिली थी, वे चाहते थे कि मेरे हर खिलाड़ी को ज़्यादा से 16-17 की उम्र तक जॉब मिल जाए. वे उसी के हिसाब से हमें ट्रेनिंग करवाते थे. हमारे बेसिक्स पर ज़्यादा ध्यान देते थे. हम भी बाक़ी प्लेयर्स को जब खेलते हुए देखते थे तब सोचते थे कि हमें भी इनके जैसा बनना है. जब आपके सामने आपका कोई आइकन हो तो आप उसे देखकर, उसके जैसा बनने के ‌लिए जल्दी सीखते हैं. रही बात मेरी तो मैं जैसे बैकग्राउंड से थी, मुझे भी लगता था कि अगर मुझे अपनी ज़िंदगी चेंज करनी है तो चीज़ों को जल्दी सीखना पड़ेगा.’’
रानी सिर्फ़ 14 साल की छोटी उम्र में नैशनल टीम का हिस्सा बन गईं. सीनियर टीम के अपने शुरुआती अनुभव रानी कुछ इस तरह बयां करती हैं,‘‘मैं जब नैशनल टीम में आई तो बहुत ही छोटी थी, जबकि कई खिलाड़ी भारत के लिए 10-10 साल से खेल रहे थे. उन सीनियर्स को अच्छा भी लगता था कि एक छोटी-सी लड़की हमारे बीच है. वह इतनी कम उम्र में भी अच्छा खेलती है. सीनियर्स और कोचेस मुझे काफ़ी सपोर्ट भी करते थे. सीनियर खिलाड़ी कहते थे यह मत सोचना कि तुम छोटी हो तो अच्छा नहीं खेल सकती. कभी डरना मत. एमके कौशिक मुझे टीम में लाए थे. उन्होंने मुझसे कह रखा था कि अगर आप अच्छा खेलोगे तो मैं आपको कंटीन्यू टीम में रखूंगा. लेकिन आपको हर दिन यह प्रूव करके दिखाना होगा कि आप अच्छी हैं. तब से मैंने यह बात गांठ बांध ली कि मुझे हर दिन और ज़्यादा मेहनत करनी है.’’

 

वर्ल्ड कप 2010, जिसने रानी की ज़िंदगी बदल दी
वर्ष 2010 में इस युवा खिलाड़ी को महज़ 16 साल की उम्र में अपना पहला वर्ल्ड कप खेलने मिला. रानी ने इस मौक़े को हाथोंहाथ लेते हुए 7 गोल किए और बेस्ट यंग प्लेयर ऑफ़ द टूर्नामेंट घोषित की गईं. रानी इसे अपने करियर का टर्निंग पॉइंट कहती हैं. ‘‘मेरा पहला वर्ल्ड कप मेरे लिए एक यादगार टूर्नामेंट साबित हुआ. मैं उस वर्ल्ड कप की सबसे युवा खिलाड़ी थी. मैंने सोच रखा था कि यह मेरा पहला वर्ल्ड कप है तो मुझे अच्छा खेलना है. हमारी टीम की परफ़ॉर्मेंस अच्छी नहीं रही, पर हमने नौवें नंबर पर फ़िनिश किया, जो पिछले कई वर्ल्ड कप्स की तुलना में हमारी सबसे अच्छी पोज़िशन थी. रही बात मेरी तो मैं टूर्नामेंट की टॉप स्कोरर थी. यंगेस्ट प्लेयर ऑफ़ टूर्नामेंट घोषित की गई थी. कहीं न कहीं इन चीज़ों ने मुझे और अधिक मेहनत करने व अच्छा खेलने के लिए प्रेरित किया. कह सकती हूं 2010 का वर्ल्ड कप मेरी ज़िंदगी का टर्निंग पॉइंट था.’’
जब आप सीनियर टीम में खेल रहे होते हैं, अगर आपकी उम्र कम है और उसी बीच जूनियर टीम का कोई बड़ा टूर्नामेंट आता है तो आपको चुना जा सकता है. इसी आधार पर रानी ने 2009 और 2013 के जूनियर वर्ल्ड कप भी खेले. ‘‘मैं नैशनल टीम में सीधे सीनियर टीम से खेलना शुरू किया. चूंकि मेरी उम्र कम थी इस2लिए मैंने 2009 और 2013 में जूनियर वर्ल्ड कप भी खेला. 2013 में हमारी टीम ने पहली बार जूनियर हॉकी में ब्रॉन्ज़ मेडल जीता. मैं प्लेयर ऑफ़ द टूर्नामेंट रही थी.’’
रियो ओलंपिक की हार, जिसने दिखाई जीत की राह
वर्ष 2016 में ब्राज़ील के रियो में हुए ओलंपिक्स में भारतीय महिला हॉकी टीम 36 साल बाद ओलंपिक खेलों का हिस्सा बनी. हालांकि भारतीय टीम 5 में से अपने 4 मैच हार गई थी और 1 ड्रा के साथ पूल में आख़िरी पायदान पर थी, पर उस वक़्त तक टीम की सीनियर खिलाड़ी बन चुकीं रानी उसे सीखनेवाला अनुभव करार देती हैं. ‘‘हम बहुत एक्साइटेड थे, क्योंकि हमने 36 सालों बाद ओलंपिक्स के लिए क्वॉलिफ़ाई किया था. कई पीढ़ियों के बाद महिला हॉकी टीम का ओलंपिक्स का पहला एक्सपीरियंस था. हां, हमने वहां अच्छा प्रदर्शन नहीं किया था, लेकिन हमने सीखा बहुत था. हमें यह तो पता चला कि ओलंपिक्स खेलने का अनुभव क्या होता है. ओलंपिक्स के बाद से भारतीय महिला हॉकी में जो सुधार आना शुरू हुआ है, वह अविश्वसनीय है. हमने सीखा कि दबाव में कैसे खेला जाता है और बड़े टूर्नामेंट्स में टॉप टीम्स के साथ कैसे कम्पीट किया जाता है. तब से हमारी टीम दिन-ब-दिन अच्छा प्रदर्शन कर रही है. हम टोक्यो ओलंपिक्स के लिए क्वॉलिफ़ाई करने की कोशिश कर रहे हैं. अब चूंकि हम रियो में खेल चुके हैं तो अगर टोक्यो ओलंपिक्स में जाते हैं तो हम वहां अधिक आत्मविश्वास से खेल सकेंगे.’’

 

 

कप्तान, जो टीम की हर खिलाड़ी को मानती है कप्तान
भारतीय महिला हॉकी टीम ने 2017 में एशिया कप जीता, 2004 के बाद ऐसा पहली बार हुआ. 2018 एशियन गेम्स में रानी की कप्तानी में सिल्वर जीता. जब हमने रानी से भारतीय टीम की कप्तान होने के मायने पूछा तो जवाब दिल छू लेनेवाला था. सफलता का श्रेय लेने के मामले में ‘वन मैन शो’ के इस दौर में भारतीय महिला हॉकी टीम की कप्तान रानी रामपाल का टीम के हर खिलाड़ी को कैप्टन कहते हुए सुनना अच्छा लगता है. रानी कहती हैं,‘‘देखिए मॉडर्न स्पोर्ट में हर खिलाड़ी कप्तान होता है. हर खिलाड़ी को अपना काम करना होता है, अपनी ज़िम्मेदारी निभानी होती है. टीम स्पोर्ट्स में हम अकेले नहीं खेल सकते हैं, चाहे वह कैप्टन हो या कोई सीनियर प्लेयर. हमें एक टीम के तौर पर खेलना होता है. अगर हम सब अपनी-अपनी ज़िम्मेदारियां पूरी कर रहे हैं तो हम सभी कैप्टन हैं.’’

 

 

बतौर कप्तान क्या अलग करना होता है, पूछे जाने पर वे कहती हैं,‘‘हां, मेरा एक एक्स्ट्रा काम यह है कि मुझे पूरी टीम को साथ रखना है. बड़े टूर्नामेंट्स में युवा खिलाड़ियों में कई बार नर्वसनेस होती है, उन्हें कॉन्फ़िडेंस और बैकअप देना होता है. लेकिन तीन-चार साल बाद जब इन युवा खिलाड़ियों में परिवक्वता आ जाती है, तब सबको अपनी-अपनी ज़िम्मेदारी का एहसास अपने आप होने लगता है. रही बात कप्तान होने के मायने की तो अपने देश का नेतृत्व करना एक सम्मान की बात है, ऐसा मौक़ा बहुत कम खिलाड़ियों को मिलता है. मुझे अगर यह मौक़ा मिला है तो मुझे अपना काम बहुत अच्छे से करना है. ताकि अपनी टीम की, अपनी खिलाड़ियों की जितनी हो सके उतनी मदद कर सकूं.’’

 

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टोक्यो ओलंपिक्स का टिकट पक्का करना है अगला लक्ष्य
रानी रामपाल 200 से अधिक मैच खेल चुकी हैं. उन्हें नैशनल टीम में आए लगभग 10 साल हो गए हैं. यह एक लंबा वक़्त होता है. इस दौरान उन्होंने इस खेल में काफ़ी बदलाव देखे हैं. जैसे,‘‘पिछले 10 वर्षों में मैंने बदलाव अनुभव किया है. उदाहरण के लिए अब हम साइंटिफ़िकली ट्रेनिंग करने लगे हैं. हमें अधिक एक्सपोज़र मिलने लगा है. अब हमारे खानपान पर भी ख़ास ध्यान दिया जाता है. चोट आदि लगने पर अच्छी देखरेख की जाती है.’’
फिर वह कौन-से कारण हैं, जिसके चलते बड़े टूर्नामेंट्स में भारतीय टीम पीछे रह जाती है? भारतीय कप्तान की मानें तो अब यह पुरानी बातें हैं. ‘‘हम लोग फ़िटनेस के चलते पीछे रह जाया करते थे. स्किल के साथ-साथ टीम की फ़िटनेस भी अच्छी होनी चाहिए, जो इस टीम में है. फ़िटनेस के मामले में भी हमने काफ़ी सुधार किया है. हमारे साइंटिफ़िक एड्वाइज़र वेन लोम्बार्ड ने काफ़ी काम किया है. इस बीच हमारे जितने कोचेस आए हैं, उन्होंने वह सब किया है, जो टीम को इम्प्रूव करने के लिए करना चाहिए. जिसने जो कुछ भी बताया, हम लोगों ने सीखने की कोशिश की है.’’

 
ओलंपिक्स की तैयारियों पर रानी कहती हैं,‘‘हम स्टेप-बाय-स्टेप जाना चाहते हैं. बहुत आगे की सोचेंगे तो अभी के मैचेस पर फ़ोकस नहीं कर पाएंगे. नवंबर में ओलंपिक्स के क्वॉलिफ़ाइंग मैचेस और टूर्नामेंट्स हैं. हमारा पहला लक्ष्य है टोक्यो के लिए क्वॉलिफ़ाई करना. उसके बाद आगे की योजना बनाएंगे. हम हर मैच में बतौर टीम अच्छा करने की कोशिश करते हैं. हम इसलिए भी अच्छा खेलना चाहते हैं, ताकि लोगों को पता चल सके कि महिला हॉकी टीम भी है. टीम का फ़्यूचर बहुत अच्छा है. पिछले दो सालों में टीम ने बहुत इम्प्रूव किया है. हमें काफ़ी खेलने मिल रहा है. इससे अच्छा एक्सपोज़र मिल रहा है. यदि यह सिलसिला चलता रहा तो टीम और ज़्यादा अच्छा करेगी.’’

 

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