अच्छी सोच

सोचिएगा कामरेड! कैसे बदला ‘उत्तम खेती, मध्यम बान, नीच चाकरी, भीख निदान’ की कहावतों का देश

कृषि के लिए किसान क्या पशु रखना चाहेगा? सुरक्षा है ही नहीं- न जीवन की, न चोरी से बचाने की, न ही चोरी होने पर किसी मुआवजे की, न चोरी रोकने के प्रयास में जान न जाने की! किसान ने पशु रखने छोड़ दिए और वह किराए की मशीनों पर निर्भर रहने लगा।

 

 

कभी सोचा है कि “उत्तम खेती, मध्यम बान, नीच चाकरी, भीख निदान” की कहावतों वाले देश में लोग बदले कैसे? आखिर यह कैसे हुआ कि लोग कृषि को उत्तम, वाणिज्य को मध्यम और नौकरी को ओछा मानने के बदले इसका उल्टा सोचने लगे? एक आम आदमी अपना पेशा, या कोई काम किस आधार पर चुनता है? पहले तो वह यह देखेगा कि उसकी रुचियाँ और कौशल क्या हैं, फिर वह यह भी देखेगा कि जो पेशा या काम वह चुनने जा रहा है, वह कितनी आर्थिक सुरक्षा देता है। ऐसा सोचते ही किसी भी पढ़े-लिखे व्यक्ति को याद आ जाएगा कि एक सरकारी नौकरी पाना जरूर मुश्किल हो, लेकिन उसका छूटना या ख़त्म हो जाना तो करीब-करीब नामुमकिन है। वह सबसे अधिक सुरक्षा देती है।

 

 

 

इसकी तुलना में अगर व्यापार को देंखें, तो नेहरू युग वाली समाजवादी व्यवस्था में उसे दुष्टों का काम और व्यापारियों को धूर्त बताया जाता रहा। करीब पाँच दशक की इस व्यवस्था ने व्यापार की जो छवि बनाई, उससे काफी पहले सत्ता का समर्थन हटाकर, शोषण बढ़ाकर, कृषि की वही दशा की जा चुकी थी। “डोगूना लागान डेना पड़ेगा” केवल एक फ़िल्मी डायलॉग भर नहीं है। एक फिरंगी सत्ता द्वारा इसके ज़रिए करीब डेढ़ सौ साल किसान का खून पिया जाता रहा। अगर मुग़ल काल में भी देखेंगे तो यह नजर आ जाएगा कि तुलनात्मक रूप से कृषि पर टैक्स काफी ज्यादा था। एक लम्बा समय लगा, मगर कृषि और वाणिज्य-व्यापार धीरे-धीरे पीछे की जगह लेने लगे।

 

 

 

धीरे-धीरे जैसे जैसे समय बदला वैसे-वैसे सरकारी नौकरियों की गिनती कम होने लगी और निजी क्षेत्र में अवसर बढ़े। युवाओं को समझ में आने लगा कि सुरक्षा बस एक भावना है। किसी निजी कंपनी में नौकरी कोई भरोसेमंद चीज़ नहीं होती, वह जा सकती है, बदल भी सकती है। अब जब अनिश्चितता उतनी भयावह नहीं दिखने लगी तो कई युवा वापस वाणिज्य और कुछ बहुत थोड़े से कृषि की ओर भी मुड़े। यह आम लोगों की बात थी, सरकार की नहीं, क्योंकि सरकार अभी भी अधिकांश उसी व्यवस्था पर चल रही थी जो विदेशियों ने कभी भारत पर शासन करने के लिए बनाई थी। यह वह व्यवस्था थी जिसके लिए खुद नेहरू ही कहा करते थे कि न तो यह भारतीय है, ना ही इनका व्यवहार नागरिक है और सेवा तो यह किसी तरह नहीं। (आज के आईएएस को उस दौर में आईसीएस यानी इंडियन सिविल सर्विस कहा जाता था।)

 

 

अब जब बात कृषि तक पहुँच चुकी है, तो अपने आस-पास पड़े मोबाइल फ़ोन के बारे में सोचिए। कभी न कभी इसके खोने/चोरी होने का सामना खुद या किसी मित्र/परिचित को करना ही पड़ा होगा। उस स्थिति में क्या इसकी पक्की रिपोर्ट (जिसमें एफआईआर नंबर और कॉपी मिलती है) करवाई थी, या बस एक आवेदन देकर आ गए थे? संभवतः एक आवेदन देकर उसकी प्राप्ति (रिसीविंग कॉपी) नया सिम कार्ड लेने के लिए रख ली होगी। ऐसा संभवतः इसलिए किया था क्योंकि खरीद की रसीद और सच में चोरी ही हुई है उसका प्रमाण जुटाना और पक्की एफआईआर करवाना बहुत समय लेने वाला और मुश्किल काम होता है। आपने आसान तरीका चुना, क्योंकि फ़ोन के लिए ₹20-25 हजार जुटा लेना आपके लिए उतना मुश्किल नहीं था।

 

 

किसान के लिए यह उतना आसान नहीं। उसके लिए एक पशु (गाय-बैल) खरीदने के ₹20-25 हजार जुटाना कुछ वर्षों की मेहनत का मामला है। उसकी चोरी होने पर एफआईआर लिखवाना और भी मुश्किल होगा, क्योंकि किसान न तो आप जितना पढ़ा-लिखा है, न उतने रसूख वाला है, न ही आर्थिक तौर पर मजबूत है। ऊपर से यह भी जोड़िए कि पशु-तस्कर रास्ते में आने वाले पुलिसकर्मियों पर गाड़ी चढ़ाने से हिचकते नहीं। चोरी के दौरान पशु के मालिक के जाग जाने पर उसे गोली मार देने की घटनाएँ आम हैं। हरियाणा में अभी हाल में ही दो ऐसे मामले चर्चा में रहे हैं जिसमें पशु-तस्करों को रोकने की कोशिश में किसान को गोली मार दी गयी और उसे कोई अख़लाक़ जैसे करोड़ों का मुआवजा तो छोड़िए, देखने तक नहीं गया।

 

 

ऐसे में कृषि के लिए किसान क्या पशु रखना चाहेगा? सुरक्षा है ही नहीं- न जीवन की, न चोरी से बचाने की, न ही चोरी होने पर किसी मुआवजे की, न चोरी रोकने के प्रयास में जान न जाने की! किसान ने पशु रखने छोड़ दिए और वह किराए की मशीनों पर निर्भर रहने लगा। अधिकांश ग्रामीण किसान ऐसे ही मिलेंगे जो खुद का ट्रैक्टर, हार्वेस्टर, थ्रेसर जैसी मशीनें नहीं खरीदते। वह खेत जोतने या दौनी जैसे कामों के लिए पशु भी नहीं रखते। वह गाँव या आस-पास के ही किसी अमीर किसान से मशीन किराए पर लेते हैं। इन पालतू पशुओं के न होने से क्या नुकसान हुआ? जो पुआल या तो भूसा बनकर पशुओं के चारे में काम आता था या फिर कच्चे मकानों की छत बनता था, वह अब किसी काम का नहीं बचा। सिर्फ एक गाय-बैलों पर से ध्यान हटते ही खेतों में कई-कई एकड़ ऐसा पुआल जमा हो गया, जो किसी काम नहीं आ सकता। यह घास की तरह आसानी से गल जाने वाली चीज़ भी नहीं थी जो सीधा इसे खेत में ही जोत देते। पशुओं के चारे की तरह बेचने का विकल्प नहीं बचा तो इसे जलाना किसान की मजबूरी थी।

 

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दिल्ली जैसे राज्यों में अंग्रेजों के दौर से ही गाय पालने पर पाबंदियाँ हैं। आस-पड़ोस के राज्यों से जब पशु घटे और खेत में पुआल जलने लगा तो धुआं दिल्ली तक भी पहुँचने लगा। अब साँस लेने में दिक्कत हो रही हो, तो परेशानी की जड़ में भी जाने की सोचिएगा कामरेड। सोचने पर फ़िलहाल जीएसटी नहीं लगता, और कंधे उचकाकर चल देने से धुआँ तो पीछा छोड़ने से रहा!

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