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एशिया की वह पहली महिला, जो पीडब्ल्यूडी विभाग में बनीं चीफ इंजीनियर!

भारत में इंजीनियरिंग का क्षेत्र आज भी पुरुष-प्रधान है। उच्च शिक्षा पर एक अखिल भारतीय सर्वेक्षण के अनुसार, आर्ट्स और साइंस के बाद इंजीनियरिंग में सबसे ज़्यादा दाखिले होते हैं, जिनमें सिर्फ़ 28.6% महिलाएं हैं। यह स्थिति सिर्फ़ भारत में ही नहीं है बल्कि पूरी दुनिया में है।

 

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स्त्रोत: (बाएं से दायें) थ्रेसिया, लेल्लम्मा और ललिता- भारत की पहली महिला इंजीनियर्स

 

इसलिए, आज की पीढ़ी को उन महिलाओं की कहानी जानना बहुत ज़रूरी है जिन्होंने भारत में सबसे पहले इंजीनियरिंग की डिग्री हासिल करके, इस क्षेत्र में अपनी जगह बनाई। यह उनकी हिम्मत और जज़्बे का ही कमाल है कि आज लगातार इंजीनियरिंग करने वाली लड़कियों की तादाद में बढ़ोतरी हो रही है।

 

 

मद्रास यूनिवर्सिटी के कॉलेज ऑफ इंजीनियरिंग से ग्रेजुएशन करने वाली पहली तीन महिलाओं में से एक पी. के. थ्रेसिया थीं। ललिता और लेल्लम्मा बाकी दो इंजीनियर ग्रेजुएट थीं। इन तीनों में से ललिता देश की पहली लड़की थीं जिन्होंने इंजीनियरिंग की डिग्री हासिल की।

 

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द बेटर इंडिया को दिए एक इंटरव्यू में, ललिता की बेटी श्यामला ने बताया कि भले ही थ्रेसिया और लेल्लम्मा, ललिता से एक साल जूनियर थीं पर उन तीनों को डिग्री साल 1944 में साथ में ही मिली थी। क्योंकि, द्वितीय विश्व युद्ध के चलते यूनिवर्सिटी को क्लासेस बंद करनी पड़ी थीं।

 

थ्रेसिया ने सिविल इंजीनियरिंग की डिग्री की और उन्होंने कोचीन में ब्रिटिश राज के अंतर्गत पब्लिक वर्क कमीशन में सेक्शन ऑफिसर के तौर पर नौकरी ली। इसके बाद, वह साल 1971 में केरल के पब्लिक वर्क्स डिपार्टमेंट में पहली महिला चीफ इंजिनियर नियुक्त हुईं। इस पद पर उन्होंने आठ साल काम किया। किसी भी राज्य के पीडब्ल्यूडी डिपार्टमेंट में बतौर चीफ इंजिनियर काम करने वाली वह पूरे एशिया में पहली महिला थीं।

 

साल 1971 में जब उनका प्रमोशन हुआ तो केरल के मलयालम मनोरमा को दिए एक साक्षात्कार में उन्होंने कहा था, “मैं सिर्फ़ 3 महीने के लिए ही ऑफिस में थी। पर तब मैंने समझा कि एक इंजीनियर की ज़िंदगी इतनी भी कठिन नहीं है जितना कि औरतें इसे समझती हैं।”

पीडब्ल्यूडी में अपनी नियुक्ति के कुछ समय बाद ही, थ्रेसिया को केरल के मुलकुन्नत्तुकावू में टी.बी. सैनाटोरियम के लिए असिस्टेंट कंस्ट्रक्शन इंजीनियर के पद पर प्रमोट कर दिया गया। इस बाद साल 1956 में उन्हें एग्जीक्यूटिव इंजीनियर बना दिया गया और वह एर्नाकुलम आ गई।

 

थ्रेसिया ने अपने चीफ इंजीनियर के कार्यकाल के दौरान उन्होंने कई महत्वपूर्ण निर्माण कार्यों को किया। उन्होंने हर साल लगभग 35 नए पुल और सड़क-निर्माण प्रोजेक्ट कमीशन किए। साथ ही, उन्होंने कोड़िकोड मेडिकल हॉस्पिटल से जुड़े हुए महिला और बच्चों के अस्पताल के निर्माण का कार्यभार भी संभाला।

थ्रेसिया निर्माण कार्यों में एक्सपेरिमेंट करने में भी पीछे नहीं रहती थीं। उन्होंने केरल में रबरयुक्त बिटुमन (डामर) सड़कों का निर्माण शुरू करवाया। उन्हें भारतीय सड़क कांग्रेस की सदस्य बनने का मौका भी मिला।

 

12 मार्च 1924 को एक इसाई परिवार में जन्मी थ्रेसिया अपने छह भाई-बहनों में दूसरे नंबर पर थीं। उनके पिता, कक्काप्पन, केरल के त्रिशूर जिले के एडथिरुथी गाँव में किसान थे। थ्रेसिया के इंजीनियरिंग करने के सपने में उनका सबसे ज़्यादा साथ उनके पिता ने दिया। उन्होंने कत्तुर के सैंट मैरी हाई स्कूल से अपनी पढ़ाई की और उसके बाद मद्रास के कॉलेज ऑफ इंजीनियरिंग में दाखिला लिया, क्योंकि उस वक़्त केरल के इकलौते इंजीनियरिंग कॉलेज में लड़कियों को दाखिला नहीं मिलता था।

 

थ्रेसिया के इंजीनियरिंग पूरी करने के दो साल बाद ही उनके पिता का देहांत हो गया। इसके बाद उनकी माँ ने उनके पूरे परिवार की ज़िम्मेदारी संभाली।

 

 

थ्रेसिया ने अपनी पूरी ज़िंदगी अपने काम और सपनों को दे दी और उन्होंने कभी भी शादी नहीं की। केरल के पीडब्ल्यूडी में लगभग 34 साल काम करने बाद 1979 में उन्होंने रिटायरमेंट ली। रिटायरमेंट के बाद उन्होंने अपनी कंपनी, ‘ताज इंजिनियर्स’ शुरू की।

 

 

एक साक्षात्कार के दौरान उन्होंने कहा था, “मैंने उस समय काम करना शुरू किया जब महिलाओं का सर्विस में होना बहुत ही बड़ी बात थी। लेकिन, मुझे कभी इस बात पर पछतावा नहीं हुआ कि मैं एक महिला हूँ।”

 

 

द बेटर इंडिया, भारत की इस बेटी को सलाम करता है। थ्रेसिया आज हर उस लड़की के लिए प्रेरणा हैं जो कि इंजीनियरिंग के क्षेत्र में अपना करियर बनाने का सपना देखती है!

 

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इनके माता-पिता

 

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