अखण्ड भारत

महात्मा गाँधी और पर्यावरण

महात्मा गांधी जी ने भारतीय संस्कृति के प्राचीन वैदिक संस्कृत साहित्य, दर्शन, विचारों एवं सिद्धान्तों को चिन्तन, मनन एवं मंथन के उपरान्त सत्य और सामयिक परिस्थितियों की कसौटी पर परख कर भारतीय परिस्थितियों में नवीन स्वरूप प्रदान किया। आपने प्राचीन सिद्धान्त, परम्पराओं में सत्य एवं अहिंसा को प्राकृतिक सामाजिक एवं राजनैतिक क्षेत्रों में विलक्षण ढंग से क्रियान्वित करने की कल्पना प्रदान की, ताकि भारतीय समाज ही नहीं बल्कि सृष्टि के सभी घटक स्वाभाविक रूप से आनन्दमय जीवन व्यतीत कर सकें।

 

 

महात्मा गाँधीजी ने सृष्टि के सभी बिन्दुओं और समस्याओं पर अपने व्यवहारिक विचार एवं समाधान व्यक्त किए हैं। विज्ञान की प्रगति के फलस्वरूप विभिन्न तकनीकियों का आविष्कार और उसके उपयोग से होने वाले सम्भावित विनाश का उन्होंने पूर्व अनुमान कर लिया था। भौतिक मूल्यों पर आधारित आधुनिक टेक्नोलाॅजी गाँधीजी के मूल्यों के प्रतिकूल है। उनका दृढ़ विश्वास रहा है कि मानवीय मूल्यों को प्रतिष्ठित करके ही समाज को विभिन्न संकटों से बचाया जा सकता है।

 

 

भौतिकवादी प्रगति की ताबड़-तोड़ होड़ से प्राकृतिक वातावरण असंतुलित होता है, हमारे परम्परागत मूल्यों पर गहरा कुठाराघात होता है, जिससे हमारे सांस्कृतिक मूल्यों में गिरावट आती है। सांस्कृतिक मूल्यों में गिरावट आने का मतलब है हमारे सामाजिक, आर्थिक, राजनैतिक एवं प्राकृतिक वातावरण का अस्वच्छ हो जाना। अतः हमारे भारतीय समाज में भारतीयों का ही नहीं बल्कि सृष्टि के सभी लोगों का सर्वांगीण विकास एवं उत्थान चाहने की जन्मजात अभिवृत्ति रही है। अतः प्राकृतिक वातावरण को स्वच्छ बनाये रखना हमारे लिये वांछित है। गाँधीजी 21वीं शताब्दी की भयंकर समस्याओं का पूर्वानुमान कर चुके थे। उनका पक्का विश्वास था कि आणविक युद्ध एवं प्राकृतिक विध्वंस से विश्व संस्कृति एवं सामाजिक जीवन-प्रक्रिया सर्वाधिक प्रभावित होगी।

 

 

इसीलिये अणु-शस्त्रों के निर्माण एवं प्राकृतिक संसाधनों को सुरक्षित रखने हेतु समय-समय पर वह अपनी करुणा भरी सलाह प्रदान करने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ते थे। आज यंत्रवाद एवं औद्योगीकरण से प्राकृतिक संसाधनों का द्रुतगति से अन्त किया जा रहा है जो कालान्तर में मानवता के अन्त का निमंत्रण लेकर आने वाला है। वह विज्ञान से जीवन-रक्षा और ज्ञान विकास जैसी उपादेयता से समाज को वंचित रखने के पक्ष में नहीं थे। वह बड़े-बड़े उद्योगों की स्थापना के विरोधी इसीलिये थे कि वह औद्योगिक संस्कृति हमारी प्राकृतिक संस्कृति को समाप्त कर देगी और भौतिकवादी संस्कृति का साम्राज्य सृष्टि पर स्थापित हो जायेगा। उनके विचार थे कि वैज्ञानिक संस्कृति में प्राकृतिक जीवन दर्शन लुप्त हो जायेगा। औद्योगिक संस्कृति में जलवायु तापमान, रहन-सहन, पारिस्थितिकी सभी असन्तुलित हो जाते हैं। इसी तरह उद्जन वमों के प्रयोग में प्राकृतिक वातावरण इतना प्रदूषित हो जाता है, जिससे लाखों शिशु विकलांक एवं विक्षिप्त पैदा होते हैं। इस प्रकार गाँधी जी यंत्रवादी सभ्यता के मायाजाल से दूर रहकर ही समाज को प्राकृतिक वातावरण में ईश्वर प्रदत्त वायु, जल, ऊर्जा, एवं आरण्य संस्कृति को सुरक्षित रखने की अनुशंसा करते रहे थे। गाँधीजी समझते थे, कि यन्त्रीकरण से औद्योगीकरण और शहरीकरण का होना स्वाभाविक क्रिया है। वह महसूस करते थे कि ऐसी परिस्थिति में मानव का जीवन ही अप्राकृतिक एवं यान्त्रिक बन जायेगा।

 

 

जब वन्य पशु पक्षी एवं प्राकृतिक वातावरण नष्ट हो जाएँगे और कोलाहलपूर्ण वातावरण का साम्राज्य हो जाएगा तब आत्महत्याएँ और मानसिक व्याधियों में वृद्धि होगी, परिणामतः जीवन की प्रफुल्लता समाप्त हो जाएगी। जब विज्ञान द्वारा प्रदत्त यंत्र जीवन (परखनली बालक), भोजन, पौष्टिक पदार्थ, विटामिन एवं प्रोटीन अप्राकृतिक ढंग से उपलब्ध करवाने लग जायेंगे तो प्राकृतिकता से हमारा नाता टूट जाएगा। जब प्राकृतिक वातावरण से हम अलग-थलग हो जाएँगे तो हमारी प्राचीन ढंग से सोचने समझने, कल्पना करने, सृजन करने एवं शौर्य के बल पर विजय करने की शक्ति समाप्त हो जायेगी और हम सदैव यंत्रों की संस्कृति का मुँह देखते रहेंगे। अतः गाँधीजी मानसिक व्याधियाँ पैदा करने वाली ‘यंत्र-संस्कृति’ की अपेक्षा ‘प्राकृतिक संस्कृति’ को सुरक्षित रखने के पक्षधर रहे हैं, जिससे प्राकृतिक पर्यावरण सन्तुलित रह सके।

 

 

 

आधुनिक काल में विज्ञान के विकास से मानवीय कल्याण एवं सभ्यता के मूल्यों में वृद्धि होने की अपेक्षा ह्रास होता जा रहा है। उद्योग क्रान्ति हमारी आवश्यकताओं की पूर्ति एवं कल्याण के लिये साधन के रूप में प्रयोग में ली गई थी, जबकि आज वह साध्य बनकर प्राकृतिक संसाधनों का द्रुत गति से विनाश करती जा रही है। इसे पुनः पूर्व स्थिति में लाया नहीं जा सकेगा। गाँधी जी ने उद्योग, विज्ञान एवं यन्त्रों को मानव कल्याण का साधन माना है और मनुष्य को परम साध्य। ऐसी मानसिकता से ही द्रुतगति से प्राकृतिक संसाधनों का हो रहा विध्वंस रुक सकता है और पर्यावरण सन्तुलन बना रह सकता है, जो हमारी सांस्कृतिक धरोहर है।

 

 

 

औद्योगीकरण से सर्व-सुलभ और व्यापक प्रचार साधनों द्वारा उद्योगवादी सभ्यता का प्रसार होने के कारण जल, वायु, मुद्रा एवं सामाजिक प्रदूषण का जन-जीवन पर परोक्ष एवं अपरोक्ष रूप से प्रभाव पड़ना स्वाभाविक है। भौतिक समृद्धि को प्राप्त करने की दृढ़ इच्छाशक्ति से अधिकाधिक उत्पादन करने की लालसा में व्यक्तिगत लाभ प्राप्त करने की मंशा निहित है। व्यक्तिगत लाभ प्राप्ति के उद्देश्य से समाज के हितों को तिलांजली देने की अभिवृत्ति का विकास द्रुत गति से हो रहा है।

 

 

यन्त्र और उद्योग मानव संस्कृति के लिये हैं। जो यन्त्र और उद्योग हमारे प्राकृतिक प्रदूषण का विस्तार करते हों, ऐसे उद्योग हमारे लिये हानिकारक हैं। इसके विपरीत लघु उद्योग हमारे सामाजिक एवं सांस्कृतिक मूल्यों के अनुकूल हैं और प्रदूषण विस्तार भी नहीं करते। कुटीर उद्योग स्थानीय आवश्यकताओं के अनुरूप स्थानीय श्रमिकों द्वारा स्थानीय संसाधनों का दोहन कर हमारी सामाजिक व्यवस्था में निरन्तरता बनाए रखते हैं और बड़े उद्योगों के कारण फैलने वाले प्रदूषणों से बचाव भी हो जाता है। स्थानीय श्रमिक सदैव प्रकृति का दोहन उतना ही करना चाहता है जितना कि उसे आवश्यकता है। प्रलोभन व संचय की वृत्ति उनमें नहीं होती जिससे पर्यावरण पर प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ता।

 

 

अतः वे पारिस्थितिकी सन्तुलन के प्रति संवेदनशील होते हैं। इसके विपरीत बड़े-बड़े उद्योगपतियों में इन स्थानों से भावात्मक सम्बन्ध न होने के कारण द्रुतगति से प्राकृतिक साधनों का विध्वंस कर अधिकतम लाभ प्राप्त करने की इच्छाशक्ति प्रबल रहती है। ये स्थान विशेष कर संसाधनों की समाप्ति होने की स्थिति में अन्यत्र जाकर विध्वंस कार्य प्रारम्भ कर देते हैं, क्योंकि भौतिकवादी शक्ति प्रचुर मात्रा में उनके पास रहती है। यही कारण है कि गाँधीजी ने कुटीर उद्योग को भारतीय समाज के लिये उपयुक्त समझा था। कुटीर उद्योग की संस्कृति हमारे लिये परम्परागत सांस्कृतिक मूल्यों को बनाये रखते हुए पारिस्थितिकी सन्तुलन बनाये रखने में भी सहायक सिद्ध होती है।

 

 

जब बड़े-बड़े उद्योग स्थापित होते हैं, शहरीकरण का विकास होता है, और उद्योगों के लिये क्षेत्रों का निर्धारण होता है तो बड़े-बड़े बाँध बनाकर ऊर्जा आपूर्ति की जाती है। बाँध निर्माण से मृदा एवं जल प्रदूषण की विकट समस्याओं के अतिरिक्त ऊर्जा के साधनों की किसी भी समय आपूर्ति न होने से ऊर्जा पर आधारित उद्योग एवं सार्वजनिक सफाई कार्य में बाधा का आना भी स्वाभाविक है। अतः गाँधीजी ने यह अनुशंसा की, कि जहाँ तक सम्भव हो भारी उद्योगों की स्थापना कम से कम हो। भारी उद्योगों की स्थापना का मतलब है अधिक ऊर्जा, अधिक कच्चा माल, अधिक यातायात के साधन एवं अधिक बाजार। ये सभी परोक्ष एवं अपरोक्ष रूप से पर्यावरण पर प्रतिकूल प्रभाव डालते हैं।

 

 

फिर भी हम मानव से दानव रूप धारण कर प्रकृति को विध्वंस करने पर उतारू हो जाते हैं। ऐसी स्थिति में ईश्वर प्रकृति को अतिवृष्टि एवं अकाल के रूप में बदला लेने को उत्प्रेरित करते हैं। अतः हमें अपनी पवित्रता और समाज व प्रकृति के प्रति साम्य रखना चाहिए। गाँधीजी ने प्रकृति के सौंदर्य के सामने मानव-निर्मित सब कलाओं का सौंदर्य तुच्छ माना है।

 

 

आज देश में ‘शहरीकरण’ एवं ‘महानगरीकरण’ और उनकी चकाचौंध, तड़क-भड़क से आकर्षित होकर लोग गाँवों से पलायन करते जा रहे हैं। इसका प्रमुख कारण है कि ग्राम विकास पर अधिक जोर नहीं दिया जा सका है। ग्राम आत्मनिर्भर उसी समय हो सकता है जब ग्रामीणों को सभी परम्परागत सुख-सुविधाएँ प्रचुर मात्रा में उपलब्ध कराई जा सकें। वे अपने ग्राम में रहकर प्राकृतिक संसाधनों का दोहन भी संवेदनशील होकर करेंगे तो पर्यावरण असन्तुलन की समस्या उभर कर सामने नहीं आयेगी। जब अपने गाँव के प्रति संवेदनशील होंगे तो अपवित्र ढंग से साधनों का उपयोग नहीं करेंगे।

 

 

अब प्रश्न उठता है, क्या वैज्ञानिक प्रगति एवं औद्योगीकरण के फलस्वरूप पर्यावरण प्रदूषित हुआ है तो क्या इससे केवल हानियाँ ही हुई हैं वस्तुतः ऐसा मानना सिक्के के एक पहलू को ही निहारना है क्योंकि विज्ञान के आविष्कार के फलस्वरूप विभिन्न रोगों को जानकर उनके निवारणार्थ बनी औषधियों से मृत्यु-दर कम हुई है। इसी प्रकार प्रभावी औद्योगीकरण के फलस्वरूप मानव शक्ति एवं श्रम की हानि को रोका जाना सम्भव हुआ है।

 

 

हाँ, यह माना जा सकता है, कि तकनीकी ज्ञान- औद्योगीकरण, शहरीकरण तथा वैज्ञानिक आविष्कारों के फलस्वरूप ध्वनि, वायु, मिट्टी एवं जल के प्रदूषित होने से मानवता खतरे में पड़ी है जिससे ‘सर्वोदय’ समाज का अस्तित्व खतरे में पड़ा है। किन्तु इस प्रदूषण को नियंत्रित करने के तरीके भी वैज्ञानिक खोजों के फलस्वरूप ईजाद किए जा सकते हैं। प्रदूषण के स्रोतों से ही प्रदूषण तत्वों को नियंत्रित किया जा सकता है। जैसे शहर एवं गाँवों के कूड़े-कचरे को वैज्ञानिक ढंग से खाद में परिवर्तित किया जा सकता है जिससे उन्नत खेती सम्भव हो सके। इसी प्रकार फैक्ट्रियों एवं पावर स्टेशनों की चिमनियों से उड़ने वाली राख से सीमेंट एवं ईटों का निर्माण किया जाए तो आवास की समस्या का सहज ही समाधान हो सकेगा तथा प्रदूषण की रोकथाम भी की जा सकेगी।

 

 

 

इतना ही क्यों, कच्चे पदार्थों और तेल शोधक संस्थाओं से प्राप्त सल्फर और सल्फर डाई-ऑक्साइड का प्रयोग, सल्फरिक एसिड बनने में किया जा सकता है। तदनुरूप ही वायु, पृथ्वी, नदियाँ जलाशयों के शुद्धिकरण हेतु भगीरथ प्रयास किए जाएँ जैसे-गंगा, नर्मदा के जल को शुद्धिकरण के प्रयास राष्ट्रीय स्तर पर किए जा रहे हैं और अच्छे परिणाम भी प्राप्त हो रहे है। बसों, ट्रकों, हवाई जहाजों हेलीकॉप्टरों, सड़कों के ट्रैफिक, ट्रेनों, एयरकंडीशनरों, आॅफिस मशीनों द्वारा उत्पन्न शोर को भी तकनीकी एवं वैज्ञानिक ज्ञान से नियंत्रित किया जा सकता है।

 

 

इसी प्रकार वैज्ञानिक आविष्कारों के बावजूद पर्यावरणीय प्रदूषण पर रोक लगाई जा सकती है जिससे मानव सभ्यता का विकास भी होता रहे तथा पर्यावरणीय प्रदूषण से मानवता को बचाया जा सके। वस्तुतः वैज्ञानिक शोधों को मानव कल्याणकारी कार्यों के लिये प्रयोग में लाने पर सर्वोदयी गाँधी दर्शन की अवधारणा को मूर्त रूप दिया जा सकता है।

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