अच्छी सोच

जीवन की मूलभूत आवश्यकता: टाल्सटाय के विचार

इस समस्या का सन्तोषजनक हल करने का एकमात्र मार्ग यही है कि हम मनुष्य की मूलभूत जीवन-आवश्यकताओं पर विचार करें और उनको अपनी कार्य-पद्धति में अनिवार्य रूप से स्थान दें। इस दृष्टि से विचार करने पर हमको यही मानना पड़ेगा कि जीवन की सर्व प्रथम आवश्यकता ‘रोटी’ है और दूसरा नम्बर ‘कपड़ा’ का हो गया है। अन्य सब आवश्यकतायें ऐसी हैं कि जिनकी पूर्ति दो-चार दिन न भी हो तो किसी तरह काम चलाया जा सकता है। पर रोटी और कपड़ा का दूसरा कोई विकल्प नहीं हो सकता। इस सिद्धान्त का विवेचन करते हुए आधुनिक युग के ऋषि महात्मा टाल्सटाय ने लिखा था—

 

 

‘‘हमारी प्रचलित समाज-व्यवस्था अत्यन्त विचित्र है। हममें से एक आदमी मन्दिर में पुजारी का काम करता है, दूसरा सेना के संगठन में लगा है, तीसरा न्यायधीश का कार्य करता है। चौथा पुस्तकों का अध्ययन और रचना करता है, पांचवां लोगों की चिकित्सा करता है, छठा बालकों को स्कूल में पढ़ाता है। इन सब लोगों ने उपर्युक्त कार्यों के करने का बहाना बनाकर रोटी के लिये शारीरिक श्रम करने का कर्तव्य त्याग दिया है और उसे दूसरे लोगों पर लाद दिया है। वे इस बात को भूल जाते हैं कि मन्दिर के पुजारी, सेना के अफसर, अदालत के जज, डॉक्टर, मास्टर आदि सब प्रकार के लोगों को सबसे पहले इस बात की आवश्यकता होती है कि उनको रोटी देकर भूखों मरने से बचाया जाय।

 

 

हम इस बात का जरा भी ख्याल नहीं करते कि मनुष्यों के असंख्यों प्रकार के कर्तव्यों में से कुछ का नम्बर उनके महत्व और उपयोगिता की दृष्टि से सबसे पहले आता है और कुछ का बाद में। हमको चाहिये कि हम प्रारम्भिक कर्तव्य को पूरा किये बिना अन्तिम कर्तव्य को पालन करने का प्रयत्न न करें। और वह कर्तव्य यही है कि हम अपनी रोटी को उत्पन्न करने में प्रत्यक्ष रूप से कुछ शारीरिक श्रम करें।’’

 

 

शायद आप तुरन्त यह आपत्ति पेश करेंगे कि ऐसा होने से तो मानव-समाज के लिये होने वाले अनेक महत्वपूर्ण कार्यों में बाधा पड़ जायेगी और उनके बौद्धिक विकास में कमी होने लगेगी। सभ्यता और संस्कृति, ज्ञान और विज्ञान की वर्तमान आश्चर्यजनक प्रगति श्रेणी-विभाजन और विशेष कार्यों में कुशलता प्राप्त करने से ही सम्भव हुई है। यदि इसमें रुकावट डाली जायेगी तो मानव-समाज पुनः उसी अर्ध-सभ्य दशा की तरफ लौटने लगेगा! यह दलील निस्सार और एक बहाना ही है। आठ घण्टे में एक घण्टे का अथवा बारह महीने में डेढ़ महीने का शारीरिक श्रम अपनी बौद्धिक योग्यता तथा प्रगति को घटाने के बजाय उल्टा बढ़ायेगा ही। शरीर के विकास के साथ मानसिक और बौद्धिक शक्तियों का विकास भी जुड़ा हुआ है। अगर हमारे शरीर को श्रम करने का अभ्यास बना रहेगा और इससे वह सशक्त और सुदृढ़ होगा तो हमारे मन तथा बुद्धि भी अधिक शुद्ध, तीव्र और कार्यक्षम अवस्था में रहेंगे।

 

 

पर असली कठिनाई यह है कि हम इस अर्थ मूलक युग की माया में फंसकर शाश्वत मानव-मूल्यों को अधिकांश में भुला बैठे हैं। हमारे सोचने का तरीका केवल यही रह गया है कि हम जिस उपाय से हल्का, ‘प्रतिष्ठित’ समझा जाने वाला काम करके थोड़े समय में अधिक रुपया प्राप्त कर सकते हैं। उस कार्य का वास्तविक परिणाम समाज, देश, राष्ट्र और स्वयं हमारे लिये क्या होता है, इस पर बहुत कम विचार करते हैं। हमारी सफलता की एक मात्र कसौटी अधिक धन, अधिक आमदनी अधिक वेतन, अधिक मजदूरी ही रह गई है। उससे आगे चल कर हमारा या दूसरों का क्या हानि-लाभ होगा, इस पर विचार करने की आवश्यकता कोई नहीं समझता।

 

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