इतिहास

किसान क्यों जहर खाकर अपनी जान दे रहा है? क्यों खेत बेचने पर मजबूर हो रहा है?

कुछ हकीकत अनुभव से ही सामने आ पाती है। अनुभव ही है जो आदमी को मुकम्मल बनाता है। हालांकि यह भी जिंदगी भर जारी रहने वाली एक प्रक्रिया है। शिक्षा भले ही स्कूल-कॉलेजों में मिलती है, लेकिन अनुभव दुनिया देखने-सुनने और वक्त से टकराने के बाद ही मिलता है। जिंदगी के कुछ पूर्वाग्रह धीरे-धीरे साफ होते हैं। इसमें पुस्तकें बहुत सहायक नहीं हुआ करतीं। ऐसा ही एक सिद्धांत-सा बन गया है कि ‘भारत गांवों में बसता है।’

 

 

इससे कौन इनकार कर सकता है! यह धु्रव सत्य छोटी-बड़ी, नई-पुरानी पुस्तकों में पढ़ा जा सकता है। नए-पुराने लोगों से सुना जा सकता है। नेता भी अक्सर इस बात को कहते हुए मिल जाते हैं। यह लगभग मानी हुई बात है कि गांव शहर की तुलना में अधिक मानवीय, अधिक संवेदनशील, अधिक भावुक और भावनाशील होते हैं। इंसानियत अगर देखनी है तो शहर में नहीं, गांव जाकर देखी जा सकती है। इसलिए भारत शहरों में नहीं, गांवों में बसा है। गांवों में अधिकतर किसान ही हैं, क्योंकि भारत की सत्तर फीसद आबादी किसान रहे हैं। भले ही यह आंकड़ा अब तेजी से घट रहा है।

 
मैं बीसवीं सदी के सातवें दशक में एक किसान गांव में ही जन्मा, पला-बढ़ा। बाद में शिक्षा प्राप्त करने के लिए गांव छोड़ कर शहर आया और जीवन की व्यस्तताओं के चलते इक्कीसवीं सदी के दूसरे दशक में एक मझोले शहर में रह रहा हूं।

 

 

प्रदेश और देश की राजधानी में शिक्षा पाने के दौरान रहना और समझना हुआ, तब से लेकर आज तक यही सुनने को मिलता रहा कि भारत देखना हो तो शहर में नहीं, गांवों में जाओे क्योंकि भाईचारा अगर बचा है तो गांवों में। लेकिन क्या भाईचारा-मेलजोल, मिलनसारिता गावों में मिलती है! हकीकत में देखा जाए और कुछ पर्दे उठा कर झांका जाएं तो आज का ‘महाभारत’ अगर कहीं हो रहा है तो गावों में ही। प्रथम दृष्ट्या यह गलत लग सकता है, कुछ को बुरा भी, लेकिन थोड़ा करीब जाकर देखने पर यह आम दिखता है।

 

 

बेशक ‘महाभारत’ एक परिवार में घटित हुआ और जमीन को लेकर ही हुआ माना गया। आज इंच भर जमीन न देने को लेकर गांवों में बड़ी लड़ाइयां हो जाती हैं। जमीन तो यों भी गांवों में भावुकता का मामला रहा है, लेकिन जब से जमीन हासिल करने वाले अधिक हो चले हैं, तब से जमीन का बाजार भाव आसमान छू रहा है। बढ़ती कीमतों ने नई पीढ़ी हो या पुरानी, सभी की निगाह जमीन पर लगा दी है। मेरे गांव में रास्ते कभी इतने चौड़े होते थे कि वहां बैलगाड़ी चलती थी। अब भारत के किसी भी गांव में चले जाइए आपको मोहल्ले से लेकर एक खेत से दूसरे खेत में पहुंचने के लिए रास्ते नहीं मिल सकते हैं।

 

 

खेत, मेड़ से हुआ करते हैं, पर आज मेड़ की परिभाषा बदल दी गई है। मेड़ के नाम पर एक पतली-सी लकीर बची है, जिससे ट्रैक्टर तो क्या, इंसान भी संतुलन बनाने पर ही निकल पाता है। ऐसे में एक-एक इंच जमीन के लिए आए दिन लड़ाई छिड़ जाती है।
किसान गांव में रहने भर से नहीं, खेती करने से होते हैं। दबंग और धनी किसानों को छोड़ दीजिए। एक आम और कमजोर किसान के पास अगर खेत हो भी तो वह अपने खेत तक कैसे पहुंचे? बीच में कई दबंगों के खेत हों या ऐसे भाई का, जिसका मकसद दूसरे भाई को परेशान करना हो, तो वह कभी भी अपने खेत से पार होने से मना कर सकता है।

 

 

आए दिन सुनने को मिलता है कि किसान की जान चली गई। किसान क्यों जहर खाकर अपनी जान दे रहा है? क्यों खेत बेचने पर मजबूर हो रहा है? इसके अलावा, जमीन के लिए एक भाई जो कभी अपने पिता से लड़ता था, फिर अपने बड़े भाई से लड़ा और आज वह अपने भाई के बेटों और पोतों से भी लड़ रहा हो तो ‘महाभारत’ और कैसा होता है? किसे रिश्ता कहेंगे और कैसे कहेंगे कि भारत शहर में नहीं, गांवों में बसता है और भाईचारा शहर में नहीं, गांवों में है!

 
गांव में हर समय रचा जा रहा ‘महाभारत’ कोई नहीं लिखने वाला। हमारे-आपके जैसे साधारण लोग जो लिखने-पढ़ने में रुचि रखते हैं, वही इन सबको दर्ज करेंगे। सच यह है कि गांवों को अब नए सिरे देखने की जरूरत है। रिश्तों से लेकर पड़ोसियों और दूसरे गांव वालों के बीच जमीन तक के विवाद जो शक्ल ले रहे हैं, उसमें गांव को लेकर मुग्ध होना मुश्किल है। पहले भी गांव ‘समरथ को नहीं दोष गुसार्इं’ की छवि के साथ रहे हैं। अब वह नए रूप में सामने आ रहा है।

 

 

सामाजिक सवाल फिर से तकलीफदेह समीकरण रच रहे हैं। ऐसे में कमजोर आदमी गांव, पंचायत, अदालत की चक्की में पिसते हुए खेत बेच कर या छोड़ कर गांव से शहर कूच कर जाता है और फिर यह सवाल उठता है कि आखिर लोग गांव छोड़ कर शहर क्यों आ रहे हैं! मेरा कहना सिर्फ इतना है कि गांवों को लेकर मुग्ध होने के साथ-साथ वहां के कुछ कड़वे सवालों से भी दो-चार हो लिया जाए!

 

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