अच्छी सोच

बिना विनय के विद्या प्राप्त करने का कोई औचित्य नहीं है;यदि सभ्य नागरिक नहीं बन सके तो ऊंचे नंबरों की अंक तालिकाएं व्यर्थ हैं!

भले ही अंग्रेज हमें ‘स़ॉरी’ कहना सिखा गए हों, लेकिन हमने उसके भाव को आज भी समझने की कोशिश नहीं की है, केवल शब्द को रट लिया है। उसकी मूल चेतना तक हम नहीं पहुंच सके हैं। तेजी से समाज में क्षमा का भाव लुप्त होता जा रहा है, बल्कि हम किसी से अपनी गलती बोल कर मानना तो दूर, उसका अहसास तक नहीं करना चाहते हैं। अपने बच्चों को भी हम यह शिक्षा घरों में नहीं देते दिखते कि कोई गलती या छोटा-मोटा अपराध हो जाए तो तुरंत माफी मांग लो! एक समय राजनीतिक शुचिता का आलम यह था कि किसी मंत्री के महकमे में कोई गलती हो जाए तो वह उसकी जिम्मेदारी लेते हुए तुरंत अपने पद से इस्तीफा दे देता था। आज उसका इस्तीफा तो दूर, पार्टी अपने स्तर पर पहले तो उसे बचाने का भरसक प्रयास करती है और बहुत दबाव होने पर ही संबंधित मंत्री का इस्तीफा लिया जाता है।

 

 

गलत या अशोभनीय बयान देने पर भी ग्लानि भाव की जगह नेता मीडिया पर दोष लगाते हुए उसे तोड़-मरोड़ कर पेश किया गया बताते रहते हैं। व्यक्तिगत जीवन में हमारे अंदर का यह पश्चाताप का बोध समाप्त-सा होता जा रहा है। संयुक्त परिवारों के विघटन के कारणों में एक यह भी है। अपने आसपास अगर आप किसी को डांटते या समझाते हैं तो वह अपनी गलती को मानने की जगह मन में बैर भाव पाल लेता है और उसे स्वस्थ दृष्टि से नहीं लेता।

 

 
दरअसल, हमारे जीवन में अहंकार-बोध प्रबलतर होता जा रहा है। अपने व्यक्तित्व, अपनी जाति और पद को लेकर हम ज्यादा सजग रहने लगे हैं। खुद को श्रेष्ठ मानने की बीमारी समाज और परिवार में तेजी से घर करती जा रही है। मन की निर्मलता का भाव समाप्त हो गया है। आज का मनुष्य इतना भौतिकतावादी और अहंबोध से ग्रस्त है कि उसे कोई सलाह या सबक देना नागवार गुजरता है। यही कारण है कि लोगों के बीच आपस में टकराव बढ़ रहे हैं। एक-दूसरे को नीचा दिखाने की प्रवृत्ति तेजी से पनप रही है। कुछ हद तक इसमें बाजारवाद और विज्ञापनों की भी भूमिका है।

 

 
शरीर के रंग रूप या आकार को लेकर दूसरे के प्रति मखौल का भाव और वस्तुओं को लेकर यह कहना कि इससे पड़ोसी को ईर्ष्या होगी या आपका ब्रांड सर्वश्रेष्ठ है और यही आपके समाज में आगे बढ़ने का कारण है आदि। इन विज्ञापनों का प्रभाव मनोवैज्ञानिक रूप से कहीं न कही आपके अचेतन पर पड़ता है और आप जाने अनजाने रूखा या उद्दंड व्यवहार कर बैठते हैं। इन सबका दुष्प्रभाव यह हो रहा है कि हम एक ऐसे कृतघ्न समाज में तब्दील होते जा रहे हैं, जिसको अपने महापुरुषों, शहीदों, कलाकारों और यहां तक कि पुरखों के प्रति कृतज्ञता भाव भी नहीं बचा है। बिना उनके योगदान को जाने या पढ़े हम व्हाट्सऐप के ज्ञान के चलते आपसी बातचीत में भी हम उनके योगदान का उपहास उड़ाते नजर आते हैं।

 

 
कलाकारों, साहित्यकारों की जन्मस्थली आदि की दुर्दशा और राष्ट्रीय प्रतीक चिह्नों के प्रति विवाद का स्वर जब तब उठता रहता है। यह एक कृतघ्न समाज के निर्माण की ओर बढ़ते कदम ही हैं। हाल में राष्ट्रपिता गांधीजी को लेकर कुछ लोगों के बयान और उनके हत्यारे नाथूराम गोड्से का महिमामंडन भी एक अहसानफरामोश समाज का ही उदाहरण है। पहले किसी गलती के लिए विनम्रता से माफी मांग लिया जाता था और उसे एक अच्छी बात के रूप देखा जाता था। अब इस तरह सोचने वाले लोग तेजी से कम हो रहे हैं।

 

 
खेलों में क्रिकेट कभी ‘जेंटलमेन गेम’ कहा जाता था, लेकिन बढ़ते धनागम ने उसको व्यावसायिक अधिक बना दिया है और उसकी शालीनता गायब हो चुकी है। क्रिकेट के मैदान पर कई शर्मिंदा पैदा करने वाली घटनाएं सामने आ चुकी हैं। क्षमा को वीरों का आभूषण कहा गया है। दिनकर ने लिखा कि ‘क्षमा शोभती उस भुजंग को जिसके पास गरल हो’। नयी पीढ़ी ने इसका भावार्थ यह लिया कि गरल ही उगलो और बाहुबल का दुरुपयोग करो। इस आभूषण का त्याग कर वे ‘आभूषणों’ का भी गलत अर्थ हथियार समझ कर उसकी ओर बढ़ रहे हैं। अहिंसा, क्षमा, दया जैसे भाव किताबी रह गए हैं। हम तेजी से एक ऐसे देश में बदल रहे हैं जो न अपनी गलतियों से सीखना चाहता है और न उसके लिए कोई ठहर कर पश्चाताप करना चाहता है। आज गलती करके सीनाजोरी करना ही शगल हो गया है।

 

 
बढ़ते अपराध और परिवारों में टूटन तथा कामकाजी वातावरण में तनाव इसी कारण बढ़ रहा है। जरूरत है कि दैनिक जीवन में अभिभावक अपने बच्चों के विनम्रता का पाठ सिखाएं, क्योंकि बिना विनय के विद्या प्राप्त करने का कोई औचित्य नहीं है। अगर आप एक संवेदनशील और सभ्य नागरिक नहीं बन सके तो ऊंचे नंबरों की अंक तालिकाएं व्यर्थ हैं!

 

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