देश

हवा के हजार दुश्मन

देश की राजधानी दिल्ली और एनसीआर में वायु प्रदूषण में एकाएक खतरनाक स्तर तक बढ़ोतरी से हर कोई चिंतित है। एक सर्वे में सामने आया है कि दिल्ली के करीब चालीस फीसद लोग प्रदूषण से बचने के लिए कहीं और जाने को तैयार हैं। दिल्ली में हवा को खराब करने में पराली का बड़ा हाथ रहा। नवंबर के पहले हफ्ते में यहां वायु गुणवत्ता सूचकांक यानी एयर क्वालिटी इंडेक्स चार सौ के पार चला गया जो खतरनाक माना जाता है। इसी के चलते दिल्ली में स्वास्थ्य आपातकाल का एलान किया गया। निर्माण कार्यों पर रोक लगा दी गई और स्कूल बंद कर दिए गए।

 

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प्रधानमंत्री कार्यालय ने प्रदूषण के लिए एक समिति गठित की है, जो देश के करीब चालीस शोध संस्थानों के साथ मिल कर दिल्ली-एनसीआर में वायु प्रदूषण के साथ-साथ बंगलुरु, हैदराबाद और पुणे की प्रदूषण संबंधी समस्याओं पर दो हफ्ते में रिपोर्ट दाखिल करेगी। उधर सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली, हरियाणा, पंजाब और उत्तर प्रदेश की सरकारों को फटकार लगाई है। फटकार की मुख्य वजह इन राज्यों में पराली जलाना रही। सुप्रीम कोर्ट ने इन सभी राज्यों को माकूल उपाय अपनाने या फिर परिणाम भुगतने के लिए तैयार रहने की चेतावनी भी दी। मगर पराली ही प्रदूषण की अकेली और सबसे बड़ी वजह नहीं है। अगर दिवाली और उसके आसपास के करीब हफ्ते-दो हफ्ते के वक्त को छोड़ दिया जाए, तो क्या बाकी के ग्यारह महीने प्रदूषण सीमा के भीतर रहता है? इसका जवाब है नहीं।

 

 

‘दि एनर्जी एंड रिसोर्सेज इंस्टीट्यूट’ यानी टेरी के मुताबिक दिल्ली के प्रदूषण में छत्तीस फीसद हिस्सेदारी खुद दिल्ली की है। जबकि चौंतीस फीसद प्रदूषण के लिए एनसीआर के शहर जिम्मेदार हैं। दिल्ली इकोनॉमिक सर्वे के मुताबिक मार्च, 2018 में दिल्ली में वाहनों की कुल संख्या 1.09 करोड़ पहुंच गई। इनमें करीब सत्तर लाख दुपहिया वाहन हैं और करीब पैंतीस लाख कारें और जीप। बाकी ट्रक, तिपहिया और अन्य वाहन हैं। दिल्ली में हर रोज करीब बारह सौ नए वाहन भी रजिस्टर होते हैं। टेरी के अध्ययन के मुताबिक दिल्ली में अट्ठाईस प्रतिशत पीएम 2.5 प्रदूषण इन्हीं वाहनों से होता है। इसके अलावा जेनरेटर, र्इंट के भट्टों, स्टोन क्रशर और उद्योगों से तीस प्रतिशत, निर्माण कार्यों की वजह से उड़ने वाली धूल से तीन प्रतिशत प्रदूषण होता है। यही नहीं, दिल्ली के आवासीय इलाकों की भी प्रदूषण में करीब दस फीसद की हिस्सेदारी है।

 
एक वाहन में एक गैलन यानी करीब पौने चार लीटर र्इंधन से नौ किलो कार्बन डाई ऑक्साइड का उत्सर्जन होता है। औसतन एक कार एक साल में करीब छह टन कार्बन डाई आॅक्साइड का उत्सर्जन करती है। सहज ही अंदाजा लगाया जा सकता है कि दिल्ली में एक करोड़ वाहन पर्यावरण के साथ क्या खिलवाड़ करते हैं। यह सही है कि सभी एक करोड़ वाहन हर दिन सड़क पर नहीं होते, लेकिन इस बात का कोई आंकड़ा नहीं है कि हर रोज दिल्ली की सड़कों पर कितने वाहन होते हैं। फिर भी मान लिया जाए कि एक तिहाई यानी तैंतीस-पैंतीस लाख वाहन ही रोजाना सड़क पर होते हैं, तो भी नतीजा कोई राहत देने वाला नहीं होता।

 
इन सबके अलावा दिल्ली-एनसीआर की आबोहवा खराब करने में बड़ा हाथ एयर कंडीशनरों का है। एयर कंडीशनर से निकलने वाला क्लोरोफ्लोरोकार्बन हवा को सीधे तौर पर तो प्रदूषित नहीं करता, लेकिन यह वायुमंडल में ओजोन परत को भारी नुकसान पहुंचाता और अल्ट्रा वायलेट विकिरण बढ़ाता है। एयरकंडीशनर के लिए ज्यादा बिजली की जरूरत होती है जो आज भी ज्यादातर कोयले से पैदा की जाती है। कोयले को जलाने पर नाइट्रस आॅक्साइड, सल्फर डाई आॅक्साइड और कार्बन डाइ आॅक्साइड जैसी नुकसानदेह गैसें पैदा होती हैं।

 
इसको इस तरह समझ सकते हैं कि डेढ़ टन का एक एसी अगर चौबीस घंटे चले तो करीब छत्तीस से चालीस वॉट बिजली खाता है, जबकि एक सामान्य पंखा केवल 1.8 वॉट और नई तकनीक वाला बीएलडीसी पंखा एक वॉट से भी कम बिजली की खपत करता है। इसको ऊर्जा के उत्पादन में इस्तेमाल र्इंधन के हिसाब से देखें तो डेढ़ टन के एक एसी के लिए पांच किलो कोयले की खपत होगी, जिससे करीब सात किलो कार्बन डाई आॅक्साइड निकलेगी। सामान्य पंखे के लिए कोयले की मात्रा दो सौ ग्राम और कार्बन डाई आॅक्साइड केवल तीन सौ ग्राम निकलेगी। बीएलडीसी पंखे के लिए कोयले की मात्रा केवल नब्बे ग्राम और कार्बन डाई आॅक्साइड केवल सौ ग्राम निकलेगी। 2011 की मर्दमशुमारी के मुताबिक दिल्ली में लगभग 29.5 प्रतिशत घरों में एयरकंडीशनर लगे थे। करीब छब्बीस फीसद के साथ दूसरे नंबर पर चंडीगढ़ और फिर तीसरे नंबर पर करीब उन्नीस प्रतिशत के साथ पंजाब और गोवा हैं। जाहिर है, बीते नौ सालों में दिल्ली में यह आंकड़ा और बढ़ा होगा।

 

 

इंटरनेशनल एनर्जी एजेंसी की एक रिपोर्ट में कहा गया है कि एयर कंडीशनर की एनर्जी एफिशियंसी के मामले में भारत विश्व के कई देशों की तुलना में पिछड़ा हुआ है। दिल्ली में ग्लोबल कूलिंग इनोवेशन समिट के दौरान जारी एक रिपोर्ट के मुताबिक 2016 में भारत में करीब 2.63 करोड़ रूम एयरकंडीशनर थे, जो 2050 तक बढ़ कर एक अरब से ज्यादा हो जाएंगे। यानी अड़तीस गुना बढ़ोतरी। यही नहीं, प्रति व्यक्ति स्पेस कूलिंग खपत 69 किलोवॉट प्रति घंटे से बढ़ कर 1140 किलोवॉट प्रतिघंटा हो जाएगी।
ऐसे में जरूरत लगातार हर रोज प्रदूषण को कम करने के उपाय अपनाने की है, न कि किसी खास वक्त पर कुछ खास उपाय अपनाने की। इसमें गाड़ियों की संख्या और एयरकंडीशनर पर लगाम लगाना भी शामिल है।

 

 

एयरकंडीशनर को लेकर सरकारी क्षेत्र की एनर्जी एफिशियंसी सर्विसेज लिमिटेड (ईईएसएल) ने हाल ही में कम खपत और कम हानिकारक गैस उत्सर्जित करने वाला एयरकंडीशनर बनाया है। कंपनी का दावा है कि इसके पचास हजार एयरकंडीशनर सालाना 14.55 करोड़ किलोवाट बिजली की बचत करेंगे और इससे वायुमंडल में 1.2 लाख टन कार्बन डाईआॅक्साइड कम होगी। ऐसी और कोशिशों को प्रोत्साहित करने की जरूरत है।
चीन की राजधानी बेजिंग में प्रदूषण की रोकथाम के लिए सीमित संख्या में वाहनों की बिक्री का नियम लागू है। भारत में भी वाहनों की बिक्री पर सख्ती की जरूरत है। सम-विषम जैसे उपाय कितने कारगर हैं, इसके भरोसेमंद आंकड़ों की अभी दरकार है, लेकिन तार्किक दृष्टि से देखा जाए तो अगर सड़कों पर वाहन कम होंगे, तो प्रदूषण भी कम ही होगा। इसे लंबे समय तक जारी रखा जाए, तो अनुकूल नतीजे आ सकते हैं। इसके अलावा हफ्ते में अलग-अलग दिन कुछ खास तरह के वाहनों के चलने पर प्रतिबंध लगाया जा सकता है। सिंगापुर में सोमवार से शुक्रवार तक एसयूवी चलाने पर रोक है। अगर इस दौरान एसयूवी चलानी है तो पहले उसके लिए फीस भर कर रसीद लेनी होती है।
हमारे यहां विरोध का एक स्वरूप वर्ग विभेद से भी जुड़ा दिख रहा है। क्या प्रदूषण के कारकों में उन्हीं को निशाना बनाया जा रहा है, जो प्रतिरोध करने की हालत में नहीं हैं? मसलन, किसान या छोटे उद्योग चलाने वाले? दिल्ली में एसी के इस्तेमाल पर लगाम के लिए तो आज तक कोई आवाज नहीं उठाई गई। कारों को लेकर सम-विषम योजना के एलान के साथ ही विरोध शुरू हो जाता है। यहां तक कि अदालत भी इस पर सवाल उठा देती है। मगर पराली का मौसम आते ही चारों ओर से किसानों पर सख्ती और जुर्माने की मांग होने लगती है। और यह उसी तबके से होती है, जो र्इंधन पीने वाली गाड़ियों से दिल्ली एनसीआर की सड़कों पर पूरे साल प्रदूषण फैलाने का सबसे बड़ा गुनहगार है।

 

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