अच्छी सोच

दोहरेपन का दायरा

समृद्ध सामाजिक और सांस्कृतिक विरासत वाले हमारे देश और समाज ने बीती शताब्दियों, दशकों और सालों में बहुत से बदलाव देखे हैं। समय के साथ हर पल, हर रोज बहुत कुछ बदल रहा है। प्राचीन काल से लेकर आज तक के दौर ने जो कुछ भी हमें विरासत में दिया है, उसमें अच्छा और बुरा दोनों ही समाहित है। मनुष्य दरअसल हमेशा से बदलाव का पक्षधर रहा है और प्रयत्नशील भी। किसी को अच्छाई में भी बुराई नजर आती है तो किसी को बुराई में भी अच्छाई। यह अपने-अपने संदर्भों और विचार-निर्माण की प्रक्रिया पर निर्भर करता है कि कोई व्यक्ति किस कोण पर खड़ा है। अगर हम वर्तमान समय के बदलाव के साक्षी होकर अपनी अपेक्षाओं के अनुरूप घर, परिवार, समाज और देश को देखना चाहते हैं तो हमें अपने साहित्य, रीतियों-कुरीतियों, अंधविश्वासों,अर्थव्यवस्था और सामाजिक परिवेश के संदर्भों में बदलाव की उम्मीदों के साथ खुद का आकलन भी करना होगा। हम बुरे को अच्छे में बदला हुआ तो देखना चाहते हैं, मगर एक संवेदनशील व्यक्ति के रूप में अच्छाई को आत्मसात करने और सामाजिक बदलाव के लिए क्या हम जमीनी स्तर पर कृतसंकल्पित और प्रयासरत हैं? यह कहना अतिश्योक्ति नहीं होगा कि आज बढ़ती बुराई और घटती अच्छाई के लिए शायद हमारे चरित्र का दोहरापन ही दोषी है। इस मामले में अक्सर हमारा ध्यान नहीं जाता या फिर हम जानते-बूझते हुए भी इसकी अनदेखी करते हैं।

 

 

कहतें हैं कि साहित्य समाज का दर्पण होता है। किसी भी देश का साहित्य उठा कर देखें तो उस देश-समाज के साहित्य से हम उसे बेहतर तरीके से जान और समझ सकते हैं। हमारे यहां भी संत कवियों, जिनमें तुलसी, ाीरा, कबीर, रहीम से लेकर मुंशी प्रेमचंद, निराला, नागार्जुन तक के रचे साहित्य में जहां तत्कालीन समाज की विसंगतियों की बात के साथ बदलाव के सकारात्मक विचार नजर आते हैं, जो सामाजिक बदलाव में आज भी प्रासंगिक है, वहीं आज रचे जा रहे अधिसंख्य साहित्य और लेखन में हमारे चरित्र का दोहरापन उभर कर सामने आ रहा है। लेखक के रूप में ख्यात कोई व्यक्ति जो टेबल के उस तरफ बैठा है, इस तरफ खड़े पीड़ित व्यक्ति के साथ न्याय करता नजर नहीं आ रहा है। कथा-कहानी और कविता में लेखक का जो फटेहाल नायक गरीब, किसान या दबा-कुचला शोषित है, उसका आर्थिक शोषण करने में अपने पद का लाभ लेते हुए वह जरा भी कोताही नहीं करता। अब ऐसे दोहरे चरित्र के साथ हम किससे और कैसे बदलाव की अपेक्षा कर रहे हैं?

 

 
परंपराओं के नाम पर रीति, कुरीतियों और अंधविश्वास को ढोते कई ऐसे प्रगतिवादी भी देखने में आ जाते हैं जो इनसे लिपटे भी हैं और इन्हें छोड़ने की आदर्शवादी बातें भी बनाते हैं। सबके लिए समान अर्थव्यवस्था और पूंजीवाद के खिलाफ किसी खास ‘वाद’ से बंधे होने का दावा करने वाले ऐसे कितने ही बुद्धिजीवी हमारे आसपास मौजूद हो सकते हैं जो शराफत के लिबास में सिली अपनी जेब को मौका मिलते ही दो नंबर के पैसों से भरते देर नही करते होंगे। इसमें संदेह नहीं कि ऐसे लोगों के बीच एक से एक ईमानदार शख्सियत भी होंगे जो विचार और व्यवहार के बीच किसी भी फांक को स्वीकार नहीं करते होंगे, लेकिन फासीवाद और राष्ट्रवाद को पानी पी-पी कर कोसने वाले ऐसे भी लोग हैं जो मौका मिलते ही उन्हीं के मंचों और पदों को स्वीकारते हुए देखे जा सकते हैं।

 

 
बदलते सामाजिक संदर्भों की बात करें तो आज समाज में एक दूसरे से बढ़ती दूरी और आत्मकेंद्रित होता मनुष्य बीते हुए सुनहरे कल की बातें करता नहीं थकता। जब आत्मीयता, अपनापन, मिलनसारिता, दुख-सुख की आपसी साझेदारी और संयुक्त परिवार की ताकत एक दूसरे की ताकत हुआ करती थी। मगर क्या शाब्दिक रोना-धोना से वह सुनहरा कल लौट सकता है? फेसबुक या वाट्सऐप जैसे सोशल मीडिया में उलझे रहने का उलाहना तो एक दूसरे को सभी देते हैं, मगर इन सबसे हट कर फिर से आत्मीय मिलनसारिता के ईमानदार प्रयास कितने करते हैं? रिश्तों में बढ़ती खटास खत्म करने की, अपनों से अबोलापन खत्म करने की ईमानदार पहल कितने करते हैं?

 

 
समाज में अस्वच्छता फैलाना, लड़के-लड़की में भेद करना, राष्ट्रीय संपत्ति को नुकसान पहुंचाना, महिलाओं के प्रति दुर्भावना रखना, अन्याय के खिलाफ चुप रहना, निरीह के प्रति क्रूरता- ये ऐसे अपराध हैं, जिनके लिए हमारे अंतर्मन से ही सही-गलत की आवाज आनी चाहिए। दोहरे चरित्र से बदलाव संभव नहीं है, बल्कि इसका उल्टा असर होगा। अगर आज का सामाजिक परिदृश्य हमारी उम्मीदों के अनुकूल नहीं है तो क्या वह किसी जादुई चिराग से बदलेगा? एक तरफ तो हम घर, परिवार, समाज और देश में सकारात्मक बदलाव चाहते हैं, दूसरी तरफ तमाम विसंगतियों को स्वीकारते हुए चुप्पी ओढ़ लेते हैं। ऐसे में हमारे दोहरे चरित्र से समाज में बेहतर और अपेक्षित बदलाव की उम्मीदें कैसे की जा सकती हैं!

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