अखण्ड भारत

निकोला टेस्ला : एक महान वैज्ञानिक जो वेदांत की वैज्ञानिक व्याख्या करना चाहता था

निकोला टेस्ला के कुछ आलेखों में ‘आकाश’ और ‘प्राण’ जैसे संस्कृत शब्द मिलते हैं और कहा जाता है कि अमेरिका में उनकी स्वामी विवेकानंद से मुलाकात भी हुई थी.

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यह जून, 1884 की बात है जब निकोला टेस्ला ऑस्ट्रिया से न्यूयॉर्क के लिए रवाना हुए. उन्हें उस दौर के महान वैज्ञानिक थॉमस एडीसन से मिलना था. टेस्ला के पास एडीसन के ही एक पूर्व सहयोगी का खत था. एडीसन को संबोधित करते हुए उसने लिखा था, ‘मैं इस दुनिया के दो महान लोगों को जानता हूं. इनमें से एक तुम हो और दूसरा यह व्यक्ति!’

 

 

‘सबसे महान कौन?’ किसी क्षेत्र (कार्यक्षेत्र) के लिए यह हर दौर का सबसे दिलचस्प सवाल होता है. 28 साल का एक बेहद प्रतिभाशाली युवा वैज्ञानिक जब पहली बार एडीसन से मिला तो उसके साथ आए खत ने तभी इस सवाल की नींव रख दी थी. इन दोनों वैज्ञानिकों को बिजली के क्षेत्र में अद्भुत सिद्धांत देने और जीवनोपयोगी आविष्कार करने के लिए जाना जाता है. यही वजह है कि अक्सर इनकी तुलना की जाती है. यह सवाल आज भी बुद्धिजीवियों और वैज्ञानिक हलकों के बीच चर्चा का विषय है कि इन दोनों में सबसे प्रतिभाशाली वैज्ञानिक और आविष्कारक कौन था, बल्ब बनाकर दुनिया को रोशन करने वाले थॉमस एल्वा एडीसन या फिर अल्टरनेट करेंट (एसी) का इस्तेमाल व्यवहारिक बनाकर धरती के कोने-कोने तक बिजली पहुंचाने वाले निकोला टेस्ला.

 
यदि हम आम लोगों की बात करें तो उनके बीच एडीसन कहीं ज्यादा लोकप्रिय हैं. उन्हें एक प्रेरक व्यक्तित्व की तरह दुनियाभर के स्कूली पाठ्यक्रम पढ़ाया जाता है. बचपन में ही एडीसन की सुनने की क्षमता जाती रही लेकिन यह शारीरिक कमी विज्ञान के प्रति उनकी लगन में कभी बाधा नहीं बन पाई. उन्होंने अकेले अमेरिका में एक हजार से ज्यादा आविष्कार अपने नाम पर पेटेंट करवाए थे. दूसरी तरफ निकोला टेस्ला इस मामले में कुछ दुर्भाग्यशाली कहे जा सकते हैं. लेकिन यदि हम उनके वैज्ञानिक सिद्धांतों और आविष्कारों की बात करें तो वे एडीसन से कहीं भी कम प्रतिभाशाली नहीं थे.

 

 

टेस्ला के पास एडीसन के ही एक पूर्व सहयोगी का खत था. एडीसन को संबोधित करते हुए उसने लिखा था, ‘मैं इस दुनिया के दो महान लोगों को जानता हूं. इनमें से एक तुम हो और दूसरा यह व्यक्ति!’

 

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टेस्ला ने एडीसन को पछाड़ा था

 

निकोला टेस्ला का जन्म 1856 में तत्कालीन सर्बिया में हुआ था. जैसा कि जन्मजात प्रतिभाओं के साथ होता है, टेस्ला की दिमागी क्षमता बचपन से ही अद्भुत थी. माना जाता है कि वैज्ञानिक भाषाएं सीखने में कमजोर होते हैं लेकिन टेस्ला के साथ यह बात नहीं थी. युवा अवस्था तक पहुंचते-पहुंचते वे अपनी मातृभाषा सर्बो के साथ-साथ इंग्लिश, फ्रैंच, जर्मन जैसी आठ भाषाएं लिखने-पढ़ने और बोलने लगे थे. वहीं गणित-विज्ञान में तो उनकी विशेषज्ञता थी ही. उन्होंने आस्ट्रिया के ग्रेज स्थित पॉलिटेक्निक संस्थान से इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग की पढ़ाई की थी और इसी दौरान उन्हें समझ आ गया था कि बिजली के जिस रूप – डायरेक्ट करेंट (डीसी) को इतना बढ़ा-चढ़ाकर उपयोगी बताया जा रहा है वह गलत है. टेस्ला उसी समय दूसरे विकल्प यानी एसी को ज्यादा उपयोगी बनाने के बारे में सोचने लगे थे.

 

 

डीसी में इलेक्ट्रॉन सिर्फ एक ही दिशा में गतिमान होते हैं और जिससे बिजली को लंबी दूरी तक नहीं भेजा जा सकता, वहीं एसी में इलेक्ट्रॉन बार-बार में अपनी दिशा बदलते हैं जिससे बिजली न सिर्फ ज्यादा दूरी तक भेजी जा सकती है बल्कि उसे कई तरीके से उपयोगी भी बनाया जा सकता है. 19वीं सदी के अंत तक डीसी बिजली को जादू की तरह देखा जा रहा था और इसके जादूगर थे एडीसन. टेस्ला की दिलचस्पी भी इस क्षेत्र में थी और आखिरकार 1884 में उनकी एडीसन से मुलाकात हो गई. इसी मुलाकात से जुड़ी एक घटना का जिक्र हमने आलेख की शुरुआत में किया है.

 

 

एडीसन उस समय तक आविष्कारक से साथ-साथ उद्योगपति भी बन चुके थे. उन्होंने डीसी बिजली सप्लाई के लिए एक प्लांट तैयार किया था और वे चाहते थे कि टेस्ला इसमें सुधार करें. टेस्ला अपने संस्मरणों में लिखते हैं कि एडीसन ने यह काम पूरा होने पर उन्हें 50 हजार डॉलर देने का वादा किया था लेकिन वे अपने वादे से मुकर गए. टेस्ला के लिए यह किसी झटके से कम नहीं था. उन्होंने तुरंत एडीसन का साथ छोड़ दिया.

 

 

टेस्ला अपने संस्मरणों में लिखते हैं कि एडीसन ने उन्हें 50 हजार डॉलर देने का वादा किया था लेकिन वे अपने वादे से मुकर गए. टेस्ला के लिए यह किसी झटके से कम नहीं था. उन्होंने तुरंत एडीसन का साथ छोड़ दिया.

 

 

उस समय तक अमेरिकी निवेशकों और वैज्ञानिकों के बीच यह बात प्रचारित हो चुकी थी कि एसी पावर सिस्टम और एसी मोटर पर टेस्ला का काम बिजली के क्षेत्र में एक बड़ा बदलाव ला सकता है. इसी सोच के साथ वेस्टर्न यूनियन कंपनी ने तुरंत टेस्ला को अपने यहां काम का प्रस्ताव दे दिया. यहीं टेस्ला ने एसी पावर सिस्टम और मोटर का विकास किया था. ये ऐसे आविष्कार थे जो बिजली सप्लाई क्षेत्र में एडीसन की कंपनी – एडीसन इलेक्ट्रिक लाइट कंपनी को पछाड़ सकते थे. जल्दी ही ऐसा हो भी गया. टेस्ला ने ये आविष्कार एक दूसरी कंपनी को बेच दिए थे. वेस्टिंग हाऊस इलेक्ट्रिक कंपनी ने इन नई खोजों के आधार पर एसी बिजली को पूरे अमेरिका में चलन में ला दिया और आखिरकार एडीसन को इस क्षेत्र से हटना पड़ा.

 

 

वैसे तो यह कंपनियों की लड़ाई थी लेकिन इसने बतौर वैज्ञानिक-आविष्कारक टेस्ला की प्रतिष्ठा को नई ऊंचाइयों पर पहुंचा दिया. उनके द्वारा विकसित किए गए एसी ट्रांसफॉर्मर और एसी मोटर ने जैसे बिजली की उपयोगिता को नए पंख दे दिए थे. बिना इनके हम औद्योगिक क्रांति की कल्पना नहीं कर सकते.

 

 

टेस्ला ने इसके बाद ‘टेस्ला क्वॉइल’ का आविष्कार किया. यह ऐसी खोज थी जिसका इस्तेमाल एक्स रे से लेकर वायरलेस कम्यूनिकेशन तक में हुआ. इसी खोज के कारण टेस्ला की एक और आविष्कारक-उद्यमी गुलीलमो मार्कोनी के साथ कानूनी लड़ाई भी चली. मार्कोनी को दुनिया रेडियो के आविष्कारक के तौर पर जानती है लेकिन टेस्ला का दावा था कि उन्होंने टेस्ला क्वॉइल के साथ ही रेडियो का विकास कर लिया था. यह मामला बाद में अमेरिका की शीर्ष अदालत तक पहुंचा और बहुत कम लोगों को यह जानकारी होगी कि अदालत ने मार्कोनी के तमाम दावों को खारिज करते हुए टेस्ला को इस आविष्कार का श्रेय दिया था. हालांकि जब यह फैसला आया उससे छह महीने पहले टेस्ला (सात जनवरी, 1943) का निधन हो चुका था.

 

स्वामी विवेकानंद ने एक पत्र में लिखा है कि यदि टेस्ला अपने प्रयोग में कामयाब हो जाते हैं तो वेदांत की वैज्ञानिक जड़ों की पुष्टि हो जाएगी.

 

 

निकोला टेस्ला पर वेदांत दर्शन का प्रभाव

स्वामी विवेकानंद जुलाई, 1893 में अमेरिका पहुंचे थे. इसी साल सितंबर में विश्व धर्म संसद का आयोजन हुआ जिसने विवेकानंद और हिंदू धर्म के वेदांत दर्शन को अमेरिकी बौद्धिक जगत के बीच पहुंचा दिया था. टेस्ला और एडीसन की प्रतिद्वंदिता और उनके आविष्कारों के भारी प्रचार के चलते इस दौर तक अमेरिका के सामान्य पढ़े-लिखे तबके में विज्ञान को लेकर जागरूकता और जिज्ञासा आ चुकी थी. इसी समय अमेरिका के वैज्ञानिक चेतना संपन्न समाज का परिचय वेदांत दर्शन से हुआ. दुनिया के सबसे प्राचीन धर्म का यह दर्शन कई मायनों इस समाज को वैज्ञानिक लगा. किसी भी वस्तु या घटना के मूल में एक परम सत्ता की उपस्थिति और प्रकृति के साथ जीवन की एकात्मता वेदांत दर्शन का ऐसा मूल सूत्र था जिसने वैज्ञानिक समुदाय को भी अपनी तरफ आकर्षित किया.

 

 

माना जाता है निकोला टेस्ला भी वेदांत दर्शन से काफी प्रभावित थे. 1907 में उन्होंने ‘मैन्स ग्रेटेस्ट अचीवमेंट’ शीर्षक के साथ एक आलेख लिखा था. इसमें उन्होंने ‘आकाश’ और ‘प्राण’ जैसे संस्कृत शब्दों का प्रयोग किया है, ‘जिन भी पदार्थों की अनुभूति की जा सकती है वे मूल रूप से एक ही तत्व या उस विरलता से निकले हैं जिसका कोई शुरुआत नहीं है, जिससे हर स्थान, आकाश या प्रकाशमान ईथर भरा हुआ है, जो जीवन देने वाले प्राण या रचनात्मक ऊर्जा से प्रभावित होता है…’

 

 

टेस्ला पदार्थ-ऊर्जा संबंध को गणित के माध्यम से स्थापित करने में कामयाब नहीं हो पाए थे लेकिन वेदांत दर्शन के प्रभाव के चलते वे इसे स्वीकार करते थे.

 

 

कहा जाता है कि टेस्ला की स्वामी विवेकानंद से मुलाकात हुई थी और इसके बाद उन्होंने वेदांत दर्शन पर गंभीरता से चिंतन शुरू किया था. हालांकि इसका कोई प्रमाण नहीं है लेकिन कुछ दस्तावेज इस तरफ इशारा करते हैं. इनमें पहला दस्तावेज खुद स्वामी विवेकानंद का एक पत्र है जो उन्होंने शायद टेस्ला से मुलाकात के कुछ दिन पहले लिखा था. इसमें वे कहते हैं, ‘मिस्टर टेस्ला सोचते हैं कि वे गणितीय सूत्रों के जरिए बल और पदार्थ का ऊर्जा में रूपांतरण साबित कर सकते हैं. मैं अगले हफ्ते उनसे मिलकर उनका यह नया गणितीय प्रयोग देखना चाहता हूं (विवेकानंद रचनावली, वॉल्यूम – V).’ विवेकानंद इसी पत्र में आगे कहते हैं कि टेस्ला का यह प्रयोग वेदांत की वैज्ञानिक जड़ों को साबित कर देगा जिनके मुताबिक यह पूरा विश्व एक अनंत ऊर्जा का रूपांतरण है.

 

 

इसके अलावा अतर्राष्ट्रीय टेस्ला सोसायटी के अध्यक्ष रहे टॉबी ग्रोट्ज का भी एक आलेख बताता है कि एक सार्वजनिक कार्यक्रम में स्वामी विवेकानंद और निकोला टेस्ला की मुलाकात हुई थी. हालांकि टेस्ला पदार्थ-ऊर्जा संबंध को गणित के माध्यम से स्थापित करने में कामयाब नहीं हो पाए थे लेकिन वेदांत दर्शन के प्रभाव के चलते वे इसे स्वीकार करते थे. बाद में अलबर्ट आइंस्टीन ने पदार्थ-ऊर्जा संबंध समीकरण को साबित किया था और यह एक तरह से वेदांत दर्शन के एक मूल विचार की स्थापना थी.

 

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